Saturday, 27 May 2017

Hindu Dharm Darshan 68




मोदी +योगी =मनुवाद 

मूल भारतीयों का मानव समूह पांच हज़ार साल  तक शूद्र अवस्था में रहने केबाद 
इनमे डा. भीम राव अम्बेडकर का उदय हुवा. 
हिन्दुतान में जमहूरियत आई, 
एक मौक़ा था कि मनुवाद द्वारा नामित शूद्र उठते मगर वह दलित बन कर ही रह गए. शूद्र हो या हरिजन या फिर दलित, इन बदलाओं से क्या हासिल हुवा? 
उन्हें डांगर निक्याने और मल ढोने से नजात कहाँ मिली ? 
कुछ शूद्र महा शूद्र ज़रूर हो गए हैं, 
जैसे राम बिलास पासबान, उदित नारायण और माया वती नमूने के तौर पर देखे जा सकते हैं. 
यह महान शूद्र मनुवाद के शरण में आकर या शूद्रों का ही दोहन करके बरहमन नुमा शूद्र ज़रूर बन गए हैं. 
कितनी घिनावनी दलील है पासबान की कि कहते हैं, 
क्या नाम कि टूटी चप्पल और फटे पायजामे ही क्या दलितों की पहचान है ? 
बहन जी अपने करोड़ों की सम्पति को 
उन टूटी चप्पल और फटे पायजामे के गरीबों से ही अर्जित किया है. 
इनको शर्म नहीं आती कि एक बनिया इनसे बेहतर था जिसने बैरिस्टर के सूट बूट को  त्याग कर महात्मा बन गया था, 
सोने की चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाला बरहमन नेहरू, 
इन के लिए सब कुछ त्याग दिया था और बार बार जेल जाकर अपनी नस्लों के लिए सिर्फ अपने किताबों की रायल्टी छोड़ी.
पांच हज़ार तक आर्यन लुटेरे मनुवादियों ने भारत के मूल निवासी को शूद्र बना कर रख्खा और इनको चीन की दीवार की तरह इतना कूटा और धुरमुटयाया कि बेचारे शूद्र इन मनु वादियों के बनाए हुए फ्रेम में खुद बखुद फिट हो होकर चरण दास बन गए. खुद को जनम जात पापी समझने लग गए हैं.
 इनका ज़मीर, इनकी ग़ैरत और इनका आत्म सम्मान सब मर चुके है. यह मनुवादियों के कमांडरों के स्वयं सेवक बन गए है जैसे कि रामायण राम की सेना में हनुमान नुमा वानर सेना का वर्णन मिलता है. 
भारत में बौद्ध धर्म का उदय मनु वादियों के शाशन काल में ही हुवा था. 
गौतम के असर को अशोक ने कुबूल किया, बौध धर्म की कामयाबी सर चढ़ कर बोलने लगी. मनुवादियों को बड़ा खतरा दिखने लगा. 
शाम दाम दंड भेद का फार्मूला चला कर इन्हों ने बौद्धों का नर संहार किया और कुछ दिनों बाद ही इसे देश निकाला मिल गया. 
भारत निष्कासित होकर कर बौध धर्म मानव मूल्यों को लेकर पूरे एशिया का बड़ा धर्म बन गया. 
मनुवादियों ने बौध धर्म के पैग़म्बर को अपना पैग़म्बर बना लिया और उसको  विष्णु का अवतार कहा गरज़ कि विष्णु की दोहरी पूजा होने लगी. 
आज भी आज़ाद भारत में कुछ ऐसा ही हो रहा है, 
अम्बेडकर को मनुवाद सर आँखों पर रख रहे हैं, आशा है कि वह उन्हें ब्रह्मा का अव तार घोषित कर देंगे और शूद्रों की चमड़ी उधड़ते रहेगे. 
संवेदना हीन मनुवाद कहता है, पेट में दाना सूद उताना, 
अतः शूद्र को कभी भर पेट खाना न दिया जाए. 
यहीं तक नहीं, 
हमारे बुज़ुर्ग कहते कि सड़ गल जाए सूद न खाए, सूद का खावा कुंवारत जाए. 
यहाँ पर मैं जोकि इस्लाम दुश्मन होते हुए भी इस्लाम का शुक्र गुज़ार हूँ कि इसकी शरण में आकर लगभग चालीस करोड़ मानव समूह मनुवाद के चंगुल से मुक्त है. केवल एक व्यक्ति जिसे इतिहास में काला पहाड़ का नाम दिया गया है, शूद्रता को छोड़ कर इस्लाम की पनाह ली और दोनों बंगाल +आसाम बिहार की आधी आबादी मनुवाद मुक्त है, यही नहीं एक देश बंगला देश की मालिक भी है. काला पहाड़ का नाम मनुवादियों ने इतिहास के सफहों से उड़ा दिया. इसकी आंधी ऐसी चली कि डर के मारे बरहमनों ने भी इस्लाम को स्वीकार कर लिया था. शेख मुजीबुर रहमान इन्ही में आते हैं.
मनुवादियों ने अपनी जड़ें बहुत गहराई तक फैला रखी हैं. भारत के तमाम मंदिर  इनका रिज़र्व बाँक हैं जहाँ इतनी दौलत है कि वह एक बार भारत सरकार को भी खीद सकते हैं. 
अहिंसा का प्रयोग दुन्या के तमाम मुल्कों के सिवा सिर्फ भारत में हुवा है जिश्के नतीजे में केवल मनुवा ही आज़ाद हुवा , इसे नए सिरे से आज़ादी मिली है. केंद्र में मोदियों और राज्यों में योगियों का ग़लबाकायम हो चूका है.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 26 May 2017

Soorah zuha 93

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह जुहा ९३  - पारा ३० 
( वज़ज़ुहा वल्लैले इज़ा सजा) 


ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.
अल्लाह कहता है - - - 

"क़सम है दिन की रौशनी की,
और रात की जब वह क़रार पकडे,
कि आपके परवर दिगार ने न आपको छोड़ा न दुश्मनी की,
और आखरात आपके लिए दुन्या से बेहतर है.
अनक़रीब अल्लाह तअला आपको देगा, सो आप खुश हो जाएँगे.
क्या अल्लाह ने आपको यतीम नहीं पाया, फिर ठिकाना दिया और अल्लाह ने आपको बे खबर पाया, फिर रास्ता बतलाया और अल्लाह ने आपको नादर पाया.
और मालदार बनाया,
तो आप यतीम पर सख्ती न कीजिए,
और सयाल को मत झिड़कइए,
और अपने रब के इनआमात का का तज़किरा करते रहा कीजिए."    .
सूरह जुहा ९३  - पारा ३० आयत (१-११)

मुहम्मद बीमार हुए, तीन रातें इबादत न कर सके, बात उनके माहौल में फ़ैल गई. किसी काफ़िर ने इस पर यूँ चुटकी लिया,
"मालूम होता है तुम्हारे शैतान ने तुम्हें छोड़ दिया है."
मुहम्मद पर बड़ा लतीफ़ तंज़ था, जिस हस्ती को वह अपना अल्लाह मुश्तहिर करते थे, काफ़िर उसे उनका शैतान कहा करते थे. इसी के जवाब में खुद साख्ता रसूल की ये पिलपिली आयतें हैं.
नमाज़ियो !
इन आसमानी आयतों को बार बार दोहराओ. इसमें कोई आसमानी सच नज़र आता है क्या? खिस्याई हुई बातें हैं, मुँह जिलाने वाली.
यहाँ मुहम्मद खुद कह रहे हैं कि वह मालदार हो गए हैं. जिनको इनके चापलूस आलिमों ने ज़िन्दगी की मुश्किल तरीन हालत में जीना इनकी हुलिया गढ़ रखा है. ये बेशर्म बड़ी जिसारत से लिखते है कि मरने के बाद मुहम्मद के पास चाँद दीनार थे. मुहम्मद के लिए दस्यों सुबूत हैं कि वह अपने फायदे को हमेशा पेश इ नज़र रखा. तुम्हारे रसूल औसत दर्जे के एक अच्छे इंसान भी नहीं थे. 



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 23 May 2017

Hindu Dharm Darshan 67



ग़द्दार
आजकल मुसलमानों को ग़द्दार कहने का फैशन बन गया है. 
नोट बंदी ने साबित कर दिया है कि ग़द्दार कहाँ बसते हैं. 
सिर्फ दिल्ली में चांदी सोने और जवाहरात की एक हज़ार दुकानें ताला बंदी की हालात में हैं , काला बाजारी, टेक्स चोरी सब इनके कारनामे हुवा करते हैं. 
जिनमें मुसलमान कोई नहीं. 
बड़ी बड़ी कंपनियों  के मालकान में सब ग़ैर मुस्लिम हैं. 
भारत माता की जय बोलने और बुलवाने वाले , 
इनको मिलने वाली सज़ा मुसलामानों को झेलनी पड़ती है. जनता इनके जुर्म को भुला देती है.यही लोग देश भगति के नाम पर मुज़फ्फ़र नगर वीरान कर दिया करते है.

ग़द्दार
ग़द्दार वह लोग हैं जो देश हित में टेक्स नहीं देते, वह नहीं जो देश को माता या पिता नहीं मानते. 
देश सीमा बंदी का नाम है जो कभी भारत होता है तो कभी 
पाकिस्तान हो जाता है 
तो कभी बांगला देश. 
देश धरती का सीमा बंद एक टुकड़ा होता है जिसका निर्माण वहां  के लोगों के आपसी समझौते से हुवा करता था, फिर राजाओं महाराजाओं और बादशाहों की बाढ़ आई जनता ने उनके अत्याचार झेले. आज जम्हूरियत आई तो बादशाहत की जगह "देश भगति" ने लेली. 
देश भगति की मूर्ति बना कर अत्याचार को नया स्वरूप दे दिया गया है. 
सरकारी शायर देश प्रेम के गुनगान में लग गए. 
धूर्त टैक्स चोर भारत माता की पूजा हवन में लग गए.
देश की हिफाज़त दमदार सेना करती है जिनका खर्च देशवासियों द्वारा टेक्स भर कर ही किया जा सकता है, देश की ख़ाली पोली पूजा करके नहीं.
देश के असली ग़द्दार सब नंगे हो कर बिलों में घुसे हुए हैं. इनकी दुकानों में ताले लगे हुए हैं. 
इनके जुर्म की सज़ा गरीब और बेबस जनता अपनी खून पसीने की कमाई को लेने के लिए बैंक के कतारों में दिनों रात ख़ड़ी हुई है.
देश के असली और ऐतिहासिक ग़द्दार हमेशा बनिए हुवा करते हैं जिनका अपनी बिरादरी के लिए सन्देश हुवा करता है - - -बनिए -- बनिए - बनिए कुछ बनिए , दूसरों को बिगड़ कर खुद बनिए. इसी निज़ाम को पूँजी वाद कहते हैं.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 22 May 2017

Soorah Lail 92

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

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सूरह लैल ९२  - पारा ३० 
(वललैलेइज़ा यगषा) 


ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.

ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद मुजाहिदे इस्लाम दुन्या भर में बिरझाए हुए हैं. अब तो वक़्त आ गया है कि भारत में ये अपनी दीवानगी का मुजाहिरा नहीं कर पा रहे हैं ,क्यूंकि पिछले दिनों हुकूमत  ए  हिंद ने सख्त होकर इनको सबक दे दिया था कि अपने मज़हबी जूनून को अपने घर तक सीमित रखो. अब  इनकी इतनी भी ताक़त नहीं बची कि  दूसरे किसी गैर मुस्लिम मुल्क में अपनी दीवानगी का इज़हार करें, ले दे के ये दीवाने मुस्लिम मुमालिक में मुसलामानों को अपनी बुज़दिली, खुद कुश हमले को अंजाम देकर कर रहे हैं. खास कर पकिस्तान में आए दिन खूँ रेज़ी हो रही है.
इस्लाम की तहरीक जेहाद के ज़रीए कमाई का रास्ता बनाओ, अभी तक मुसलमान के मुँह लगा हुवा है. इसके सूत्रधार हैं ओलिमा, यही ज़ात ए नापाक हमेशा आम इंसानों को बहकाती रही है, जो इनके झांसे में आकर इस्लाम क़ुबूल कर लिया करते थे. इस्लाम एक तरीका है, एक फार्मूला है ब्लेक मेलिंग का कि लोगों को मुसलमान बना कर अपने लिए साधन बनाओ, भरण पोषण का. ये इंसान को जेहादी बनाता है, जेहाद का मकसद है लूट मार, वह चाहे गैर मुस्लिम का हो चाहे मुसलामानों का. इतिसस गवाह हैं कि मुसलामानों ने जितना खुद मुसलामानों का खून किया है, उसका सवां हिस्सा भी काफिरों और मुरिकों का नहीं किया. आज पकिस्तान इस्लामी जेहादियों का क़त्ल गाह बना हुवा है. इसको इसकी सज़ा मिलनी भी चाहिए कि इस्लाम के नाम पर किसी देश का बटवारा किया था. इसके नज़रिए को मानने वाले तर्क वतन को मज़हब की बुनियाद पर तरजीह दिया था. इसके बानी मुहम्मद अली जिना को अपने कौम को इस्लामी क़त्ल गाह के हवाले कर देने का अज़ाब, उनकी रूह को इस्लामी जहन्नम में पड़ा होना चाहिए मगर काश कि इस्लामी जन्नत या जहन्नम में कुछ सच्चाई होती.
हिन्दुतान अपनी तहजीब की बुन्यादों पर इर्तेकाई मंजिलों पर गामज़न है. मुसलामानों को चाहिए कि अपनों आँखें खोलें. 
जाहिले मुतलक मुहम्मदी अल्लाह क्या कहता है देखो - - -

"क़सम है रात की जब वह छुपाले,
दिन की जब वह रौशन हो जाए,
और उसकी जिस ने नर और मादा पैदा किया,
कि बेशक तुम्हारी कोशिशें मुख्तलिफ हैं,.
सो जिसने दिया और डरा,
और अच्छी बात को सच्चा समझा,
तो हम उसको राहत की चीज़ के लिए सामान देंगे,
और जिसने बोख्ल किया और बजाए अल्लाह के डरने के, इससे बे परवाई अख्तियार की और अच्छी बात को झुटलाया,
तो हम इसे तकलीफ़ की चीज़ के लिए सामान देंगे."
सूरह लैल ९२  - पारा ३० आयत (१-१०)

"और इसका माल इसके कुछ काम न आएगा,
जब वह बर्बाद होने लगेगा,
वाकई हमारे जिम्मे राह को बतला देना है,
औए हमारे ही कब्जे में है,
आखिरत और दुन्या, तो तुमको एक भड़कती हुई आग से डरा चुका हूँ,
इसमें वही बदबख्त दाखिल होगा जिसने झुटलाया और रूगरदानी की,
और इससे ऐसा शख्स दूर रखा जाएगा जो बड़ा परहेज़गार है,
जो अपना माल इस लिए देता है कि पाक हो जाए,
और बजुज़ अपने परवर दिगार की रज़ा जोई के, इसके ज़िम्मे किसी का एहसान न था कि इसका बदला उतारना हो .
और वह शख्स अनक़रीब खुश हो जाएगा."
सूरह लैल ९२  - पारा ३० आयत(११-२१)

नमाजियों!
हिम्मत करके सच्चाई का सामना करो. तुमको तुम्हारे अल्लाह का रसूल वर्गाला रहा है. अल्लाह का मुखौटा पहने हुए, वह तुम्हें धमका रहा है कि उसको माल दो. वह ईमान लाए हुए मुसलामानों से, उनकी हैसियत के मुताबिक टेक्स वसूल किया करता था. इस बात की गवाही ये क़ुरआनी आयतें हैं. ये सूरह मक्का में गढ़ी गई हैं जब कि वह एक्तेदार पर नहीं था. मदीने में मका मिलते ही भूख खुल गई थी.
मुहम्मद ने कोई समाजी, फलाही,खैराती या तालीमी इदारा कायम नहीं कर रखा था कि वसूली हुई रक़म उसमे जा सके. मुहम्मद के चन्द बुरे दिनों का ही लेकर आलिमों ने इनकी ज़िन्दगी का नक्शा खींचा है और उसी का ढिंढोरा पीटा है. मुहम्मद के तमाम ऐब और खामियों की इन ज़मीर फरोशों ने पर्दा पोशी की है. बनी नुज़ैर की लूटी हुई तमाम दौलत को मुहम्मद ने हड़प के अपने नौ बीवियों और उनके घरों के लिए वक्फ कर लिया था. और उनके बागों और खेतियों की मालगुजारी उनके हक में कर दिया था. जंग में शरीक होने वाले अंसारी हाथ मल कर राह गए थे. हर जंगी लूट मेल गनीमत में २०% मुहम्मद का उवा करता था.



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 20 May 2017

Hindu Dharm Darshan 66



देश का नैतिक पतन 

भारत के मानस का जितना नैतिक पतन आज हुवा है उतना कभी भी नहीं हुवा. 
तीन चौताई बहुमत की ओर जा रही BJP अपने साथ जनना को भी मानव मूल्यों पाताल में लिए जा रही है. 
पेट्रोल पम्प के सर्वे बतला रहे हैं कि ९९@ पम्पों में घटत्तौलियों के चिप्स लगे गुए हैं . क्या इस बात से साबित नहीं हो रहा कि EVM की मशीनों में कोई हरकत न लगी हुई हो ? 
नोट बंदी के दौरान जेवरात के सभी दुकाने इनकम tex छापों के डर से बंद हुईं, 
बनियों को लूट पाट का सुनहरा मौक़ा मिला था. 
ज़िन्दा बे कुसूर इंसान जुनूनी भीड द्वारा पीट पीट कर मारे जा रहे है, 
जैसे असभ्य ईरान जैसे देशों में हर चौराहे पर फांसी पर लटके अवाम दिखते हैं . 
क्या नेहरू काल में आजके हालात का तसव्वुर भी किया जा सकता था ?
अनजाम कार विश्व पटल पर भारत का स्थान 3 अंक गिर कर १४२ निम् स्तरीय श्रेणी में आ गया है. 
जब कि बदनाम अमरीका का स्थान 42 नंबर पर. 
भारत का उदय मोदी नहीं कर रहे हैं, 
समय चक्र कर रहा है, 
हाँ भारत का नैतिक पतन धर्मान्धरता के शिकार मोदी कर रहे हैं.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Soorah shams 91

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

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सूरह शम्स ९१  - पारा ३० 
(वश्शमसे वज़ूहाहा)  

ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.
इस धरती पर मुख्तलिफ़ वक्तों में समाज में कुछ न कुछ वाकिए और हादसे हुवा करते है जिसे नस्लें दो तीन पुश्तों तक याद रखती हैं. इनको अगर मुरत्तब किया जाए लाखों टुकड़े ज़मीन के ऐसे हैं जो करोरों वाकिए से ज़मीन भरे हुए  है. इसको याद रखना और बरसों तक दोहराना बेवकूफी  की अलामत है. मगर मुसलमान इन बातों को याद करने की इबादत करते हैं. बहुत से ऐसे मामूली वाकिए कुरआन में है जिनको नमाज़ों में पढ़ा जाता है. पिछली  सूरह में था कि आग तापते हुए मुसलामानों और मफरूज़ा काफिरों में कुछ कहा-सुनी हो गई, बात मुहम्मद के कान तक पहुँची, बस वह मामूली सा वाकिया क़ुरआनी आयत बन गया और मुसलमान वजू करके, नियत बाँध के, उसको रटा करते है. ऐसा ही एन वाकिया अबू लहब का है कि जब मुहम्मद ने अपने कबीले को बुला कर अपनी पैगम्बरी  का एलान किया तो मुहम्मद के चचा अबी लहब, पहले शख्स थे जिन्होंने कहा, "तेरे हाथ माटी मिले , क्या इसी लिए तूने हमें बुलाया था?" बस ये बात कुरआन की एक सूरह बन गई जिसको मुसलमान सदियों से गा रहे हैं, "तब्बत यदा अबी लह्बिवं - - -"

"क़सम है सूरज की और उसके रौशनी की,
और चाँद की, जब वह सूरज से पीछे आए,
और दिन की, जब वह इसको खूब रौशन कर दे,
और रत की जब वह इसको छुपा ले,
और आसमान की और उसकी. जिसने इसको बनाया.
और ज़मीन कीऔर उसकी. जिस ने इसको बिछाया.
और जान की और उसकी, जिसने इसको दुरुस्त बनाया,
फिर इसकी बद किरदारी की और परहेज़ गारी की, जिसने इसको अल्क़ा किया,
यकीनन वह इसकी मुराद को पहुँचा जिस ने इसे पाक कर लिया ,
और नामुराद वह हुवा जिसने इसको दबा दिया."
सूरह शम्स ९१  - पारा ३० आयत (१-१०)

"कौम सुमूद ने अपनी शरारत के सबब तकज़ीब की,
जब कि इस कौम में जो सबसे ज़्यादः बद बख्त था,
वह उठ खड़ा हुआ तो उन  लोगों से अल्लाह के पैगम्बर ने फ़रमाया कि अल्लाह की ऊँटनी से और इसके पानी पीने से खबरदार रहना,
सो उन्हों ने पैगम्बर को झुटला दिया, फिर इस ऊँटनी को मार डाला.
तो इनके परवर दिगार ने इनको इनके गुनाह के सबब इन पर हलाक़त नाज़िल फ़रमाई."
सूरह शम्स ९१  - पारा ३०  आयत (११-१५)

नमाज़ियो !
अल्लाह चाँद की क़सम खा रहा है, जबकि वह सूरज के पीछे हो. इसी तरह वह दिन की क़सम खा रहा है जब कि वह सूरज को खूब रौशन करदे?
गोया तुम्हारा अल्लाह ये भी नहीं जनता कि सूरज निकलने पर दिन रौशन हो जाता है. वह तो जानता है कि दिन जब निकलता है तो सूरज को रौशन करता है.
इसी तरह रात को अल्लाह एक पर्दा समझता है जिसके आड़ में सूरज जाकर छिप जाता है.
ठीक है हजारो साल पहले क़बीलों में इतनी समझ नहीं आई थी, मगर सवाल ये है कि क्या अल्लाह भी इंसानों की तरह ही इर्तेकाई मराहिल में था?
मगर नहीं! अल्लाह पहले भी यही था और आगे भी यही रहेगा. ईश या खुदा कभी जाहिल या बेवकूफ तो हो ही नहीं सकता.
इस लिए मानो कि कुरआन किसी अल्लाह का कलाम तो हो ही नहीं सकता. ये उम्मी मुहम्मद की जेहनी गाथा है.
कुरआन में बार बार एक आवारा ऊँटनी का ज़िक्र है. कहते हैं कि अल्लाह ने बन्दों का चैलेंज कुबूल करते हुए पत्थर के एह टुकड़े से एक ऊँटनी पैदा कर दिया. बादशाह ने इसे अल्लाह की ऊँटनी करार देकर आज़ाद कर दिया था जिसको लोगों ने मार डाला और अल्लाह के कहर के शिकार हुए.
ये किंवदंती उस वक्त की है जब इंसान भी ऊंटों के साथ जंगल में रहता था, इस तरह की कहानी के साथ साथ.
मुहम्मद उस ऊँटनी को पूरे कुरआन में जा बजा चराते फिरते हैं.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 16 May 2017

Hindu Dharm Darshan 65



वेद दर्शन                         
खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 

1-अग्नि ने अपने मित्र इंद्र के लिए 
तीन सौ भैंसों को पकाया था. 
इंद्र ने वृत्र को मारने के लिए मनु के 
तीन पात्रों में भरे सोम रस को एक साथ ही पी लिया था.
 पंचम मंडल सूक्त - 7 
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )

अग्नि देव ने तीन सौ भैसों को किस कढाई में पकाया होगा?
और इंद्र ने कितनी बड़ी परात में तीन सौ भैंसों को भक्षा होगा ? 
यह दोनों मांसाहारी रहे होंगे बल्कि महा मान्साहारी, 
जिनके पुजारी शाकाहारी क्यों हो गए? 
इनको झूट बोलने में कभी कोई लज्जा नहीं आती ? 
इन मन्त्रों को लाउड स्पीकर पर बड़ी बेशर्मी के साथ उच्चारित किया जाता है. 
इस लिए कि संस्कृत भाषा में होते हैं 
जैसे कुरआन अरबी भाषा में होता है. 
दोनों हिन्दू और मुसलमान इन पंडों और मुल्लों के शिकार हैं.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान