Monday, 24 July 2017

Soorah kafroon 110

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
***********

सूरह नस्र ११० पारा - ३० 
(इज़ाजाअ नसरुल लाहे वलफतहो)  

ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.

नट खट बातूनी बच्चे से देर रात को माँ कहती है, बेटे सो जाओ नहीं तो बागड़ बिल्ला आ जाएगा. माँ की बात झूट होते हुए भी झूट के नफ़ी पहलू से अलग है. यह सिर्फ मुसबत पहलू के लिए है कि बच्चा सो जाए ताकि उसकी नींद पूरी हो सके, मगर यह बच्चे को डराने के लिए है.
क़ुरआन का मुहम्मदी अल्लाह बार बार कहता है,
 "मैं डराने वाला हूँ " 
ऐसे ही माँ बच्चे को डराती  है.
लोग उस अल्लाह से डरें जब तक कि सिने बलूगत न आ जाए, यह बात किसी फ़र्द या कौम के ज़ेहनी बलूगत पर मुनहसर करती है कि वह बागड़ बिल्ला से कब तक डरे. 
यह डराना एक बुराई, जुर्म और गुनाह बन जाता है कि बच्चा बागड़ बिल्ला से डर कर किसी बीमारी का शिकार हो जाए, डरपोक तो वह हो ही जाएगा माँ की इस नादानी से. डर इसकी तमाम उम्र का मरज़ बन जाता है.
मुसलमान अपने बागड़ बिल्ला से इतना डरता है कि वह कभी बालिग ही नहीं होगा. 
मूर्तियाँ जो बुत परस्त पूजते हैं, वह भी बागड़ बिल्ला ही हैं लेकिन उनको अधिकार है कि सिने- बलूगत आने पर वह उन्हें पत्थर मात्र कह सकें, उन पर कोई फ़तवा नहीं, मगर मुसलमान अपने हवाई बुत को कभी बागड़ बिल्ला नहीं कह सकता.
देखिए कि बागड़ बिल्ला क्या कहता है - - -

"जब अल्लाह की मदद और फतह आ पहुंचे, 
और आप लोगों को अल्लाह के दीन में जौक़ जौक़ दाख़िल होता हुवा देखें, 
तो अपने रब की तस्बीह और तहमीद कीजिए और उससे इस्तेग्फार की दरख्वास्त कीजिए. वह बड़ा तौबा कुबूल करने वाला है." 
सूरह नस्र ११० पारा - ३० आयत (१-३)

मुहम्मद का ख्वाब ए वहदानियत शक्ल पाने वाली है, मक्का की फ़तह हासिल करने वाले हैं, उनका ला शऊर बेदार हो रहा है, वह भी अपने रचे हुए अल्लाह से डरने लगे हैं, उनकी बद आमलियाँ उनको झिंझोड़ रही है, नतीजतन वह अपनी मग्फ़िरत की दुआ कर रहे हैं. खुशियों और मायूसियो से पुर यह सूरह है. 
फ़तह मक्का का दिन दुन्या की तमाम इंसानी आबादी के लिए एक बद तरीन दिन था, खास कर मुसलामानों के लिए नामुराद दिन कहा जाएगा, इस के बाद दीन जैसे मुक़द्दस उन्वान को लेकर जब तलवार उट्ठी तो इंसानों के लिए यह ज़मीन तंग हो गई. सदियाँ गुज़र गईं मगर यह जिहादी सिलसिला अभी तक ख़त्म नहीं हुवा. इतने बड़े इंसानी खून का हिसाब जब एक बन्दे हक़ीर अल्लाह से तलब करता है, तब अल्लाह नज़रें चुराता है. इस नतीजा ए फ़िक्र 
 के बाद बंदा ए अहक़र, बन्दा ए बरतर हो गया और उसने ऐसे कमतर अल्लाह की नमाज़ें अपने पर हराम कर लीं. 



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 22 July 2017

Hindu Dharm Darshan 82



अनर्गल  श्रद्धा

आस्थावान और श्रद्धालु पक्के चूतिए होते हैं. 
मुस्लिम आस्थावान हिन्दू आस्थावान की आस्था कुफ़्र, शिर्क और ढोंग समझता है औए हिन्दू आस्थावान मुसलमानों की आस्था और अक़ीदा को कूड़ा. 
दोनों की आस्थाएँ मनमानी हैं जो निराधार होती हैं.
मैंने आस्थावानों और श्रद्धालु के लिए कठोर, अभद्र और असभ्य  भाषा का इस्तेमाल जान बूझ कर किया है ताकि झटका लगे और यह अपनी धुन पर पुनर विचार करें.
इनको वस्त्रहीन करके दिखलाया जाए कि अभी तक ये बालिग़ नहीं हुए हैं, 
जैसेकि कभी कभी एक डाक्टर मरीज़ को नंगा कर देता है.
आस्थावान जेहनी मरीज़ ही तो होते हैं जो अपनी अपनी आस्था क़ायम करके या विरासत में मिली आस्था को लेकर समाज को अव्योस्थित किए रहते हैं. 
या कार्ल मार्क्स का कथन कि यह अफ़ीमची होते हैं.
इन मानसिक रोगियों से समाज डरता है जब यह समूह बन जाते हैं 
और इनकी खिल्ली उड़ाई जाती है जब अल्प संख्यक होते हैं. 
यानी चूतिए बनाम चूतिए. 
आस्थावान होना चाहिए उन मूल्यों का जो मानव जाति के भलाई में होती हैं, 
जो आस्था धरती के हर प्राणी के लिए शुभ हों, 
आस्थावान होना चाहिए धरती सजाने संवारने वाले उन सभी कार्यों के 
जो इसके लिए हमारे वैज्ञानिक अपनी अपनी ज़िंदगियाँ समर्पित किए हुए हैं. 
यही श्रद्धालु हमारी आगामी नस्लों के शुभ चिन्तक हैं.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 21 July 2017

Soorah kafroon 109

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह काफिरून १०९ - पारा ३०
(कुल्या अय्योहल कफिरूना)


ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.

एक बार मक्का के मुअज़ज़िज़  कबीलों ने मिलकर मुहम्मद के सामने एक तजवीज़ रखी, कि आइए हम लोग मिल कर अपने अपने माबूदों की पूजा एक ही जगह अपने अपने तरीकों से किया करें, ताकि मुआशरे में जो ये नया फ़ितना खडा हुआ है, उसका सद्दे-बाब हो. इससे हम सब की भाई चारगी क़ायम रहेगी, सब के लिए अम्न ओ अमान रहेगा. 
बुत परस्तों (मुशरिकीन) की यह तजवीज़ माक़ूल थी जो आजकी जदीद क़द्रों की तरह ही माकूल है , मगर मुहम्मद को यह बात गवारा न हुई. यह पेश कश मुहम्मद को रास नहीं आई क्यूँकि यह इनके तबअ से मेल नहीं खा रही थी. मुहम्मद को अम्न ओ अमान पसंद न था, इसनें जंग, लूट मार और शबखून कहाँ? वह तो अपने तरीकों को दुन्या पर लादना चाहते थे. अपनी रिसालत पर खतरा मसूस करते हुए उन्होंने अपने हरबे के मुताबिक अल्लाह की वह्यी उतरवाई, 

मंदार्जा ज़ेल सियासी आयतें मुलाहिजा हों- - - 
"आप कह दीजिए कि ऐ काफ़िरो! 
न मैं तुम्हारे माबूदों की परिस्तिश करता हूँ, 
और न तुम मेरे माबूदों की परिस्तिश करते हो, 
और न मैं तुम्हारे माबूदों की परिस्तिश करूँगा, 
और न तुम मेरे माबूद की परिस्तिश करोगे. 
तुमको तुम्हारा बदला मिलेगा और मुझको मेरा बदला मिलेगा." 
सूरह काफिरून १०९ - पारा ३०- आयत (१-६) 

नमाज़ियो !
अल्लाह के पसे पर्दा उसका खुद साख्ता रसूल अपने अल्लाह से अपनी मर्ज़ी उगलवा रहा है.. . . . 
आप कह दीजिए, (जैसे कि नव टंकियों में होता है) 
अल्लाह को क्या क़बाहत है कि खुद मंज़रे आम पर आकर अपनी बात कहे ? या ग़ैबी आवाज़ नाज़िल करे. इस क़दर हिकमत वाला अल्लाह क्या गूंगा है  कि आवाज़ के लिए उसे किसी बन्दे की ज़रुरत पड़ती है ? 
यह कुरान साज़ी मुहम्मद का एक ड्रामा है जिस पर तुम आँख बंद करके भरोसा करते हो. सोचो, लाखों सालों से क़ायम इस दुन्या में, हज़ारों साल से क़ायम इंसानी तहज़ीब में, क्या अल्लाह को सिर्फ़ २२ साल ४ महीने ही बोलने का मौक़ा मिला कि वह शर्री मुहम्मद को चुन कर, तुम्हारी नमाज़ों के लिए कुरआन बका?
अगर आज कोई ऐसा अल्लाह का रसूल आए तो? 
उसके साथ तुम्हारा क्या सुलूक होगा?



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 19 July 2017

Hindu Dharm Darshan 81



गीता और क़ुरआन

सज्जन पुरुष अर्जुन कहता है - - -
*यदि हम ऐसे आततायियों का बद्ध करते हैं तो हम पर पाप चढ़ेगा,
अतः यह उचित न गोगा कि घृत राष्ट्र के तथा उनके मित्रों का बद्ध करें.
हे लक्षमी पति कृष्ण ! इस में हमें क्या लाभ होगा ?
और अपने ही कुटुम्भियों को मार कर हम किस प्रकार सुखी हो सकते हैं ?   
**हे जनार्दन ! 
यद्यपि लोभ से अभिभूत चित वाले यह लोग अपने परिवार को मारने या अपने मित्रों से द्रोह करने में कोई दोष नहीं देखते, 
किन्तु हम लोग जो परिवार को विनष्ट करने में जो अपराध देख सकते  हैं, ऐसे पाप कर्मों में क्यों प्रवृति हों ? 
 श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  1   श्लोक 36-37-38

युद्ध की आग भड़काने वाले भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
*किन्तु अगर तुम यह सोचते हो कि आत्मा सदा जन्म लेता है 
तथा सदा मरता है तो भी हे बाहुबली ! 
तुम्हारे शोक करने का कोई करण नहीं.
*जिसने जन्म लिया है, 
उसकी मृत्यु निश्चित है. 
अपने अपरिहार्य कर्तव्य पालन में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2  श्लोक 26-27  
*
और क़ुरआन कहता है - - - 
''सो जब अश्हुर-हुर्म गुज़र जाएँ इन मुशरिकीन को जहाँ पाओ मारो 
और पकड़ो और 
बांधो और दाँव घात के मौकों पर तक लगा कर बैठो. 
फिर अगर तौबा करलें, नमाज़ पढने लगें और ज़कात देने लगें तो इन का रास्ता छोड़ दो,''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (५)

؟           ?
क्या गीता और कुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?
क्या इन्हीं किताबों पर हाथ रख कर हम अदालत में सच बोलने की क़सम खाते हैं ? ?
धरती पर शर और फ़साद के हवाले करने वाले यह ग्रन्थ 
क्या इस काबिल हैं कि इनको हाज़िर व् नाज़िल किया जाए, गवाह बनाया जाए ???
क्या यह अद्ल (न्याय) का अपमान नहीं.????
*****


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 17 July 2017

Soorah qausar 108

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह कौसर १०८  - पारा ३० 
(इन्ना आतयना कल कौसर)


ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.

आज कल जिहाद को लेकर बहसें चल रही हैं. पिछले दिनों ndtv पर इस सिलसिले में एक तमाशा देखने को मिला. इसमें मुस्लिम बाज़ीगर आलिमों और सियासत दानों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, लग रहा था कि इस्लाम का दिफ़ा कर रहे हों, बजाए इसके कि वह सच्चाई से काम लें जिससे मुस्लिम अवाम का कुछ फ़ायदा हो. जिहाद के नए नए नाम और मअनी तराशे गए, 
इसका हिंदी करण किया गया कि जिहाद प्रयास और प्रयत्न का नाम है, यज्ञं और परितज्ञ को जिहाद कहा जाता है. उन सभों की लफ्ज़ी मानों में यह दलीले सही थीं मगर जिहाद का और उसके अर्थ का इस्लामी करण किया गया है, काश कि ऐसा होता जैसा कि यह जोगी बतला रहे थे. 
क़ुरआन में जिहाद के फ़रमान हैं, 
"इस्लाम के लिए जंगी जिहाद करो, गैर मुस्लिम और ख़ास कर काफ़िरों से इतनी जिहाद करो कि उनका वजूद न बचे." 
सैकड़ों आयतें इस संदभ में पेश की जा सकती हैं. इस सन्दर्भ में. "काफ़िर वह होते हैं जो कुफ्र करते है और एकेश्वर को नहीं मानते तथा मूर्ति पूजा करते है. भारत के हिन्दू 'मिन जुमला काफ़िर' हैं, 
इसको मुसलामानों के दिल ओ दिमाग से निकाला नहीं जा सकता. 
खैबर की जंग इसकी तारीखी गवाह है, जिसमें खुद मुहम्मद शामिल थे. ये जिहाद इतनी कुरूर थी कि इसके बयान के लिए इन ओलिमा के पास हिम्मत और जिसारत नहीं कि यह टीवी चैनलों के सामने बयान कर सकें. इसी जंग में मिली मज़लूम सफ़िया, मुहम्मद की बीवियों में से एक थी जिसे मजबूर होना पड़ा कि अपने बाप, भाई, शौहर और पूरे खानदान की लाशों के बीच मुहम्मद के साथ सुहाग रात मनाए. 
अलकायदा, तालिबान और अन्य जिहादी तंजीमें सही मअनो में क़ुरआनी मुसलमान हैं जो खैबर को अफगानिस्तान के कुछ हिस्से में मुहम्मदी काल को दोहरा रहे हैं. अल्लाह कहता है - - -

"बेशक हमने आपको कौसर अता फ़रमाई,
सो आप अपने परवर दिगार की नमाज़ें पढ़िए,
और क़ुरबानी कीजिए, बिल यक़ीन आपका दुश्मन ही बे नाम ओ निशान होगा"
सूरह कौसर १०८ - पारा ३० आयत (१-३) 
नमाज़ियो !
नमाज़ से जल्दी फुर्सत पाने के लिए अक्सर आप मंदार्जा बाला छोटी सूरह पढ़ते हो. इसके पसे-मंज़र में क्या है, जानते हो?
सुनो,खुद साख्ता रसूल की बयक वक़्त नौ बीवियाँ थीं. इनके आलावा मुताअददित लौंडियाँ और रखैल भी हुवा करती थीं. जिनके साथ वह अय्याशियाँ किया करते थे. उनमें से ही एक मार्या नाम की लौड़ी थी, जो हामला हो गई थी. मार्या के हामला होने पर समाज में चे-में गोइयाँ होने लगी कि जाने किसका पाप इसके पेट में पल रहा है? बात जब ज्यादः बढ़ गई तो मार्या ने अपने मुजरिम पर दबाव डाला, तब मुहम्मद ने एलान किया कि मार्या के पेट में जो बच्चा पल रहा है, वह मेरा है. ये एलान रुसवाई के साथ मुहम्मद के हक में भी था कि खदीजा के बाद वह अपनी दस बीवियों में से किसी को हामला न कर सके थे गोया अज सरे नव जवान हो गए(अल्लाह के करम से). बहरहाल लानत मलामत के साथ मुआमला ठंडा हुआ. 
इस सिलसिले में एक तअना ज़न को मुहम्मद ने उसके घर जाकर क़त्ल भी कर दिया. 
नौ महीने पूरे हुए, मार्या ने एक बच्चे को जन्म दिया, मुहम्मद की बांछें खिल गई कि चलो मैं भी साहिबे औलादे नारीना हुवा. 
उन्होंने लड़के की विलादत की खुशियाँ भी मनाईं. 
उसका अक़ीक़ा भी किया, दावतें भी हुईं. 
उन्हों ने बच्चे का नाम रखा अपने मूरिसे आला के नाम पर 
'इब्राहीम'
इब्राहीम ढाई साल की उम्र पाकर मर गया, एक लोहार की बीवी को उसे पालने के किए दे दिया था, जिसके घर में भरे धुंए से उसका दम घुट गया था. 
खुली आँखों से जन्नत और दोज़ख देखने वाले और इनका हाल बतलाने और हदीस फ़रमाने वाले अल्लाह के रसूल के साथ उनके मुलाज़िम जिब्रील अलैहिस्सलाम ने उनके साथ कज अदाई की और अपने प्यारे रसूल के साथ अल्लाह ने दगाबाज़ी कि उनका ख्वाब चकनाचूर हो गया. 
मुहल्ले की औरतों ने फब्ती कसी - - -
" बनते हैं अल्लाह के रसूल और बाँटते फिरते है उसका पैगाम, बुढ़ापे में एक वारिस हुवा, वह भी लौड़ी जना, उसको भी इनका अल्लाह बचा न सका." 
मुहम्मद तअज़ियत की जगह तआने पाने लगे. बला के बेशर्म और ढीठ मुहम्मद ने अपने हरबे से काम लिया, और अपने ऊपर वह्यी उतारी जो मंदार्जा बाला आयतें हैं. अल्लाह उनको तसल्ली देता है 
कि तुम फ़िक्र न करो मैं तुमको, (नहीं! बल्कि आपको) इस हराम जने इब्राहीम के बदले जन्नत के हौज़ का निगरान बनाया, आकर इसमें मछली पालन करना. 
अच्छा ही हुवा लौंडी ज़ादा गुनहगार बाप का बेगुनाह मासूम बचपन में जाता रहा वर्ना मुहम्मदी पैगम्बरी का सिलसिला आज तक चलता रहता और पैगम्बरे आखिरुज्ज़मां का ऐलान भी मुसलमानों में न होता. 





जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 15 July 2017

Hindu Dharm Darshan 80



गीता और क़ुरआन
भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -

किन्तु यदि तुम युद्ध करने से स्वधर्म को संपन्न नहीं करते तो तुम्हें निश्चित रूप से अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने का पाप लगेगा और तुम योद्धा के रूप में भी अपना यश खो दोगे. 
लोग सदैव तुम्हारे अपयश का वर्णन करेंगेऔर सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश तो मृत्यु से भी बढ़ कर है. 
तुम्हारे शत्रु अनेक प्रकार के कटु शब्दों से तुम्हारा वर्णन करेगे. तुम्हारे लिए इससे दुखदायी क्या हो सकता है.
गीता सार श्लोक 33 -34 -36 
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद A C भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद संसथापकाचारी अंतर राष्ट्रीय कृष्णा भावनामृत संघ 

और क़ुरआन कहता है - - - 

''तुम में हिम्मत की कमी है इस लिए अल्लाह ने तख्फीफ (कमी) कर दी है,
सो अगर तुम में के सौ आदमी साबित क़दम रहने वाले होंगे तो वह दो सौ पर ग़ालिब होंगे.
नबी के लायक नहीं की यह इनके कैदी रहें,
जब कि वह ज़मीन पर अच्छी तरह खून रेज़ी न कर लें.
सो तुम दुन्या का माल ओ असबाब चाहते हो और अल्लाह आख़िरत को चाहता है
और अल्लाह तअला बड़े ज़बरदस्त हैं और बड़े हिकमत वाले हैं.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (६७)

क्या गीता और कुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 14 July 2017

Soorah Maaoon 107

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह माऊन१०७  - पारा ३० 
(अरायतललज़ी योकज्ज़ेबो बिद्दीन)

कट्टर हिन्दू संगठन अक्सर कुरआन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहते हैं मगर उनका मुतालबा सीमित रहता है कि क़ुरआन से केवल बह आयतें हटा दी जाएँ जो काफ़िरों के ख़िलाफ़ जिहाद का आह्वान करती हैं, बाक़ी कुरआन पर उनको कोई आपत्ति नहीं. इस मांग में उनका हित इस्लामी जिहादियों की तरह ही निहित है कि इससे मुस्लिम वर्ग का हमेशा अहित ही होगा. मुस्लिम अपनी आस्था के तहत ऊपर की दुन्या में मिलने वाली जन्नत के लिए इस दुन्या की ज़िन्दगी को संतोष के साथ गुज़ार देंगे. उनको मजदूर, मिस्त्री, राज, नाई, भिश्ती और मुलाजिम सस्ते दामों में मिलते रहेंगे. 
मुस्लिम कट्टरता बेवक़ूफ़ होती है जो इन्सान को एक बार में ही कत्ल करके खुद इंसानों की मोहताज हो जाती है, इसके बर अक्स हिन्दू कट्टरता बुद्धिमान होती है जो इन्सान को उसकी जिंदगी को मुसलसल क़त्ल किए रहती है, न मरने देती है न मुटाने देती है. यह मानव समाज को धीरे धीरे अछूत बना कर, उनका एक वर्ग बना देती और खुद स्वर्ण हो जाती है. पाँच हज़ार साल से भारत के मूल बाशिदे और आदि वासी इसकी मिसाल हैं.
इन दोनों कट्टरताओं को मज़हब और धर्म पाले रहते है, जिनको मानना ही मानव समाज की हत्या या फिर उसकी खुद कुशी है. 
इसके आलावा क़ुरआन के मुख़ालिफ़ कम्युनिस्ट और पश्चिमी देश भी है जो पूरे कुरआन को ही जला देने के हक में है, इन देशों में धर्म ओ मज़हब की अफीम नहीं
बाक़ी बची है, इस लिए वह पूरी मानवता हे हितैषी हैं. 
भारतीय मुसलामानों मुसलमानों के दाहिने खाईं है, तो बाएँ पहाड़. उसका मदद गार कोई नहीं है, बैसे भी मदद मोहताजों को चाहिए. व मोहताज नहीं अभी भी ताक़त हासिल कर सकते है बेदारी की ज़रुरत है, 
हिम्मत करके मुस्लिम से हट कर मोमिन हो जाएँ. 

ज़कात और नमाज़ का भूखा और प्यासा मुहम्मदी अल्लाह कहता है - - - 
"क्या आपने ऐसे शख्स को नहीं देखा जो रोज़े-जजा को झुट्लाता है, 
सो वह शख्स है जो यतीम को धक्के देता है, 
वह मोहताज को खाना खिलने की तरगीब नहीं देता, 
सो ऐसे नमाजियों के लिए बड़ी खराबी है, 
जो अपनी नमाज़ को भुला बैठे हैं, 
जो ऐसे है कि रिया करी करते हैं, 
और ज़कात बिलकुल नहीं देते."

देखो और समझो कि तुम्हारी नमाज़ों में झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.
नमाज़ियो ! 
मुहम्मद की सोहबत में मुसलमान होकर रहने से बेहतर था की इंसान आलम-ए-कुफ्र में रहता. मुहम्मद हर मुसलमान के पीछे पड़े रहते थे, न खुद कभी इत्मीनान से बैठे और न अपनी उम्मत को चैन से बैठने दिया.इनके चमचे हर वावत इनके इशारे पर तलवार खींचे खड़े रहते थे" या रसूल्लिल्लाह ! हुक्म हो तो गर्दन उड़ा दूं" आज भी मुसलमानों को अपनी आकबत पर खुद एतमादी नहीं है. वह हमेशा खुद को अल्लाह का मुजरिम और गुनाहगार ही माने रहता है. उसे अपने नेक आमाल पर कम और अल्लाह के करम पर ज्यादह भरोसा रहता है. मुहम्मद की दहकाई हुई क़यामत की आग ने मुसलामानों की शख्सियत कुशी कर राखी है. कुदरत की बख्शी हुई तरंग को मुसलमानों से इस्लाम ने छीन लिया है.
नमाज़ियो ! 
सजदे से सर उठाकर अपनी नमाज़ की नियत को तोड़ दो और ज़िदगी की रानाइयों पर भी एक नज़र डालो. ज़िन्दगी जीने की चीज़ है, इसे मुहम्मदी जंजीरों से आज़ाद करो.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 11 July 2017

Soorah qurash 106

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह कुरैश 106  
( लेईलाफे कुरैशिन ईलाफेहिम)  

समाज की बुराइयाँ, हाकिमों की ज्यादतियां और रस्म ओ रिवाज की ख़ामियाँ देख कर कोई साहिबे दिल और साहिबे जिगर उठ खड़ा होता है, वह अपनी जान को हथेली पर रख कर मैदान में उतरता है. वह कभी अपनी ज़िदगी में ही कामयाब हो जाता है, कभी वंचित रह जाता है और मरने के बाद अपने बुलंद मुकाम को छूता है, ईसा की तरह. मौत के बाद वह महात्मा, गुरू और पैगम्बर बन जाता है. इसका वही मुख़ालिफ़ समाज इसके मौत के बाद इसको गुणांक में रुतबा देने लगता है, इसकी पूजा होने लगती है, अंततः इसके नाम का कोई धर्म, कोई मज़हब या कोई पन्थ बन जाता है. धर्म के शरह और नियम बन जाते हैं, फिर इसके नाम की दुकाने खुलने लगती हैं और शुरू हो जाती है ब्यापारिक लूट. अज़ीम इन्सान की अजमत का मुक़द्दस खज़ाना, बिल आखीर उसी घटिया समाज के लुटेरों के हाथ लग जाता है. इस तरह से समाज पर एक और नए धर्म का लदान हो जाता है. 
हमारी कमजोरी है कि हम अज़ीम इंसानों की पूजा करने लगते हैं, जब कि ज़रुरत है कि हम अपनी ज़िन्दगी उसके पद चिन्हों पर चल कर गुजारें. हम अपने बच्चों को दीन पढ़ाते हैं, जब कि ज़रुरत है कि उनको आला और जदीद तरीन अखलाक़ी क़द्रें पढ़ाएँ. मज़हबी तालीम की अंधी अकीदत, जिहालत का दायरा हैं. इसमें रहने वाले आपस में ग़ालिब ओ मगलूब और ज़ालिम ओ मज़लूम रहते हैं. 
दाओ धर्म कहता है "जन्नत का ईश्वरीय रास्ता ये है कि अमीरों से ज़्यादा लिया जाए और गरीबों को दिया जाए. इंसानों की राह ये है कि गरीबों से लेकर खुद को आमिर बनाया जाए. कौन अपनी दौलत से ज़मीन पर बसने वालों की खिदमत कर सकता है? वही जिसके पास ईश्वर है. वह इल्म वाला है, जो दौलत इकठ्ठा नहीं करता. जितना ज्यादः लोगों को देता है उससे ज्यादः वह पाता है." 

अल्लाह अपने कुरैश पुत्रों को हिदायत देता है कि - - - 
"चूँकि कुरैश खूगर हो गए, 
जाड़े के और गर्मी के, यानी जाड़े और गर्मी के आदी हो गए, 
तो इनको चाहिए कि काबः के मालिक की इबादत करें, 
जिसने इन्हें भूक में खाना दिया और खौफ़ से इन्हें अम्न दिया." 
सूरह क़ुरैश १०६ - पारा ३० आयत (१-४) 

कुरआन में आयातों का पैमाना क्या है? इसकी कोई बुन्याद नहीं है. आयत एक बात पूरी होने तक तो स्वाभाविक है मगर अधूरी बात किस आधार पर कोई बात हुई ? देखिए, "चूँकि कुरैश खूगर हो गए," 
ये अधूरी बात एक आयत हो गई और कभी कभी पूरा पूरा पैरा ग्राफ एक आयत होती है. इस मसलक की कोई बुनियाद ही नहीं, इससे ज्यादः अधूरा पन शायद ही और कहीं हो. 

नमाज़ियो ! 
तुम कुरैश नहीं हो और न ही (शायद) अरबी होगे, फिर कुरैसियों के लिए, यह कुरैश सरदार की कही हुई बात को तुम अपनी नमाज़ों में क्यूँ पढ़ते हो? क्या तुम में कुछ भी अपनी जुगराफियाई खून की गैरत बाकी नहीं बची? यह कुरैश जो उस वक़्त भी झगडालू वहशी थे और आज भी अच्छे लोग नहीं हैं. वह तुमको हिदी मिसकीन कहते हैं, तेल की दौलत के नशे में बह आज से सौ साल पहले की अपनी औकात भूल गए, जब हिंदी हाजियों के मैले कपडे धोया करते थे और हमारे पाखाने साफ़ किया करते थे. आज वह तुमको हिक़ारत की निगाह से देखते हैं और तुम उनके नाम के सजदे करते हो. क्या तुम्हारा ज़मीर इकदम मर गया है? 
अगर तुम कुरैश या अरबी हो भी तो सदियों से हिंदी धरती पर हो, इसी का खा पी रहे हो, तो इसके हो जाओ. कुरैश होने का दावा ऐसा भी न हो कि क़स्साब से कुरैशी हो गए हो याकि जुलाहे से अंसारी, कई भारतीय वर्गों ने खुद को अरबी मुखियों को अपना नाजायज़ मूरिसे-आला बना रक्खा है ये बात नाजायज़ वल्दियत की तरह है. बेहतर तो यह है कि नामों आगे क़बीला, वर्ग और जाति सूचक इशारा ही ख़त्म कर दो. 



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 8 July 2017

Hindu Dharm Darshan 79



मोदी से याहू मिले , कर कर लंबे हाथ

बाबा इब्राहीम के पोते याक़ूब के, एक बेटे का नाम यहूदा था जिसने अपने ख़ास नज़रिए की बुनियाद रखी , इस नज़रिए को सच मानने वाले यहूदी कहे जाने लगे. यहूदा के खुदा ने उसे ख्बाब दिखलाया कि तू सृष्टि का महा मानव है और तेरी नस्लें बाक़ी मानव जाति से श्रेष्ट होंगी औए दुन्या पर राज करेंगी . 
उसके बाद यहूदियों का खुदा यहूदियों के पैग़म्बरों को मार्ग दर्शन के लिए ख़्वाब दिखलाता रहा . 
३५०० वर्ष पहले एक इब्रानी क़ैदी युसूफ़ मिस्र में बादशाह का वजीर बनने में कामयाब हुवा, उसने अपने दस भाइयों के साथ साथ अपने माँ बाप को मिस्र में पनाह दिलाया जो उस वक़्त सिर्फ़ 73 प्राणी हुवा करते थे. 
४०० वर्षों बाद जब यह मिस्र से मूसा के नेतृत्व में निष्कासित हुवे तो इनकी संख्या ४लाख 25 हज़ार थी. 
25 सालों तक यह लोग वीरान मरू भूमि में रह कर संपन्न हुए तो मूसा ने एक फ़ौज बनाई और एक बस्ती पर हमला करने का हुक्म जारी किया, 
फ़ौज बस्ती को फतह करके वापस आ गई, 
मूसा ने कमांडर से पूछा क्या करके आए हो ? 
उसने बतलाया कि बूढ़े और बच्चों को छोड़ कर बाक़ी सब को मौत के घाट उतार कर आया हूँ. 
मूसा बोला जाओ जिनको छोड़ कर आए हो उनको ख़त्म करके आओ. 
फ़ौज गई और तमाम मानव जीव को ख़त्म करके वापस आई, 
मूसा ने दरयाफ्त किया कि क्या बाक़ी छोड़ कर आए हो ? 
कमांडर बोला अब तो बस्ती में सिर्फ हैवान बचे हैं. 
मूसा ने कहा वापस जाओ और उनको भी ठिकाने लगा कर आओ. 
कमांडर हुक्म बजा लाया. 
मूसा ने पूछा क्या बाक़ी बचा है बस्ती में ? 
सुनसान बस्ती का सन्नाटा कमांडर बोला, 
हुक्म हुवा जाओ उसे भी आग के हवाले करके आओ.

यह ट्रेनिग थी मूसा की जो यहूदी हमलों का बुनियाद बनीं. 
यहूदी पूरे अरब में मूसा पैटर्न पर बस्तियों को तबाह करते और दो पहरेदार बिठा देते कि बस्ती दोबारा आबाद न होने पाए. फ़िलस्ती उनके ख़ास दुश्मन थे जो उस धरती के मूल निवासी थे.
यहूदियों का खुदा हमेशा उनको ख़्वाब दिखलाता कि उन्हें अब क्या करना है. मिस्र से निष्काषित होते वक़्त उसने यहूदियों को ख़्वाब दिखलाया कि मिसरी औरतों को विशवास में लेकर उनके जेवरात को लूट लो, इस तरह कि तुम देव दर्शन को जा रही हो, तुम्हारे जेवर अगर दोगी तो वह एक के दो हो जाएँगे. 
तौरेत कहती है कि 
इस तरह से यहूदियों ने मिस्रियों को लूट लिया.
2000 हज़ार सालों तक यहूदी सारे ज़माने के दुश्मन रहे और सारा ज़माना मिल कर यहूदियों का दुश्मन बन गया . 
______________________________________
देखें - - - १३०० पृष्ठों का बहुमूल्य ग्रन्थ 
तौरेत धर्म ग्रन्थ . 
अनुवाद करता R P साह येसु समाज 
प्रकाशक उत्तर भारत का धर्माअध्यक्ष - मंडल 
हिटलर यहूदीज़्म का बड़ा जानकार था उसने अपने तईं इन मानवता दुश्मन  यहूदियों को दुन्या से ख़त्म कर दिया था और कुछ एक को बचे रहने दिया था कि दुन्या इनको देख कर समझे कि यह क्या बला होते हैं.
अमरीका का खोजी नाविक यहूदी था, उसने अमरीका के मूल निवासी रेड इंडियन्स को योरोप के यहूदियों के हवाले कर दिया था, उस महान सभ्यता के साढ़े चार लाख प्यारी मख़लूक़ का आज नामो निशान ही बचा है, साहिलों पर यह लाल रंग वाले ख़ूब सूरत बन्दे, घोड़ों पर जनता को सैर कराते हुए देखे जा सकते हैं. 
यह यहूदियों के ज़ुल्म की जीती जागती हुई तस्वीर है. वह ग़ैर यहूदियों को भेड़ बकरी की तरह मरते थे.
भारत के आर्यन्स भी यहूदी D N A के बहुत करीब हैं. 
मनु विधान लगभग यहूदीज़्म से मिलता जुलता है.  
मनु विधान के तहत ब्रह्मण ब्रह्मा के मुख से निकला पवित्र पावन और श्रेष्ट  है , 
इसकी रक्षा के लिए क्षतत्रीय हुए , जो ब्रह्मा के बाजुओं से पैदा हुए, 
इनकी जीविका चलाने वाले वैश्य ब्रह्मा के पेट से जन्मे और 
इनकी सेवा करने वाले शूद्र हुए जो ब्रह्मा के चरणों से निकले. 
यहूदियों और बरहमनों में बस ज़रा सा फ़र्क है कि वह अपने दुश्मन को मार देते हैं और 
यह उन्हें दास बना लेते हैं. 
उनको अपना काम खुद करना पड़ता है या फिर काम के लिए कम्प्यूटर और रिबोट बना लेते हैं और 
बरहमन अपने काम अपने बनाए हुए सेवकों से कराते हैं.
मोदी का इस्रईली दौरा दुन्या का एक नया आइकोन बन कर भारत का भविष्य तय कर सकता है, 
हो सकता है इतिहास के पन्नों पर एक नईं इबारत लिखी जाए.
सदियों से बिछड़े हुए भाई - - - 
भाई भाई से मिलें कर कर लंबे हाथ.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 7 July 2017

Soorah feel 105

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
************

सूरह  फ़ील १०५  - पारा ३० 
(अलम तरा कैफ़ा फ़अला रब्बोका बेअसहाबिल  फ़ील) 


अगर इंसान किसी अल्लाह, गाड और भगवान् को नहीं मानता तो सवाल उठता है कि वह इबादत और आराधना किसकी करे ? मख्लूक़ फ़ितरी तौर  पर किसी न किसी की आधीन होना चाहती है. एक चींटी अपने रानी के आधीन होती है, तो एक हाथी अपनेझुण्ड के सरदार हाथी या पीलवान का अधीन होता है. कुत्ते अपने मालिक की सर परस्ती चाहते है, तो परिंदे अपने जोड़े पर मर मिटते हैं. इन्सान की क्या बात है, उसकी हांड़ी तो भेजे से भरी हुई है, हर वक्त मंडलाया करती है, नेकियों और बदियों का शिकार किया करती है. शिकार, शिकार और हर वक़्त शिकार, इंसान अपने वजूद को ग़ालिब करने की उडान में हर वक़्त दौड़ का खिलाडी बना रहता है, मगर बुलंदियों को छूने के बाद भी वह किसी की अधीनता चाहता है.
सूफी तबरेज़ अल्लाह की तलाश में इतने गारे गे कि उसको अपनी जात के आलावा कुछ न दिखा, उसने अनल हक (मैं खुदा हूँ) कि सदा लगे, इस्लामी शाशन ने उसे टुकड़े टुकड़े कर के दरिया में बह देने की सजा दी. मुबल्गा ये है कि उसके अंग अंग से अनल हक की सदा निकलती रही.
कुछ ऐसा ही गौतम के साथ हुवा कि उसने भी भगवन की अंतिम तलाश में खुद को पाया और " आप्पो दीपो भवः " का नारा दिया.
मैं भी किसी के आधीन होने के लिए बेताब था, खुदा की शक्ल में मुझे सच्चाई मिली और मैंने उसमे जाकर पनाह ली.
कानपूर के ९२ के दंगे में, मछरिया की हरी बिल्डिंग मुस्लिम परिवार की थी, दंगाइयों ने उसके निवासियों को चुन चुन कर मारा, मगर दो बन्दे उनको न मिल सके, जिनको कि उन्हें खास कर तलाश थी. पड़ोस में एक हिन्दू बूढी औरत रहती थी, भीड़ ने कहा इसी घर में ये दोनों शरण लिए हुए होंगे, घर की तलाशी लो. बूढी औरत अपने घर की मर्यादा को ढाल बना कर दरवाजे खड़ी हो गई. उसने कहा कि मजाल है मेरे जीते जी मेरे घर में कोई घुस जाए, रह गई अन्दर मुसलमान हैं ? तो मैं ये गंगा जलि सर पर रख कर कहती हूँ कि मेरे घर में कोई मुसलमान नहीं है. औरत ने झूटी क़सम खाई थी, दोनों व्यक्ति घर के अन्दर ही थे, जिनको उसने मिलेट्री आने पर उसके हवाले किया.
ऐसे झूट का भी मैं अधीन हूँ. 

ये खाए हुए भूसे का नतीजा गोबर वाली आयत है. गोबर गणेश अल्लाह कहता है - - -

"क्या आपको मालूम नहीं कि आपके रब ने हाथी वालों के साथ क्या मुआमला किया?
क्या इनकी तदबीर को सर ता पा ग़लत नहीं कर दिया?
और इन पर ग़ोल दर ग़ोल परिंदे भेजे,
जो इन लोगों पर कंकड़ कि पत्थरियाँ फेंकते थे,
सो अल्लाह ने इनको खाए हुए भूसा की तरह कर दिया."  
सूरह  फ़ील १०५  - पारा ३० आयत (१-५)

नमाज़ियो !
इस्लाम नाज़िल होने से तकरीबन अस्सी साल पहले का वक़ेआ है कि अब्रहा नाम का कोई हुक्मरां मक्के में काबा पर अपने हाथियों के साथ हमला वर हुवा था. किम-दंतियाँ हैं कि उसकी हाथियों को अबाबील परिंदे अपने मुँह से कंकड़याँ ढो ढो कर लाते और हाथियों पर बरसते, नतीजतन हाथियों को मैदान छोड़ कर भागना पड़ा और अब्रहा पसपा हुवा. यह वक़ेआ ग़ैर फ़ितरी सा लगता है मगर दौरे जिहालत में अफवाहें सच का मुकाम पा जाती हैं.
वाजः हो कि अल्लाह ने अपने घर की हिफ़ाज़त तब की जब खाना ए काबा में ३६० बुत विराजमान थे. इन सब को मुहम्मद ने उखाड़ फेंका, अल्लाह को उस वक़्त परिंदों की फ़ौज भेजनी चाहिए था जब उसके मुख्तलिफ शकले वहां मौजूद थीं. अल्लाह मुहम्मद को पसपा करता. अगर बुत परस्ती अल्लाह को मंज़ूर न होती तो मुहम्मद की जगह अब्रहा सललललाहे अलैहे वसल्लम होता.
यह मशकूक वक़ेआ भी कुरानी सच्चाई बन गया और झूट को तुम अपनी नमाज़ों में पढ़ते हो?   

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 4 July 2017

Hindu Dharm Darshan 78



आदित्य नाथ योगी की सेवा में प्रस्तुत हैं - - -

ऋग वेद की दो सूक्तियाँ 

1-अग्नि ने अपने मित्र इंद्र के लिए तीन सौ भैंसों को पकाया था. 
इंद्र ने वृत्र को मारने के लिए मनु के तीन पात्रों में भरे सोम रस को एक साथ ही में पी लिया था.
 पंचम मंडल सूक्त - 7 
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )
2-हे धन स्वामी इंद्र ! 
जब तुमने तीन सौ भैसों का मांस खाया, 
सोम रस से भरे तीन पात्रों को पिया, 
एवं वृत्र को मारा, तब सब देवों ने सोमरस से पूर्ण तृप्त इंद्र को उसी प्रकार बुलाया जैसे मालिक अपने नौकर को बुलाता है. 
पंचम मंडल सूक्त - 8 
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )

महाराज !
उत्तर प्रदेश के तथा कथित क़त्ल गाहों को कौन से धर्म के तहत बंद करा रहे हैं  ? 
जब कि ऋग वेद में अग्नि देवता इंद्र देव के लिए तीन सौ भैसों को मार कर पकाते है 
और इंद्र देव भैंसों का सारा मांस एक समय में ही चट कर जाते है, 
वह भी तीन मटके दारू के साथ ??

बूढ़े और दूध मुक्त जानवरों को इंसान खाएँ या शेर और गिद्ध , 
उनके शरीर ही दूसरे शरीरों को जीवन दान देते हैं. 
हर प्राणी दूसरे प्राणी का आहार है, 
सब्जी की लहलहाती हुई शरीर भी प्राण रखती हैं, 
फर्क इतना है कि उनके पास आवाज़ नहीं है 
और जानवरों के पास चिल्लाने के लिए आवाज़ है. 
कुछ बनस्पतियां भी प्राणी वद्ध करती हैं. discovery chanal देखा करें.
संसार के हर देश में आहार की आज़ादी है , चाहे वह मांस हो या शाक. 
मत अड़ंगा लगाएँ क़ुदरत के नियम में.
आप रूप और बुद्धि दोनों तरह से धर्म के खांचे में ढले हुए,
 "ढलुवा चकनट" लगते हैं. 
कंप्यूटर युग है अपने आकार को साकार करिए.
दुन्या के साथ ही चलिए वरना इतिहास आप को मानवता पर लगा हुवा कलंक के रूप में याद करेगा.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 3 July 2017

Soorah Hamzah 104

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
************

सूरह  हो म ज़ह १०४  - पारा ३०
(वैलुल्ले  कुल्ले होमा ज़तिल लोमाज़ते) 

अल्लाह को मानने से पहले उसे जानने की ज़रुरत है. इसके लिए हमें अपने दिमाग को रौशन करना पड़ेगा. इस धरती पर जितने भी रहमान और भगवन है, सब हजरते इंसान के दिमागों के गढ़े हुए हैं. क़ुदरत और फ़ितरत इनके हथियार हैं और इनके खालिक़ ए मशकूक की बरकत इनका ज़रीआ मुआश. इन खुदा फरोशों से दूर रहकर ही हम सच के आशना हो सकते हैं. फ़ितरत ने हमें सिर्फ़ खाम मॉल दिया है और इसे शक्ल देने के लिए औज़ार दिए हैं . . .
हाथ पैर, कान नाक, मुँह और दिल ओ दिमाग और सब से आखीर मरहला, जब हम शक्ल मुकम्मल कर लेते हैं तो फिनिशिग के लिए दिए हैं,
ज़मीर नुमा पालिश.
इस तरह हम ज़िन्दगी के तमाम मुआमले तराश सकते हैं और फिनिशिंग तक ला सकते हैं. इस ज़मीन को ही जन्नत बना सकते हैं. हमें अपने दिलो- दिमाग की हालत ठीक करना है, जिस पर रूहानियत ग़ालिब है. 

अल्लाह की आग की सिफ़त मुलाहिजा हो, दुन्या की तमाम आग अल्लाह की नहीं है?

"बड़ी खराबी है ऐसे शख्स के लिए जो पसे पुश्त ऐब निकलने वाला हो.
रू दर रू तअने देने वाला हो, जो माल जमा करता हो और इसे बार बार गिनता हो.
वह ख्याल करता है, उसका माल उसके पास सदा रहेगा.
हरगिज़ नहीं! वह शख्स ऐसी आग में डाला जाएगा,
जिसमें जो कुछ पड़े वह इसको तोड़ फोड़ दे.
और आपको मअलूम है कि वह तोड़ फोड़ करने वाली आग कैसी है?
वह अल्लाह की आग है जो सुलगाई गई है, जो दिलों तक पहुँचेगी,
वह इन पर बंद कर दी जाएगी.
वह लोग आग के बड़े बड़े सुतूनों में होंगे."
सूरह हो म ज़ह १०४ - पारा ३०-आयत (१-९)

नमाज़ियो !
अपने अक़ीदों को मानो,
मगर ज़रूरी है कि इसे जानो भी.
अल्लाह जैसी हस्ती आजिज़ है, उन लोगों से जो उसे , उसकी अन देखी सूरत और ऊँट पटाँग बातों को मानने को तैयार नहीं,
आखिर इसके लिए क्या मुंकिन नहीं है कि वह मुजस्सिम अपने बन्दों के सामने आ जाए?
और अपने वजूद का सुबूत दे,
जिन बन्दों की किस्मत में उसने जन्नत लिख रखी हैं, उनके हाथों में छलकता जाम थमा दे,
उनके लिए बैज़ा जैसी बड़ी बड़ी आँखों वाली गोरी गोरी हूरों की परेड करा दे.
क़ुरआन कहता है अल्लाह और उसके रसूल को मानो तो मरने के बाद जन्नत की पूरी फिल्म दिखलाई जाएगी,
तो इस फिल्म का ट्रेलर दिखलाना उसके लिए क्या मुश्किल खड़ी करता है,
वह ऐसा करदे तो उसके बाद कौन कमबख्त काफ़िर बचेगा?
मगर अल्लाह के लिए ये सब कर पाना मुमकिन नहीं,
अफ़सोस तुम्हारे लिए कितना आसान है, इस खयाली अल्लाह को बगैर सोचे विचारे मान लेते हो.
इसे जानो,
जागो! मुसलमानों जागो!!



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 1 July 2017

Hindu Dharm Darshan 77



वेद दर्शन                          
 खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 

हे अग्नि ! जो यजमान स्रुज उठाकर तुम्हें प्रज्वलित करता है  
एवं दिन में तीन बार तुम्हें हव्य अन्न देता है, 
हे जातवेद ! 
वह तुम्हें संतुष्ट करने वाले ईंधन आदि से बढ़ते हुए 
तुम्हारे तेज को जानता हुवा 
धन द्वारा शत्रुओं को पूरी तरह हरावे. 
चतुर्थ मंडल सूक्त 12 -1 
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )
आज के युग में इन वेद मन्त्रों के शब्द गुत्थी को सुल्जना ही मुहाल है, 
इनके अर्थ मे जाना समय की बर्बादी. 
इन्हें पेशेवर पंडित और पुजारियों की स्म्मानित भिक्षा स्रोत कहा जा सकता है.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 29 June 2017

Soorah Asr 103

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
*****

सूरह  अस्र १०३  - पारा ३० 
(वलअसरे  इन्नल इनसाना)

ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.

तथा कथित बाबा राम देव एक मदारी है जो योग के नाम पर उछल कूद करता है. वह अव्वल दर्जे का अय्यार है जो भोले भाले अवाम को ठगता है. पैसे से दूर दिखने बाला ये धूर्त अपने हर काम में पैसे की दुर्गन्ध सूंघता है. इसकी एक ही प्रेक्टिस है" पेट की धौकनी " इसका तमाशा ये कुईन विक्टोरिया तक को दिखा चुका है. 
अफ़सोस होता है अवाम पर जो इसकी लकवा ग्रस्त आँखे और चेहरे को देख कर भी इसे हर बीमारी का मसीहा मानते हैं.
रामदेव एक फटीचर गवइए से अरबों का मालिक बन गया है, उसकी आकान्छाएँ यहीं तक सीमित नहीं, बल्कि वह देश का राष्ट्र पति बन्ने का सपना देख रहा है. योग गुरु तो उसने खुद को स्थापित कर ही चुका है, अब अवशधि  सम्राट की दौड़ में शामिल है. परदे के पीछे राम देव क्या है, इसका पोल भी जल्द ही दुन्या के सामने आ जायगा. इसको बढ़ावा देने वाले या तो सीधी सादी जनता है या फिर कपटी कुटिल मुट्ठी भर लोग. खेद है कि भेद चाल चलने वाली जनता के लिए जम्हूरियत की सौगात है.
ऐसे हालात ही इन कुटिलों को एक दिन मुहम्मद बना देते हैं.

"क़सम है ज़माने की,
कि इंसान बड़े ख़सारे में है,
मगर जो लोग ईमान लाए और उन्हों ने अच्छे कम किए और एक दूसरे को हक की फ़ह्माइश करते रहे और एक दूसरे को पाबंदी की फ़ह्माइश करते रहे"
सूरह वल अस्र १०३ पारा-३० आयत (१०३)

नमाज़ियो !

आज जदीद क़द्रें आ चुकी हैं कि 'बिन माँगी राय' मत दो, क़ुरआन कहता है," एक दूसरे को हक की फ़ह्माइश करते रहो"
हक नाहक इंसानी सोच पर मुनहसर करता है, जो तुम्हारे लिए हक़ का मुक़ाम रखता है, वह किसी दूसरे के लिए नाहाक़ हो सकता है. उसको अपनी नज़र्याती राय देकर, फर्द को महेज़ आप छेड़ते हैं, जो कि बिल आखीर तनाजिए का सबब बन सकता है.
इन्हीं आयातों का असर है कि मुसलामानों में तबलीग का फैशन बन गया है और इसकी जमाअतें बन गई हैं. यही तबलीग (फ़ह्माइश)जब जब शिद्दत अख्तियार करती है तो जान लेने और जान देने का सबब बन जाती है और इसकी जमाअतें तालिबानी हो जाती हैं.

इस्लाम हर पहलू से दुश्मने-इंसानियत है. अपनी नस्लों को इसके साए से बचाओ.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 27 June 2017

Hindu Dharm Darshan 76



वर्ग विशेष 

मुसलमानों को वर्ग विशेष का दर्जा हिन्दू समाज ने कब से और क्यूँ दे रख्खा है, यह खोज का विषय है. 
उस समय मुस्लिम प्रतिष्ठित अपने धर्म के कारण ही रहे होंगे जिसे कि बहु संख्यक समाज को भी कहना पड़ता था कि वह हम से बरतर हैं. 
इस बात को इस प्रचलित विशवास से भी देखा जा सकता है कि मस्जिद में नमाजियों से नमाज़ के बाद हिन्दू औरतें अपने बच्चों को गोदों में लिए नमाजियों से फूंक डलवाने के लिए लाइन से खड़ी रहती है. पचास साल पहले मैं इस बात का गवाह हूँ, अब माहौल बदला होगा पता नहीं . 
इस तरह के बहुत से विश्वास और सुलूक मुसलमानों के हैं जो इसे वर्ग विशेष बनाते है. 
इस्लामी नज़रिए की निराकार कोई एक ताक़त जिसे अल्लाह कहा जाता है, साकार मूर्तियों और देवों की भीड़ पर ग़ालिब हो गई, जिसे अब बाक़ी हिन्दू भी जाने अनजाने मानने लगे है. 
सब इंसान अल्लाह के बन्दे समान दर्जा रखते है. ज़ात-पात, छुवा-छूत से मुसलमान परे हैं यह बात अलग है कि हिन्दू समाज के असर में थोड़े बहुत हैं.
कोई बेहतर न कोई मेहतर. 
दुन्या की आधी आबादी यानी स्त्री का दर्जा मुस्लिम समाज में कहीं बेहतर है बनिस्बत हिन्दू समाज के.
विधवा और अबला को यह समाज पहले अपनाता है.
अपनी माँ बहेन बेटियों को आश्रम के हवाले नहीं करता. 
यह बात भी सच है कि क़ुरान एक मर्द की गवाही की जगह दो औरतों की गवाही चाहता है जब कि हिन्दू धर्म ग्रन्थों में औरतों को कोई मकाम ही नहीं है.
 मुसलमानों की ज़िन्दगी में हराम और हलाल का बड़ा दख्ल़ है जिसका हिन्दू समाज को ज्ञान ही नहीं. 
इंसान का हर नवाला हराम और हलाल के पैमाने से तुला हुवा होता है, 
खुराक ही नहीं, हर अमल हराम और हलाल की राह से गुज़रता है. 
शराब और जुए से निस्बतन दूर. 
मांसाहार भी इसकी माक़ूलियत है.
हिन्दू समाज मुसलमानों को वर्ग विशेष इस लिए कहता है कि वह इन हकीकतों को देखता है, मगर अपने समाज की जंजीरों में जकड़ा हुवा है.
इसके बावजूद आधा अखंड भारत इस्लाम के शरण में चला गया.

मुसलमान इनको ग़ैर मुस्लिम कहता है. ग़ैर अर्थात पराया. गोया हिन्दू इनके लिए पराए होते हैं. सच तो यह है कि मुसलमान ग़ैर को अपनाता है और हिन्दू अपनों को वहिस्कृत करता है.
इन विरोध भाषी प्रचलन के साथ लगभग एक हज़ार साल गुज़र गए. 
और यह अब भी प्रचलित है. इसके असर में भारत आज भी प्रभावित है, 
किसी दबाव के चलते कौमी स्तर पर धमकियां आया करती हैं कि अगर हमारी बात न मानी गई तो हम इस्लाम कुबूल कर लेंगे. 
कोई वर्ग विशेष नाम का प्राणी नहीं जो कभी धमकाए कि वह हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगा . 
हर रोज़ कोई न कोई हिन्दू इस्द्लाम को कुबूल करता हुवा देखा जा सकता है मगर पचास वर्ष की अपनी व्यसक आयु में मैंने सिर्फ एक बार पढ़ा कि कोई मुस्लिम हिन्दू बन कर सुमन नाम रख्खा है.
मैं हर धर्म और मज़हब को दुन्या की बद तरीन वजूद मानता हूँ 
वह चाहे इस्लाम हो या दूसरा कोई. 
मगर जो देख रहा हूँ वह लिख रहा हूँ.
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 26 June 2017

Soorah Taqasur 102

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह  तकासुर १०२  - पारा ३० 
(अल्हाको मुत्तकासुरोहत्ता ज़ुर्तमुल मकाबिर)  

ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.

मुसलामानों का एक फख्र ए नाहक ये भी है कि दुन्या में क़ुरआन वाहिद ऐसी करिश्माई किताब है कि जिसको हिफ्ज़ (कंठस्त) किया जा सकता है, इसलिए कि ये आसमानी किताब है. यक़ीन किया जा सकता है कि इस बात में जुज़्वी सच्चाई है क्यूंकि चौदा सौ सालों में इसके लाखों हाफिज़ हुए होंगे और आज भी हजारहा मौजूद हैं. इस बात पर एक तहक़ीक़ी निगाह डालने की ज़रुरत है. सब से पहले कि कुरआन एक मुक़फ्फ़ा नसर (तुकान्ती गद्य) है जिसमे लय और तरन्नुम बनना फितरी है. इसको नगमों की तरह याद किया जा सकता है. खुद कुरआन के तर्जुमे को किसी दूसरी भाषा में हिफ्ज़ कर पाना मुमकिन नहीं, क्यूंकि ये कोई संजीदा मज़मून नहीं है, कोई भी नज़्म खुद को याद कराने की कशिश रखती है. इसके हिफ्ज़ का शिकार तालिब इल्म किसी दूसरे मज़मून के आस पास नहीं रहता, जब वह दूसरे सब्जेक्ट पर जोर डालता है तो उसका क़ुरआनी हिफ्ज़ ख़त्म होने लगता है.
आमाद ए जेहाद तालिब इल्म कुरआन क्या, इससे बड़ी बड़ी किताबो का हफिज़ा कर लेता है. एक लाख बीस हज़ार की ज़खीम किताब महा भारत बहुतों को कंठस्त हुई. सिन्फ़ आल्हा ज़बानी गाया जाता है जो बांदा जिले के लोगों में सीना बसीना अपने पूर्वजों से आय़ा. इस विधा को जाहो-जलाल के साथ गाया जाता है कि सुनने वाले पर जादू चढ़ कर बोलता है. अभी एक नवजवान ने पूरी अंग्रेजी डिक्शनरी को, लफ़्ज़ों को उलटी हिज्जे के साथ याद करके दुन्या को अचम्भे में ड़ाल दिया, इसका नाम गिनीज़ बुक आफ रिकार्ड में दर्ज हुआ.
अहम् बात ये है कि इतनी बड़ी तादाद में हाफ़िज़े कुरआन, कौम के लिए कोई फख्र की बात नहीं, ये तो शर्म की बात है कि कौम के नवजवान को हाफ़िज़े जैसे गैर तामीरी काम में लगा दिया जाए. इतने दिनों में तो वह ग्रेजुएट हो जाते. कोई कौम दुन्या में ऐसी नहीं मिलेगी जो अपने नव जवानों की ज़िन्दगी इस तरह से बर्बाद करती हो. 
अल्लाह कहता है - - -

"फख्र करना तुमको गाफ़िल किए रखता है,
यहाँ तक कि तुम कब्रिस्तानों में पहुँच जाते हो,
हरगिज़ नहीं तुमको बहुत जल्द मालूम हो जाएगा.
(फिर) हरगिज़ नहीं तुमको बहुत जल्द मालूम हो जाएगा.
हरगिज़ नहीं अगर तुम यकीनी तौर पर जान लेते,
वल्लाह तुम लोग ज़रूर दोज़ख को देखोगे.
वल्लाह तुम लोग ज़रूर इसको ऐसा देखना देखोगे जोकि खुद यक़ीन है, फिर उस रोज़ तुम सबको नेमतों की पूछ होगी".

नमाज़ियो! 
तुम अल्लाह के कलाम की नंगी तस्वीर देख रहे हो, कुरआन में इसके तर्जुमान इसे अपनी चर्ब ज़बानी से बा लिबास करते है. क्या बक रहे हैं तुम्हारे रसूल ? वह ईमान लाए हुए मुसलामानों को दोज़ख में देखने की आरज़ू रखते हैं. किसी तोहफे की तरह नवाजने का यकीन दिलाते हैं. " वल्लाह तुम लोग ज़रूर दोज़ख को देखोगे." अगर वाकई कहीं दोज़ख होती तो उसमें जाने वालों में मुहम्मद का नाम सरे फेहरिश्त होता.



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 24 June 2017

Hindu Dharm Darshan 75



हिदुस्तानी मुसलमान 

कुछ पढ़े लिखे मूर्ख, जनता के तथा कथित प्रतिनिघ बड़ी आसानी से मुसलमानों को मश्विरह दे देते हैं कि पाकिस्तान चले जाएं. 
जो पाकिस्तान ज़िदाबाद के नारे लगाते हैं और पाकिस्तान जाना चाहते हैं, उनको हमरा कानून जाने नहीं देता. बार्डर क्रॉस करते  ही फौज उन्हें गोली मार  देगी . ऐसे जन प्रतिनिघ अपने साक्षर बापों से मश्विरह लेकर ही जुबान खोला करें.
काश कि संसार के सारे देश इस बात को माने कि हर आने जाने वाले को Wellcome और Wellgo कहकर बंधकों आज़ाद किया करें.
मगर सवाल यह उठता है कि जिन मुल्कों ने परिश्रम और ईमान दारी से अपने देश को पवित्र और जन्नत नुमा बनाया है वह घटिया दरजे के इन बेईमान और भ्रष्ट लोगों को अपने देश में घुसने भी क्यों दें ? वह तो हर देश के उन नव निहालों को सर आँखों पर बिठाते हैं जो हर मैदान में उनकी तरह या उनसे आगे हो, भारत के हों या पाकिस्तान के.
हम बात कर रहे थे उन थोथे प्रतिनिघयों की जो हमें देश छोड़ने की राय दिया करते हैं, कि हम को अगर तुम्हारे बापों का देश छोड़ना ही पड़ा तो हम अपना मकान, अपनी दुकान, अपनी खेती बाड़ी, और अपना तमाम असासा अपने साथ लेकर ही जाएँगे , 
तुमको मुफ्त नहीं दे जाएँगे. 
हम ईमान दारी के साथ सरकारी भुगतान को जीवन का अंग बनाए हैं, 
हर तरह के कर अदा करते हैं, 
हर कानून का पालन करते हैं, हमें देश नहीं छोड़ना पड़ेगा 
बल्कि देश को उन टुकड़ों को छोड़ना पड़ेगा जो हमारा है. 
देश छोड़ने वाले बनिए और बाह्मन होगे जो देश के तमाम संसाधन और दौलत पर कब्जा किए हुए बैठे हैं. 
मल्याओं ने तो खुद ही देश छोड़ रखा है. 
मुसलमान तुम्हारी आँखों में इस लिए चुभ रहे है कि वह मनुवाद के फंदे से आज़ाद हो गए हैं, शूद्रों , हरिजनों और आज के दलितों की तरह तुम्हारे दास नहीं, तुम्हारा मल मूत्र नहीं ढोते, तुहारे डांगर नहीं निक्याते.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 23 June 2017

Soorah alkaariya 101

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
***
सूरह अलक़ारिआ १०१- पारा ३०
(अल्क़ारेअतो मल्क़ारेअतो)


एक बच्चे ने बाग़ में बैठे कुछ बुजुर्गों से, आकर पूछा क़ि क्या उनमें से कोई उसके एक सवाल का जवाब दे सकता है?
छोटा बच्चा था, लोगों ने उसकी दिलजोई की, बोले पूछो.
बच्चे ने कहा एक बिल्ली अपने बच्चे के साथ सड़क पार कर रही थी क़ि अचानक एक कार के नीचे आकर मर गई, मगर उसका बच्चा बच गया, बच्चे ने आकर अपनी माँ के कान में कुछ कहा और वहां से चला गया. ,
आप लोगों में कोई बतलाए क़ि बच्चे ने अपनी माँ के कान में क्या कहा होगा ?
बुड्ढ़े अपनी अपनी समझ से उस बच्चे को बारी बारी जवाब देते रहा जिसे बच्चा ख़ारिज करता रहा. थक हर कर बुड्ढों ने कहा , अच्छा भाई  हारी, तुम ही बतलाओ क्या कहा होगा?
बच्चे ने कहा उसने अपनी माँ के कान में कहा था "मियाऊँ"
आलिमान दीन की चुनौती है कि कुरआन का सही मतलब समझना हर एक की बस की बात नहीं, वह ठीक ही समझते है क़ि मियाऊँ को कौन समझ सकता है? मुहम्मद के मियाऊँ का मतलब है "क़यामत ज़रूर आएगी"

देखिए क़ि मुहम्मद उम्मी सूरह में आयतों को सूखे पत्ते की तरह खड़खडाते हैं. सूखे पत्ते सिर्फ जलाने के काम आते हैं. वक़्त का तकाज़ा है क़ि सूखे पत्तों की तरह ही इन कुरानी आयतों को जला दिया जाए - - - 


"वह खड़खडाने वाली चीज़ कैसी कुछ है, वह खड़खडाने वाली चीज़,
वह खाद्खादाने वाली चीज़ कैसी कुछ है वह खड़खडाने वाली चीज़,
और आपको मालूम है कैसी कुछ है वह खड़खडाने वाली चीज़,
जिस रोज़ आदमी परेशान परवानों जैसे हो जाएगे.
और पहाड़ रंगीन धुनी हुई रूई की तरह हो जाएगे,
फिर जिस शख्स का पल्ला भरी होगा,
वह तो खातिर ख्वाह आराम में होगा,
और जिसका पल्ला हल्का होगा,
तो उसका ठिकाना हाविया होगा,और आपको मालूम है, वह हाविया क्या है?
वह एक दहकती हुई आग है."
सूरह अलक़ारिआ १०१- पारा ३० आयत (१-११)

 नमाज़ियो !
इस सूरह को ज़बान ए उर्दू में हिफज़ करो उसके बाद एक हफ्ते तक अपनी नमाज़ों में ज़बान ए उर्दू में (या जो भी आपकी मादरी ज़बान हो), अल्हम्द के बाद इसे ही जोड़ो. अगर तुम उस्तुवार पसंद हो तो तुम्हारे अन्दर एक नया नमाज़ी नमूदार होगा. वह मोमिन की राह तलाश करेगा, जहाँ सदाक़त और उस्तुवारी है.
नमाज़ के लिए जाना है तो ज़रूर जाओ, उस वक्फे में वजूद की गहराई में उतरो, खुद को तलाश करो. अपने आपको पा जाओगे तो वही तुम्हारा अल्लाह होगा. उसको संभालो और अपनी ज़िन्दगी का मकसद तुम खुद मुक़र्रर करो.

तुम्हें इन नमाज़ों के बदले 'मनन चिंतन' की ज़रुरत है. इस धरती पर आए हो तो इसके लिए खुद को इसके हवाले करो, इसके हर जीव की खिदमत तुम्हारी ज़िन्दगी का मक़सद होना चाहिए, इसे कहते हैं ईमान, क़ि जो झूट का इस्तेमाल किसी भी हालत में न करे. तुम्हारे कुरआन में  मुहम्मदी झूट का अंबार है.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान