Wednesday, 20 January 2021

अल्लाह की २+२+५


अल्लाह की २+२+५

हलाकू के समय में अरब दुन्या का दमिश्क़ शहर इस्लामिक माले ग़नीमत से खूब फल फूल रहा था. ओलिमाए दीन (धर्म गुरू)झूट का अंबार किताबों की शक्ल में खड़ा किए हुए थे. हलाकू बिजली की तरह दमिश्क़ पर टूटा, लूट पाट के बाद इन ओलिमाओं की ख़बर ली, सब को इकठ्ठा किया और पूछा 
यह किताबें किस काम आती हैं? जवाब था पढने के. 
फिर पूछा - सब कितनी लिखी गईं? 
जवाब- साठ हज़ार . 
सवाल - - साठ हज़ार पढने वाले ? ? फिर साठ हज़ार और लिखी जाएंगी ???. इस तरह यह बढती ही जाएंगी. 
फिर उसने पूछा तुम लोग और क्या करते हो? 
ओलिमा बोले हम लोग आलिम हैं हमारा यही काम है. 
हलाकू को हलाकत का जलाल आ गया . 
हुक्म हुवा कि इन किताबों को तुम लोग खाओ. 
ओलिमा बोले हुज़ूर यह खाने की चीज़ थोढ़े ही है. 
हलाकू बोला यह किसी काम की चीज़ नहीं है, और न ही तुम किसी कम की चीज़ हो. हलाकू के सिपाहिओं ने उसके इशारे पर दमिश्क़ की लाइब्रेरी में आग लगा दी और सभी ओलिमा को मौत के घाट उतर दिया. आज भी इस्लामिक और तमाम धार्मिक लाइब्रेरी को आग के हवाले कर देने की ज़रुरत है.
क़ज़ज़ाक़ लुटेरे और वहशी अपनी वहशत में कुछ अच्छा भी कर गए
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 19 January 2021

धन्यविवाद योगी जी + मोदी जी.


धन्यविवाद योगी जी + मोदी जी.

अजीब साज़िश है कि अनजाने में योगी महाराज का मुसलमानों के ख़िलाफ़ उठाया गया हर क़दम, मुसलमानों के हक़ में उनकी बेहतरी के लिए होता है, यहाँ तक कि मोदी महान का भी हर इरादा भी.
हज के सफ़र में भारत सरकार ने जो अनुदान (ख़ैरात) रोका है, वह मुसलमानों को ख़ैरात खो़री अथवा दान भक्षक न बन्ने का पैग़ाम देता है. 
एक इस्लामी सूफ़ी कहता है - - - 
"जिस्म पर पहने हुए लिबास में एक गिरह कपड़ा भी अगर मुफ़्त का, चोरी का या ख़ैरात का अगर होता है तो उस बन्दे की नमाज़ अल्लाह क़ुबूल नहीं करता."
अब आगे ज़रुरत है कि मुसलमानों को हज के फ़ुज़ूल ख़रची से बचाया जाए. 
दुन्या के इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी मक्का पहुँच कर शैतान को कंकड़ मरने जाती है ? शैतान तो अल्लाह की तरह ज़मीन पर हर जगह मौजूद है, कहीं भी उसको सजदा किया जा सकता है या कंकड़ मारा जा सकता है. 
मुसलमान हज को फ़ुज़ूल ख़रची मान कर अपनी बचत को अपनी नस्लों को तालीम के मैदान में उतारें, जहाँ कोई रूकावट नहीं. 
बेशक बर्फ़ानी बाबा के बर्फीले तानासुल (लिंग) के दर्शन में मग्न आस्था वानों को वह (मोदी और योगी) बढ़ावा देते रहें और उनको निचोड़ते रहें.  
तीन तलाक़ भी मुस्लिम समाज में मूज़ी बीमारी की तरह फैला हुवा है. इसे भी कोई मोदी ही ख़त्म कर दिया है. इससे मुस्लिम  समाज और मज़बूत होगा और तथा कथित लव जिहाद का चलन और मज़बूत हो जाएगा, हिन्दू लड़कियाँ जल जाने से बेहतर लव जिहाद के मैदान में कूदना पसंद करेंगी.
 मदरसों को MODERN EDUCATIN से सुसज्जित करना तो योगी महाराज का बहुत बड़ा क़दम होगा, बेहतर है कि उनके लौंडे कैलाश पर्बत चढ़ते रहें और कांवड़ ढोते रहें.
लाउड स्पीकर पर पाबंदी, सबसे ज़्यादा हराम खो़र मुल्लों को अपाहिज बनता है जो पाँच वक़्त अज़ान देकर, किसी वक़्त भी तबलीग़ करके जनता के कान खाते हैं मुसलमानों के असली दुश्मन यही हैं, उसके बाद ही पुजारीयों का. 
इस अपराध से मुसलमानों को कोई योगी ही बचा सकता है.  
धन्यविवाद योगी जी + मोदी जी.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 18 January 2021

खेद है कि यह वेद है . . .


वेद दर्शन - - - खेद है कि यह वेद है . . .

हे शूर इंद्र ! तुमने अधिक मात्रा में जल बरसाया, उसी को घृत असुर ने रोक लिया था. तुमने उस जल को छुड़ा लिया था. तुमने स्तुत्यों द्वारा उन्नति पाकर स्वयं को मरण रहित मानने वाले दास घृत को नीचे पटक दिया था.
द्वतीय मंडल सूक्त 11-2
क़ुरआन की तरह वेद को भी हिन्दू समझ नहीं पाते, वह अरबी में है, यह संस्कृत में. ज़रुरत है इन किताबों को लोगों को उनकी भाषा में पढाई जाए और इसे विषयों में अनिवार्य कर दिया जाए जब तक कि विद्यार्थी इसे पढने से तौबा न करले.
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हे शूर इंद्र ! तुम बार बार सोमरस पियो. मद (होश) करने वाला सोमरस तुमको प्रसन्न करे. सोम तुम्हारे पेट को भर कर तुम्हारी वृध करे. पेट भरने वाला सोम तुम्हें तिरप्त करे. द्वतीय मंडल सूक्त 11-11
सोमरस अर्थात दारू हवन की ज़रूरी सामग्री हुवा करती थी, अब पता नहीं है या नहीं हवन के बाद शराब इन पुरोहितों को ऐश का सामान होती.
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हे इंद्र ! तुम्हारी जो धनयुक्त स्तोता की इच्छा पूरी करती है, वह हमें प्रदान करो. 
तुम सेवा करने योग्य हो, इस लिए हमारे अतरिक्त वह दक्षिणा किसी को न देना. 
हम पुत्र पौत्रआदि को साथ लेकर यज्ञ में तुम्हारी अधिक स्तुति करेंगे.
द्वतीय मंडल सूक्त 11-21
यह है वेदों की पुजारियों की मानसिता जो आज के समाज में ज़हर कई.
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 17 January 2021

मुहम्मदुर रसूलिल्लाह (मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं)


मुहम्मदुर रसूलिल्लाह
(मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं)

मुहम्मद की फ़ितरत का अंदाज़ा क़ुरआनी आयतें निचोड़ कर निकाला जा सकता है कि वह किस कद्र ज़ालिम ही नहीं कितने मूज़ी तअबा शख़्स थे. क़ुरआनी आयतें जो ख़ुद मुहम्मद ने वास्ते तिलावत बिल ख़ुसूस महफ़ूज़ कर दीं, इस एलान के साथ कि ये बरकत का सबब होंगी न कि इसे समझा समझा जाए.
अगर कोई समझने की कोशिश भी करता है तो उनका अल्लाह उस पर एतराज़ करता है कि ऐसी आयतें मुशतबह मुराद (संदिग्ध) हैं जिनका सही मतलब अल्लाह ही जानता है.
इसके बाद जो अदना (सरल) आयतें हैं और साफ़ साफ़ हैं वह अल्लाह के किरदार को बहुत ही ज़ालिम, जाबिर, बे रहम, मुन्तक़िम और चालबाज़ साबित करती है बल्कि अल्लाह इन अलामतों का ख़ुद एलान करता है कि
अगर ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' (मुहम्मद ईश्वर के दूत हैं) को मानने वाले न हुए तो. अल्लाह इतना ज़ालिम और इतना क्रूर है कि इंसानी खालें जला जला कर उनको नई करता रहेगा, इंसान चीख़ता चिल्लाता रहेगा और तड़पता रहेगा मगर उसको मुआफ़ करने का उसके यहाँ कोई जवाज़ नहीं है, कोई कांसेप्ट नहीं है.
मज़े की बात ये कि दोबारा उसे मौत भी नहीं है कि मरने के बाद नजात कि सूरत हो सके, उफ़! इतना ज़ालिम है मुहमदी अल्लाह?
सिर्फ़ इस ज़रा सी बात पर कि उसने इस ज़िन्दगी में ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' क्यूं नहीं कहा. हज़ार नेकियाँ करे इन्सान, कुरआन गवाह है कि सब हवा में ख़ाक की तरह उड़ जाएँगी अगर ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' नहीं कहा क्यों कि हर अमल से पहले ईमान शर्त है और ईमान है ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' .
इस क़ुरआन का ख़ालिक़ कौन है जिसको मुसलमान सरों पर रखते हैं ?
मुसलमान अपनी नादानी और नादारी में यक़ीन करता है कि उसका अल्लाह .
वह जिस दिन बेदार होकर कुरआन को खुद पढ़ेगा तब समझेगा कि इसका खालिक तो दग़ाबाज़ ख़ुद साख़्ता अल्लाह का बना हुवा रसूल मुहम्मद है.
उस वक़्त मुसलमानों की दुन्या रौशन हो जाएगी.
मुहम्मद कालीन मशहूर सूफ़ी ओवैस करनी जिसके तसव्वुफ़ के कद्रदान मुहम्मद भी थे, जिसको कि मुहम्मद ने बाद मौत के अपना पैराहन पहुँचाने की वसीअत की थी, मुहम्मद से दूर जंगलों में छिपता रहता कि इस ज़ालिम से मुलाक़ात होगी तो कुफ्र ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' मुँह पर लाना पड़ेगा.
इस्लामी वक्तों के माइल स्टोन हसन बसरी और राबिया बसरी इस्लामी हाकिमों से छुपे छुपे फिरते थे कि यह ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' को कुफ्र मानते थे.
मक्के के आस पास फ़तेह मक्का के बाद इस्लामी गुंडों का राज हो गया था.
किसी कि मजाल नहीं थी कि मुहम्मद के ख़िलाफ़ मुँह खोल सके .
मुहम्मद के मरने के बाद ही मक्का वालों ने हुकूमत को टेक्स देना बंद कर दिया कि ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' कहना हमें मंज़ूर नहीं
'लाइलाहा इल्लिल्लाह' तक ही सही है.
अबुबकर ख़लीफ़ा ने इसे मान लिया मगर उनके बाद ख़लीफ़ा उमर आए और उन्हों ने फिर बिल जब्र ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' पर अवाम को आमादः कर लिया .
इसी तरह पुश्तें गुज़रती गईं, सदियाँ गुज़रती गईं, जब्र, ज़ुल्म,
ज़्यादती और बे ईमानी ईमान बन गया.
आज तक चौदह सौ साल होने को हैं सूफ़ी मसलक ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' को मज़ाक़ ही मानता है, वह अल्लाह को अपनी तौर पर तलाश करता है,
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 16 January 2021

बन्दों का हक


बन्दों का हक 

धर्म और ईमान के मुख़्तलिफ नज़रिए और माने अपने अपने हिसाब से गढ़ लिए गए हैं. आज के नवीतम मानव मूल्यों का तकाज़ा इशारा करता है कि धर्म और ईमान हर वस्तु के उसके गुण और द्वेष की अलामतें हैं. 
इस लम्बी बहेस में न जाकर मैं सिर्फ़ मानव धर्म और ईमान की बात पर आना चाहूँगा. मानव हित,जीव हित और धरती हित में जितना भले से भला सोचा और भर सक किया जा सके वही सब से बड़ा धर्म है और उसी कर्म में ईमान दारी है.
वैज्ञानिक हमेशा ईमानदार होता है क्यूँकि वह नास्तिक होता है, इसी लिए वह अपनी खोज को अर्ध सत्य कहता है. वह कहता है यह अभी तक का सत्य है कल का सत्य भविष्य के गर्भ में है.
मुल्लाओं और पंडितों की तरह नहीं कि आखरी सत्य और आख़िरी निज़ाम की ढपली बजाते फिरें. धर्म और ईमान हर आदमी का व्यक्तिगत मुआमला होता है मगर होना चाहिए हर इंसान को धर्मी और ईमान दार, कम से कम दूसरे के लिए. इसे ईमान की दुन्या में ''हुक़ूक़ुल इबाद'' कहा गया है, अर्थात ''बन्दों का हक़'' आज के मानव मूल्य दो क़दम आगे बढ़ कर कहते हैं ''हुक़ूक़ुल मख़लूकात'' अर्थात हर जीव का हक़.
धर्म और ईमान में खोट उस वक़्त शुरू हो जाती है जब वह व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो जाता है. धर्म और ईमान , धर्म और ईमान न राह कर मज़हब और रिलीज़न यानी राहें बन जाते हैं. इन राहों में आरंभ हो जाता है कर्म कांड, वेश भूषा,नियमावली, उपासना पद्धित, जो पैदा करते हैं इंसानों में आपसी भेद भाव. 
राहें कभी धर्म और ईमान नहीं हो सतीं. 
धर्म तो धर्म कांटे की कोख से निकला हुआ सत्य है, 
पुष्प से पुष्पित सुगंध है, उपवन से मिलने वाली बहार है. 
हम इस धरती को उपवन बनाने के लिए समर्पित राहें यही मानव धर्म है. 
धर्म और मज़हब के नाम पर रची गई पताकाएँ, दर अस्ल अधार्मिकता के चिन्ह हैं.
लोग अक्सर तमाम धर्मों की अच्छाइयों(?) की बातें करते हैं यह धर्म जिन मरहलों से गुज़र कर आज के परिवेश में कायम हैं, क्या यह अधर्म और बे ईमानी नहीं बन चुके है? क्या यह सब मानव रक्त रंजत नहीं हैं? 
इनमें अच्छाईयां है कहाँ? 
जिनको एक जगह इकठ्ठा किया जाय, यह तो परस्पर विरोधी हैं..
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 15 January 2021

ज़मीर फरोश ओलिमा


ज़मीर फरोश ओलिमा 

मेरे गाँव की एक फूफी के बीच बहु-बेटियों की बात चल रही थी किमेरा फूफी ज़ाद भाई बोला अम्मा लिखा है औरतों को पहले समझाओ बुझाओ, न मानें तो घुस्याओ लत्याओ, फिरौ न मानैं तो अकेले कमरे मां बंद कर देव, यहाँ तक कि वह मर न जाएँ . फूफी आखें तरेरती हुई बोलीं उफरपरे! कहाँ लिखा है? बेटा बोला तुम्हरे क़ुरआन मां.-- आयं? कह कर फूफी बेटे के आगे सवालिया निशान बन कर रह गईं. बहुत मायूस हुईं और कहा ''हम का बताए तो बताए मगर अउर कोऊ से न बताए''
मेरे ब्लॉग के मुस्लिम पाठक कुछ मेरी गंवार फूफी की तरह ही हैं.वह मुझे राय देते हैं कि मैं तौबा करके उस नाजायज़ अल्लाह के शरण में चला जाऊं. मज़े कि बात ये है कि मैं उनका शुभ चिन्तक हूँ और वह मेरे. ऐसे तमाम मुस्लिम भाइयों से दरख्वास्त है कि मुझे पढ़ते रहें, मैं उनका ही असली खैर ख्वाह हूँ .हिदी ब्लॉग जगत में एक सांड के नाम से जाना जाने वाला कैरानवी है जो खुद तो परले दर्जे का जाहिल है मगर ज़मीर फरोश ओलिमा की लिखी हुई कपटी रचनाओं को बेच कर गलाज़त भरी रोज़ी से पेट पालता है. अल्लाह का चैलेंज, अंतिम अवतार, बौद्ध मैत्रे जैसे सड़े गले राग खोंचे लगाए गाहकों को पत्ता रहता है. उसको लोगों के धिक्कार की परवाह नहीं. मेरे हर आर्टिकल पर अपना ब्लाक लगा देता है, कि मेरे पास आ मैं जेहालत बेचता हूँ. 
''यह मत देखो कि किसने कहा है, यह देखो की क्या कहा है.''

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 14 January 2021

सौ सौ झूट के बाद


सौ सौ झूट के बाद

लोग ख़ुद  साख़्ता रसूल की बातों में आ तो जाते हैं मगर बा असर काफ़िरों का ग़लबा भी इनके ज़ेहनों पर सवार रहता है. वह उनसे मिलते जुलते हैं, इनकी जायज़ बातों का एतराफ़ भी करते हैं जो ख़ुद  साख़्ता रसूल को पसंद नहीं, मुख़बिरों और चुग़ल खो़रों से इन बातों की ख़बर बज़रीआ वह्यीय ख़ुद  साख़्ता रसूल को हो जाती है और ख़ुद  साख़्ता रसूल कहते हैं,
"अल्लाह ने इन्हें सारी ख़बर देदी है "
वह फिर से लोगों को पटरी पर लाने के लिए क़यामत से डराने लगते हैं, इस तरह क़ुरआन मुकम्मल होता रहता. मुहम्मद के फेरे में आए हुए लोगों को ज़हीन अफ़राद समझते हैं - - -
"ये शख़्स मुहम्मद, बुज़ुर्गों से सुने सुनाए क़िस्से को क़ुरआनी आयतें गढ़ कर बका करता है. इसकी गढ़ी हुई क़यामत से खौ़फ़ खाने की कोई ज़रुरत नहीं. चलो तुमको अंजाम में मिलने वाले इसके गढ़े हुए अज़ाबों को की ज़िम्मेदारी मैं अपने सर लेने का वादा करता हूँ, अगर तुम इसके जाल से निकलो"
माज़ी के इस पसे-मंज़र में डूब कर मैं पाता हूँ कि दौरे-हाज़िर के पीरो मुर्शिदों, स्वामियों और स्वयंभू भगवानों की दूकानों को, जो बहुत क़रीब नज़र आती हैं और बहुत पास मिलते हैं वह सादा लौह, गाऊदी, अय्यार मुसाहिबों और लाख़ैरों की भीड़, मुरीदों के ये चेले, ऐसे ही लोग मुहम्मद के जाल में आ जाते, जिनको समझा बुझा कर राहे-रास्त पर लाया जा सकता था.
मैं ख़ुद  साख़्ता रसूल की हुलिया का तसव्वुर करता हूँ . . .
नीम दीवाना, नीम होशियार, मगर गज़ब का ढीठ.
झूट को सच साबित करने का अहेद बरदार,
सौ सौ झूट बोल कर आख़िर कार
"हज़रात मुहम्मद रसूल अल्लाह सललललाह अलैहे वसल्लम"
बन ही गया. वह अल्लाह जिसे ख़ुद इसने गढ़ा,
उसे मनवा कर, पसे पर्दा ख़ुद अल्लाह बन बैठा.
झूट ने माना कि बहुत लम्बी उम्र पाई मगर अब और नहीं.
मुहम्मद के गिर्द अधकचरे ज़ेहन के लोग हुवा करते जिन्हें सहाबाए-कराम कहा जाता है, जो एक गिरोह बनाने में कामयाब हो गए.
गिरोह में बेरोज़गारों की तादाद ज़्यादः थी. कुछ समाजी तौर पर मज़लूम हुवा करते थे, कुछ मसलेहत पसंद और कुछ बेयारो मददगार.
कुछ लोग तफरीहन भी महफ़िल में शरीक हो जाते.
कभी कभी कोई संजीदा भी जायज़ा लेने की ग़रज़ से आकर खड़ा हो जाता और अपना ज़ेहनी ज़ायका बिगाड़ कर आगे बढ़ जाता
और लोगों को समझाता . . .
इसकी हैसियत देखो, इसकी तालीम देखो, इसका जहिलाना कलाम देखो, बात कहने की भी तमीज नहीं, जुमले में अलफ़ाज़ और क़वायद की कोताही देखो. इसकी चर्चा करके नाहक ही इसको तुम लोग मुक़ाम दे राहे हो, क्या ऐसे ही सिडी सौदाई को अल्लाह ने अपना पैग़मबर चुना है?
बहरहाल इस वक़्त तक मुहम्मद ने तनाज़ा, मशग़ला और चर्चा के बदौलत मुआशरे में एक पहचान बना लिया था.
एक बार मुहम्मद मक्का के पास एक मुक़ाम तायाफ़ के हाकिम के पास अपनी रिसालत की पुडिया लेकर गए. उसको मुत्तला किया कि
"अल्लाह ने मुझे अपना रसूल मुक़रार किया है."
उसने इनको सर से पाँव तक देखा और थोड़ी गुफ़्तगू की और जो कुछ पाया उस पैराए में इनसे पूछा - - -
"ये तो बताओ कि मक्का में अल्लाह को कोई ढंग का आदमी नहीं मिला कि एक अहमक को अपना रसूल बनाया? "
उसने धक्के देकर इन्हें बाहर निकाला और लोगों को माजरा बतलाया.
लोगों ने लात घूसों से इनकी तवाज़ो किया,
बच्चों ने पागल मुजरिम की तरह इनको पथराव करते हुए बस्ती से बाहर किया. क़ुरआनी आयतें लाने वाले जिब्रील अलैहस्सलाम दुम दबा कर भागे, और अल्लाह आसमान पर बैठा ज़मीन पर अपने रसूल का तमाशा देखता रहा.
मगर साहब ! मुहम्मद अपनी मिटटी के ही बने हुए थे, न मायूस हुए न हार मानी. जेहाद की बरकत 'माले ग़नीमत' का फ़ार्मूला काम आया.
फतह मक्का के बाद तो तायाफ़ के हुक्मरान जैसे उनके क़दमों में पड़े थे.
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान