Monday, 10 December 2018

सूरह दुख़ान-44 -سورتہ الدخان (मुकम्मल)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है.
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

*****
सूरह दुख़ान-44 -سورتہ الدخان
(मुकम्मल)

एक दिन मुहम्मद अपने मरहूम दोस्त इब्ने सय्यास के घर की तरफ़ चले, 
पास पहुँचे तो देखा कि इब्ने सय्यास का बेटा मैदान में अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था. उसे मुहम्मद की आमद की ख़बर न हुई, जब मुहम्मद ने उसे थपकी दी तो उसने आँख उठ कर देखा.
मुहम्मद ने उससे पूछा कि -
"तू इस बात की गवाही देता है कि मैं अल्लाह का रसूल हूँ?"
उसने मुहम्मद की तरफ़ आँख उठा कर देखा और कहा,
 "हाँ मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि आप उम्मियों के रसूल हैं."
इसके बाद उसने मुहम्मद से पूछा -
"क्या आप इस बात की गवाही देते हो  कि मैं अल्लाह का रसूल हूँ?"
मुहम्मद ने उसके सवाल पर लापरवाई बरतते हुए कहा,
"मैं अल्लाह के तमाम बर हक़ रसूलों पर ईमान रखता हूँ "
फिर उससे पूछा -
"तुझको क्या मालूम पड़ता है?"
उसने कहा -
"मुझे झूटी और सच्ची दोनों तरह की ख़बरें मालूम पड़ती हैं"
मुहम्मद ने कहा -
"तुझ पर मुआमला मख़लूत हो गया."
फिर बोले -
"मैंने तुझ से पूछने के लिए एक बात पोशीदा रख्खी है?"
वह बोला -
"वह दुख़ है"(धुवाँ=स्याह क़ल्बी)
मुहम्मद बोले -
"दूर हो! तू अपने मर्तबा से हरगिज़ तजाउज़ न कर सकेगा."
साथी ख़लीफ़ा उमर बोले -
"या रसूलिल्लाह अगर इजाज़त हो तो मैं इसे क़त्ल कर दूं"
मुहम्मद बोले -
"अगर ये वही दज्जाल है तो तुम इसे क़त्ल करने में क़ादिर नहीं हो सकोगे और अगर ये वह दज्जाल नहीं है तो इसे क़त्ल करने से क्या हासिल?"
उस बहादर लड़के का नाम था
"ऐसाफ़"
उसने किस बहादरी से कहा है -
"वह दुख़ है"
दुख़ के मानी धुवाँ होता है
मुहम्मद के लिए इससे बड़ा सच हो ही नहीं सकता.
ऐसाफ़ ! तुम पर मोमिन का सलाम पहुँचे
शायद इसी दुख़ की सच्चाई पर इस सूरह दुख़ान का नाम रख्खा गया हो.
अब पढ़िए अल्लाह के धुवाँ धार झूट का फ़साना - - -

"हा मीम"
जादू गरों का मंतर, लोगों की तवज्जो खींचने के लिए. 
दुष्ट ओलिमा ने इसमें भी अल्लाह का कोई पैग़ाम पोशीदा पाया है.
सूरह दुख़ान 44 आयत (1)

"क़सम है इस किताब वाज़ह की कि हमने इसको बरकत वाली रात को उतारा है और हम आगाह करने वाले थे, इस रात में हर हिकमत वाला मुआमला हमारी पेशी से हुक्म होकर तय किया जाता है. हम बवजेह रहमत के जो आपके रब की तरफ़ से हुई है, आप को पैग़ामबर बनाने वाले थे. बेशक वह बड़ा सुनने वाला और बड़ा जानने वाला है."
सूरह दुख़ान 44 आयत (2-6)

कहते हैं क़ुरआन में कोई फ़र्क या बढ़त घटत नहीं हो सकती यहाँ तक कि ज़ेर ज़बर की भी नहीं. वह तमाम इबारत क़ुरआन बनती गई जो मुहम्मद मदहोशी में बाईस सालों तक बोले और जितना होश में बोले अपनी उम्मियत के साथ वह हदीसें बन गईं. मदहोशी के आलम में बकी गई आयते क़ुरआनी में तर्जुमा निगारों को बड़ी गुंजाईश है कि अर्थ हीन जुमलों को मनमानी करके सार्थक बना लें मर हदीसों को जस का तस रखा गया. जिसमें मुहम्मद के किरदार का आइना है.
ऊपर की आयातों में मदहोशी है कि मुहम्मद जो कुछ कहना चाह रहे है, 
कह नहीं पा रहे. अल्लाह के रसूल कभी अल्लाह बन कर बातें करते हैं, 
तो कभी उसके रसूल बन जाते हैं. जहाँ अटक जाते है, 
वहां कलाम को अधूरा छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं. 
कहते हैं - 
"आप को पैग़ामबर बनाने वाले थे. बेशक वह बड़ा सुनने वाला और बड़ा जानने वाला है." 
सूरह दुख़ान 44 आयत (2)
आप को पैग़ामबर बनाने वाले थे.? (मगर ? बना न सके??)
"रात में हर हिकमत वाला मुआमला हमारी पेशी से हुक्म होकर तय किया जाता है" (है न मदहोशी के आलम में की गई बात)
 क़ुरआन कभी माहे रमज़ान में उतरता है और कभी बरकत वाली रात शब क़दर को, वैसे मुहम्मद बाईस सालों तक क़ुरआनी उल्टियाँ करते रहे.

दूसरे ख़लीफ़ा उमर के बेटे अब्दुल्ला से रवायत है कि मुहम्मद ने एक शख़्स का हाथ अपने हाथों से काटा, जिसका जुर्म था तीन पैसे की मालियत की चोरी.
(मुस्लिम - - - किताबुल हुदूद)
ऐसे ही मुहम्मद ने अपने ही क़बीले की एक ख़ातून का हाथ क़लम कर दिया था, बहुत मामूली चोरी पर.ये तो थी इसकी पैग़मबरीकी सख़्त  मिसाल, 
हैरत का मुक़ाम ये है कि यही शख़्स   कहता है कि "जेहाद में मारे जाने वाली बेकुसूर औरतों और बच्चो को मारना जायज़ है क्यूँकि काफ़िर मिन जुमला काफ़िर होते हैं.''
यह तो हदीसों की बातें थीं कि जिन पर मुसलमानों का एक गुमराह तबक़ा अहले हदीस बना हुवा है, 
अब चलिए देखें क़ुरआन की नसीहतें क्या कहती हैं - - -

"बल्कि वह शक में हैं और खेल में मसरूफ़ हैं, सो आप उस रोज़ का इंतज़ार करें कि आसमान की तरफ़  एक नज़र आने वाला धुवाँ पैदा हो, जो इन सब लोगों पर आम हो जाए. ये एक दर्द नाक सज़ा है. ऐ हमारे रब ! हम से इस मुसीबत को दूर कर दीजिए, हम ज़रूर ईमान ले आएँगे. इनको कब नसीहत होती है हालांकि इनके पास ज़ाहिर शान का पैग़म्बर आया फिर भी ये लोग इससे सरताबी करते रहे और यही कहते रहे कि सिखाया हुआ है और दीवाना है. हम चंदे इस अज़ाब को हटा देंगे तुम फिर इसी हालत में आ जाओगे.
जिस रोज़ हम बड़ी सख़्त  पकड़ पकड़ेंगे, हम बदला लेंगे." 
सूरह दुख़ान 44 आयत (9-16)

अल्लाह के रसूल की पुर फ़रेब बातों को ख़ातिर में लाइए मगर उनकी पैग़मबरी को मद्दे नज़र रखते हुए. 
क्या इस मक्कारी को पैग़मबरी पाने का हक़ हासिल होना चाहिए?

"ये लोग कहते हैं कि आख़िर हालत बस यही, हमारा दुनिया में मरना है और दोबारा दुनिया में न ज़िन्दा होंगे. सो ऐ मुसलमानों! अगर तुम सच्चे हो तो हमारे बाप दादाओं को ला मौजूद करो. ये लोग ज़्यादः ही बढे हुए है. यातिब्बा की क़ौम  और जो कौमें इससे पहले गुज़रीं, हमने उन सब को हलाक़ कर डाला, वह नाफ़रमान थे."
सूरह दुख़ान 44 आयत (35-37) 

मुहम्मद के लचर मिशन के सामने जब मुख़ालिफ़ उनसे ठोस सवाल करते है तो वह खोखले जवाब के साथ फ़रार अख़्तियार करते हैं. अकसर वह सवालों का जवाब यूँ देते हैं "ये लोग ज़्यादः ही बढे हुए है. "
मुहम्मदी अल्लाह को हलाकुल्लाह कहा जा सकता है. 
या तिब्बा का नाम कहीं से सुन लिया होगा अल्लाह के अनपढ़ रसूल ने. 

"बेशक ज़क़ूम का दरख़्त बड़े मुजरिमों को खाना होगा, जो तेल की तलछट जैसा होगा. वह पीप में ऐसा घुलेगा जैसे तेज़ गरम पानी खौलता है. हुक्म होगा, इसको दोज़ख़ के बीचो बीच घसीटते हुए ले जाओ, फिर इसके सर पे तकलीफ देने वाला गरम पानी छोड़ो. ले चख तू बड़ा मगरूर, मुकर्रम था. ये वही चीज़ है जिस पर तुम ज़क किया करते थे."
सूरह दुख़ान 44 आयत (42-50)

इन आयतों में हर नुक्ते पर अपने आप में छेड़ कर देखिए कि मुहम्मद कितने बेतुके थे.
"बेशक अल्लाह से डरने वाले अमन की जगह पर होंगे. यानी बागों में और नहरों में. वह लिबास पहनेंगे बारीक और दबीज़ रेशम का, आमने सामने बैठे होंगे. ये बात इसी तरह है और इनका गोरी गोरी बड़ी बड़ी आँखों वालियों से ब्याह करेंगे. वहाँ इत्मीनान से हर क़िस्म का मेवा मंगाते होंगे. वहाँ बजुज़ इस मौत के जो दुन्या में हो चुकी थी, और मौत का ज़ाइका भी नहीं चखेंगे. और अल्लाह इन्हें दोज़ख़ से बचा लेगा."
सूरह दुख़ान 44 आयत (51-56) 29 

हैरानी होती है कि मुसलमान इन क़ुरआनी बातों पर पूरा पूरा यक़ीन करते हैं और इस ज़िन्दगी को पाने के लिए हर उम्र में हराम मौत मरने को तैयार रहते हैं. 
बेवक्त हराम मौत मरना, अपने माँ बाप और अज़ीज़ों को दाग़े मुफ़ारिक़त दे जाना, क़ुदरत की बख़्शी  हुई अपनी इस बेश क़ीमत ज़िन्दगी से हाथ धो लेना, इन हक़ीक़तों पर कभी ग़ौर ही नहीं करते. 
ज़िन्दगी के कारनामों को अंजाम देने में मौत को जाए तो शहादत है, 
मुहम्मद की सुझाई हुई जन्नत पर लानत है कि इस के लिए मर जाए तो हिमाक़त है. बेमक़सद मुसलसल जीते रहना ही मौत से बदतर है.
***
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 9 December 2018

Hindu Dharm Darshan 252


शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (56)

भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं - - -
>हे भरत पुत्र ! 
ब्रह्म नामक समग्र भौतिक वस्तु जन्म का स्रोत है.
और मैं इसी ब्रह्म को गर्भस्त करता हूँ, 
जिसमें समस्त जीवों का जन्म संभव होता है.
>>हे कुंती पुत्र ! 
तुम यह समझ लो कि समस्त प्रकार के जीव-योनियाँ 
इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा संभव हैं 
और मैं उसका बीज-प्रदाता हूँ. 
>>>भौतिक प्रकृति तीन गुणों से युक्त है. 
सतो, रजो, तथा तमो गुण. 
हे महाबाहू अर्जुन ! 
जब शाश्वत जीव प्रकृति के संसर्ग में आता है, 
तो वह इन गुणों से बंध जाता है.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय -14   श्लोक -3+4 +5   

*एक बार मैंने ज़बान ए आम में इसी गीता शब्दों को कहा कि 
ब्रह्माण्ड =ब्रह्मा का अंडा, 
तो पाठकों ने ठहाका लगाया था और मेरे इल्म को छदम बतलाया था. 
विडंबना यही है कि जनता धर्म ग्रंथों को हाथ भी नहीं लगाती 
और अपने धर्म की कमियों को खुद नहीं जानती. 
वह ग्रंथों के साथ एक पल भी रहना दिमागी मशक्क़त समझती है 
और पंडो की बातों पर घंटों झूमती रहती है. 
अब लो यह भगवान् इसी ब्रह्मा के अंडे को गर्भाधान करते है. 
जब स्वयं भगवान् सम्भोग में लिप्त पाए जाते हैं, यह उनकी ही स्वीकृति है, 
तो मानव जाति को क्यों इस कृति से दूर रखना चाहते हैं. 
बेशक प्रकृति ही इन बीजों का श्रोत है वरना तमाम योनियाँ इसे पाने के लिए इतनी बेचैन क्यों हुवा करती हैं ? 
खुद प्रकृति अपने बीज रोपण में क्यों संलग्न रहती है ? 
यही दोनों अलग अलग मानव अंग हैं जो मिलने के लिए हर समय उत्साहित रहते हैं. क्योकि इसी मिलन के रहस्य में जीवों का स्तित्व सुरक्षित है.
धर्म ग्रन्थ हमेशा विरोधाभाषी उपदेशों से परिपूर्ण हुवा करते हैं. 
पिछले अध्याय में भगवान ब्रह्मचर्य का पाठ पढाते हैं और यहाँ प्रक्रति का गुण ठहराते  हैं. 
सतो, रजो, तथा तमो गुणों का कहीं पर वर्गी करण करके अच्छा और बुरा करार देते है तो कहीं इसे संयुक्त कर के जीव स्वभाव बतलाते हैं. 
और क़ुरआन कहता है - - - 
>"बड़ी आली शान ज़ात है जिसने ये फैसले की किताब अपने बंद-ए-खास पर नाज़िल फरमाई ताकि तमाम दुन्या जहाँ को डराने वाला हो"
सूरह फुरकान-२५-१८वाँ पारा आयत (१)

गौर तलब है अल्लाह खुद अपने मुँह से अपने आप को आली शान कह रहा है. जिसकी शान को बन्दे शबो-रोज़ अपनी आँखों से खुद देखते हों, उसको ज़रुरत पड़ गई बतलाने और जतलाने की? कि मैं आलिशान हूँ. मुहम्मद को बतलाना है कि वह बन्दा-ए-खास हैं. जिनको उनके अल्लाह ने काम पर लगा रक्खा है कि बन्दों को झूटी दोज़ख से डराया करो कि यही चाल है कि तुझको लोग पैगम्बर मानें. 
***


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 8 December 2018

Hindu Dharm Darshan 255



शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (59)

> भगवान् ने कहा ---
हे भरतपुत्र ! 
निर्भयता, आत्म शुद्धि,आध्यात्मिक, ज्ञान का अनुशीलन, दान, आत्म संयम, यज्ञ परायणता, वेदाध्ययन, तपस्या, सरलता, अहिंसा, सत्यता, क्रोध विहीनता, त्याग, शांति, छिद्रान्वेषण (ऐब निकालना) में अरुचि, समस्त जीवों पर करुणा, लोभ विहीनता, भद्रता, लज्जा, संकल्प, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, ईर्ष्या एवं सम्मान की अभिलाषा से मुक्ति -- 
ब यह सारे दिव्य गुण हैं, जो दैवी प्रकृति से संपन्न देव तुल्य पुरुषों में पाए जाते हैं.
>हे पृथापुत्र !
दंभ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर्ता तथा अज्ञान -- 
यह सब असुरी स्वभाव वाले गुण हैं.     
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय -  16 श्लोक - 1-2-3-4   
*गीता की अच्छी बातें जिनको कम व् बेश स्वीकार किया जा सकता है.
मगर क्या पिछले अध्यायों की घृणित जिहादी बातें इन शुभों के साथ होना चाहिए ?

और क़ुरआन कहता है - - - 
>सूरह फातेहा (१) 

सब अल्लाह के ही लायक हैं जो मुरब्बी हें हर हर आलम के। (१) 
जो बड़े मेहरबान हैं , निहायत रहेम वाले हैं। (२) 
जो मालिक हैं रोज़ जज़ा के। (३) 
हम सब ही आप की इबादत करते हैं, और आप से ही दरखास्त मदद की करते हैं। (४) 
बतला दीजिए हम को रास्ता सीधा । (५) 
रास्ता उन लोगों का जिन पर आप ने इनआम फ़रमाया न कि रास्ता उन लोगों का जिन पर आप का गज़ब किया गया । (६) 
और न उन लोगों का जो रस्ते में गुम हो गए। (७) 
>क़ुरआन में भी बहुत सी बातें जन साधारण के लिए ठीक ही हैं. 



*****
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 7 December 2018

सूरह ज़ुख़रूफ़-43 - سورتہ الزخرف (क़िस्त 2)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है.
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

*****
सूरह ज़ुख़रूफ़-43 - سورتہ الزخرف
(क़िस्त 2) 

आइए मुहम्मदी अल्लाह का ताबूत खोला जाए - - -
"और आप के रब की रहमत बदरजहा से बेहतर है जिसको ये लोग समेटते फिरते हैं, 
और अगर ये बात न होती कि तमाम आदमी एक ही तरह के हो जाएँगे,
तो जो लोग अल्लाह के साथ कुफ्र करते हैं,
उनके लिए उनके घरों की छतें हम चाँदी की कर देते.
और जीने भी जिस पर वह चढ़ कर जाते हैं,
और उनके घरों के कंवाड़े भी और तख़्त भी जिस पर तकिया लगा कर वह बैठते हैं,
और सोने के भी, और ये सब कुछ भी नहीं,
सिर्फ़ दुनयावी ज़िन्दगी की कुछ रोज़ की कामरानी है,
आख़िरत आप के रब के यहाँ ख़ुदा तरसों के लिए है."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (32-35)

उम्मी मुहम्मद क्या बात कहना चाहते हैं? नतीजा अख्ज़ करना मोहल है. 
बात काफ़िरों के हक़ में जाती है जिसे मुतरज्जिम ने ब्रेकट में अपनी बात रख कर अल्लाह की मदद करके रसूल के हक़ में किया हुवा है. 
ऐसे आयतों को मुसलमान कहते हैं कि क़ुरआन का एक जुमला भी कोई इंसान बना नहीं सकता. बेशक इंसान तो कभी नहीं बनाएगा ऐसा कलाम मगर पागल आदमी ऐसा कलाम दिन भर बड़बड़ाया करता है.
सब लोग बराबर होते तो इंसान के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता था, 
मगर अल्लाह के लिए मुश्किल खडी हो जाती कि उसको ऐसे रसूल कहाँ मयस्सर होते.
कुफ़्फ़ार ने तो अपने घरों की छतें, जीनें और कंवाड़े तो चांदी के कर लिए हैं और मुसलमान फ़क़त अल्लाह हू, अल्लाह हू में मुब्तिला है. 

"और जो शख़्स   अल्लाह की नसीहत से अँधा हो जाए, हम इस पर एक शैतान मुसल्लत कर देते हैं, सो वह इनके साथ हो जाता है, और वह इनको राहे हक़ से रोकता है."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (37)
तो अल्लाह सब के बड़ा शैतान हुवा जो इंसान के पीछे शैतान लगा देता है, 
जो उसे बुरी राहों पर चलाता है.
मुसलमानों! यक़ीन करो कि तुम्हारा अल्लाह ही शैतान है 
जो तुमको तरक़क़ी  नहीं करने देता.
आयत में दो अल्लाह के वजूद पर ग़ौर करें.

"तो बस अगर हम आप को उठा लें तब भी वह बदला लेने वाला है."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (41)

मुहम्मद की लग़ज़िश देखिए कि यहाँ पर अल्लाह उनसे कहता है कि 
"अगर हम आप को उठा लें तब भी वह बदला लेने वाला है" 
अल्लाह हाज़िर, अल्लाह ग़ायब की बात करता है.
अल्लाह मुहम्मद को ज़बान देता है कि आपके मरने के बाद भी वह उनके दुश्मनों से इन्तेकाम लेगा.
गोया मुहम्मद मरने के बाद भी अपना भूत इंसानों पर तैनात कर रहे हैं.

"वह लोग शरारत से भरे थे, फिर जब उन्हों ने हमें ग़ुस्सा दिला दिया तो हम ने उन से बदला लिया और ज़िंदा डुबो दिया"
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (55)

ऐसा अल्लाह है तुम्हारा ऐ मुसलमानों. 
उसको भड़काया भी गया कि उसको तैश आ जाए. 
और तैश में आकर इंसानों को पानी में डुबो भी दिया. 
यानी वह ज़रा सा बेवक़ूफ़ भी है, कम अक़्ल पहेलवान जैसा.
दर अस्ल ऐसी फ़ितरत मुहम्मद की ज़रूर थी.
"जो हमारी बातों पर ईमान लाए थे? ? ?
(उनका अंजाम ये रहा कि तुम देख रहे हो कि - - -बतलाना भूल गया)

"तुम और तुम्हारी बीवियां ख़ुश ख़ुश जन्नत में दाख़िल हो जाओ,
इनके पास सोने की रेकाबियाँ और गिलास ले जाएँगे, और वहाँ हर चीज़ मिलेगी.
जिसको दिल चाहेगा, जिससे आँखों को लज्ज़त होगी,
और तुम यहाँ हमेशा रहोगे
जन्नत है जिसके तुम मालिक बनाए गए, अपने आमाल के एवाज़,
तुम्हारे लिए इसमें बहुत से मेवे हैं जिन में से खा रहे हो."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (69-73)

किस अंदाज़ की चिरकुट गुफ़्तुगू है अल्लाह हिकमत वाले की?
क्या औरतों के आमाल का हिसाब किताब नहीं होता? 
क्या वह अपने शौहरों के आमाल के सिलह में, 
अपने शौहरों के हमराह जन्नत में दाख़िल होंगी? 
वैसे मुहम्मद तो उनको मुकम्मल इंसान भी नहीं मानते थे, 
कहते थे कि एक दिन उनको दोज़ख़ दिखलाई गई जहाँ कसरत से औरतें थीं. (एक हदीस)

"बेशक नाफ़रमान लोग अज़ाबे दोज़ख़ में हमेशा रहेगे. वह उनसे हल्का न किया जाएगा और वह उसी में मायूस पड़े रहेंगे और हमने उन पर ज़ुल्म नहीं किया लेकिन ख़ुद ही ज़ालिम थे. पुकारेंगे ऐ मालिक तुम्हारा परवर दिगार हमारा काम ही तमाम करदे और जवाब देगा कि तुम हमेशा इसी हाल में रहो. हमने सच्चा दीन तुम्हारे पास पहुँचाया लेकिन तुम में से अकसर आदमी सच्चे दीन से नफ़रत करते थे."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत  (74-75)

ज़ालिम मोहम्मद की एक अदा ये भी है कि इस बात को बार बार दोहराते हैं कि "हमने उन पर ज़ुल्म नहीं किया लेकिन ख़ुद ही ज़ालिम थे
वह इतनी सी बात पर ज़ालिम हो गए कि तुम्हारे झूट को नहीं माना 
और तुम पैदायशी ज़ालिम जो अपने ही बुजुर्गों, रिश्ते दारों और और अज़ीज़ों को मार के तीन दिनों तक उनकी लाशों को सड़ने दिया फिर एक एक को नाम और उनकी वल्दियत के साथ ताने देते हुए बदर के कुँए में उनकी लाशें फिंकवा दिया था.
(हदीसें देखिए)
इस आयत में देखिए कि कुफ़्फ़ार किस तरह से गिड़गिड़ाते हैं और मुहम्मदी अल्लाह पसीजने के बजाए और सख़्त हुवा जा रहा है. मुहम्मद के झूठे दीन के प्रचारक बारहा इस धरती पर ज़िल्लत की मौत पा चुके है मगर ये अपनी माँ के ख़सम ओलिमा कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होकर फिर से इंसान को बहकाना शुरू कर देते है.
वाक़ई ये मुहम्मदी दीन क़ाबिले नफ़रत है.

"हाँ क्या उन लोगों का ख़याल है कि हम उनकी चुपके चुपके बातों को और मशविरे को नहीं सुनते हैं और हमारे फ़रिश्ते उनके पास हैं, वह भी लिखते हैं"
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (80)
देखिए कि मुहम्मद के चुगल खो़र सहाबी किराम को मुहम्मद फ़रिश्तों का दर्जा दे रहे हैं.
"सो उनको आप शोगल और तफ़रीह में पड़ा रहने दें यहाँ तक कि उनको अपने इस दिन के साबेक़ा वाक़े हो जिसका इनसे वादा किया गया है."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (83)
बद नियत रसूल कहता है कि इनको मश्गलों में पड़ा रहने दो ताकि हम उनसे बदला ले सकें.कि इसका वादा पूरा हो, जो इसने इंसानियत के साथ किया था.

"और इसको रसूल के इस कहने की भी ख़बर है कि ऐ मेरे रब ये ऐसे लोग हैं कि ईमान नहीं लाते तो आप इनसे बे रुख रहिए और यूं कह दीजिए कि तुमको सलाम करते हैं तो तुम को भी मालूम हो जायगा."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (89)
आयत में बेसिर पैर की बातें ही नहीं बे सिर पैर की भाषा भी है.
***  

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 6 December 2018

Hindu Dharm Darshan 254



शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (58)

भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं - - -
>वह मेरा परम धाम न तो सूर्य और चंद्रमा के द्वारा प्रकाशित होता है 
और न अग्नि या बिजली से. 
जो लोग वहां पहुँच जाते हैं, वे इस भौतिक जगत में फिर से लौट कर नहीं आते हैं.  
मैं समस्त जीवों के शरीरों में पाचन अग्नि हूँ 
और मैं श्वास प्रश्वास में रहकर चार प्रकार के अन्नों को पचता हूँ.
जो कोई भी शंशय रहित होकर पुरोशोत्तम भगवन के रूप में जाब्ता है,
 वह सब कुछ जानने वाला है. 
अतएव हे भारत पुत्र !
वह व्यक्ति मेरी पूर्ण भक्ति में रत होता है.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय -15   श्लोक -6 +14 +19  

*जो भाषण और वाणी आजके आधुनिक युग में चाल घात समझी जाती  हैं वही बातें आज भी ईश वानी का दर्जा रखती हैं. 
सोए हुए जन मानस ! 
तुमको कैसे जगाया जाए ? 
तुमको हजारो साल से यह धर्मों के धंधे बाज़ ठगते रहे हैं, 
और कब तक तुम  अपनी पीढ़ियों को इन से ठगाते रहोगे ? 
भले ही तुम उस जाति अथवा वर्ग के हो, 
यह लाभ तुम्हारे लिए भी आज के युग में हराम हो गया है.

और क़ुरआन कहता है - - - 
>"और हमने आपको इस लिए भेजा है कि खुश खबरी सुनाएँ और डराएँ. आप कह दीजिए कि मैं तुम से इस पर कोई मावज़ा नहीं मांगता, हाँ जो शख्स यूँ चाहे कि अपने रब तक रास्ता अख्तियार करे."
सूरह फुरकान-२५-१९वाँ पारा आयत (५७)

डरना, धमकाना, जहन्नम की बुरी बुरी सूरतें दिखलाना और इन्तेकाम की का दर्स देना, मुहम्मदी अल्लाह की खुश खबरी हुई. जो अल्लाह जजिया लेता हो, खैरात और ज़कात मांगता हो, वह भी तलवार की ज़ोर पर, वह खुश खबरी क्या दे सकता है?
***

*****
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 5 December 2018

सूरह ज़ुख़रूफ़-43 - سورتہ الزخرف (क़िस्त 1)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है.
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

*****
सूरह ज़ुख़रूफ़-43 - سورتہ الزخرف
(क़िस्त 1)
  
मौजूदा  साइंस की बरकतों से फैज़याब दौर के लोगो! 
ख़ास कर मुसलमानों!!
एक बार अपने ख़ुदा के वजूद का तसव्वुर अपनी ज़ेहनी सतह पर बड़ी ग़ैर जानिब दारी से क़ायम करो. बस कि सच का मुक़ाम ज़ेहन में हो. 
सच से किसी शरीफ़ और ज़हीन आदमी को इंकार नहीं हो सकता, 
इसी सच को सामने रख कर ख़ुदा का वजूद तलाशो, 
हमारे कुछ सवालों का जवाब ख़ुद को दो.
1-क्या ख़ुदा हिदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों और दीगर मज़ाहिब के हिसाब से जुदा जुदा हो सकता है?
2- क्या ख़ुदा भारत, चीन, योरोप, अरब, अमरीका और जापान वग़ैरह के जुग़राफ़ियाई एतबार से अलग अलग हो सकता है?
3- क्या ख़ुदा नस्लों, तबकों, फिरकों, संतों, गुरुओं, पैग़मबरों और क़बीलों के एतबार से जुदा जुदा हो सकते हैं?
4- समाज के इज्तेमाई (सामूहिक) फ़ैसले के नतीजे से बरआमद ख़ुदा, 
क्या हो सकता है?
5- खौफ़, लालच, जंग ओ जेहाद से बरामद किया हुआ ख़ुदा क्या सच हो सकता है?
6- क्या ज़ालिम, जाबिर, ज़बर दस्त, मुन्तकिम, चालबाज़, गुमराह करने वाली हस्ती ख़ुदा हो सकती है?
7- पहले हमल में ही इंसान की क़िस्मत लिख्खे, फिर पैदा होते ही कांधों पर आमाल नवीस फ़रिश्ते मुक़र्रर करे. इसके बाद यौमे हिसाब मुनअक़िद करे, क्या ऐसा कोई ख़ुदा हो सकता है?
8-क्या ख़ुदा ऐसा हो सकता है जो नमाज़, रोज़ा, पूजा पाठ, चढ़ावाया और प्रसाद वग़ैरह का लालची हो सकता है?
9- क्या ख़ुदा कोई हो सकता है कि जिसके हुक्म के बग़ैर पत्ता भी न हिले?
तो क्या तमाम समाजी बुराइयाँ इसी का हुक्म हैं ? 
तब तो दुन्या के तमाम दस्तूर इसके ख़िलाफ़ हैं.
10- कहते हैं ख़ुदा के लिए हर कम मुमकिन है, क्या ख़ुदा इतना बड़ा पत्थर का गोला बना सकता है, जिसे वह ख़ुद न उठा पाए?
मुसलमानों! इन सब सवालों का सही सही जवाब पाने के बाद तुम चाहो तो बेदार हो सकते हो.
जगे हुए इंसान को किसी पैग़ामबर या मुरत्तब किए हुए अल्लाह की ज़रुरत नहीं होती है, जगे हुए इंसान के का रहनुमा ख़ुद इसके अन्दर विराजमान होता है.
याद रखो तुम्हारे जागने से सिर्फ़ तुम नहीं जागते, बल्कि इर्द गिर्द का माहौल जागेगा, चिराग़ जलने के बाद सिर्फ़ चिराग़ रौशनी में नहीं आता, 
बल्कि तमाम सम्तें रौशन हो जाती हैं.
महक़ उट्ठो अपने अन्दर की ख़ुशबू से. 
लाशऊरी तौर पर तुम अपनी इस ख़ुशबू को ख़ारजी रुकावटों के बायस पहचान नहीं पाते. ये ख़ुशबू है इंसानियत की. मज़हब तो ख़ारजी लिबास पर इतर का छिड़काव भर है.
छोडो इन पंज रुकनी लग्वियात को. और इस पंज वकता खुराफ़ात को,
मैं देता हूँ तुम्हें बहुत ही आसान पाँच अरकान ए हयात.
1-सच को जानो. सच के बाद भी सच, सच को ओढ़ो और सच को बिछाओ, 
2- मशक्कत, का एक नवाला भी अपने या अपने बच्चों के मुँह में हलाल है, 
मुफ़्त या हराम से मिली नेमत मुँह में मत जाने दो.
3- जिसारत, सदाक़त को इरादे की बहुत सख़्त ज़रुरत होती है, 
वैसे सदाक़त अपने आप में जिसारत है.
4. प्यार- - - इस धरती से, धरती की हर शै से और ख़ुद से भी.
5- अमल- - -  तुम्हारे किसी अमल से किसी को ज़ेहनी या जिस्मानी या फिर माली नुकसान न हो.
 बस.

"हा-मीम"
सूरह ज़ुख़रूफ़ -43 आयत (1)

मुह्मिल यानी अर्थ हीन शब्द है. वैसे तो पूरा क़ुरआन ही अर्थ में अनर्थ है, 
नाइंसाफी और जब्र है.

"क़सम है इस किताब वाज़ेह की कि हमने इसे अरबी ज़बान का क़ुरआन बनाया है ताकि तुम लोग इसे समझ लो और हमारे पास लौहे महफ़ूज़ में बड़ी हिकमत भरी किताब है. क्या तुम से  इस नसीहत को, इस बात से उठा लेंगे कि तुम हद से गुज़रने वाले हो."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (2-5)  

अल्लाह अपने इस किताब की क़सम खाता है क्यूँकि ये अरबी ज़बान में है. 
न क़सम खाता तो भी इसे अरबी ज़बान में ही ज़माना देख रहा है. 
अब तो हर ज़बान में इस रुस्वाए ज़माना किताब वाज़ेह उरियाँ हो रही है.
मुहम्मद के ज़ेहन पर अरबी ज़बान का भूत काबिज़ है कि जिसे ये बार बार दोहरा रहे हैं.
लौह यानी पत्थर कि स्लेट जिस पर इबारत खुदी हुई हो. 
मूसा को ख़ुदा ने दस इबारत खुदी हुई पत्थर की पट्टिका दी थीं 
"The Ten comondments " 
जो अरब दुन्या में मशहूर ए ज़माना था. 
उसी को मुहम्मद अपने कलाम में बार बार गाते हैं कि ये क़ुरआन पत्थर की लकीर है, इस की फोटो कापी कर के जिब्रील लाते हैं.
वह कहते है कि क्या अल्लाह इससे बाज़ आएगा कि उसकी बात नहीं मानते, 
कभी नहीं. 
गोया अपने अल्लाह की बे गैरती बतला रहे हैं.
एक गावँइ  कहावत है हालांकि फूहड़ है जिसे ज़द्दे क़लम में न लाते हुए भी लाना पड़ रहा है, अल्लाह की संगत का असर जो है कि वह बार बार अपने फूहड़ कलाम में फूहड़ पन को दोहराता है. 
कहावत यूं है कि "रात भर गाइन  बजाइन, भोर माँ देखिन तो बेटा के छुन्याँ ही नहीं" यही कहावत लागू होती है  क़ुरआन पर कि इसकी तारीफ़ो के पुल बांधे है मगर पुल के नीचे देखा तो नाली बह रही थी.  
क़ुरआन में कुछ भी नहीं है सिवाए ख़ुद की तारीफ़ के. 

"और उन लोगों ने अल्लाह के बन्दे में अल्लाह का जुज़ ठहराया दिया और उनहोंने फ़रिश्तों को जो कि अल्लाह के बन्दे है, औरत क़रार दे रख्खा है. क्या इनकी पैदाइश के वक़्त मौजूद थे? इनका ये दावा लिख लिया जाता है और क़यामत के दिन इनसे बाज़ पुर्स होगी."
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (19)

इशारा ईसाइयत की तरफ़ है जो फ़रिश्तों को इंसान से हट कर वह मासूम मख़लूक़ मानते हैं जो कोई जिन्स नहीं रखते. ऊपर मैंने कहा था कि अल्लाह  क़ुरआन फूहड़ पन से भरा हुवा है,.इसी आयत में यह बात आ गई कि फूहड़ मुहम्मद ईसाइयों से पूछते है कि फ़रिश्ते जब जन्म ले रहे थे तो क्या यह लोग खड़े इनका जिन्स देख रहे थे. इनसे पूछा जा सकता है कि जब अल्लाह इन्हें पैग़ामबर बना रहा था तो कोई गवाह था. इनकी झूटी गवाहियाँ अज़ान और नमाज़ों में तो हर रोज़ दी जाती है.

"और वह लोग यूँ कहते हैं कि अगर अल्लाह चाहता तो हम लोग उन (बुतों) की इबादत न करते. उनको इसकी कुछ तहक़ीक़ नहीं, सब बे तहक़ीक़ बातें करते है. क्या हमने उनको इससे पहले कोई किताब दे रख्खी है कि वह इससे इस्तेद्लाल करते. और कहते हैं कि अगर  क़ुरआन अल्लाह का कलाम है तो दोनों बस्ती मक्का और तायफ़ के किसी बड़े आदमी पर क्यूँ  न नाज़िल किया गया. क्या ये लोग अपने रब की रहमते नबूवत को तक़सीम करना चाहते है?"
सूरह ज़ुख़रूफ़ - 43 आयत (20-21+31-32)

लोगों का सीधा और वाजिब सवाल और मुहम्मद का टेढ़ा और ग़ैर वाजिब जवाब. मक्का के लोगों का कहना था कि वह पैग़मबरी को तक़सीम ओ ज़रब नहीं करना चाहते थे, वह सिर्फ़ इतना चाहते थे कि  क़ुरआन अगर वाकई अरब में और अरबी ज़बान में आई होती तो किसी संजीदः, सलीक़े मंद, पढ़ा लिखा, नेक तबा, शरीफुन-नफ्स, अम्न  पसंद, ईमानदार, साहिबे किरदार, साहिबे इंसाफ, साहिबे फ़िक्र के हिस्से में आती, न कि किसी झूठे और शर्री के हिस्से में.

कलामे दीगराँ - - -
"मैं कहता आँखन की देखी, तू कागत की लेखी"
"कबीर"
इसे कहते हैं कलाम पाक 

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 4 December 2018

Hindu Dharm Darshan 253


शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (57)

भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं - - -
>हे भारत पुत्र ! 
सतो गुण मनुष्य को सुख से बांधता है,
रजो गुण सकाम कर्म से बांधता है 
और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर उसे पागलपन में बाधता है.
>>तपो गुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है,रजो गुण से लोभ उत्पन्न होता है और तमो गुण से अज्ञान, प्रमाद और मोह उत्पन्न होता है.
>>>सतो गुणी व्यक्ति क्र्मशः ऊपर उच्च लोकों को जाते हैं, 
रजोगुणी इसी पृथ्वी पर रह जाते हैं 
और जो अत्यंत गर्हित तमो गुण में स्थित हैं, 
वे नीचे नरक लोक में जाते हैं.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय -14   श्लोक - 8+17 + 18  

*हर आदमी में सभी गुण स्वाभाविक होते हैं , 
कब किसका प्रयोजन हो जाए. 
उम्र भी इन गुणों को निर्धारित करती है. 
इंसान किसी पल फ़रिश्ता होता है तो अगले क्षण शैतान. 
परिस्थितियाँ गुणों को दास बना देती है.
धर्म ज्ञान अधकचरा ज्ञान होता है, 
इसमें कहीं न कहीं उनका हित निहित होता है. 
इंसानियत इन से मुक्ति चाहती है.
प्रस्तुत पुस्तक का एक पाठ है 
" तात्पर्य" 
इसका अध्यन ध्यान पूर्वक करिए तो समझ में आएगा कि " तात्पर्य" का  तात्पर्य क्या है ? अगर धर्म के धंधे बाजों को अपनी कमाई का 50% इनको दो तो यह तुम्हें स्वर्ग लोक में पहुंचा देंगे, इस से कम दो तो इसी लोक में पड़ा रहने देगे और अगर इन लुटेरों को कुछ न दो तो नरक निश्चित है.

और क़ुरआन कहता है - - - 
>"और जिस रोज़ आसमान बदली पर से फट जाएगा, और फ़रिश्ते बकसरत उतारे जाएँगे उस रोज़ हक़ीक़ी हुकूमत रहमान की होगी. और वह काफ़िर पर सख्त दिन होगा, उस रोज़ ज़ालिम अपने हाथ काट काट  खाएँगे. और कहेंगे क्या खूब होता रसूल के साथ हो लेते."
सूरह फुरकान-२५-१९वाँ पारा आयत (२६-२७)

अल्लाह का इल्म मुलाहिजा हो, उसकी समझ से बादलों के ठीक बाद आसमान की छत छाई हुई है जो फट कर फरिश्तों को उतारने लगेगी.  
इस अल्लाह को हवाई सफ़र कराने की ज़रुरत है, 
कह रहे हैं कि "उस रोज़ हक़ीक़ी हुकूमत रहमान की होगी" जैसे कि आज कल दुन्या में उसका बस नहीं चल पा रहा है. 
अल्लाह ने काफिरों को ज़मीन पर छोड़ रक्खा है कि हैसियत वाले बने रहो कि जल्द ही आसमान में दरवाज़ा खुलेगा और फरिश्तों की फ़ौज आकर फटीचर मुसलामानों का साथ देगी. 
काफ़िर लोग हैरत ज़दः  होकर अपने ही हाथ काट लेंगे और पछताएँगे कि कि काश मुहम्मद को अपनी खुश हाली को लुटा देते. 
चौदः  सौ सालों से मुसलमान फटीचर का फटीचर है और काफिरों की गुलामी कर रहा है, यह सिलसिला तब तक क़ायम रहेगा जब तक मुसलमान इन क़ुरआनी आयतों से बगावत नहीं कर देते.
***

*****
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान