Friday, 18 August 2017

Hindu Dharm Darshan 87



गीता और क़ुरआन

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -

>जिसने मन को जीत लिया, 
उसके लिए मन सर्व श्रेष्ट मित्र है. 
किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया, 
उसके लिए मन सब से बड़ा शत्रु है.

**जिसने मन को जीत लिया है, 
उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, 
क्योकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है. 
ऐसे पुरुष के लिए सुख दुःख, सर्दी गर्मी, मान अपमान एक सामान हैं.

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  -6  - श्लोक -6 -7 

>बहुत अच्छा गीता सन्देश है. 

यह विचार इस्लाम के बाग़ी समूह तसव्वुफ़ (सूफ़ी इज़्म) के आस पास है. 
इस श्लोक में इन्द्रीय तृप्ति की बात नहीं है, इसलिए यह तसव्वुफ़ के और अरीब है. हर सूफी शादी शुदा रह कर और बीवियों के बख्शे हुए कष्ट को झेल कर ही सूफी बनता है. 
एक सूफ़ी की बीवी अपने शौहर के इंतज़ार में आग बगूला हो रही थी कि  दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई, 
तो देखा सूफी नहीं ,उसका दोस्त खड़ा है. 
इतने में सूफी भी लकड़ियों का गठ्ठर जिसे शेर पर लादे हुए और एक सांप बांधे हुए था, लेकर आया. 
बीवी जो लकड़ियों का इंतज़ार खाली हांडी हाथों में लिए कर रही थी, 
गुस्से में हांडी को सूफी के सर पर पटख दिया. 
हांडी टूट गई मगर उसका अंवठ सूफी के गर्दन में था. 
दोस्त ने पूंछा यह क्या ? 
सूफी का जवाब था 
"शादी का तौक़" 
शेर और सांप मेरी लकड़ी ढोते हैं और मैं शादी का तौक़. 

उर्दू शायरी इस गीता सन्देश को कुछ इस तरह कहती है - - -

नहंग व् अजदहा व् शेर ए नर मारा तो क्या मारा,
बड़े मूज़ी को मारा, नफ्स ए अम्मारा को गर मारा.
नहंग=घड़ियाल*नफस ए अम्मारा =मन 

नक्क़ारे के शोर में मुंकिर की आवाज़ 

मन को इतना मार मत, मर जाएँ अरमान,
अरमानों के जाल में, मत दे अपनी जान.

और क़ुरआन कहता है - - - 

>क़ुरान की तो अलाप ही जुदा है.
>"तुम लोगों के वास्ते रोजे की शब अपनी बीवियों से मशगूल रहना हलाल कर दिया गया, 
क्यूँ कि वह तुम्हारे ओढ़ने बिछोने हैं और तुम उनके ओढ़ने बिछौने हो। 
अल्लाह को इस बात की ख़बर थी कि तुम खयानत के गुनाह में अपने आप को मुब्तिला कर रहे थे। खैर अल्लाह ने तुम पर इनायत फ़रमाई और तुम से गुनाह धोया - - -
जिस ज़माने में तुम लोग एत्काफ़ वाले रहो मस्जिदों में ये खुदा वंदी जाब्ते हैं कि उन के नजदीक भी मत जाओ। इसी तरह अल्लाह ताला अपने एह्काम लोगों के वास्ते बयान फरमाया करते हैं इस उम्मीद पर की लोग परहेज़ रक्खें .
(सूरह अलबकर २, दूसरा पारा आयत १८७)


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 14 August 2017

क़ुरआन के झूट - - - और तौरेती सदाक़त - - -

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
*************
क़ुरआन के झूट - - - और तौरेती सदाक़त  - - -

क़ुरआन में कई अच्छी और कई बुरी हस्तियों का नाम बार आता है, जिसमे उनका ज़िक्र बहुत मुख़्तसर होता है. पाठक की जिज्ञासा उनके बारे में बनी रहती है कि वह उनकी तफ्सील जानें. मुहम्मद ने इन हुक्मरानों का नाम भर सुना था और उनको पैग़म्बर या शैतान का दरजा देकर आगे बढ़ जाते हैं, उनका नाम लेकर उसके साथ मन गढ़ंत लगा कर क़ुरआन पढ़ने वालों को गुमराह करते हैं. दर अस्ल यह तमाम हस्तियां यहूद हैं जिनका विवरण तौरेत में आया है, मैं उनकी हक़ीक़त बतलाता हूँ, इससे मुहम्मदी अल्लाह की जिहालत का इन्किशाफ़ होता है. 

झलकियाँ - - -
इंजील दो हिस्सों में तक़सीम है , पहला आदम से लेकर ईसा तक। 
इसे ओल्ड टेस्टामेंट (Old Testament )कहते हैं। 
दूसरा ईसा और ईसा के बाद का है जिसे (New Testament ) कहते हैं। 
ईसाई इन दोनों हिस्से को अपनी मुक़द्दस इंजील मानते हैं मगर ,
यहूदियों का सिर्फ पहले हिस्से Old Testament पर ही ईमान है जिसे तौरेत कहते हैं। 
ईसा बज़ात ख़ुद यहूदी थे मगर बुन्याद परस्ती के बाग़ी थे , जैसे भारत में कबीर हुए.  इस लिए यहूद उनको अपने धर्म का दुश्मन मानने लगे। 
मुहम्मद का माहौल यहूदियों से ज़्यादा मुतास्सिर था , इस लिए उन्हों ने बुत परस्तों के बीच में नया मूसा बनने का तरीक़ा अपनाया , इसी लिए इस्लाम में तौरेती अंकुर हैं.

 इंजील से मुहम्मद कम ही वाक़िफ़ थे इस लिए क़ुरआन में ईसाइयत की झलक कम ही नज़र आती हैं, सूरह मरियम में मुहम्मद ने कुछ मनगढ़ंत की है। 
(यह सिलसिला जारी रहेगा)


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Hindu Dharm Darshan 86



गीता ज्ञान 

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -

*विनर्म साधु पुरुष अपने वास्तविक ज्ञान के कारण 
एक विज्ञान तथा विनीत ब्राह्मण, 
गाय, हाथी, कुत्ता, तथा चांडाल को सामान दृष्टि (समभाव) से देखते हैं.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  -5 - श्लोक -18 

वैसे भगवान् कृष्ण पर सियासी तौर पर यादवों (अहीरों) का क़ब्ज़ा है, 
मथुरा और आस पास दूधयों की बड़ी आबादी है, 
स्थानीय लोग दूध घी का सेवन कुछ ज़यादा ही करते हैं. 
मगर पौराणिक दर्पण में भगवान् कृष्ण क्षत्रीय माने जाते हैं . 
वैदिक युग में गाय, हाथी, कुत्ता सब जीव सामान थे, 
गौ मांस प्रचलित था, सम्मानित खाद्य पदार्थ था दूसरे  पदार्थों के बनिसबत. 
आज यह गऊ माता हो गई, 
यह हमारा चाल, चरित्र और चेहरा है जो ज़रूरतन बदलता रहता है. 
मनुवाद ने चांडाल को पशुओं की सीमा रेखा पर रखा है,  
हक़ीक़त यह है कि चोर चांडाल और बरहमन एक ही कुल के होते हैं, 
शेर कुत्ता और क्षत्रीय दूसरे कुल के,
तथा हाथी सुवर और बनिए तीसरे कुल के.

और क़ुरआन कहता है - - - 
"बे शक जो लोग काफ़िर हो चुके हैं, 
बेहतर है उनके हक में, 
ख्वाह उन्हें आप डराएँ या न डराएँ, 
वह ईमान न लाएंगे।
 बंद लगा दिया है अल्लाह ने उनके कानों और दिलों पर और आंखों पर परदा डाल दिया है" 
(सूरह अलबकर -२ पहला पारा अलम आयत 6-7) 

इस मौके पर एक वाकेया गाँव के एक नव मुस्लिम राम घसीटे उर्फ़ अल्लाह बख्श का याद आता है --- 
मस्जिद में नमाज़ से पहले मौलाना पेश आयत को बयान कर रहे थे, 
अल्लाह बख्श भी बैठा सुन रहा था, 
पास में बैठे गुलशेर ने पूछा , 
"अल्लाह बख्श कुछ समझे ? 
"अल्लाह बख्श ने ज़ोर से झुंझला कर जवाब दिया , 
"क्या ख़ाक समझे ! 
"जब अल्लाह मियाँ खुदई दिल पर परदा डाले हैं 
और कानें माँ डाट ठोके हैं. 
पहले परदा और डाट हटाएँ, मोलबी साहब फिर समझाएं" 
भरे नमाज़ियों में अल्लाह की किरकिरी देख कर गुलशेर बोला 
"रहेगा तू काफ़िर का काफ़िर'' 
"तुम्हारे ऐसे अल्लाह की ऐसी की तैसी" 
कहता हुवा घसीटा राम सर की टोपी उतार कर ज़मीन पर फेंकता हुवा मस्जिद के बाहर था.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 11 August 2017

Soorah Falak113+ Soorah Naas 114-Last


मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
**************
सूरह फ़लक़ - ११३ - पारा - ३० 
(कुल आऊजो बेरब्बिल फलके) 
 
आज मैं खुश हूँ कि क़ुरआन की आख़िरी सूरह पर पहुँच चुका हूँ. 
सूरह अव्वल यानी सूरह फातेहा में मैंने आपको बतलाया था कि 
मुहम्मद ने खुद अपने कलाम को अल्लाह बन कर फ़रमाने की नाकाम कोशिश की, जिसे ओलिमा ने क़लम का ज़ोर दिखला कर कहा कि अल्लाह कभी अपने मुँह से बोलता है, 
कभी मुहम्मद के मुँह से, 
तो कभी बन्दे के मुँह से बोलता है. 
बोलते बोलते देखिए कि आखिर में अल्लाह की बोलती बंद हो गई, 
उसने सच बोलकर अपनी खुदाई के खात्मे का एलान कर दिया है. 

क़ुरआन की ११४ सूरतों का सिलसिला बेतुका सा है, 
कोई सूरह इस्लाम के वक़्त ए इब्तेदा की है तो 
अगली सूरह आखिर दौर की आ जाती है. 
बेहतर यह होता कि इसे मुरत्तब करते वक़्त मुहम्मद की तहरीक के मुताबिक इस का सिसिला होता. 
खैर, 
इस्लाम की तो सभी चूलें ढीली हैं, उनमें से एक यह भी है. 
इस खामी से एक फ़ायदा यह हुवा है कि इन आखिरी दो सूरतों में इस्लाम की वहदानियत की हवा खुद मुहम्मदी अल्लाह ने निकाल दिया है. 
अल्लाह जिब्रील के मार्फ़त जो पैगाम मुहम्मद के लिए भेजता है उसमे मुहम्मद उन तमाम कुफ्र के माबूदों से पनाह माँगते है, अल्लाह की, 
जिसे हमेशा वह नकारते रहे, 
 इस सूरह में अल्लाह तमाम माबूदों को पूजने का मश्विरः देता है क्यूंकि वह बीमारी से निढाल है.
मुहम्मद शदीद बीमार हो गए थे, कहते हैं कि उनका पेट फूल गया था, जिसकी वजेह थी कि कुछ यहूदिनों ने उन पर जादू टोना कर दिया था कि उनकी बजने वाली मिटटी जाम हो गई थी और उनका बजना बंद हो गया था.
(पिछली सूरतों में उन्होंने फ़रमाया है कि इंसान बजने वाली मिटटी का बना हुवा है) 
उनका पेट इतना फूल गया था कि बोलती बंद हो गई थी. 
जिब्रील अलैहिस सलाम वहयी लेकर आए और मंदार्जा जेल आयतें पढनी शरू कीं, तब जाकर धीरे धीरे उनका जाम खुलने लगा, 
उनसे जिब्रील ने कहलवाया कि - - - 
"तुम गाठों पर पढ़ पढ़ कर फूंकने वाली वालियों को तस्लीम करो कि उनकी भी एक हस्ती है तुम्हारे अल्लाह जैसी ही." 
"हसद करने वाले भी दमदार हैं जो अपना असर अल्लाह की तरह रखते हैं, जब वह हसद करने पर आ जाएं." 
"आदमियों के मालिक, बादशाहों का भी अल्लाह की तरह ही कोई मुक़ाम है." 
"आदमियों के मुखालिफ़ माबूदों ; लात, मनात और उज्जा वगैरा को भी तस्लीम करो कि वह भी अल्लाह की तरह ही कोई ताक़त हैं." 
"वुस्वुसा डालने के वहेम को भी अपना माबूद तस्लीम करो जब तुम वुस्वुसे में आओ." 
"जिन्न को तो तुम पहले से ही अल्लाह दो नम्बरी माने बैठे हो. तो ठीक है . . . ." 
एन हफ्ते की मामूली बीमारी ने मुहम्मद को ऐसा सबक़ सिखलाया कि इस्लाम का मुँह काला हो गया. 
मुहम्मद के फूले हुए पेट से मुहम्मदी अल्लाह की सारी हवा ख़ारिज हो गई,

मुसलमान सिर्फ इन ग्यारह आयतों की दो सूरतों को ही पढ़ कर संजीदगी से मुहम्मद को समझ लें तो मुहम्मदी अल्लाह को समझ पाना आसान होगा. 

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सूरह फ़लक़ - ११३ - पारा - ३० 
(कुल आऊजो बेरब्बिल फलके) 

"आप कहिए कि मैं सुब्ह के मालिक की पनाह लेता हूँ,
तमाम मख्लूकात के शर से,
और अँधेरी रत की शर से,जब वह रात आ जाए,
और गाठों पर पढ़ पढ़ कर फूँकने वालियों की शर से,
और हसद करने वालों के शर से, जब वह हसद करने लगें."
(सूरह फ़लक़ - ११३ - पारा - ३० आयत (१-५)

सूरह नास ११४ - पारा - ३० 
(कुल आऊजो बेरब्बिंनासे) 

"आप कहिए,
कि मैं आदमियों के मालिक और आदमियों के बादशाह,
और आदमियों के माबूद से पनाह लेता हूँ,
वुस्वुसा डालने, पीछे हट जाने वाले के शर से,
जो आदमियों के दिलों में वुस्वसा डालता है,
ख्वाह वह जिन हो या आदमी." 
(सूरह फ़लक़ - ११३ - पारा - ३० आयत (१-६)

नमाज़ियो !
सूरह फ़लक और सूरह नास के बारे में वाक़िया है कि यहूदिनों ने मुहम्मद पर जादू टोना करके उनको बीमार कर दिया था, तब अल्लाह ने यह दोनों सूरतें बयक वक़्त नाजिल कीं, घर की तलाशी ली गई, एक ताँत (सूखे चमड़े की रस्सी) की डोरी मिली, जिसमे ग्यारह गाठें थीं. इसके मुकाबिले में जिब्रील ने मंदार्जा ग्यारह आयतें पढ़ीं, हर आयत पर डोरी की एक एक गाठें खुलीं, और सभी गांठें खुल जाने पर मुहम्मद चंगे हो गए.
जादू टोना को इस्लामी आलिम झूट क़रार देते हैं, जब कि इसके ताक़त के आगे रसूल अल्लाह की अमाँ चाहते हैं. 
यह क़ुरआन क्या है?
राह भटके हुए मुहम्मदी अल्लाह की भूल भुलय्या ? या 
मुहम्मद की, अल्लाह का पैगम्बर बन्ने की चाहत ? 

मुसलमानों! 
मैं तुम्हारा और तुम्हारी नस्लों का सच्चा ख़ैर ख्वाह हूँ , इस लिए कि दुन्या की कोई कौम तुम जैसी सोई हुई नहीं है. माजी परस्ती तुम्हारा ईमान बन गया है, जब कि मुस्तकबिल पर तुम्हारे ईमान को क़ायम होना चाहिए. 

हमारी तहकीकात और हमारे तजुरबे, हमारे अभी तक के सच है, इन पर ईमान लाओ. कल यह झूट भी हो सकते हैं, तब तुम्हारी नस्लें नए फिर एक बार सच पर ईमान लाएँगी, उनको इस बात पर लाकर कायम करो, और इस्लाम से नजात दिलाओ. 


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 5 August 2017

Hindu Dharm Darshan 85



गीता और क़ुरआन

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -

 इस लिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ट अर्जुन ! 
प्रारंभ में ही इन्द्रियों को वश में करके, इस पाप के महा प्रतीक (काम) का दमन करो और ज्ञान तथा आत्म साक्षातार के इस विनाश करता का बद्ध करो. 
इस प्रकार हे महाबाहु अर्जुन ! 
अपने आपको भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जान कर और मन को सावधान आघ्यात्मिक बुद्धि (कृष्ण भावनामृत) से स्थिर करके आघ्यात्मिक शक्ति द्वारा इस काम रुपी दुर्जेय शत्रु को जीतो.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  -3 - श्लोक -41-43 

*काम अर्थात संभोग, 
संभोग स्त्री और पुरुष (Male Female) का ऐसा खेल है जिस को भोगने का आनंद दोनों को बराबर बराबर मिलता है. 
सम+भोग=सम्भोग. बिलकुल उचित नाम है इस क्रिया क्रम का . 
उर्दू में संभोग को मुबाशरत कहते हैं. मुबाशरत शब्द बशर से बना है . 
मुबाशरत यानी बशर की उत्पत्ति. 
कहने का मतलब है कि केवल मुबाशरत से ही इंसान के वजूद का सिलसिला जारी रह सकता है, 
वरना मानव जीव अलविदा. 
मुबाशरत और संभोग के लिए इंसान ही नहीं हैवान भी जान की बाज़ी लगा देते हैं.
धरती का हर जीव मुबाशरत और संभोग के लिए उत्साहित रहता है. 
इस में इतनी लज्ज़त कुदरत ने क्यों भर दी ? 
इस लिए कि जीवन का सिलसिला इस धरती पर कायम रहे. 
क़ुदरत दुन्या को जीवित रखना चाहती है. 
भगवान कृष्ण काम यानी मुबाशरत और संभोग को 
"पाप के महा प्रतीक (काम) का दमन" क्यों आदेशित करते हैं ? 
क्या उद्देश, क्या मकसद है उनका ? 
अगर उनके आज्ञा का पालन सारी मानव जाति करने लगे तो 40-50 सालों बाद मानव जाति का The End .
**
और क़ुरआन कहता है - - - 

क़ुरआन मुबाशरत और संभोग को प्रोत्साहित करता है. क़ुरआनमें ब्रम्हचर्य गुनाह है. एक ही नहीं चार चार निकाह की छूट देता है. बेवा से शादी को अव्वल्यत देता है ताकि मुबाशरत और संभोग जारी रहे.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Soorah Akhlas 112

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

सूरह इखलास - ११२ - पारा - ३० 
( कुल हवाल लाहो अहद) 



जंगे-बदर के बाद जंगे-ओहद में अल्लाह के खुद साख्ता रसूल हार के बाद अपने मुँह ढक कर हारी हुई फ़ौज के सफ़े-आखीर में पनाह लिए हुए खड़े थे और अबू सुफ्यान की आवाज़ ए बुलंद को सुनकर भी टस से मस न हुए. वह आवाज़ जंग का बाहमी समझौता हुवा करता था कि नाम पुकारने के बाद दस्ते के मुखिया को सामने आ जाना चाहिए ताकि उसके मातहतों का खून खराबा मजीद न हो. 
वैसे भी मुहम्मद ने कभी तलवार और तीर कमान को हाथ नहीं लगाया, बस लोगों को चने की झाड़ पर चढाए रहते थे. 
उनका कलाम होता ,
'' मार ज़ोर लगा के, तुझ पर मेरे माँ बाप कुर्बान"

"आप कह दीजिए वह यानि अल्लाह एक है,
अल्लाह बेनयाज़ है,
इसके औलाद नहीं,
और न वह किसी की औलाद है, और न कोई उसके बराबर है."

नमाज़ियो !
सूरह अखलास दूसरी ग़नीमत सूरह है, पहली ग़नीमत थी सूरह फातेहा. बाक़ी कुरआन सूरतें करीह हैं , तमाम सूरतें मकरूह हैं. इन दोनों सूरतों को छोड़ कर बाक़ी कुरआन नज़रे-आतिश कर दिया जाय, तो भी इस्लाम की लाज बच सकती है, वरना तो ज़रुरत है मुकम्मल इन्कलाब की.
इसमें कोई शक नहीं की कुदरत की न कोई औलाद है, न ही वह किसी की औलाद. इसी तरह कुदरत की मज़म्मत करना या उसे पूजना दोनों ही नादानियाँ हैं. कुदरत का सामना करना ही उसका पैगाम है. कुदरत पर फ़तह पाना ही इंसानी तजस्सुस और इंसानी ज़िन्दगी का राज़ है. कुदरत को मगलूब करना ही उसकी चाहत है.

सूरह इखलास - ११२ - पारा - ३० 
( कुल हवाल लाहो अहद) 


जंगे जंगे-बदर के बाद जंगे-ओहद में अल्लाह के खुद साख्ता रसूल हार के बाद अपने मुँह ढक कर हारी हुई फ़ौज के सफ़े-आखीर में पनाह लिए हुए खड़े थे और अबू सुफ्यान की आवाज़ ए बुलंद को सुनकर भी टस से मस न हुए. वह आवाज़ जंग का बाहमी समझौता हुवा करता था कि नाम पुकारने के बाद दस्ते के मुखिया को सामने आ जाना चाहिए ताकि उसके मातहतों का खून खराबा मजीद न हो. 
वैसे भी मुहम्मद ने कभी तलवार और तीर कमान को हाथ नहीं लगाया, बस लोगों को चने की झाड़ पर चढाए रहते थे. उनका कलाम होता ,'' मार ज़ोर लगा के, तुझ पर मेरे माँ बाप कुर्बान"

"आप कह दीजिए वह यानि अल्लाह एक है,
अल्लाह बेनयाज़ है,
इसके औलाद नहीं,
और न वह किसी की औलाद है, और न कोई उसके बराबर है."
नमाज़ियो !
सूरह अखलास दूसरी ग़नीमत सूरह है, पहली ग़नीमत थी सूरह फातेहा. बाक़ी कुरआन सूरतें करीह हैं , तमाम सूरतें मकरूह हैं. इन दोनों सूरतों को छोड़ कर बाक़ी कुरआन नज़रे-आतिश कर दिया जाय, तो भी इस्लाम की लाज बच सकती है, वरना तो ज़रुरत है मुकम्मल इन्कलाब की.

इसमें कोई शक नहीं की कुदरत की न कोई औलाद है, न ही वह किसी की औलाद. इसी तरह कुदरत की मज़म्मत करना या उसे पूजना दोनों ही नादानियाँ हैं. कुदरत का सामना करना ही उसका पैगाम है. कुदरत पर फ़तह पाना ही इंसानी तजस्सुस और इंसानी ज़िन्दगी का राज़ है. कुदरत को मगलूब करना ही उसकी चाहत है.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 2 August 2017

Hindu Dharm Darshan 84



गीता और क़ुरआन

क़ुरआन मैं ५०सालों से पढ़ रहा हूँ, गीता बहुत पहले एक बार पढ़ी थी, 
मगर हिन्दू धर्म शाश्त्रों के विरोध में ज़बान नहीं खोली कि 
यह हिन्दू मुस्लिम मुआमला हो जाएगा.
मैं डरता था और सोचता था कि सिर्फ मुसलामानों को जगाया जाए, 
हिन्दुओं के तो बहुतेरे समाज सुधारक हैं. 
मगर एक दिन अन्दर से आवाज़ आई कि मैं तो डरपोक और पक्षपाती हूँ.
आज का पाठक भी बहुत समझदार हो गया है , वह विषय में तथ्य को तलाशता है हिन्दू मुस्लिम संकीर्णता को नहीं. 
जो बुनयादी तौर पर कपटी हैं उनकी बात अलग है.
बहुत पहले मनुवाद और गीता पढ़ी थी, दोबारा फिर पढ़ रह हूँ. 
अब इनको समय के हिसाब से उदर पोषक लेखकों ने छल कपट के आभूषण से  और सजा दिया है. 
क़ुरआन में ओलिमा ने अपनी बात डालने के लिए 
"अल्लाह के कहने का मतलब यह है - - - " का सहारा लिया है . 
अल्लाह कहता है क़ुरआन सुन कर जिन्नों ने कहा इसमें तो निरा जादू है, मुतरज्जिम कहता है लाहौलविलाकूवत (धिककार) जादू तो झूट होता है , 
इससे तो क़ुरआन झूट साबित होता है, 
" अल्लाह के हहने का मतलब यह है  - - - " 
फिर वह क़ुरआनी आयतों में मनमानी भरता है.
गीता में में इसी " अल्लाह के कहने का मतलब यह है  - - - " 
को तात्पर्य का सहारा लिया गया है. 
श्लोक के बाद "तात्पर्य" लगा कर अपनी गन्दी मानसिकता उंडेलते हैं.
गोया यह किराय के टट्टू भगवान् के गुरु बन जाते हैं. 
***********
आधार ;-
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद A C भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद संसथापकाचारी अंतर राष्ट्रीय कृष्णा भावनामृत संघ 
*
गीता और क़ुरआन
भगवान कृष्ण कहते  हैं ---
 क्षत्रिय होने के नाते अपने अशिष्ट धर्म का विचार करते हुए 
तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म के लिए युद्ध करने से बढ़ कर तुमहारे लिए अन्य को कार्य नहीं है 
अतः तुम्हें संकोच करने की कोई आवश्यता नहीं.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय २ श्लोक  31
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद A C भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद संसथापकाचारी अंतर राष्ट्रीय कृष्णा भावनामृत संघ 
और 
कुरआन कहता है ---
''ऐ ईमान वालो! जब तुम काफिरों के मुकाबिले में रू बरू हो जाओ तो इन को पीठ मत दिखलाना और जो शख्स इस वक़्त पीठ दिखलाएगा, अल्लाह के गज़ब में आ जाएगा और इसका ठिकाना दोज़ख होगा और वह बुरी जगह है. सो तुम ने इन को क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ने इनको क़त्ल किया और ताकि मुसलामानों को अपनी तरफ से उनकी मेहनत का खूब एवज़ दे. अल्लाह तअला खूब सुनने वाले हैं.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (१५-१६-१७)

क्या गीता और कुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?
क्या इन्हीं किताबों पर हाथ रख कर हम अदालत में सच बोलने की क़सम खाते हैं ? ?
धरती पर शर और फ़साद के हवाले करने वाले यह ग्रन्थ 
क्या इस काबिल हैं कि इनको हाज़िर व् नाज़िल किया जाए, गवाह बनाया जाए ???

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 1 August 2017

Soorah lahab 111

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह लहेब १११ - पारा - ३० 
(तब्बत यदा अबी लहबिंव वतब्बा) 

ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.

अबू लहब मुहम्मद के सगे चाचा थे, ऐसे चाचा कि जिन्हों ने चालीस बरस तक अपने यतीम भतीजे मुहम्मद को अपनी अमाँ और शिफक़त में रक्खा. अपने मरहूम भाई अब्दुल्ला की बेवा आमना के बातिन से जन्मे मुहम्मद की खबर सुन कर अबू लहब ख़ुशी से झूम उट्ठे और अपनी लौड़ी को आज़ाद कर दिया,जिसने बेटे की खबर दी थी और उसकी तनख्वाह मुक़र्रर कर के मुहम्मद को दूध पिलाई की नौकरी दे दिया. बचपन से लेकर जवानी तक मुहम्मद के सर परस्त रहे. दादा के मरने के बाद इनकी देख भाल किया, यहाँ तक कि मुहम्मद की दो बेटियों को अपने बेटों से मंसूब करके उनको सुबुक दोष किया. अपने मोहसिन चचा का तमाम अह्सानत पल भर में फरामोश कर दिया. वजेह ?

हुवा यूँ था की एक रोज़ मुहम्मद ने तमाम ख़ानदान कुरैश को कोह ए मिन्फा पर इकठ्ठा होने की दावत दी. लोग अए तो सब से पहले तम्हीद बांधा और फिर एलान किया कि अल्लाह ने मुझे अपना पैगम्बर मुक़र्रर किया. लोगों को इस बात पर काफी गम ओ गुस्सा और मायूसी हुई कि ऐसे जाहिल को अल्लाह ने अपना पैगम्बर कैसे चुना ? सबसे पहले अबू लहेब ने ज़बान खोली और कहा, "तू माटी मिले, क्या इसी लिए तूने हम लोगों को यहाँ बुलाया है?
इसी बात पर मुहम्मद ने यह सूरह गढ़ी जो कुरआन में इस बात की गवाह बन कर १११ के मर्तबे पर है. 
सूरह लहेब कुरआन की वाहिद सूरह है जिस  में किसी फ़र्द का नाम दर्ज है. किसी ख़लीफ़ा या क़बीले के किसी फ़र्द का नाम कुरआन में नहीं है.
"ज़िक्र मेरा मुझ से बढ़ कर है कि उस महफ़िल में है"
देखिए कि अल्लाह किसी बेबस औरत की तरह कैसे अबू लहेब को कोस रहा है - - -

"अबू लहब तेरे हाथ टूट जाएँ, न मॉल उसके काम आया,
न उसकी कमाई .
 वह  अनक़रीब एक शोला ज़न आग में दाखिल होगा,
वह भी और उसकी बीवी भी, जो लकड़ियाँ लाद कर लाती है,
उसके गले में एक रस्सी होगी खूब बाटी हुई."
सूरह लहेब १११ - पारा - ३० आयत (१-५)

 नमाज़ियो ! 
गौर करो कि अपनी नमाज़ों में तुम क्या पढ़ते हो? क्या यह इबारतें क़ाबिल ए इबादत हैं?
अल्लाह अबू लहेब और उसकी जोरू को बद दुआएँ दे रहा है और साथ में उसकी बीवी को उनके हालत पर तआने भी दे रहा है कि वह उस ज़माने में लकड़ी ढोकर गुज़ारा करती थी. यह मुहम्मदी अल्लाह जो हिकमत वाला है, अपनी हिकमत से इन दोनों प्राणी को पत्थर की मूर्ति ही बना देता. कुन फिया कून" कहने की ज़रुरत थी. सच पूछिए तो मुहम्मदी अल्लाह भी मुहम्मद की हुलया का ही है.

   


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान