Tuesday, 5 December 2017

Hindu Dharm Darshan 117



वेद दर्शन - - -                           
खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 
यज्ञ के नेता ऋत्विज, दूर से दिखाई देने वाले, गृहपति एवं गति शाली अग्नि को हाथों की गति एवं उँगलियों की सहायता से अरणि से उत्पन्न करते हैं,
सातवाँ मंडल सूक्त 1
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )
नेता ऋत्विज कौन हैं और गृहपति कौन हैं ? 
कहीं यह अग्नि देव को मिली उपाधियाँ तो नहीं ?? 
जो भी हों इस युग में इनकी कोई उपयोगता नहीं. 
 हाथों की गति एवं उँगलियों की सहायता से अरणि (मथना) क्या उत्पन्न करते है?
अधूरी बात कहके पंडित जी महिमा मंडित होते है. 
इसी लिए वेदों का मंत्रोच्चार होता है , समझने की ज़हमत न करें.
ठीक ऐसा ही क़ुरान है जो तिलावत (पाठ) के लिए होता है ,
इसे समझने की इजाज़त मुल्ला कभी नहीं देता .



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान


SOORAH AAL E IMRAAN 3 DUSRI AIST

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
*********
सूरह आले इमरान ३ 
दूसरी  किस्त

मुसलमानों के साथ कैसा अजीब मज़ाक है कि उनका अल्लाह अपनी तमाम कार गुज़रियाँ खुद गिनवा रहा है वह भी उनका झूठा गवाह बन कर, उन का मुंसिफ बन कर. अफ़सोस का मुक़ाम ये है कि मुस्लमान ऐसे अल्लाह पर यक़ीन करता है। जब तक उसका यक़ीन पुख्ता है तब तक उसका ज़वाल भी यकीनी है. खुदा न करे वह दिन भी आ सकता है कि कहा जाय एक क़ौम ए जेहालत उम्मत ए मुहम्मदी हुवा करती थी. 

तौरेत, इंजील, ज़ुबूर जैसी सैकडों तारीखी किताबें अपने वाजूदों को तस्लीम और तसदीक़ कराए हुए है, इन के सामने कुरआन हक़ीक़त में अल्लम गल्लम से ज्यादा कुछ भी नहीं. 

कुरआन का उम्मी मुसन्निफ़ सनद दे तौरेत, इंजील को तो तौरेत, इंजील की तौहीन है. 

कुरआन के मुताबिक मूसा पर आसमानी किताब तौरेत और ईसा पर आसमानी किताब इंजील नाज़िल हुई थी मगर इन दोनों की उम्मातें के पास इनकी मुस्तनद तारीख़ है. मूसा ने तौरेत लिखना शुरू किया जिसको कि बाद के उसे यहूद नबी मुसलसल बढाते गए जो बिल आखीर ओल्ड टेस्टामेंट की शक्ल में महफूज़ हुई जोकि यहूदियों और ईसाइयों की तस्लीम शुदा बुनियादी किताब है. 

ईसा के बाद इस के हवारियों ने जो कुछ इस के हालात लिखे या लिखवाए वह इंजील है. 

दाऊद ने जो गीत रचे वह ज़ुबूर है.
सुलेमान और छोटे छोटे नबियों ने जो हम्दो सना की वह सहीफ़े हैं. 
यह सब किताबें आलमी स्कूलों, कालेजों, लाइबब्रेरिज में दस्तयाब हैं और रोज़े रौशन की तरह अयाँ हैं. बहुत तफसील के साथ सब कुछ देखा जा सकता है. 
ये किताबें मुक़द्दस ज़रूर मानी जाती हैं मगर आसमानी नहीं, सब ज़मीनी हैं, कुरआन इन्हें ज़बरदस्ती आसमानी बनाए हुए है, इन्हें अपने रंग में रंगने के लिए. 
इनकी मौजूदयत को कुरानी अल्लाह (इस्लामी सियासत के तहत) नकली कहता है.
इस की सज़ा मुसलामानों को चौदह सौ सालों से सिर्फ मुहम्मद की खुद सरी, खुद पसंदी और खुद बीनी की वजह से चुकानी पड़ रही है। 

बात अरब दुन्या की थी, समेट लिया पूरे एशिया अफ्रीका और आधे योरोप को. हम फ़िलहाल अपने उप महा द्वीप की बात करते हैं कि ये आग हम को एकदम पराई लग रही है जिसमे यह मज़हबी रहनुमा हम को धकेल रहे हैं

 "सब कुछ संभालने वाले हैं. अल्लाह ने आप के पास जो कुरआन भेजा है वाकेअय्यत के साथ इस कैफ़ियत से कि वह तस्दीक करता है उन किताबों को जो इस से पहले आ चुकी हैं और इसी तरह भेजा था तौरेत और इंजील को."
सूरह आले सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयत (3)

मुहम्मदी अल्लाह की वाकेअय्यत ऊपर बयां कर चुके हैं.

"जो लोग मुनकिर हैं अल्लाह ताला के आयतों के इन के लिए सजाए सख्त है और अल्लाह ताला गल्बा वाले हैं, बदला लेने वाले हैं.''
सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयत (4) 

मुनकिर के लफ्जी माने तो होते हैं इंकार करने वाला, इन्सान या तो किसी बात का मुनकिर होता है या इक्रारी मगर लफ्ज़ मुनकिर का इस्लामी करण होने के बाद इसके मतलब बदल कर इसलाम कुबूल कर के फिर जाना वाला मुनकिर हो जाना है, 
ऐसे लोगों की सज़ा मोहसिन इंसानियत, सरवरे कायनात, मालिके क़ौनैन, हज़रात मुहम्मद मुस्तफ़ा, रसूल अकरम, सल्लललाहो अलैहे वालेही वसल्लम ने मौत फरमाई है. 
जो ताक़त कायनात पर ग़ालिब होगी, क्या वजह है कि वह हमारे हाँ न पर, हमारी मर्ज़ी पर, हमारे अख्तियार पर क्यों न गालिब हो, उसको मोहतसिब और मुन्तक़िम होने की ज़रुरत ही क्यूँ पड़ी.? 
ये क़ुरआन के उम्मी ख़ालिक का बातिल पैगाम है. खलिक़े हक़ीक़ी का नहीं हो सकता. 
मुसलमानों होश में आओ. कुरआन के बातिल एजेंट अपना कारोबार चला रहे हैं और कुछ भी नहीं. इन का कई बार सर क़लम किया गया है मगर ये सख्त जन फिर पनप आते हैं।

इसी तरह अरबों के मुश्तरका बुज़ुर्ब अब्राहम जो अरब इतिहासकारों के लिए पहला मील का पत्थर है, जिस से इंसानी समाज की तारीख़ शुरू होती है और जो फ़ादर अब्राहम कहे जाते है उनको भी मुहम्मद ने मुस्लमान बना लिया और उनका दीन इसलाम बतलाया। खुद पैदा हुए उनके हजारों साल बाद और अपने बाप को भी काफ़िर और जहन्नमी कहा मगर इब्राहीम अलैहिस्सलाम को जन्नती मुसलमान. काश मुसलमानों को कोई समझाए कि हिम्मत के साथ सोचें कि वह कहाँ हैं? एक लम्हे में ईमान दारी पर ईमान ला सकते है. मुस्लिम से मोमिन बन सकते हैं.
" जिसने नाज़िल किया किताब को जिस का एक हिस्सा वह आयतें हैं जो कि इश्तेबाह मुराद से महफूज़ हैं और यही आयतें असली मदार हैं किताब का. दूसरी आयतें ऐसी हैं जो कि मुश्तबाहुल मुराद हैं, सो जिन लोगों के दिलों में कजी है वह इन हिस्सों के पीछे हो लेते हैं. जो मुश्तबाहुल मुराद हैं, सो सोरिश ढूढने की ग़रज़ से. हालांकि इस का सही मतलब बजुज़ अल्लाह ताला के कोई नहीं जनता."
सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयत (6+7) 

मुहम्मदी अल्लाह अपनी कुरानी आयातों की खामियों की जानकारी देता है कि इन में कुछ साफ़ साफ़ हैं और यही क़ुरआन की धुरी हैं और कुछ मशकूक हैं जिनको शर पसंद पकड़ लेते हैं. इस बात की वज़ाहत आलिमान क़ुरआन यूँ करते हैं कि क़ुरआन में तीन तरह की आयतें हैं---
१- अदना (जो साफ़ साफ़ मानी रखती हैं)
२- औसत (जो अधूरा मतलब रखती हैं)
३-तवास्सुत (जो पढने वाले की समझ में न आए और जिसको अल्लाह ही बेहतर समझे।)
सवाल उठता है कि एक तरफ़ दावा है हिकमत और हिदायते नेक से भरी हुई क़ुरआन अल्लाह की अजीमुश्शान किताब है और दूसरी तरफ़ तवस्सुत और औसत की मजबूरी ? 
अल्लाह की मुज़बज़ब बातें, एहकामे इलाही में तजाद, हुरूफ़े मुक़त्तेआत का इस्तेमाल जो किसी मदारी के छू मंतर की तरह लगते हैं। 

दर अस्ल कुरआन कुछ भी नहीं, मुहम्मद के वजदानी कैफ़ियत में बके गए बड का एह मज्मूआ है। इन में ही बाज़ बातें ताजाऊज़ करके बे मानी हो गईं तो उनको मुश्तबाहुल मुराद कह कर अल्लाह के सर हांडी फोड़ दिया है। 

वाज़ह हो कि जो चीजें नाज़िल होती हैं वह बला होती हैं. अल्लाह की आयतें हमेशा नाज़िल हुई हैं. कभी प्यार के साथ बन्दों के लिए पेश नहीं हुईं. कोई कुरानी आयत इंसानी ज़िन्दगी का कोई नया पहलू नहीं छूती, कायनात के किसी राज़ हाय का इन्क्शाफ़ नहीं करती, जो कुछ इस सिलसिले में बतलाती है दुन्या के सामने मजाक बन कर रह जाता है. बे सर पैर की बातें पूरे कुरआन में भरी पड़ी हैं, 
बस कि कुरआन की तारीफ, 
तारीफ किस बात की तारीफ उस बात का पता नहीं. 
इस की पैरवी मुल्ला, मौलवी, ओलिमाए दीन करते हैं जिन की नक़ल मुस्लमान भी करता है. आम मुस्लमान नहीं जनता की कुरआन में क्या है, खास जो कुछ जानते हैं वह सोचते है भाड़ में जाएँ, हम बचे रहें इन से, यही काफी है। 

यह आयत बहुत खास इस लिए है कि ओलिमा नामुराद अक्सर लोगों को बहकते हैं कि क़ुरआन को समझना बहुत मुश्किल है.






जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 2 December 2017

सुरह आल ए इमरान 3 पहली किस्त

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह आले इमरान ३ तीसरा पारा 
पहली किस्त


एक हदीस मुलहिज़ा फरमाएँ - - -

इस्लाम के दूसरे सूत्राधार अली मौला से रवायत है कि 
''एक ऊंटनी बद्र के जंग से माले-गनीमत (लूट) में मुझे मिली और एक रसूल ने तोह्फ़तन  दी. इन दोनों को एक अंसार के सेहन में बाँध कर मैं सोंच रहा था कि इन पर अज़ख़ुर घास लाद कर लाया करूंगा और बेचूगा, इस तरह कुछ पैसा जमा कर के फातमा का वलीमा करूंगा जो कि अभी तक मुझ पर उधार था. इसी घर में हम्ज़ा बिन अब्दुल मतलब मुहम्मद के चचा शराब पी रहे थे, साथ में एक लौंडी ग़ज़ल गा रही थी जो कुछ इस तरह थी - - - 
(तर्जुमा)
 चल ऐ हम्ज़ा इन मोटे ऊंटों पे जा,
बंधे हैं सेहन में जो सब एक जा,
चला इनकी गर्दन पे जल्दी छुरा,
मिला इनको तू खून में और लुटा,
बना इनके टुकड़ों से उम्दा जो हों,
गज़क गोश्त का हो पका और भुना. 

उसकी ग़ज़ल सुन कर हम्ज़ा ने तलवार उठाई और ऊटों की कोखें फाड़ दीं. अली यह मंज़र देख कर मुहम्मद के पास भागे हुए गए और जाकर शिकायत की, जहाँ ज़ैद बिन हार्सा भी मौजूद थे. तीनों अफ़राद जब हम्ज़ा के पास पहुंचे तो वह नशे में धुत्त था. उन सभों को देख कर गुस्से के आलम में लाल पीला हो रहा हो गया, बोला, 
'' तुम लोग हो क्या? मेरे बाप दादों के गुलाम हो.'' 
यह सुन कर मुहम्मद उलटे पाँव वापस हो गए
(देखें हदीस ''मुस्लिम - - - किताबुल अशर्बता'' + बुखारी १५७)

यह मुहम्मद का बहुत निजी मामला था, एक तरफ़ दामाद, दूसरी तरफ़ खुदा खुदा करके हुवा, मुसलमान बहादुर चचा हम्ज़ा ? 
होशियार अल्लाह के ख़ुद साख़ता रसूल को एक रास्ता सूझा, 
दूसरे दिन ही अल्लाह की क़ुरआनी आयत नाज़िल करा दी कि शराब हराम हुई. 
मदीने में मनादी करा दी गई कि अल्लाह ने शराब को हराम क़रार दे दिया है.
जाम ओ पैमाना तोड़ दिए गए, मटके और ख़ुम पलट दिए गए, 
शराबियों के लिए कोड़ों की सजाएं मुक़रर्र हुईं. 
कल तक जो शराब लोगों की महबूब मशरूब थी, उस से वह महरूम कर दिए गए. यकीनन ख़ुद मुहम्मद ने मयनोशी उसी दिन छोड़ी होगी क्यूं कि कई क़ुरआनी आयतें शराबियों की सी इल्लत की बू रखती हैं. 
लोगों की तिजारत पर गाज गिरी होगी, मुहम्मद की बला से, उनका तो कौल था कि सब से बेहतर तिजारत है जेहाद जिसमे लूट के माल से रातो रात माला माल हो जाओ. 
गौर करें की मुहम्मद ने अपने दामाद अली के लिए लोगों को शराब जैसी नेअमत से महरूम कर दिया. 
शराब ज़ेहन इंसानी के लिए नेअमत ही नहीं दवा भी है, दवा को दवा की तरह लिया जाए न के अघोरियों की तरह. शराब जिस्म के तमाम आज़ा को संतुलित रखती है आज की साइंसी खोज में इसका बड़ा योगदान है. यह ज़ेहन के दरीचों को खोलती है जिसमे नए नए आयाम की आमद होती है. इसकी लम्स कुदरत की अन छुई परतें खोलती हैं. शराब इंसान को मंजिल पाने के लिए मुसलसल अंगड़ाइयां अता करती है. 
आलमे इस्लाम की बद नसीबी है कि शराब की बे बरकती ने इसे कुंद जेहन, कौदम, और गाऊदी बना दिया है. इस्लाम तस्लीम करने के बाद कोई मुस्लिम बन्दा ऐसा नहीं हुवा जिस ने कि कोई नव ईजाद की हो. 
हमारे मुस्लिम समाज का असर हिन्दू समाज पर अच्छा खासा पड़ा है. 
इस समाज ने मुस्लिम समाज के रस्मो-रिवाज, खान पान, लिबासों, पोशाक, और तौर तरीकों को अपनाया और ऐसा नहीं कि सिर्फ हिन्दुओं ने ही अपनाया हो, मुसलामानों ने भी अपनाया. यूं कहें कि इस्लाम कुबूल करने के बाद भी अपने रस्मो रिवाज पर कायम रहे. मसलन दुल्हन का सुर्ख लिबास हो या जात बिरादरी. मगर सोमरस जो कि ऋग वेद मन्त्र का पवित्र उपहार है, हिदू समाज में हराम कैसे हो गया, 
मोदी का गुजरात इसे क्यूं क़ुबूल किए हुए है? 
गांधी बाबा इसके खिलाफ क्यूं सनके? 
यह तो वाकई आबे हयात है. 
किसी के लिए मीठा और चिकना हराम है तो किसी के लिए नमक और मिर्च. ज्यादा खाना नुकसान देह हो तो हराम हो जाता है और गरीब को कम खाना तो मजबूरी में हराम होता ही है. 
यह हराम हलाल का कन्सेप्ट ही इस्लामी बेवकूफियों में से एक है. 
हराम गिज़ा वह होती है जो मुफ्त और बगैर मशक्क़त की हो, 
दूसरों का हक हो लूट पाट की हो. 
मुसलमानों! 
माले गनीमत बद तरीन हराम गिज़ा है. 
आइए तीसरे पारे आले इमरान की बखिया उधेडी जाए - - - 

"अलम"
"सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयत (1)

यह लफ्ज़ मोहमिल (यानी अर्थ शून्य) है जिसका मतलब अल्लाह ही जनता है. ऐसे हर्फों या लफ्ज़ों को कुरानी मंतिक़यों ने हुरूफ़ ए मुक़त्तेआत का नाम दिया है. यह सूरत के पहले आते हैं. यहाँ पर यह एक आयत यानी कोई बात, कोई पैगाम की हैसियत भी रखता है. इस अर्थ हीन शब्द के आगे + गल्लम लगा कर किसी अक्ल मंद ने इसे अल्लम गल्लम कर दिया, गोया इस का पूरा पूरा हक अदा कर दिया, अल्लम गल्लम. क़ुरआन का बेहतरीन नाम अल्लम गल्लम हो सकता है.
" अल्लाह तअला ऐसे हैं कि उन के सिवा कोई क़ाबिल माबूद बनाने के नहीं और वह ज़िन्दा ओ जावेद है."
सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयत (२)

यहाँ पर मैं फिर आप को एक बार याद दिला दूँ कि कुरआन कलाम अल्लाह नहीं कलाम मुहम्मद है, जैसा कि वह अल्लाह के बारे में बतला रहे हैं, 
साथ साथ उसकी मुशतहरी भी कर रहे हैं. इस आयत में बेवक़ूफ़ी कि इत्तेला है. 
अल्लाह अगर है तो क्या मुर्दा होगा ? 
मुस्लमान तो मुर्दा खुदाओं का दामन थाम कर भी अपनी नय्या पार लगा लेता है. यह अल्लाह के ज़िन्दा होने और सब कुछ संभालने की बात मुहम्मद ने पहले भी कही है आगे भी इसे बार बार दोहराते रहेंगे.



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 29 November 2017

Hindu Dharm Darshan 116



गीता और क़ुरआन

भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं - - -
>मुझ भगवान् में अपने चित्त को स्थिर करो
और अपनी सारी  बुद्धि मुझ में लगाओ.
इस प्रकार तुम निःसंदेह मुझ में वास करोगे.

>>हे अर्जुन ! हे धनञ्जय !!
 यदि तुम अपने चित को अविचल भाव से मुझ पर स्थिर नहीं कर सकते 
तो तुम भक्ति योग की विधि-विधानों का पालन करो.
इस प्रकार तुम मुझे प्राप्त करने की चाह पैदा करो. 

>>> यदि तुम यह अभ्यास नहीं कर सकते तो 
घ्यान के अनुशीलन में लग जाओ. 
लेकिन ज्ञान से श्रेष्ट ध्यान है
और ध्यान से भी श्रेष्ट कर्म फलों का परित्याग, 
क्योकि ऐसे त्याग से मनुष्य को मन शान्ति प्राप्त हो सकती है.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय - 12  श्लोक -8 -9 -12  

*धार्मिकता मानव मस्तिष्क की दासता चाहती है. 
उसे तरह तरह के प्रलोभन देकर मनाया जाए 
और अगर इस पर भी न पसीजे तो इसे डरा धमका कर 
जैसा कि भगवान् अपने विकराल रूप अर्जुन को दिखलाता है 
कि डर के मारे अर्जुन की हवा निकल जाती है.  
गीता सार को जो प्रसारित और प्रचारित किया जाता है
 वह अलग अलग श्लोकों में वर्णित टुकड़ों का समूह समूह है 
जो अलग अलग संदर्भित है. 
हर टुकड़ा युद्ध को प्रेरित करने के लिए है 
मगर उसे संयुक्त करके कुछ और ही अर्थ विकसित किया गया है.  
आखिर भगवान् अपनी भक्ति के लिए क्यों बेचैन है ? 
कहते हैं कर्म करके फल को भूल जाओ. 
भला क्यों ? 
फल के लिए ही तो मानव कोई काम करता है. 
फल भक्त भूल जाए ताकि इसे भगवान् आसानी से हड़प ले. 
हम बैल हैं ? कि दिन भर हल जोतें और सानी पानी देकर मालिक फसल को भोगे ? यह गीता का घिनावना कार्य क्रम है जिसके असर में मनुवाद ठोस हुवा है 
और मानवता जरजर.
पडोसी चीन में धर्म को अधर्म क़रार दे दिया गया, 
वह भारत से कई गुणा आगे निकल गया है. 
यहाँ आज भी इनके बनाए हुए शूद्र और आदिवासी अथवा मूल निवासी ग़रीबी रेखा से निकल ही नहीं पा रहे. 

और क़ुरआन कहता है - - - 
>मुहम्मदी अल्लाह के दाँव पेंच इस सूरह में मुलाहिज़ा हो - - -
"जो लोग काफ़िर हुए और अल्लाह के रस्ते से रोका, अल्लाह ने इनके अमल को क़ालअदम (निष्क्रीय) कर दिए. और जो ईमान लाए, जो मुहम्मद पर नाज़िल किया गया है, अल्लाह तअला इनके गुनाह इनके ऊपर से उतार देगा और इनकी हालत दुरुस्त रक्खेगा."
सूरह मुहम्मद - ४७ -पारा २६- आयत (१-२)

मुहम्मद की पयंबरी भोले भाले इंसानों को ब्लेक मेल कर रही है जो इस बात को मानने के लिए मजबूर कर  रही है कि जो गैर फ़ितरी है. क़ुदरत का क़ानून है कि नेकी और बदी का सिला अमल के हिसाब से तय है,ये  इसके उल्टा बतला रही है कि अल्लाह आपकी नेकियों को आपके खाते से तल्फ़ कर देगा. कैसी बईमान मुहम्मदी अल्लाह की खुदाई है? किस कद्र ये पयंबरी झूट बोलने  पर आमादः है.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 27 November 2017

अलबकर -२ पहला पारा- नवीं क़ुरान सार किस्त

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.

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क़ुरआन सार 


* शराब और जुवा में बुराइयाँ हैं और अच्छइयां भी. 
*खैर और खैरात में उतना ही खर्च करो जितना आसान हो. 
* यतीमों के साथ मसलेहत की रिआयत रखना ज्यादा बेहतर है. 
*काफिर औरतों के साथ शादी मत करो भले ही लौंडी के साथ कर लो. 
*काफिर शौहर मत करो, उस से बेहतर गुलाम है. 
*हैज़ एक गन्दी चीज़ है हैज़ के आलम में बीवियों से दूर रहो. 
*मर्द का दर्जा औरत से बड़ा है. 
*सिर्फ दो बार तलाक़ दिया है तो बीवी को अपना लो चाहे छोड़ दो. 
*तलाक के बाद बीवी को दी हुई चीजें नहीं लेनी चाहिएं, 
मगर आपसी समझौता हो तो वापसी जायज़ है. 
जिसे दे कर औरत अपनी जन छुडा ले. 
*तीसरे तलाक़ के बाद बीवी हराम है.
*हलाला के अमल के बाद ही पहली बीवी जायज़ होगी. 
*माएँ अपनी औलाद को दो साल तक दूध पिलाएं 
तब तक बाप इनका ख़याल रखें. 
ये काम दाइयों से भी कराया जा सकता है. 
*एत्काफ़ में बीवियों के पास नहीं जाना चाहिए. 
*बेवाओं को शौहर के मौत के बाद चार महीना दस दिन निकाह के लिए रुकना चाहिए. 
*बेवाओं को एक साल तक घर में पनाह देना चाहिए 
*मुसलमानों को रमजान की शब् में जिमा हलाल हुवा.
वगैरह वगैरह सूरह कि खास बातें, 
इस के अलावः नाकाबिले कद्र बातें जो फुजूल कही जा सकती हैं. 
भरी हुई हैं.
तमाम आलिमान को मोमिन का चैलेंज है.
मुसलमान आँख बंद कर के कहता है क़ुरआन में निजाम हयात 
(जीवन-विधान) है.
नमाज़ियो!
ये बात मुल्ला, मौलवी उसके सामने इतना दोहराते हैं कि वह सोंच भी नहीं सकता कि ये उसकी जिंदगी के साथ सब से बड़ा झूट है. 
ऊपर की बातों में आप तलाश कीजिए कि कौन सी इन बेहूदा बातों का आज की ज़िन्दगी से वास्ता है. 
इसी तरह इनकी हर हर बात में झूट का अंबार रहता है. 
इनसे नजात दिलाना हर मोमिन का क़स्द होना चाहिए . 

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 26 November 2017

Hindu Dharm Darshan 115



वेद दर्शन 
 खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 
 हे प्रचंड योद्धा इन्द्र! 
तू सहस्त्रों प्रकार के भीषण युद्धों में अपने रक्षा-साधनों द्वारा हमारी रक्षा कर |४| 
हमारे साथियों की रक्षा के लिए वज्र धारण करता है, 
वह इन्द्र हमें धन अथवा बहुत से ऐश्वर्य के निमित्त प्राप्त हो.
(ऋग्वेद १.३.७) 
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )

इन्हीं वेदों की देन हैं कि आज मानव समाज विधर्मिओं और अधर्मियों को मिटाने की दुआ माँगा करता है और उनके बदले अपनी सुरक्षा चाहता है. इंसान को दूसरों का शुभ चिन्तक होना चाहिए.

                    
 खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 
अग्नि ने अपने मित्र इंद्र के लिए तीन सौ भैंसों को पकाया था. 
इंद्र ने वृत्र को मारने के लिए मनु के तीन पात्रों में भरे सोम रस को एक साथ ही पी लिया था.
 पंचम मंडल सूक्त - 7 
हे धन स्वामी इंद्र ! 
जब तुमने तीन सौ भैसों का मांस खाया, 
सोम रस से भरे तीन पात्रों को पिया 
एवं वृत्र को मारा, तब सब देवों ने सोमरस से पूर्ण तृप्त इंद्र को उसी प्रकार बुलाया जैसे मालिक अपने नौकर को बुलाता है. 
* मांसाहार भगवा भगवांस - - -


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 25 November 2017

अलबकर -२ पहला पारा- अलबकर -२ पहला पारा- आठवीं किस्त

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह अल्बक्र २ दूसरा पर 
क़िस्त 8 (आख़ीर)

अज़ीयत पसंद हज़रात चाहें तो कुरआन उठा कर आयत २६१ देखें. 
सवाल उठता है हम ऐसी बातें वास्ते सवाब पढ़ते हैं? 
दिन ओ रात इन्हें दोहराते हैं, 
क्या अनजाने में हम पागल पन की हरकत नहीं करते ? 
 हाँ ! 
अगर हम इसको अपनी जबान में बआवाज़ बुलंद दोहराते रहें. 
सुनने वाले यक़ीनन हमें पागल कहने लगेंगे और इन्हें छोडें, 
कुछ दिनों बाद हम खुद अपने आप को पागल महसूस करने लगेंगे. 
आम तौर पर मुसलमान इसी मरज़ का शिकार है जिस की गवाह इस की मौजूदा तस्वीर है. 
वह अपने मुहम्मदी अल्लाह का हुक्म मान कर ही पागल तालिबान बन चुका है. ."
.(सूरह अलबकर-२ तीसरा परा तिरकर रसूल आयत 261) 

खर्च पर मुसलसल मुहम्मदी अल्लाह की ऊट पटांग तकरीर चलती रहती है. मालदार लोगों पर उसकी नज़रे बद लगी रहती है, 
सूद खोरी हराम है मगर बज़रीआ सूद कमाई गई दौलते बिक़ा हलाल हो सकती है अगर अल्लाह की साझे दारी हो जाए. 
रहन, बय, सूद और इन सब के साथ साथ गवाहों की हाज़िरी जैसी आमियाना बातें अल्लाह हिकमत वाला खोल खोल कर समझाता है. 
(सूरह अलबकर-२ तीसरा परा तिरकर रसूल आयत 263-273) 

अल्लाह ने इन आयतों में ख़र्च करने के तरीक़े और उस पर पाबंदियां भी लगाई हैं. 
कहीं पर भी मशक्क़त और ईमानदारी के साथ रिज़्क़ कमाने का मशविरा नहीं दिया है. 
इस के बर अक्स जेहाद लूट मार की तलक़ीन हर सूरह में है. 
"ऐ ईमान वालो! तुम एहसान जतला कर या ईजा पहुंचा कर अपनी ख़ैरात को बर्बाद मत करो, उस शख्स की तरह जो अपना मॉल ख़र्च करता है, लोगों को दिखने की ग़रज़ से और ईमान नहीं रखता - - - ऐसे लोगो को अपनी कमाई ज़रा भी हाथ न लगेगी और अल्लाह काफ़िरों को रास्ता न बतला देंगे." 
जरा मुहम्मद की हिकमते अमली पर गौर करें कि वह लोगों से कैसे अल्लाह का टेक्स वसूलते हैं. 
जुमले की ब्लेक मेलिंग तवज्जेह तलब है - - -
और अल्लाह काफिरों को रास्ता न बतला देंगे - - - 
एक मिसाल अल्लाह की और झेलिए- - - 
"भला तुम में से किसी को यह बात पसंद है कि एक बाग़ हो खजूर का और एक अंगूर का. इस के नीचे नहरें चलती हों, उस शख्स के इस बाग़ में और भी मेवे हों और उस शख्स का बुढापा आ गया हो और उसके अहलो अयाल भी हों, जान में कूवत नहीं, सो उस बाग़ पर एक बगूला आवे जिस में आग हो ,फिर वह बाग जल जावे. अल्लाह इसी तरह के नज़ाएर फरमाते हैं, तुम्हारे लिए ताकि तुम सोचो," 
(सूरह अलबकर-२ तीसरा परा तिरकर रसूल आयत 266) 

" और जो सूद का बक़ाया है उसको छोड़ दो, अगर तुम ईमान वाले हो और अगर इस पर अमल न करोगे तो इश्तहार सुन लो अल्लाह की तरफ से कि जंग का - - - और इस के रसूल कि तरफ से. और अगर तौबा कर लो गे तो तुम्हारे अस्ल अमवाल मिल जाएँगे. न तुम किसी पर ज़ुल्म कर पाओगे, न कोई तुम पर ज़ुल्म कर पाएगा." 
(सूरह अलबकर-२ तीसरा परा तिरकर रसूल आयत 279) 

एक अच्छी बात निकली मुहम्मद के मुँह से पहली बार 
"लेन देन किया करो तो एक दस्तावेज़ तैयार कर लिया करो, इस पर दो मर्दों की गवाही करा लिया करो, दो मर्द न मलें तो एक मर्द और दो औरतों की गवाही ले लो" 
(सूरह अलबकर-२ तीसरा परा तिरकर रसूल आयत 283) 

यानी दो औरत=एक मर्द 
कुरान में एक लफ्ज़ या कोई फ़िक़रा या अंदाज ए  बयान का सिलसिला बहुत देर तक क़ायम रहता है जैसे कोई अक्सर जाहिल लोग पढ़े लिखों की नक़्ल में पैरवी करते हैं. इस लिए भी ये उम्मी मुहम्मद का कलाम है, साबित करने के लिए लसानी तूल कलामी दरकार है. 
यहाँ पर अल्लाह के रसूल की धुन है 
"लोग आप से पूछते हैं. "
अल्लाह का सवाल फर्जी होता है, जवाब में वह जो बात कहना चाहता है. ये जवाब एन इंसानी फ़ितरत के मुताबिक होते हैं, जो हजारों सालों से तस्लीम शुदा हैं. जिसे आज मुस्लमान कुरानी ईजाद मानते हैं. 
आम मुसलमान समझता है इंसानियत, शराफ़त, और ईमानदारी, सब इसलाम की देन है, ज़ाहिर है उसमें तालीम की कमी है. उसे महदूद मुस्लिम मुआशरे में ही रखा गया है. 

कुरान में कीडे निकालना भर मेरा मक़सद नहीं है, बहुत सी अच्छी बातें हैं, इस पर मेरी नज़र क्यूँ नहीं जाती?
"अक्सर ऐसे सवाल आप की नज़र के सामने मेरे ख़िलाफ़ कौधते होंगे. बहुत सी अच्छी बातें, बहुत ही पहले कही गई हैं, 
एक से एक अज़ीम हस्तियां और नज़रियात इसलाम से पहले इस ज़मीन पर आ चुकी हैं जिसे कि कुरानी अल्लाह तसव्वुर भी नहीं कर सकता. अच्छी और सच्ची बातें फितरी होती हैं जिनहें आलमीं सचचाइयाँ भी कह सकते हैं. 
कुरान में कोई एक बात भी इसकी अपनी सच्चाई या इन्फरादी सदाक़त नहीं है. हजारों बकवास और झूट के बीच अगर किसी का कोई सच आ गया हो तो उसको कुरान का नहीं कहा जा सकता,
"माँ बाप की ख़िदमत करो" 
अगर कुरान में कहता है तो इसकी अमली मिसाल श्रवण कुमार इस्लाम से सदियों पहले क़ायम कर चुका है. 
मौलाना कूप मंडूकों का मुतलिआ कुरान तक सीमित है इस लिए उनको हर बात कुरान में नज़र आती है. 
यही हाल अशिक्षित मुसलमानों का है. 

सूरह के आख़ीर में अल्लाह खुद अपने आप से दुआ मांगता है, 
बकौल मुहम्मद कुरआन अल्लाह का कलाम है ? 
देखिए आयत में अल्लाह अपने सुपर अल्लाह के आगे कैसे ज़ारों क़तार गिडगिडा रहा है. 
सदियों से अपने फ़ल्सफ़े को दोहरते दोहराते मुल्ला अल्ला को बहरूपिया बना चुका है, 
वह दुआ मांगते वक़्त बन्दा बन जाता है. 
मुहम्मद दुआ मांगते हैं तो एलानिया अल्लाह बन जाते हैं. 
उनके मुंह से निकली बात, चाहे उनके आल औलादों के ख़ैर के लिए हो, चाहे सय्यादों के लिए बरकत की हो, कलाम इलाही बन कर निकलती है. 
आले इब्राहीमा व आला आले इब्राहिम इन्नका हमीदुं मजीद. 
यानी आले इब्राहीम ग़रज़ यहूदियों की ख़ैर ओ बरकत की दुआ दुन्या का हर मुस्लमान मांगता है और वही यहूदी मुसलमानों के जानी दुश्मन बने हुए हैं. 
हम हिदुस्तानी मुसलमान यानि अरबियों कि भाष में हिंदी मिस्कीन अरबों के ज़ेहनी गुलाम बने हुए हैं. 
अल्लाह को ज़ारों कतार रो रो कर दुआ मांगने वाले पसंद हैं. 
यह एक तरीक़े का नफ़्सियाती ब्लेक मेल है. 
रंज ओ ग़म से भरा हुआ इंसान कहीं बैठ कर जी भर के रो ले तो उसे जो राहत मिलती है, अल्लाह उसे कैश करता है, 
(बकौल मुहम्मद कुरआन अल्लाह का कलाम है ? 
देखिए आयत में अल्लाह अपने सुपर अल्लाह के आगे कैसे ज़ारों क़तार गिडगिडा रहा है. 
सदियों से अपने फ़ल्सफ़े को दोहरते दोहराते मुल्ला अल्ला को बहरूपिया बना चुका है, 
वह दुआ मांगते वक़्त बन्दा बन जाता है. 
मुहम्मद दुआ मांगते हैं तो एलानिया अल्लाह बन जाते हैं. 
उनके मुंह से निकली बात, चाहे उनके आल औलादों के ख़ैर के लिए हो, चाहे सय्यादों के लिए बरकत की हो, कलाम इलाही बन कर निकलती है. 
आले इब्राहीमा व आला आले इब्राहिम इन्नका हमीदुं मजीद. 
यानी आले इब्राहीम ग़रज़ यहूदियों की ख़ैर ओ बरकत की दुआ दुन्या का हर मुस्लमान मांगता है और वही यहूदी मुसलमानों के जानी दुश्मन बने हुए हैं. 
हम हिदुस्तानी मुसलमान यानि अरबियों कि भाष में हिंदी मिस्कीन अरबों के ज़ेहनी गुलाम बने हुए हैं. 
अल्लाह को ज़ारों कतार रो रो कर दुआ मांगने वाले पसंद हैं. 
यह एक तरीक़े का नफ़्सियाती ब्लेक मेल है. 
रंज ओ ग़म से भरा हुआ इंसान कहीं बैठ कर जी भर के रो ले तो उसे जो राहत मिलती है, अल्लाह उसे कैश करता है, 
सूरह अलबकर-२ तीसरा परा तिरकर रसूल आयत 284-286) 


कुरान की एक बड़ी सूरह अलबकर अपनी २८६ आयातों के साथ तमाम हुई- जिसका लब्बो लुबाबा दर्ज जेल है - - -


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान