जय भीम ??
जय भीम से और जय भीमियों से मुझे चिढ सी होने लगी है.
पहले मैं इनके साथ था मगर जब मैंने देखा कि यह भी कट्टर हिन्दुओं की तरह हाथ में कलावा बांधते हैं और अपने कमरों में आंबेडकर के साथ गणेश और हनुमान की प्रतिमा और तस्वीर रखते हैं तो मेरा मोह इन से भंग हो गया.
राम की बन्दर सेना यही थे जिसके प्रतीक हनुमान,
अपना सीना फाड कर राम और सीता को बिराज मान दिखलाते हैं.
यह चरणों में दास बने राम को जताते हैं कि तुम दिल में बसते हो.
यही वानर सेना आज भी एक बोतल दारु के बदले इलेक्शन में अंध भक्त हो जाते हैं. इनके मौजूदा रूप रामबिलास पासबान और मायावती होते हैं जो इनका मानसिक शोषण करते हुए खुद मालदार ब्रह्मण बन जाते हैं.
भीम राव आंबेडकर एक महा विद्वान थे,
बाबा साहब कैसे बन गए.?
उन्होंने शूद्रों के लिए अपनी रचना में आवाज़ ज़रूर उठाई मगर शूद्रों की रहनुमाई कहाँ की ? क़ुरबानी कब दी ? इलेक्शन हारे भी.
अंधों में काने राजा ज़रूर हुए.
उनकी बैसाखी दलितों को कमज़ोर बनाए हुए है.
अभी दलितों में बाबा साहब पैदा होना बाक़ी है.
छोटे छोटे लेखक और अध्यापक इनके प्रतीक बने हुए हैं
जोकि इनके लिए काफ़ी नहीं.
मनुवाद ने सदियों से इन्हें कूट कूट कर चीन की दीवार की तरह लोहा लाट बना दिया है. अक्सर देखा गया हैं कि यह ख़ुद अपने ख़िलाफ़ मनुवादी हैं.
52 % की आबादी रखने वाले इस समूह में से कोई लेनिन, काल मार्क्स और माओज़े तुंग जैसी हस्ती पैदा हों तब बात बनेगी.
वरना यह शूद्र से हरिजन और हरिजन से दलित बनते रहेंगे
और अपमान इनका भाग्य होगा.
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