Monday, 16 July 2018

Soorah taha -20 Q- 3

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह ताहा २० 
क़िस्त-३


''और हमने इसी तरह उसको अरबी क़ुरआन नाज़िल किया है और हमने उसमें तरह तरह की चेतावनियाँ दी हैं. ताकि वह लोग डर जाएँ या यह उनके लिए किसी क़द्र समाझ पैदा कर दे. - - - और आप दुआ कीजिए की ऐ मेरे रब मेरा इल्म बढ़ा दीजिए. और इस से पहले हम आदम को एक हुक्म दे चुके थे, सो उनसे गफ़लत हो गई हमने इन में पुख़तगी न पाई, जब कि हमने फ़रिश्तों को इरशाद फ़रमाया था कि आदम को सजदा करो. - - 
फ़िर इसके बाद शुरू हो जाती है आदम और इब्लीस की दास्तान जो क़ुरआन में बार बार दोहराई गई है.
सूरह ताहा- २० आयत- (११३-१२३)



मुहम्मद बार बार कहते हैं कि वह क़यामत की (मुख़्तलिफ़ ड्रामे बाज़ी करके) लोगों को डरा रहा हूँ, डराने वाला ज़ाहिर है झूठा होता है, मुसलमान इसी बात को ही अगर समझ लें तो उनकी इसमें बेहतरी है, मगर इतना ही काफ़ी नहीं है, क्यूं कि उम्मी के पास शब्द भंडार नहीं थे कि वह ''डराने'' की जगह आगाह या तंबीह लफ़्ज़ों को अपने कलाम में लाते. इस से साबित होता है कि मुहम्मद अव्वल दर्जे के फ़ासिक़ और दरोग़ गो थे. क़ुरआन के एक एक हर्फ़ झूठे हैं, 

जब तक इस बात पर मुसलमान ईमान नहीं लाते, वह सच्चे मोमिन नहीं कहलाएंगे.
क़ुरआन अरबी में है, मुनासिब था कि ये अरबियों तक सीमित रहता, 
वह रहते कुँए के मेंढक, मगर यह तो तलवार के ज़ोर और ओलिमा के प्रोपोगंडा से पूरी दुन्या में मोहलिक बीमारी बन कर फैल गया. 
हमारे पूर्वजों के वंशजों पर इसका कुप्रभाव ऐसा पड़ा कि अपने रंग में रंगे भारत टुकड़ों में बट गया, 
अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रिय बुद्धिस्ट तालिबानी बन गए, 
आर्यन की मुक़द्दस सरज़मीन नापाक (किस्तान) हो गई, साथ साथ आधा बंगाल भी इस्लाम के भेट चढ़ गया. 
अगर इस्लाम का स्तित्व न होता तो भारत हिंदुत्व ग्रस्त कभी भी न होता, कोई महान ''माओज़े तुंग'' यहाँ भी पैदा होता जो धर्मों की अफ़ीम से भारत को मुक्त कराता और आज हम चीन से आगे होते.
मुसलमान क़ौम, क़ौमों में रुवाई और ज़िल्लत उठा रही है, 
इबादत और दुवाओं के फ़रेब में आकर. 
मुन्जमिद क़ौम की कोड़ों की मार और संगसारी सिंफे-नाज़ुक पर, 
ज़माना इनकी तस्वीरें देख रहा है, 
यह ओलिमा अंधे हो कर इस्लाम की तबलीग़ में लगे हुए है क्यूंकि मुसलामानों की दुर्दशा ही इनकी ख़ूराक है.



''रोज़-हश्र अल्लाह गुनेहगार मुर्दों को क़ब्र से अँधा करके उठाएगा और कहेगा कि तूने मेरे हुक्म को नहीं माना, मैं भी तेरे साथ कोई रिआयत नहीं करूंगा. अल्लाह कहता है क्या इस से भी लोगों को इबरत नहीं मिलती कि इससे पहले कई गिरोहों को हमने हलाक कर दिया, (मूसा द्वारा बर्बाद और वीरान की गई बस्तियों का हवाला देते हुए) कहता कि क्या इनको वह दिखता नहीं कि यहाँ लोग चलते फिरते थे. मुहम्मद समझाते हैं कि अगर अल्लाह ने अज़ाब के लिए एक दिन मुक़ररर न किया होता तो अज़ाब आज भी नाज़िल हो जाता. अल्लाह बार बार मुहम्मद को तसल्ली देता है कि आप सब्र कीजिए जल्दी न मचाइए और दुखी मत होइए. अपने रब की हम्द के साथ इसकी तस्बीह कीजिए. 
ख़बरदार! खुश हाल लोगों की तरफ़ नज़र उठा कर भी न देखिए कि वह उनके साथ मेरी आज़माइश है. आप के रब का इनआम तो आख़रत है. समझाइए अपने साथियों को कि नमाज़ पढ़े, और ख़ुद भी पाबन्दी रखिए. अल्लाह कहता है - -  ''

''हम आप से मुआश कमवाना नहीं चाहते मुआश तो आप को हम देंगे.और बेतर अंजाम तो परहेज़ गारी है.'' 
सूरह ताहा- २० आयत- (१३०) 



अवाम जब मुहम्मद से पैग़म्बरी की कोई निशानी चाहते हैं तो जवाब होता है, पहले के नबियों और उन पर उतरी किताबों की बातें क्या नहीं कान पडीं. कहते हैं हम सब आक़बत की दौड़ में हैं 

देखना है कि कौन राहे रास्त पर है किसको मंजिले मक़सूद मिलती है.
सूरह ताहा- २० आयत- (१३४-१३५)



इतना ज़ालिम अल्लाह ? 

अगर अपने बन्दों को अँधा कर के उठाएगा तो वह मैदाने-हश्र में पहुचेंगे कैसे? 
इस क़यामती ड्रमों ने तो मुसलमानों को इतना बुज़दिल बना दिया है कि वह दुन्या में सबसे पीछे खड़े होकर अपने अल्लाह से दुआओं में मसरूफ़ हैं, 
उनके अक़्ल में ये बात नहीं घुसती कि दुआ का फ़रेब इनको पामाल किए हुए है.
मुसलमानों! 
तुमहारी ख़ुशहाली न अल्लाह को गवारा है, न तुमहारे मफ़रूज़ा पैग़म्बर को, न इन हराम खो़र इस्लामी एजेंटों को .
देखो आँखें खोल कर तुम्हारे अल्लाह को अपनी मशक्क़त से रोज़ी रोटी गवारा नहीं? वह अपने रसूल से कहता है,
''हम आप से मुआश कमवाना नहीं चाहते मुआश तो आप को हम देंगे.और बेतर अंजाम तो परहेज़ गारी है.'' 
सूरह ताहा- २० आयत- (१३०)
तरक़्क़ी की जड़ है अनथक मेहनत मगर इस्लाम में इसकी तबलीग़ कहीं भी नहीं है, जंगों से मिला माले ग़नीमत जो मुयस्सर है.
मुहम्मद फ़रमाते हैं - - -
'' अमलों में तीन अमल अफ़ज़ल हैं - - - 
(हदीस-बुखारी २५)
* १-अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखना.
* २-अल्लाह की राह में जेहाद करना.
* ३- हज करना.
देखें कि बेअमली को वह अमल बतलाते है. 
१-ये आस्था है, अमल या कर्म नहीं.
2-जेहाद ही को मुहम्मद ज़रीआ मुआश कहते है. 
कई हदीसें इसकी गवाह हैं.
३-तीर्थ यात्रा भी कोई अमल नहीं अरबियों की परवरिश का ज़रीआ मुहम्मद ने क़ायम किया है, जो आज काबा है.
मुसलमानों !
मेरी तहरीर में आपको कहीं भी कोई खोट नज़र आती है? 
मेरे इन्केशाफ़ात (उदघोषण) में कहीं भी कोई ऐसा नुक़ता-ऐ-रूपोश आप पकड़ पा रहे हैं जो आप के ख़िलाफ़ हो? 
हम समझते हैं कि मेरी बातों से आप परेशान होते होंगे और दुखी भी. 
मेरी ईमान गोई आपको अपसेट कर रही है, 
ज़ाहिर है आपरेशन में कुछ तकलीफ़ तो होती है. 
मैं क़ुरआनी मरज़ से आपको नजात दिलाना चाहता हूँ, 
अपनी नस्लों को मोमिन की ज़िदगी दीजिए, 
ज़माना उनकी पैरवी में होगा, 
फ़ितरत के आगोश में बेबोझ वह आबाद होंगे.

मोमिन को समझने की कोशिश कीजिए.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 14 July 2018

Hindu Dharm Darshan207


शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (12)

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
यदि कोई कृष्णाभावनामृत अंगीकार कर लेता है तो भले ही वह शाश्त्रानुमोदित कर्मों को न करे अथवा ठीक से भक्ति न करे और चाहे वह पतित भी हो जाए तो इसमें उसकी हानि या बुराई नहीं होगी. किन्तु यदि वह शाश्त्रानुमोदित सारे कार्य करे तो उसके किस काम का है ?
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1.5.17
*
और क़ुरआन कहता है - - - 
"कुल्ले नफ़्सिन ज़ाइक़तुलमौत''-हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है, 
और तुम को तुम्हारी पूरी पूरी पादाश क़यामत के रोज़ ही मिलेगी, सो जो शख़्स दोज़ख़ से बचा लिया गया और जन्नत में दाख़िल किया गया, सो पूरा पूरा कामयाब वह हुवा। और दुनयावी ज़िन्दगी तो कुछ भी नहीं, सिर्फ़ धोके का सौदा है।" 
सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयात (185) 

क्या गीता और कुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?
क्या इन्हीं किताबों पर हाथ रख कर हम अदालत में सच बोलने की क़सम खाते हैं ? ?
धरती को शर और फ़साद के हवाले करने वाले यह ग्रन्थ 
क्या इस क़ाबिल हैं कि इनको हाज़िर व् नाज़िल किया जाए,
 गवाह बनाया जाए ???
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 9 July 2018

Soorah Taha -20 Q- 1

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह ताहा २० 
क़िस्त-1


बहुत से लक़बों (उपाधियों) के साथ साथ तथा-कथित पैग़म्बर मुहम्मद का एक लक़ब उम्मी भी है जिसके के लफ़्ज़ी मअनी होते हैं अनपढ़ और जाहिल. 
ये लफ्ज़ किसी फ़र्द को नफ़ी (न्यूनता की परिधि) में ले जाता है, 
मगर बात मुहम्मद की है तो मअनी कुछ और ही हो जाता है. 
इस तरह उनके तुफ़ैल में उम्मी शब्द पवित्र और मुक़द्दस हो जाता है. 
ये इस्लाम का ख़ास्सा है. इस्लामी इस्तेलाह (परिभाषा) में कई अलफ़ाज़ आलिमों के साज़िशों से अस्ल मअनी कुछ के कुछ हो गए हैं, जिसे आगे आप देखेंगे. 
मुहम्मद निरे उम्मी थे, 
मुतलक़ जाहिल. 
क़ुरआन उम्मी, अनपढ़ और अक़ली तौर पर उजड, 
मुहम्मद का ही कलाम (वचन) है जिसे उनके गढ़े हुए अल्लाह का कलाम कहा जाता है. 
इसको क़ुराने-हकीम कहा जाता है यानी हिकमत से भरी हुई बातें.
क़ुरआन के बड़े बड़े हयूले बनाए गए, 
बड़ी बड़ी मर्यादाएं रची गईं, 
ऊंची ऊंची मीनारें क़ायम की गईं, 
इसे विज्ञान का का जामा पहनाया गया, तो कहीं पर रहस्यों का दफ़ीना साबित किया गया है. 
इसे कहीं पर अज़मतों का निशान बतलाया गया है तो कहीं पर जन्नत की कुंजी, और हर सूरत में नजात (मुक्ति) का रास्ता. 
निज़ामे-हयात (जीवन विद्या) तो हर अदना पदना मुसलमान इसे कह कर फूले नहीं समाता, 
गोकि दिनो-रात मुस्लमान इन्हीं क़ुरानी आयतों की गुमराही में मुब्तितिला, पस्पाइयों में समाता चला जा रहा है. 
आम मुसलमान क़ुरआन को अज़ खुद कभी समझने की कोशिश नहीं करता, उसे हमेशा अपनी ओलिमा (धर्म गुरु) ही समझाते हैं.
इस्लाम क्या है? 
इसकी बरकत क्या है? 
छोटे से लेकर बड़े तक सारे मुसलमान ही दानिश्ता और ग़ैर दानिश्ता तौर पर इस के झूठे और खोखले फ़ायदे और बरकतों से जुड़े हुए हैं. 
सच पूछिए तो कुछ मुट्ठी भर अय्यार और बेज़मीर मुसलमानों का सब से बड़ा ज़रीया मुआश (भरण पोषण) इस्लाम है जो कि इसी तबके के मेहनत कश  अवाम पर मुनहसर करता है, 
यानी बाक़ी क़ौमों से बचने के बाद ख़ुद मुसलमान मुसलमानों का इस्तेह्सल (शोषण) करते हैं. 
दर अस्ल यही मज़हब फ़रोशों का तबक़ा, ग़रीब मुसलामानों का ख़ुद दोहन करता है और दूसरों से भी इस्तेह्साल कराता है. 
वह इनको इस्लामी जेहालत के दायरे से बाहर  निकलने ही नहीं देता.

"ताहा" 
सूरह ताहा- २० आयत- 1 

यह शब्द निरर्थक है. 
ऐसे शब्दों को क़ुरआनी सन्दर्भ में हुरूफ़े-मुक़त्तेआत कहते हैं जिसका मतलब बन्दे नहीं जानते, अल्लाह ही जाने. 
ऐसे शब्द सूरह के पहले कभी कभी आते हैं. 
यहाँ यह शब्द एक आयत भी बन गई है, 
अर्थात अल्लाह का एक पैग़ाम जिसे बन्दे न समजते हुए भी गाया करते हैं. 

"हमने क़ुररान को आप पर इस लिए नहीं उतारा कि आप तकलीफ़ उठाएं बल्कि ऐसे शख़्श के नसीहत के लए उतारा है कि जो अल्लाह से डरता हो" 
सूरह ताहा- २० आयत- २-३ 

ऐ अल्लाह ! 
तू अगर वाक़ई है तो सच बोल तुझे इंसान को डराना भला क्यूं अचछा लगता है ? 
क्या मज़ा आता है कि तेरे नाम से लोग थरथरएं ? 
गर बन्दे सालेह अमल और इंसानी क़द्रों का पालन करें जिससे कि इंसानियत का हक़ अदा होता हो तो तेरा क्या नुक़सान है? 
तू इनके लिए दोज़खें तैयार किए बैठा है, तू सबका अल्लाह है या कोई दूसरी शय ? 
तेरा रसूल लोगों पर ज़ुल्म ढाने पर आमादा रहता है. 
तुम दोनों मिलकर इंसानियत को बेचैन किए हुए हो. 

"क्या आपको मूसा की ख़बर है? उन्हों ने एक आग देखी, तो घर वालों से कहा तुम ठहरे रहो, मैं ने एक आग देखी है, शायद कोई शोला तुम्हारे लिए ला सकूं और रास्ते का पता मालूम हो सके और जब मूसा आग के पास पहुंचे तो अल्लाह ने आवाज़ दी कि ऐ मूसा! तू अपनी जूतियाँ उतार दे. हमने तुझे मुन्तख़िब किया है. जो कुछ वह्यि (ईश्वरीय-आज्ञा) की जा रही है, तू उसे सुन. मैं ही अल्लाह हूँ , मेरे सिवा कोई माबूद नहीं , मेरी ही इबादत किया करो और मेरे नाम की नमाज़ पढ़ा करो. दूसरी बात सुनो बिला शुब्ह क़यामत आएगी. मैं इसको पोशीदा रखना चाहता हूँ, ताकि हर शख़्श को उसके किए का बदला मिले." 
सूरह ताहा- २० आयत- ९-१५ 

जब मुहम्मद को उनके यहूदी मुख़बिर से कोई ख़बर मिलती तो वह अपने क़बीलाई माहौल में इसे अल्लाह की वह्यी (ईश्वरीय-आज्ञा) बना कर पेश करते. वह सूचना में कुछ फेर बदल कर लेते ताकि बात मुहम्मद की अपनी लगे, वह उसमें नमाज़ ज़कात की बातें बतौर आमेज़िश शामिल कर देते. एक बेवकूफी की बात भी ज़रूर शामिल करते .... 
देखिए अल्लाह कहता है. 
"दूसरी बात सुनो ! बिला शुब्ह क़यामत ज़रूर आएगी . मैं इसको पोशीदा रखना चाहता हूँ ताकि लोगों को इसका बदला मिल सके." 
*
"अल्लाह मूसा की लाठी में करामत पेश करता है और गदेली में सफ़ेद दाग जिसे यदे-बैज़ा कहा गया. अल्लाह मूसा को हुक्म देता है कि इन निशानियों को लेके फ़िररौन के पास जाओ क्यूंकि वह हद से निकल गाया है. 
मूसा कुछ और चाहते हुए अल्लाह से कहते हैं कि वह इनकी ज़बान से लुक्नत (तुतलाहट) हटा दे और मदद के लिए इनके भाई हारून को इनका सहायक बना दे" 
सूरह ताहा- २० आयत- १५-३६ 

अल्लाह मूसा की दरख्वास्त को मंज़ूर करता है और कहता है,

"हम तो तुम पर और एक बार एहसान कर चुके है कि तुम्हारी माँ को इल्हाम में बतलाया था कि तुम को जल्लादों के हाथों से बचाने के लिए सन्दूक में रखकर दरया में डाल दें. हमने तुम्हारे दिल में डाल दिया था कि तुम हम से राग़िब रहो और मेरी निगरानी में परवरिश पाओ. तुम्हारी बहन भागती हुई हमारे पास आई थी कि तुम्हें परवरिश के लिए कुछ करूँ, सो हमने कुछ ऐसी तरकीब किया कि तुम फिर अपनी माँ की परवरिश में चले गए ताकि इनकी आँखें ठंडी हों और तुमने एक शख़्श को जान से मार डाला, फिर हमने तुमको ग़मों से नजात दी. और हमने तुमको सख़्त मेहनतों में डाला और तुमको तुम्हारे भाई समेत मुअज्ज़ा दिया. जाओ हमारी याद  में सुस्ती मत करो."
सूरह ताहा- २० आयत- ३७-४२ 

मुहम्मद का ज़ेहनी मेयार इन बातों में निहाँ है कि 
देखिए  अल्लाह एहसान भी करता है और तरकीब भी भिड़ाता है. 
कितना बड़ा हादसा है जो मुसलामानों के दिल पर क़ाबू किए हुए है. 
वह इन्ही बातों की सुब्ह व् शाम इबादत करते हैं. 
इस क़ौम की रहनुमाई कोई नहीं कर सकता.
ऐ अल्लाह अगर तू कोई हस्ती है तो हिन्दुस्तान में माओत्ज़े तुंग को भेज. 

मूसा अपने भाई हारुन को लेकर फ़िरौन के दरबार में पहुँचता है और उससे अपने लोगों को आज़ाद करने की बात करता है. मूसा से फ़िरौन और उसके जादूगरों से लफ्ज़ी जंग होती है 
फिर अपने मकर का सामान जमा करना शुरू किया. मूसा ने उन लोगों से फ़रमाया
 "ऐ कमबख़्ती मारो अल्लाह तअला पर झूठा इफ़तार मत बांधो, कभी वह तुमको सजा से बिलकुल नेस्त नाबूद न करदे ". 
सूरह ताहा- २० आयत- ६१ 

फ़िरौन और मूसा में जादुई मुक़ाबले शुरू हो जाते हैं. अल्लाह कभी खुद फ़िरौन को जादूगर बतलाता है, कभी उसके जादूगरों को. यह तौरेत का मशहूर ए ज़माना वाक़िया है जिसे क़ुरआन में मुहम्मद निहायत फूहड़ ढंग से पेश कर रहे हैं . 
इस नाटक के आख़िर में मूसा की लाठी का बड़ा सांप, फ़िरौन के जादूगरों की रस्सियों के छोटे छोटे साँपों को निंगल जाता है. फ़िरौन के जादूगर मूसा के क़दमों में गिर कर लिपट जाते हैं और मूसा पर ईमान लाते हैं. मूसा के बतलाए हुए अल्लाह पर ईमान लाते हैं. फ़िरौन अपने जादूगरों से नाराज़ होकर हुक्म देता है कि इनके हाथ और पैर काट कर इनको पेड़ों पर लटका दिया जाए. 
सूरह ताहा- २० आयत- ६८-७१ 

यहूदियों की सुनी सुनाई कहानी में मिलावट करके मुहम्मदी अल्लाह दूसरे वाक़ेआत को आगे बयान करते रहने का वादा करके फिर इस्लामी डफ़ली क़यामत का राग अलापने लगता है..... 
जब सूर फूँका जाएगा और तमाम मुर्दे अपनी अपनी क़ब्रों से बरामद होंगे और आपस में बातें करेंगे . . . 

"जो शख्स अल्लाह और रसूल की पूरी इताअत करेगा, अल्लाह तअला उसे बहिश्तों में दाख़िल कर देगा जिसके नीचे नहरें जारी होंगी, हमेशा हमेशा इसमें रहेंगे , ये बड़ी कामयाबी होगी" 
सूरह ताहा- २० आयत-  ७२-७६ 

ये जुमला मुहम्मदी अल्लाह  का क़ुरआन में तकिया कलाम है, 
इसे वह बार बार इसे दोहराता है. 

मूसा का फ़िरौन से बनी इस्राईल को आज़ाद कराने, फिर इन्हें दर्याए नील पार कराने और फ़िरौन को ग़र्क़ ए आब करने, इसके बाद कोहेतूर पर ले जाने और मन व् सलवा बरसाने की बातें दोहराते हुए अल्लाह मूसा को आगाह करता है कि तेरी क़ौम हद से न गुज़रे .
मूसा कलीम उल्लाह तूर पर अल्लाह के दरबार में वास्ते कलाम पहुँचते हैं तो अल्लाह शिकायत ले बैठता है कि तू जिस अपनी क़ौम को पीछे छोड़ आया है व एक सामरी के जाल में फँस चुकी है. मूसा रंजीदा हो कर पहाड़ से नीचे उतरता है, क़ौम पर अपनी खफ़गी का इज़हार करता है . मूसा सामरी से पूछता है 
बता तेरा मुआमला क्या है? 
वह कहता है कि मैं मुट्ठी भर ख़ाक उठाता हूँ और डाल देता हूँ , 
इसनें इसका कोई कमाल छिपा होगा जिससे अवाम मुरीद हो गई होगी?
मूसा इसको आगाह करता है कि एक माबूद के सिवा दूसरा कोई क़ाबिले इबादत नहीं. और फिर इसके बाद शुरू हो जाती है तब्लिगे-इस्लाम .
अल्लाह वादा करता है आगे भी ऐसी कहानियाँ सुनाता रहूँगा"
सूरह ताहा- २० आयत-  ७६-१०० 
मुसलमानों! 
तुम जिस क़ुरआन को वास्ते सवाब पढ़ते हो उसमे तुम्हारा अल्लाह ढंग की कहानी भी नहीं बयान कर पाता. बेश क़ीमत फ़रमान और एलन तो दूर की बात है. 
मुहम्मद की आजिज़ करने वाली बकवास को कलाम इलाही समझते हो.

***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 7 July 2018

Hindu Dharm Darshan205


शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (9)
भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
किन्तु यदि तुम युद्ध करने से स्वधर्म को संपन्न नहीं करते तो तुम्हें निश्चित रूप से अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने का पाप लगेगा और तुम योद्धा के रूप में भी अपना यश खो दोगे.
लोग सदैव तुम्हारे अपयश का वर्णन करेंगे और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश तो मृत्यु से भी बढ़ कर है.
तुम्हारे शत्रु अनेक प्रकार के कटु शब्दों से तुम्हारा वर्णन करेगे. तुम्हारे लिए इससे दुखदायी क्या हो सकता है.
श्रीमद्  भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 33 -34 -36
*
और क़ुरआन कहता है - - -
''तुम में हिम्मत की कमी है इस लिए अल्लाह ने तख़्फ़ीफ़ (कमी) कर दी है,
सो अगर तुम में के सौ आदमी साबित क़दम रहने वाले होंगे तो वह दो सौ पर ग़ालिब होंगे.
नबी के लायक़ नहीं की यह इनके कैदी रहें,
जब कि वह ज़मीन पर अच्छी तरह खून रेज़ी न कर लें.
सो तुम दुन्या का माल ओ असबाब चाहते हो और अल्लाह आख़िरत को चाहता है
और अल्लाह तअला बड़े ज़बरदस्त हैं और बड़े हिकमत वाले हैं.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (६७)

*क्या गीता और कुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?
क्या इन्हीं किताबों पर हाथ रख कर हम अदालत में सच बोलने की क़सम खाते हैं ? ?
धरती पर शर और फ़साद के हवाले करने वाले यह ग्रन्थ
क्या इस काबिल हैं कि इनको हाज़िर व् नाज़िल किया जाए, गवाह बनाया जाए ???
***


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 6 July 2018

सूरह मरियम 19 (क़िस्त 3)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह मरियम 19
(क़िस्त  3)
ऐ ख़ुदा!
ऐ ख़ुदा! तू खुद से पैदा हुवा,
ऐसा बुज़ुर्गों का कहना है.
तू है भी या नहीं? 
ये मेरा ज़ेहनी तजस्सुस और मेरी कशमकश है.
दिल कहता है तू है ज़रूर कुछ न कुछ. 
ब्रहमांड को भेदने वाला,
हमारी ज़मीन की ही तरह लाखों असंख्य ज़मीनों को पैदा करके उनका संचालन करने वाला,
क्या तू इस ज़मीन पर बसने वाले मानव जाति की ख़बर भी रखता है?
तेरे पास दिल, दिमाग, हाथ पाँव, कान नाक, पर, सींग और एहसासात हैं क्या?
या इन तमाम बातों से तू लातअल्लुक़ है?
तेरे नाम के मंदिर, मस्जिद,गिरजे और तीरथ बना लिए गए हैं,
धर्मं का माया जाल फैला हुवा है, सब दावा करते हैं कि वह तुझसे मुस्तनद हैं,
इंसानी फ़ितरत ने अपने स्वार्थ के लिए मानव को जातियों में बाँट रख्खा है,
तेरी धरती से निकलने वाले धन दौलत को अपनी आर्थिक तिकड़में भिड़ा कर, ज़हीन लोग अपने क़ब्जे में किए हुवे हैं.
दूसरी तरफ़ मानव दाने दाने का मोहताज हो रहा है. 
कहते हैं सब भाग्य का लिखा हुआ है जिसको भगवान ने लिखा है.
क्या तू ऐसा ही कोई ख़ुदा है?
सबसे ज़्यादः भारत भूमि इन हाथ कंडों का शिकार है,
इन पाखंडियों द्वरा गढ़े गए तेरे अस्तित्व को मैं नकारता हूँ.
तेरी तरह ही हम और इस धरती के सभी जीव भी, 
अगर ख़ुद से पैदा हुए हें, तो सब ख़ुदा हुए?
त्तभी तो तेरे कुछ जिज्ञासू कहते हैं,
''कण कण में भगवन ''
मैंने जो महसूस किया है, वह ये कि तू बड़ा कारीगर है.
तूने कायनात को एक सिस्टम दे दिया है,
एक फ़ार्मूला सच्चाई का २+२=४ की सदाक़त और सत्य,
कर्म और कर्म फल,
इसी धुरी पर संसार को नचा दिया है कि धरती अपने मदार पर घूम रही है.
तू ऐसा बाप है जो अपने बेटे को कुश्ती के दाँव पेंच सिखलाता है,
ख़ुद उससे लड़ कर,
चाहता है कि मेरा बेटा मुझे परास्त कर दे.
तू अपने बेटे को गाली भी दे देता है,
ये कहते हुए कि ''अगर मेरी औलाद है तो मुझे चित करके दिखला'',
बेटा जब ग़ैरत में आकर बाप को चित कर देता है,
तब तू मुस्कुराता है और शाबाश कहता है.
प्रकृति पर विजय पाना ही मानव का लक्ष है,
उसको पूजना नहीं.
मेरा ख़ुदा कहता है, 
"मुझे हल हथौड़ा लेकर तलाश करो,
माला और तस्बीह लेकर नहीं.
तुम खोजी हो तो एक दिन वह सब पा जाओगे, 
जिसकी तुम कल्पना करते हो,
तुम एक एक इंच ज़मीन के लिए लड़ते हो,
मैं तुम को एक एक नक्षत्र रहने के लिए दूँगा.
तुम लम्बी उम्र की तमन्ना करते हो,
मैं तुमको मरने ही नहीं दूँगा जब तक तुम न चाहो,
तुम तंदुरस्ती की आरज़ू करते हो,
मैं तुमको सदा जवान रहने का वरदान दूंगा,
शर्त है कि,
मेरे छुपे हुए राज़ो-नियाज़ को तलाशने की जद्दो-जेहाद करो,
मुझे मत तलाशो,
मेरी लगी हुई इन रूहानी दूकानों पर, 
तुम को अफ़ीमी नशा के सिवा कुछ न मिलेगा.
तुम किधर जा रहे हो  ? 
सोचो,
पश्चिम जागृत हो चुका है. वह अंतरिक्ष में आशियाना बना रहा है,
तुम आध्यात्म के बरगद के साए में बैठे पूजा पाठ और नमाज़ों में मग्न हो,
जागृत लोग नक्षर में चले जाएँगे, तुम तकते रह जाओगे,
तुमको बनी नूए ले जाएंगे साथ साथ,
मगर अपना ग़ुलाम बना कर,
जागो लोगो, मोमिन सभी को जगा रहा है.



चलिए अल्लाह की लफ़्फ़ाज़ी देखें - - - 




"इस किताब में मूसा का भी ज़िक्र करिए. वह बिला शुबहा अल्लाह के ख़ास किए हुए थे. और वह रसूल भी थे और नबी भी थे और हमने उनको तूर की दाहिनी जानिब से आवाज़ दी और हमने उनको राज़ की बातें करने के लिए मुक़र्रिब बनाया और उनको हमने अपनी रहमत से उनके भाई हारुन को नबी बना कर अता किया''

सूरह मरियम 19 आयत (50-53)



''और इस किताब में इस्माईल का ज़िक्र कीजिए, बिला शुबहा वह बड़े सच्चे थे, वह रसूल भी थे और नबी भी और अपने मुतअलिक़ीन को नमाज़ और ज़कात का हुक्म किया करते थे और वह अपने परवर दिगार के नज़दीक पसंद दीदा थे.''

सूरह मरियम 19 आयत (54-55)



''और इस किताब में इदरीस का भी ज़िक्र कर दीजिए. बेशक वह बड़े रास्ती वाले थे और हमने उनको बुलंद मर्तबा तक पहुँचाया. ये वह लोग हैं जिन को अल्लाह ने ख़ास इनआम अता फ़रमाया. . . .जब उनके सामने रहमान की आयतें पढ़ी जातीं तो सजदा करते हुए और रोते हुए गिर जाते थे - - -''

सूरह मरियम 19 आयत (57-60)



मुसलमानों ! 
इन आयतों को बार बार पढ़िए. 

ये हिंदी में हैं 
अक़ीदत की ऐनक उतार कर, 
कोई गुनाह नहीं पड़ेगा. 
मुझ से नहीं, अपने आप से लड़िये अपने तह्तुत ज़मीर को जगाइए, 
अपने बच्चों के मुस्तक़बिल को पेशे नज़र रख कर, 
फिर तय कीजिए कि क्या यह हक़ बजानिब बातें हैं? 
अगर आप जाग गए हों तो दूसरों को जगाइए, 
ख़ुद पार हुए तो ये काफ़ी नहीं, औरों को पार  लगाइए  . 
यही बड़ा कारे ख़ैर है. 
इसलाम यहूदियत का उतरन है जिनसे आप नफ़रत करते हैं, 
मगर उसी से लैस हैं. वाक़ई यहूदी नस्ली तौर पर ख़ुद को बरतर मानते हैं. दीगरों के लिए कोई बुरा फ़ेल उनके लिए गुनाह नहीं होता. 
मूसा इंसानी तारीख़ में अपने ज़माने का हिटलर हुआ करता था. 
शायद हिटलर ने मूसा को अच्छी तरह समझा 
और यहूदियों को नेस्त नाबूद करना  चाहा. 
मुसलमानों से इन्तेक़ाम के लिए कई हिटलर पैदा हो चुके हैं 
मगर नई क़द्रें उनके पैरों में human right की ज़ंजीर डाले हुए हैं, 
अगर कहीं इस क़ौम में ज़्यादः तालिबानियत का उबाल आया तो यह जंजीरें पिघल जाएँगी. 
कहर ए हिटलर इस बार क़ुरआनी आयतों पर और इनके मानने वालों पर टूटेगा. 
यह हराम ज़ादे ओलिमा ऐंड कंपनी आपको आज भी गुमराह किए हुए हैं कि इस्लाम अमरीका और योरोप में सुर्ख़रू हो रहा है. 
एक ही रास्ता है कि इस्लाम से तौबा करके एलान के साथ एक सच्चे मोमिन बन जाओ. मोमिन बनना ज़रा मुश्किक अमल है मगर जिस दिन आप मोमिन बन जाओगे ज़िंदगी बहुत बे बोझ हो जाएगी.



''इस जन्नत में वह लोग कोई फ़ुज़ूल बात न सुन पाएँगे, बजुज़ सलाम के. और उनको उनका खाना सुब्ह शाम मिला करेगा, ये जन्नत ऐसी है कि हम अपने बन्दों में से इस का मालिक ऐसे लोगों को बना देंगे जो ख़ुदा से डरने वाले हों. और हम बग़ैर आप के रब के हुक्म वक़्तन फवक़्तन नहीं आ सकते. उसी की हैं हमारे आगे की सब चीजें और हमारे पीछे की सब चीजें और जो चीजें उनके दरमियान में हैं. और आप का रब भूलने वाला नहीं. वह रब है आसमानों और ज़मीन का और जो कुछ इन के दरमियान में हैं सो ऐ ! तू इसकी इबादत किया कर और उसकी इबादत पर क़ायम रह. भला तू किसी को इसका हम सिफ़त मानता है?

सूरह मरियम 19 आयत (61-65)



ऐसी जन्नत पर फिटकर है जहाँ बात चीत न हो, कोई मशगला न हो, 
फ़न ए लतीफ़ा न हो, शेरो शाइरी न हो, 

बस सलाम ओ वालेकुम सलाम, सलाम ओ वालेकुम सलाम? 
क़ैदियों की तरह सुब्ह शाम खाने की मोहताजी, 
वहां भी हमीं में से दरोगा बनाया जायगा, 
गोया वहां भी मातहती ? 
कौन किसके हुक्म से वक़्तन फवक़्तन नहीं आ सकेगा? 
अल्लाह ने मुल्लाओं को समझ दी है कि इन बातों का मतलब समझाएं. 
भला कौन सी चीजें होती है ?

''आगे की सब चीजें और हमारे पीछे की सब चीजें और जो चीजें उनके दरमियान में हैं.'' जिसको अल्लाह भूलने वाला नहीं?
है न दीवानगी के आलम में हादी बाबा की बड़ बड़ जिनका ज़िक्र मैं कर चुका हूँ. मोहम्मद को क़ुरआन का पेट भरना था, सो भर दिया और एलान कर दिया कि यह अल्लाह का कलाम है. 
मुसलमानों ! 
क्या यह आपकी बदनसीबी नहीं कि इस पागल की बातों को अपना सलीक़ा मानते हो, अपनी तमाज़त तस्लीम करते हो?
 
''क्या आप को मालूम नहीं कि हमने शयातीन को कुफ़्फ़ार पर छोड़ रक्खा है कि वह उनको खूब उभारते रहते हैं, सो आप उनके लिए जल्दी न करें, हम उनकी बातें ख़ुद  शुमार करते हैं, जिस रोज़ हम मुत्तक़्यों को रहमान की तरफ़ मेहमान बना कर जमा करेंगे और मुजरिमों को दोज़ख़ की तरफ़ हाकेंगे, कोई सिफ़ारिश का अख़्तियार न रखेगा. मगर हाँ जिसने रहमान से इजाज़त ली. और ये लोग कहते हैं अल्लाह तअला ने औलाद अख़्तियार कर रखी है. ये ऐसी सख़्त हरकत है कि जिसके सबब कुछ बईद नहीं कि आसमान फट पड़ें और ज़मीन के टुकड़े हो जाएँ और पहाड़ गिर पड़ें. इस बात से कि ये लोग रहमान की तरफ़ औलाद निस्बत करते हैं, हालांकि रहमान की शान नहीं कि वह औलाद अख़्तियार करें. जितने भी कुछ हैं आसमानों और ज़मीन में हैं, वह सब रहमान की तरफ़ गुलाम बन कर हाज़िर होते हैं. रहमान - - - रहमान - - -रहमान - - -
सूरह मरियम 19 आयत (83-98)



और लीजिए अल्लाह कहता है अपने रसूल से कि उसने अपने बन्दों पर शैतान छोड़ दिए है. 

हे अल्लाह के बन्दों! 
क्या अल्लाह ऐसा भी होता है? 
यह तो ख़ुद शैतानो का बाप लग रहा है. 
और आप के रसूल लिल्लाह जल्दी मचा रहे हैं कि उनको पैग़म्बर न मानने वाले कुफ़्फ़ार को सज़ा जल्दी क्यूं नहीं उतरती? 
इसी तरह की बातें हैं इस पोथी में. 
मुझे तअज्जुब हो रहा है कि इतनी बड़ी आबादी और इतनी खोखली इस पोथी को निज़ामे-हयात मान कर इसको अपना रहबर बनाए हुए है? 
मुसलमानों ! 
क्यूं अपनी जग हंसाई करवा रहे हो?
ईसा ख़ुदा का बेटा है, इस अक़ीदत को लेकर मुहम्मद बार बार ईसाइयों को चिढ़ा रहे हैं, और ईसाई हर बार मुसलमानों की धुलाई करते हैं, 
स्पेन से लेकर ईराक़ तक हमेशा इसके लाखों शैदाई मौत का मज़ा चखते आ रहे हैं मगर अक़्ल नहीं आती, 
बदज़ाद ओलिमा आप के अन्दर शैतान पेवश्त किए हुए हैं.



मुहम्मद ने ज़ैद बिन हरसा को भरी महफ़िल में अल्लाह को गवाह बनाते हुए गोद लेकर अपनी औलाद बनाया था, उसकी बीवी के साथ ज़िना करते हुए जब ज़ैद ने हज़रात को पकड़ा तो उसने मुहम्मद को ऊपर से नीचे तक देखा, गोया पूछ रहा हो

 अब्बा हुज़ूर! ये आप अपनी बहू के साथ पैग़म्बरी कर रहे हैं?
 मुहम्मद ने हज़ार समझाया कि वह मान जाए, हम दोनों का काम चलता रहेगा, आख़िर तेरी पहली बीवी ऐमन भी तो मेरी लौंडी हुवा करती थी, 
पर वह नहीं माना, तभी से ग़ैर के बच्चे को औलाद बनाना हराम कर दिया. उसी का रद्दे अमल है कि इस बंदे नामुराद ने अल्लाह तक पर ईसा को औलाद बनाना हराम कर दिया.



इस पूरी सूरह में अल्लाह का नाम बदल कर मुहम्मद ने रहमान कर दिया है, ये भी पागलों की अलामत है और जाहिलों की खू. 




जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 5 July 2018

Hindu Dharm Darshan204


शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (8)

भगवान कृष्ण कहते  हैं ---
 क्षत्रिय होने के नाते अपने अशिष्ट धर्म का विचार करते हुए 
तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म के लिए युद्ध करने से बढ़ कर तुम्हारे लिए अन्य को कार्य नहीं है 
अतः तुम्हें संकोच करने की कोई आवश्यता नहीं.
 हे पार्थ! 
वे क्षत्रिय सुखी हैं जिन्हें ऐसे युद्ध के अवसर अपने आप प्राप्त होते हैं 
जिस से उनके लिए स्वर्गों के द्वार खुल जाते हैं.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय २ श्लोक  31- 32 

*मनुवाद ने मानव जाति को चार वर्गों में बांटे हुए है. हर वर्ग के लिए उसक कार्य क्षेत्र निर्धारित किए हुए है, चाहे भंगियों को जनता के मल-मूत्र उठाना हो या वैश्य के लिए तेलहन पेर कर तेल निकलना हो अथवा क्षत्रिय को युद्ध करना. 
भगवान् अर्जुन को धर्म के कर्म बतला रहे हैं. 
यह कर्म तो उस पर ईश्वरीय निर्धारण है, कैसे पीछे रह सकता है ? 
कृष्ण आदेश क्या आज का समाज स्वीकार करेगा ?
*
क़ुरआन कहता है ---
''ऐ ईमान वालो! जब तुम काफ़िरों के मुक़ाबिले में रू बरू हो जाओ तो इन को पीठ मत दिखलाना और जो शख़्स इस वक़्त पीठ दिखलाएगा, अल्लाह के गज़ब में आ जाएगा और इसका ठिकाना दोज़ख होगा और वह बुरी जगह है. सो तुम ने इन को क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ने इनको क़त्ल किया और ताकि मुसलामानों को अपनी तरफ़ से उनकी मेहनत का खूब एवज़ दे. अल्लाह तअला खूब सुनने वाले हैं.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (१५-१६-१७)

क्या गीता और क़ुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?
क्या इन्हीं किताबों पर हाथ रख कर हम अदालत में सच बोलने की क़सम खाते हैं ? ?
धरती पर शर और फ़साद के हवाले करने वाले यह ग्रन्थ, 
क्या इस काबिल हैं कि इनको हाज़िर व् नाज़िल किया जाए, 
गवाह बनाया जाए ???
***



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 4 July 2018

सूरह मरियम 19 (क़िस्त 2)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
************
सूरह मरियम 19
(क़िस्त 2)


मोमिन अपने लिए तो नहीं लिखता मगर शायद आप को ये अच्छा नहीं लगता कि मैं हिदू वादी हूँ, न इस्लाम वादी, मैं इस्लाम विरोधी हूँ तो मुझे हिदू समर्थक होना चाहिए - - -

हिन्दू के लिए मैं इक मुलिम ही हूँ, आख़िर,
मुलिम ये समझते हैं गुमराह है काफ़िर.
इंसान भी होते हैं कुछ लोग जहाँ में,
गफ़लत में हैं ये दोनों समझेगा मुनकिर.



विडम्बना ये है कि हमारे समाज में ज्यादाः तर लोग आपस में सीगें लड़ाते हुए यही दोनों हैं, फिर भी ये मत देखिए कि कौन कह रहा है, 
यह देखिए कि क्या कह रहा है,

क़ुरआन की चुनौतियाँ


आम मुसलामानों को कहने में बड़ा गर्व होता है कि क़ुरआन की एक आयत (वाक्य) भी कोई इंसान नहीं बना सकता क्यूंकि ये अल्लाह का कलाम है. 

दूसरी फ़ख़्र की बात ये होती है कि इसे मिटाया नहीं जा सकता क्यूंकि यह सीनों में सुरक्षित है, (अर्थात कंठस्त है.) यह भी धारणा आलिमों द्वारा फैलाई गई है कि इसकी बातों और फ़रमानों को आम आदमी ठीक ठीक समझ नहीं सकता, बग़ैर आलिमों के. 
सैकड़ों और भी बे सिरो-पैर की ख़ूबियाँ इसको प्रचारित करती हैं.
सच तो है कि किसी दीवाने की बात को कोई सामान्य आदमी दोहरा नहीं सकता और आपकी अख़लाकी जिसारत भी नहीं कि किसी पागल को दिखला कर मुसलामानों से कह सको कि यह रहा, 
बडबडा रहा है क़ुरआनी आयतें. 
एक सामान्य आदमी भी नक़्ल में मुहम्मद की आधी अधूरी और अर्थ हीन बातें स्वांग करके दोहराने पर आए तो दोहरा सकता है, 
क़ुरआन की बकवासें, 
मगर वह मान कब सकेंगे. मुहम्मद की तरह उनकी नक़्ल उस वक़्त लोग दोहराते थे मगर झूटों के बादशाह कभी मानने को तैयार न होते. 
हिटलर के शागिर्द मसुलेनी ने शायद मुहम्मद की पैरवी की हो कि झूट को बार बार दोहराव, सच सा लगने लगेगा. 
मुहम्मद ने कमाल कर दिया, झूट को सच ही नहीं बल्कि अल्लाह की आवाज़ बना दिया, 
तलवार की ज़ोंर और माले-ग़नीमत की लालच से. 
मुहम्मद एक शायर नुमा उम्मी थे, और शायर को हमेशा यह भरम होता है कि उससे बड़ा कोई शायर नहीं, उसका कहा हुवा बेजोड़ है.
क़ुरआन के तर्जुमानों को इसके तर्जुमे में दातों पसीने आ गए, 
मौलाना अबू कलाम आज़ाद सत्तरह सिपारों का तर्जुमा करके, 
मैदान छोड़ कर भागे. 
मौलाना अशरफ़ अली थानवी ने ईमानदारी से इसको शब्दार्थ में परिवर्तित किया और भावार्थ को ब्रेकेट में अपनी राय देते हुए लिखा, 
जो नामाक़ूल आलिमों को चुभा. इनके बाद तो तर्जुमानों ने बद दयानती शुरू कर दी और आँखों में धूल झोंकना उनका ईमान और पेशा बन गया.
दर अस्ल इस्लाम की बुनियादें झूट पर ही रख्खी हुई, 
अल्लाह बार बार यक़ीन दिलाता है कि उसकी बातें इकदम सही सही हैं, 
इसके लिए वह कसमें भी खाता है. 
इसी झूट के सांचे को लेकर ओलिमा चले हैं. 
इनका काम है मुहम्मद की बकवासों में मानी ओ मतलब पैदा करना. 
इसके लिए तफ़सीरें (व्याख्या) लिखी गईं जिसके जरीए शरअ और आध्यात्म से जोड़ कर अल्लाह के कलाम में मतलब डाला गया. 
सबसे बड़ा आलिम वही है जो इन अर्थ हीन बक बक में किसी तरह अर्थ पैदा कर दे. मुहम्मद ने वजदानी कैफ़ियत (उन्माद-स्तिथि) में जो मुंह से निकाला वह क़ुरआन हो गया, 
अब इसे ईश वाणी बनाना इन रफ़ुगरों का काम है.
जय्यद आलिम वही होता है जो क़ुरान को बेजा दलीलों के साथ इसे ईश वाणी बनाए.
मुसलमान कहते हैं क़ुरआन मिट नहीं सकता कि ये सीनों में क़ायम और दफ़्न है. 
यह बात भी इनकी क़ौमी बेवक़ूफ़ी बन कर रह गई है, बात सीने में नहीं याद दाश्त यानी ज़हनों में अंकित रहती है जिसका सम्बन्ध सर से है. 
सर खराब हुआ तो वह भी गई समझो. 
जिब्रील से भी ये इस्लामी अल्लाह ने मुहम्मद का सीना धुलवाया था, 
चाहिए तो यह था कि धुलवाता इनका भेजा. 
रही बात हाफ़िज़े (कंठस्त) की, मुसलमान क़ुरआन को हिफ्ज़ कर लेते हैं जो बड़ी आसानी से हो जाता है, यह फूहड़ शायरी की तरह मुक़फ़्फ़ा (तुकान्तित) पद्य जैसा गद्य है, आल्हा की तरह, गोया आठ साल के बच्चे भी इसके हाफिज़ हो जाते हैं, अगर ये शुद्ध गद्य में होता तो इसका हफिज़ा मुमकिन न होता.



चलिए अल्लाह की बातों की तरफ़ - - -


''फिर वह (मरियम) उसको (ईसा को) गोद में लिए हुए क़ौम के सामने आई. लोगों ने कहा ऐ मरियम तुमने बड़े गज़ब का काम किया है . ऐ हारुन की बहेन! तुम्हारे बाप कोई बुरे नहीं थे, और न तुम्हारी माँ बद किरदार. बस कि मरियम ने बच्चे की तरफ़ इशारा किया, लोगों ने कहा भला हम शख़्स से कैसे बातें कर सकते हैं ? जो गोद में अभी बच्चा है. बच्चा ख़ुद ही बोल उट्ठा कि मैं अल्लाह का बन्दा हूँ. उसने मुझ को किताब दी और नबी बनाया और मुझको बरकत वाला बनाया. मैं जहां कहीं भी हूँ. और उसने मुझको नमाज़ और ज़कात का हुक्म दिया जब तक मैं ज़िन्दा हूँ. और मुझको मेरी वाल्दा का ख़िदमत गार बनाया, और उसने मुझको सरकश और बद बख़्त नहीं बनाया. और मुझ पर सलाम है. जिस रोज़ मैं पैदा हुवा, और जिस रोज़ रेहलत करूंगा और जिस रोज़ ज़िन्दा करके उठाया जाऊँगा. ये हैं ईसा इब्ने मरियम. सच्ची बात है जिसमे ये लोग झगड़ते हैं. अल्लाह तअला की यह शान नहीं कि वह औलाद अख़्तियार करे वह पाक है.''
सूरह मरियम 19 आयत (27-34)



पिछली क़िस्त में आपने पढ़ा कि क़ुरआन में किस शर्मनाक तरीक़े से मुहम्मद ने मरियम को जिब्रील द्वारा गर्भवती कराया और ईसा रूहुल-जिब्रील पैदा हुए. 
अब देखिए कि दीवाना पैगम्बर, ईसा का तमाशा मुसलमानों को क्या दिखलाता है? विडम्बना ये है कि मुसलमान इस पर यक़ीन भी करता है, क़ुरआन का फ़रमाया हुवा जो हुवा. मरियम हरामी बच्चे को पेश करते हुए समाज को जताती है कि मेरा बच्चा कोई ऐसा वैसा नहीं, यह तो ख़ुद चमत्कार है कि ईसा पैदा होते ही अपनी सफ़ाई देने को तय्यार है. लो, इसी से बात करलो कि ये कौन है. 
लोगों के सवाल करने से पहले ही एक बालिश्त की ज़बान निकल कर टाँय टाँय बोलने लगे ईसा अलैहिस्सलाम. 
ज़ाहिर है उनके संवाद और चिंतन उम्मी मुहम्मद के ही हैं. 
बच्चा कहता है, ''मैं अल्लाह का बन्दा हूँ '' 
जैसे कि वह देखने में भालू जैसा लग रहा हो. 
मुहम्मद को उनके अल्लाह ने चालीस साल की उम्र में क़ुरआन दिया था, 
ईसा को पैदा होते ही किताब मिली? 
जैसे कि ईसा का पुनर जन्म हुवा हो, 
और वह अपने पिछले जन्म की बात कर रहे हों. 
मुहम्मद की कुबुद्धि बोल चाल में इस स्तर की है कि इल्म की दुन्या में जैसे वह थे. व्याकरण, काल, भाषा, प्रस्तुति, इनकी ग़ौर तलब है. 
लेखन की दुन्या में अगर इन आयतों को दे दिया जाए तो मुहम्मद की बुरी दुर्गत हो जाए. इन्ही परिस्थियों में जो आलिम इसके अन्दर मानी, मतलब और हक़ गोई पैदा कर दे, वह इनआम याफ़्ता आलिम हो सकता है. 
मुसलमानों के सामने ये खुली चुनौती है कि वह ऐसी क़ुरआन पर लअनत भेज कर इससे मुक्ति लें. 

अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बने ईसा मुहम्मद की नमाज़,ज़कात और इस्लाम का प्रचार भी करते हैं.

''तमाम ज़मीन और इस पर रहने वालों के हम ही मालिक रह जाएँगे 

और ये सब हमारे पास ही लौटे जाएँगे ''
सूरह मरियम 19 आयत (40)



मुसलामानों तुम्हारा अल्लाह कितना बड़ बोला है, 
यह बशर का सच्चा अल्लाह तो नहीं हो सकता. 
वह जो भी हो, जैसा भी हो, अपने आप में रहे, मख़लूक़ को क्यूँ डराता धमकाता है ? हम उससे डरने वाले नहीं, क्या हक़ है उसे मख़लूक़ को सज़ा देने की ? 
क्या मख़लूक़ ने उससे गुज़ारिश की थी कि हम पैदा होना चाहते हैं, 
इस तेरी अज़ाबुन-नार ? अपनी तमाश गाह बनाया है दुन्या को? 
ऐसा ही ज़ालिम ओ जाबिर अगर है अगर तू , तो तुझ पर लअनत है.

ईसा
 ईसा कट्टर पंथी यहूदी धर्म का एक बाग़ी यहूदी था.
एक मामूली बढ़ई यूसुफ़ क़ी मंगेतर मरियम थी,
जिनका शादी से पहले ही अपने मंगेतर के साथ यौन संबंध हो गया था,  नतीजतन वह गर्भ वती हो गई,
बच्चा हुआ जो यहूदी धर्म में अमान्य था,
जैसे आज मुसलमानों में ऐसे बच्चे नाजायज़ क़रार पाते हैं.
ईसा को बचपन से ही नाजायज़ होने का तअना सुनना पड़ा.
जिसकी वजह से वह अपने माँ बाप से चिढ़ने लगा था.
वह चौदह साल का था, माँ बाप उसे अपने साथ योरोसलम तीर्थ पर ले गए,
जहाँ वह गुम हो गया, बहुत ढूँढने के बाद वह योरोसलम के एक मंदिर में मरियम को वह मिला.
मरियम ने झुंझला कर ईसा को घसीटते हुए कहा,
''तुम यहाँ हो और तुम्हारा बाप तुम्हारे लिए परेशान है.''
ईसा का जवाब था मेरा कोई बाप है और न माँ.
मैं ख़ुदा का बेटा हूँ और यहीं रहूँगा.
ईसा अड़ गया, यूसुफ़ और मरियम को ख़ाली हाथ वापस लौटना पड़ा.
ईसा के इसी एलान ने उसे ख़ुदा का बेटा बना दिया.
वह कबीर क़ी तरह यहूदी धर्म क़ी उलटवासी कहने लगा,
थे न दोनों समाज के नाजायज़ संतानें.
वह धर्म द्रोही हुवा और सबील पर यहूदी शाशकों ने उसे लटका दिया.
इस तरह वह  ''येसु ख़ुदा बाप का बेटा'' बन गया.
और उसके नाम से ही एक धर्म बन गया.
ईसाई उसे कुंवारी मारिया का बेटा कहते हैं,
जिसमें झूट और अंध विश्वास न हो तो वह धर्म कैसा?
***


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान