मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह अनआम ६
(क़िस्त - 2 )
मुसलमानों!
क्या तुम को मालूम है कि इस वक़्त दुन्या में और ख़ास कर बर्रे सग़ीर हिंद (भारत उप महा द्वीप) में आप का सब से बड़ा दुश्मन कौन है?
कोई और नहीं आप को पीछे खड़ा आप का मज़हबी रहनुमा,
आप का आलिम ए दीन, मौलाना, मोलवी साहब और मुल्लाजी का गिरोह.
आप का आलिम ए दीन, मौलाना, मोलवी साहब और मुल्लाजी का गिरोह.
जी हाँ! चौंकिए मत यही हज़रात आप के अस्ल मुजरिम हैं, बज़ाहिर आप के ख़ैर ख़्वाह.
ये मजबूरी में पेशेवर हैं क्यूं कि इनको मदरसों में ढाला गया है और कोई जीविका इनके लिए नहीं है . इनका ज़रीया मुआश दीन है.
ये मजबूरी में पेशेवर हैं क्यूं कि इनको मदरसों में ढाला गया है और कोई जीविका इनके लिए नहीं है . इनका ज़रीया मुआश दीन है.
मगर इनके लिए दीन कोई हक़ीक़त नहीं, जैसा कि आप समझते हैं.
यह दीन के क़रीब तर रह कर इसको उरियाँ हालत में देख चुके हैं.
अब इन के लिए कोई अख़लाक़ी क़द्रें देखना बाक़ी नहीं बचीं.
इन्हें दीन की पर्दापोस्शी करनी है.
यह दीन के क़रीब तर रह कर इसको उरियाँ हालत में देख चुके हैं.
अब इन के लिए कोई अख़लाक़ी क़द्रें देखना बाक़ी नहीं बचीं.
इन्हें दीन की पर्दापोस्शी करनी है.
इनको इनकी तालीमी वक्फ़े में यही सिखलाया गया है.
यही ''पर्दापोस्शी".
यही ''पर्दापोस्शी".
यह निन्नानवे फ़ी सद आलिमे दीन ग़रीब, मुफ़लिस, मोहताज घरों के फ़ाक़ा कश बच्चे होते हैं.
तालीम के नाम पर जो कुछ पाया है, इसी में फ़सल जोतना, बोना, सींचना और काटना है.
यह पैदाइशी मुन्तक़िम (प्रति शोधक) होते हैं,
इसकी वजह ग़ुरबत के मारे, दूसरी वजह तालीमी विषय का इन पर ग़लत थोपन है.
इसकी वजह ग़ुरबत के मारे, दूसरी वजह तालीमी विषय का इन पर ग़लत थोपन है.
ये अव्वल दर्जे के अय्यार, परले दर्जे के ईमान फ़रोश हो जाते हैं.
ये अपने साथ की गई समाजी ना इंसाफी का बदला उस समाज से गिन गिन कर लेते है जिसने इनके साथ न इंसाफी की है.
ये अपने साथ की गई समाजी ना इंसाफी का बदला उस समाज से गिन गिन कर लेते है जिसने इनके साथ न इंसाफी की है.
आप अपने बच्चों को इनके साए से दूर रखिए क्यूंकि क़ुरआनी जन्नत में मिलने वाली हूरें और गुलामों की यौन सेवाएँ इन्हें जिंसी बे राह रवी का शिकार बना देती हैं. मस्जिद के हुजरे हों चाहे मदरसे की छत,
ये हर जगह बाल शोषण करते हुए पकडे़ जाते हैं.
ये हर जगह बाल शोषण करते हुए पकडे़ जाते हैं.
यह दीन धरम के ख़ुद साख्ता पैग़म्बर और स्वयम्भू बने भगवान आज तक अपने विरोधी इन्सान को, इंसानियत को जी भर के कोसते काटते, गलियां, देते और तरह तरह की उपाधियाँ प्रदान करते चले आए हैं.
हम कुछ नहीं कर सकते, कानून इनका संरक्षक है. हुकूमतें इनकी पुश्त पनाही में हैं. जनता इनके साथ में है, मगर शिक्षित,और जागृति जनता, बेदार अवाम अब सिर्फ़ सच के साथ हैं.
अब देखें मुहम्मदी अल्लाह को कि क्या कहता है - - -
हम कुछ नहीं कर सकते, कानून इनका संरक्षक है. हुकूमतें इनकी पुश्त पनाही में हैं. जनता इनके साथ में है, मगर शिक्षित,और जागृति जनता, बेदार अवाम अब सिर्फ़ सच के साथ हैं.
अब देखें मुहम्मदी अल्लाह को कि क्या कहता है - - -
''उन्हों ने देखा नहीं हम उनके पहले कितनी जमाअतों को हलाक कर चुके हैं, जिनको हमने ज़मीन पर ऐसी क़ूवत दी थी कि तुम को वह क़ूवत नहीं दिया और हम ने उन पर ख़ूब बारिश बरसाईं हम ने उनके नीचे से नहरें जारी कीं फिर हमने उनको उनके गुनाहों के सबब हलाक कर डाला''
सूरह अनआम -६-७वाँ पारा आयत (6)
मुहम्मद का रचा अहमक अल्लाह अपने जाल में आने वाले क़ैदियों को धमकता है कि तुम अगर मेरे जाल में आ गए तो ठीक है वर्ना मेरे ज़ुल्म का नमूना पेश है, देख लो. उस वक़्त के लोगों ने तो ख़ैर खुल कर इन पागल पन की बातों का मज़ाक़ उडाया था मगर जिहाद के माले-ग़नीमत की हांडी में पकते पकते आज ये पक्का ईमान बन गया है. यही अलक़ायदा और तल्बानियों का ईमान है.
ये अपनी मौत ख़ुद मरेंगे मगर आम बे गुनाह मुसलमान अगर वक़्त से पहले न चेते तो गेहूं के साथ घुन की मिसाल बन जायगी.
ये अपनी मौत ख़ुद मरेंगे मगर आम बे गुनाह मुसलमान अगर वक़्त से पहले न चेते तो गेहूं के साथ घुन की मिसाल बन जायगी.
''और ये लोग कहते हैं कि इनके पास कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं भेजा गया और अगर हम कोई फ़रिश्ता भेज देते तो सारा क़िस्सा ही ख़त्म हो जाता, फिर इन को ज़रा भी मोहलत न दी जाती.''
सूरह अनआम -६-७वाँ पारा आयत (8)
यानी फ़रिश्ता न हुवा कोहे तूर पर झलकने वाली इलाही की झलक हुई कि उसके दिखते ही लोग खाक़ हो जाते.
देखें कि एक हदीस में इसके बर अक्स मुहम्मद क्या कहते हैं---
देखें कि एक हदीस में इसके बर अक्स मुहम्मद क्या कहते हैं---
''मुहम्मद सहबियों की झुरमुट में बैठे थे कि एक शख्स़ आकर कुछ सवाल पूछता है - - -
१- ईमान क्या है?
२-इस्लाम क्या है?
३-एहसान क्या है?
और क़यामत कब आएगी?
मुहम्मद उसको अपनी ज़ेहनी जेहालत से लबरेज़ बेतुके जवाब देते हैं. उसके जाने के बाद लोगों से पूछते हैं कि जानते हो यह कौन थे? लोगों ने कहा अल्लाह के रसूल ही बेहतर जानते हैं.
फ़रमाया जिब्रील अलैहिस्सलाम थे दीन बतलाने आए थे.
(बुखारी-४७)
ये है मुहम्मद का क़ुरआनी और हदीसी, दो विरोधाभासी अवसर वादिता. यह मोह्सिने इंसानियत नहीं थे बल्कि इंसानियत कि जड़ों में मट्ठा डालने वाले नस्ल-ए-इंसानी के बड़े मुजरिम थे.
क़ुरआन में अल्लाह बार बार कहता है कि उसे तमसख़ुर (हंसी-मज़ाक़) पसंद नहीं. लोग तमसख़ुर उसी शख्स़ से करते है जो बेवक़ूफ़ी की बातें करता है.
ख़ुद साख़ता बने अल्लाह के रसूल क़ुरआन में ऐसी ऐसी बे वज़्न और बेवक़ूफ़ी की बातें करते हैं कि हंसी आना लाज़िम है, इस पर तुर्रा ये कि ये अल्लाह की भेजी हुई आयतं हैं. हर दिन एक एक टुकडा अल्लाह की आयत बन कर नाज़ि ल होती है. इस पर काफ़िर कहते हैं कि
ख़ुद साख़ता बने अल्लाह के रसूल क़ुरआन में ऐसी ऐसी बे वज़्न और बेवक़ूफ़ी की बातें करते हैं कि हंसी आना लाज़िम है, इस पर तुर्रा ये कि ये अल्लाह की भेजी हुई आयतं हैं. हर दिन एक एक टुकडा अल्लाह की आयत बन कर नाज़ि ल होती है. इस पर काफ़िर कहते हैं कि
''क्यूं नहीं तुम्हारा अल्लाह यक मुश्त मुकम्मल किताब आसमान से सीढी लगा कर किसी फ़रिश्ते के मार्फ़त एक बार में ही भेज देता.''
देखिए कि बन्दों के इस माक़ूल सवाल का नामाक़ूल अल्लाह का जवाब - - '
देखिए कि बन्दों के इस माक़ूल सवाल का नामाक़ूल अल्लाह का जवाब - - '
सूरह अनआम -६-७वाँ पारा आयत (10)
"और वाकई आप
(खुद साख्ता पैगम्बर मुहम्मद को अल्लाह भी एह्तरामन आप कहता है,
ये कमीनगी आलिमान दीन के क़लम का ज़ोर है)
ये कमीनगी आलिमान दीन के क़लम का ज़ोर है)
से पहले जो पैग़म्बर हुए हैं उन के साथ भी इस्तेह्ज़ा (मज़ाक़) किया गया है फिर जिन लोगों ने इन के साथ तमसख़ुर (मज़ाक़) किया उन को एक अज़ाब ने आ घेरा जिसका वह मज़ाक़ उड़ा रहे थे''
क़ुरआन में अल्लाह बार बार कहता है कि उसे तमसख़ुर (हंसी-मज़ाक़) पसंद नहीं.
लोग तमसख़ुर उसी शख्स़ से करते है जो बेवक़ूफ़ी की बातें करता है.
लोग तमसख़ुर उसी शख्स़ से करते है जो बेवक़ूफ़ी की बातें करता है.
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान
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