Friday, 22 June 2018

सूरह कहफ़ 18 (क़िस्त-3)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह कहफ़ 18 
(क़िस्त-3) 


(इस क़िस्त में ब्रेकट में रखे अल्फ़ाज़ तर्जुमा निगार के हैं, अल्लाह के नहीं.ऐसे ही पूरे क़ुरआन में तर्जुमान अल्लाह का उस्ताद बना हुवा है.)

''सो हमने इस ग़ार में इनके कानो पर सालहा साल तक (नींद का पर्दा) डाल दिया. फिर हमने उनको उठाया ताकि हम मालूम कर लें इन दोनों गिरोहों में से कौन सा (गिरोह) इनके रहने की मुद्दत से ज़्यादः वाकिफ़ है. हम इनका वाक़ेआ आप से ठीक ठीक बयान करते हैं, वह लोग चन्द नव जवान थे जो अपने रब पर ईमान लाए थे, हमने उनकी हिदायत में और तरक्क़ी कर दी. और हमने उनके दिल और मज़बूत कर दिए, जब वह (दीन में) पुख़ता होकर कहने लगे हमारा रब तो वह है जो आसमानों और ज़मीन का रब है. हम तो इसे छोड़ कर किसी माबूद की इबादत न करेंगे. (क्यूँकि) इस सूरत में यक़ीनन हम ने बड़ी बेजा बात कही है, जो हमारी क़ौम है, उन्हों ने ख़ुदा को छोड़ कर और माबूद क़रार दे रखे हैं. ये लोग इन (माबूदों पर) कोई खुली दलील क्यूँ नहीं लाते? सो इस शख़्स से ज़्यादः कौन गज़ब ढाने वाला शख़्स होगा जो अल्लाह पर ग़लत तोहमत लगावे. और जब तुम उन लोगों से अलग हो गए हो और उनके माबूदों से भी, मगर अल्लाह से अलग नहीं हुए तो तुम फलाँ ग़ार में जाकर पनाह लो. तुम पर तुम्हारा रब अपनी रहमत फैला देगा और तुम्हारे लिए तुम्हारे इस काम में कामयाबी का सामान दुरुस्त करेगा.''
सूरह कहफ़ १८ -१५ वां पारा आयत(८-१६)

कहानी का मुद्दा मुहम्मद के बत्न में ही रह गया '' दोनों गिरोहों में से कौन सा (गिरोह) इनके रहने की मुद्दत से ज़्यादः वाकिफ़ है.'' कौन से दो गिरोह? 
अल्लाह ही जानें या फिर मुल्ला जी जानें. 
फिर अल्लाह झूटों क़ी तरह बातें करता है

''हम इनका वाक़ेआ आप से ठीक ठीक बयान करते हैं'' 
और झूट उगलने लगता है कि वह नव मुस्लिम थे, इस लिए उसने ''उनकी हिदायत में और तरक्क़ी कर दी. और हमने उनके दिल और मज़बूत कर दिए'' 

यानी ये चारो मक्का वालों के लिए फेंका जाता है कि वह बेजा बातें करते हैं कि मूर्ति पूजा करते हैं और उनके फेवर में कोई दलील नहीं रखते. 
मुहम्मद ऐसे लोगों को गज़ब ढाने वाला बतलाते है. 
मक्का वालों को आप बीती बतलाते हैं कि वह इस्लाम का झंडा लेकर उन क़ुरैशियों और अरबों से अलग हो गए.
मुहम्मद की हर बात में सस्ती सियासत और बेहूदा पेवंद कारी की बू आती है. अफ़सोस कि मुसलमानों क़ी नाकें बह गई हैं. 
ऐसा घिनावना मज़हब जिसको अपना कहने में शर्म आए. 
बस इन को इस्लामी ओलिमा इस के लिए, मारे और बांधे हुए हैं.

''और ऐ (मुख़ातब) तू इनको जागता हुवा ख़याल करता है, हालांकि वह सोते थे. और हम उनको (कभी) दाहिनी तरफ़ और (कभी) बाएँ तरफ़ करवट देते थे और इनका कुत्ता दह्जीज़ पर अपने दोनों हाथ फैलाए हुए था. अगर ऐ (मुख़ातब) तू इनको झाँक कर देखता तो उनसे पीठ फेर कर भाग खड़ा होता, तेरे अन्दर उनकी दहशत समां जाती और इस तरह हमने उनको जगाया ताकि वह आपस में पूछ ताछ करें. उनमें से एक कहने वाले ने कहा कि तुम (हालाते-नर्म) में किस क़दर रहे होगे ? बअज़ों ने कहा कि (ग़ालिबन) एक दिन या एक दिन से भी कुछ कम रहे होंगे (दूसरे बअज़ों ने) कहा ये तो तुम्हारे ख़ुदा को ही ख़बर है कि तुम किस क़दर रहे. अब अपनों में किसी को ये रुपया दे कर शहर की तरफ़ भेजो फिर वह शख़्स तहक़ीक़ करे कि कौन सा खाना (हलाल) है. सो इसमें से तुम्हारे पास कुछ खाना ले आवे और (सब काम) ख़ुश तदबीरी (से) करे और किसी को तुम्हारी ख़बर न होने दे. (क्यूं कि अगर) वह लोग कहीं तुम्हारी ख़बर पा जावेंगे तो तुमको या तो पत्थर से मार डालेगे फिर (जबरन) अपने तरीकों में ले लेंगे और (ऐसा हुवा तो) तुम को भी फ़लाह न होगी. और इस तरह (लोगों को) मुत्तेला कर दिया. ताकि लोग इस बात का यक़ीन कर लें कि अल्लाह तअला का वादा सच्चा है. और यह कि क़यामत में कोई शक नहीं. (वह वक़्त भी क़ाबिले-ज़िक्र है) जब कि (इस ज़माने के लोग) इन के मुआमले में आपस में झगड़ रहे थे. सो लोगों ने कहा उनके पास कोई इमारत बनवा दो, इनका रब इनको खूब जनता है. जो लोग अपने काम पर ग़ालिब थे उन्हों ने कहा हम तो उनके पास एक मस्जिद बनवा देंगे. (बअज़े लोग तो) कहेंगे कि वह तीन हैं और चौथा उनका कुत्ता है. और (बअज़े) कहेंगे वह पाँच हैं छटां उनका कुत्ता (और) ये लोग बे तहक़ीक़ बात को हाँक रहे हैं और (बअज़े) कहेगे कि वह सात हैं, आठवां उनका कुत्ता. आप कह दीजिए कि मेरा रब उनका शुमार ख़ूब (सही सही) जानता है उनके (शुमार को) बहुत क़लील लोग जानते हैं तो सो आप उनके बारे में बजुज़ सरसरी बहेस के ज़्यादः बहेस न कीजिए और आप उनके बारे में इन लोगों से किसी से न पूछिए.''
सूरह कहफ़ १८ -१५ वां पारा आयत(१८-२२)

मुसलमान संजीदगी के साथ ये पाँच आयतें अपने ज़ेहनी और ज़मीरी कसौटी पर रख कर कसें. 
अल्लाह जो साज़गारे-कायनात है, इस तरह से आप के साथ मुख़ातिब है ? 
इसके बात बतलाने के लहजे को देखिए, कहता है कि कुत्ता दोनों हाथ फैलाए था? चारों पैर के सिवा कुत्ते को हाथ कहाँ होते हैं जो इंसानों की तरह फैलाता फिरे. 
अपना क़ुरआनी मसअला हराम, हलाल को उस वक़्त भी मुहम्मद लागू करना नहीं भूलते. खुद इंसानी जानों को पथराव करके सज़ा की ज़ालिमाना उसूल को उन पहाड़ियों का बतलाते हैं जो सैकड़ों साल इन से पहले हुवा करते थे, 
हर मौके पर अपनी क़यामत की डफ़ली बजाने लगते हैं. 
पागलों की तरह बातें करते है, 
एक तरफ़ उन लोगों को तनहा छुपा हुवा बतलाते हैं, 
दूसरी तरफ इकठ्ठा भीड़ दिखलाते हैं कि कोई कहता है इन असहाब के लिए इमारत बनवा देंगे और अपने काम में ग़ालिब लोग उनके लिए मस्जिद बनवाने की बातें करते हैं. 
उनकी तादाद पर ही अल्लाह क़यास आराईयाँ करता है कि कुत्ते समेत कितने असहाबे-कुहफ़ थे? 
कहता है बंद करो क़यास आराईयाँ असली शुमार तो मैं ही जनता हूँ कि मैं अल्लाह हूँ, जो हर जगह गवाही देने के लिए मुहम्मद के लिए बे किराये के टट्टू की तरह हाज़िर रहता हूँ.

मुसलमानों!
 क्या है तुम्हारे इस क़ुरआन में? जो इसके पीछे बुत के पुजारी की तरह आस्था वान बने खड़े रहते हो? 
तुमसे बेहतर वह बुत परस्त हैं जो बामानी तहरीर तो रखते और गाते हैं. 
यह जिहालत भरी लेखनी क्या किसी के लिए इअबादत की आवाज़ हो सकती है? 
कोई नहीं है तुम्हारा दुश्मन, 
तुम ख़ुद अपने मुजरिम और दुश्मन हो .
ऐसी वाहियात तसनीफ़ को पढ़ के हर इन्सान तुमसे नफ़रत करेगा कि तुम 
''पहाड़ वाले उसकी अजाएबात में से कुछ तअज्जुब की चीज़ हो'' 
तुम इस धरती का हक़ अदा करने की बजाए, उस पर बोझ हो, 
क्यूं कि तुम्हारा यक़ीन तो इस धरती पर न होकर ऊपर पे है. 
तुम्हारी बेग़ैरती का आलम ये है कि धरती के लिए किए गए ईजाद को सब से पहले भोगने लगते हो, चाहे हवाई सफ़र हो या टेलीफोन, या जेहाद के लिए भी गोले बारूद जो कचरा की तरह बेकार हो चुका है, क्यूँकि तुम्हारे लिए वही आइटम बम है. 
वह अपने पुराने हथियार तुम को बेच कर ठिकाने लगाते हैं, 
तुम उन्हें सोने के भाव ख़रीद लेते हो. 
तुम उनको लेकर मुस्लिम देशों में ही उन बेगुनाहों का ख़ून बहाते हो 
जो हराम ज़ादे ओलिमा के फन्दों में है. 
शर्म तुमको मगर नहीं आती. 



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 21 June 2018

Hindu Dharm Darshan 199


शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा

गीता का संक्षेप परिचय इस तरह से है कि कौरवों और पांडुओं के बीच हुए युद्ध के दौरान पांडु पुत्र अर्जुन के सारथी (कोचवान) बने भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं, अर्जुन उनके उपदेश और निर्देश को सुनता है, शंका समाधान करवाता है, 
भगवान् उसे जीवन सार समझाते हैं, दोनों की यही वार्तालाप गीता है. 

अंधे राजा धृतराष्ट्र का सहायक संजय युद्ध का आँखों देखा हाल सुनाता है. 
संजय गीता का ऐसा पात्र है कि जिसमें अलौकिक दूर दृष्टि होती है. 
वह कृष्ण और अर्जुन के बीच हुई बात चीत को अक्षरक्षा अंधे धृतराष्ट्र को सुनाता है.
>धृतराष्ट्र ने पूछा  ---
धर्म भूमि कुरुक क्षेत्र युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे तथा पांडु के पुत्रों ने क्या किया.
>>संजय ने कहा --- 
हे राजन ! 
पांडु पुत्रों द्वारा सेना की व्यूह रचना देख कर राजा दुर्योधन अपने गुरु के पास गया और उसने यह शब्द कहे---
>>>हे आचार्य ! 
पांडुओं की विशाल सेना को देखें, जिसे आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने इतने कौशलता से व्यवस्थित किया है.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय- 1  श्लोक  1-2-3 

*गीता क्या है ? 
नमूने के तौर पर उपरोक्त तीन श्लोक प्रस्तुत हैं . 
अंधे धृतराष्ट्र को संजय अपनी दूर दृष्टिता द्वारा मैदान ए जंग का आँखों देखा हाल सुनाता है, 
इसी सन्देश वाहक के सन्देश द्वारा गीता की रचना होती है.
संजय की ही तरह मुहम्मद ने क़ुरआन को आसमान से वह्यि (ईश वाणियाँ) ढोकर लाने वाले फ़रिश्ता जिब्रील को गढ़ा है, जो क़ुरआनी आयतें अल्लाह से ले कर मुहम्मद के पास आता  है और इनको उसका पाठ पढ़ाता है. मुहम्मद उसे याद करके लोगों के सामने गाते हैं. 
ऐसे चमत्कार को आज, इस इक्कीसवीं सदी में भी बुद्धिहीन हिन्दू और मुसलमान ओढ़ते और बिछाते हैं. 
कुरआन कहता है ---  
''ये किताब ऐसी है जिस में कोई शुबहा नहीं, राह बतलाने वाली है, अल्लाह से डरने वालों को." 
(सूरह अलबकर -२ पहला पारा अलम आयत 2 ) 
आख़िर अल्लाह को इस क़द्र अपनी किताब पर यक़ीन दिलाने की ज़रूरत क्या है? 
इस लिए कि यह झूटी है. 
क़ुरआन में एक ख़ूबी या चाल यह है कि मुहम्मद मुसलामानों को अल्लाह से डराते बहुत हैं. मुसलमान इतनी डरपोक क़ौम बन गई है कि अपने ही अली और हुसैन के पूरे ख़ानदान को कटता मरता खड़ी देखती रही, 
अपने ही ख़लीफ़ा उस्मान ग़नी को क़त्ल होते देखती रही, 
उनकी लाश को तीन दिनों तक सड़ती, खड़ी देखती रही, 
किसी की हिम्मत न थी की उसे दफ़नाता, 
यहूदियों ने अपने कब्रिस्तान में जगह दी तो मिटटी ठिहाने लगी. 
मगर मुसलमान इतना बहादुर है 
कि जन्नत की लालच और हूरों की चाहत में सर में कफ़न बाँध कर जेहाद करता है. 
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 20 June 2018

सूरह कहफ़ 18 (क़िस्त-2)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
 हदीसें सिर्फ़ "बुख़ारी'' 
और  ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह कहफ़ 18 
(क़िस्त-2) 

अल्लाह सूरह कहफ़ में कहफ़ (गुफा ) से हट कर ईसा की बातें करने लगता है - - - 

''और ताकि लोगों को डराइए जो (यूं) कहते हैं (नौज़ बिल्लाह) कि अल्लाह तअला औलाद रखता है, न कोई इसकी कोई दलील उनके पास है, न उनके बाप दादों के पास थी. बड़ी भारी बात है जो उनके मुँह से निकलती है. वह लोग बिलकुल झूट बकते हैं,''
सूरह कहफ़ १८ -१५ वां पारा आयत(५)

मुहम्मद सिर्फ़ काफ़िर, मुशरिक से ही नहीं सारे ज़माने से बैर पालते थे. 
यहाँ इशारा ईसाइयों की तरफ़ है जो ईसा को ख़ुदा का बेटा मानते हैं. 
तुम ख़ुदा के नबी हो सकते हो,वह तुमको आप जनाब करके चोचलाता है, 
कोई दूसरा ख़ुदा का बेटा क्यूँ नहीं हो सकता ?
क्यूँ ? अल्लाह के लिए क्या मुश्किल है ''कुन फियाकून '' का फ़ॉर्मूला उसके पास है, एक अदद बेटा बना लेना उसके लिए कौन सी मुश्किल है?

 ईसा कट्टर पंथी यहूदी धर्म का एक बाग़ी यहूदी था. 
एक मामूली बढ़ई यूसुफ़ क़ी मंगेतर मरियम थी, 
जिनका शादी से पहले ही अपने मंगेतर के साथ यौन संबंध हो गया था और नतीजतन वह गर्भ वती हो गई, 
बच्चा हुआ जो यहूदी धर्म में अमान्य था, 
जैसे आज मुसलमानों में ऐसे बच्चे नाजायज़ क़रार पाते हैं. 
ईसा को बचपन से ही नाजायज़ होने का तअना सुनना पड़ा. 
जिसकी वजह से वह अपने माँ बाप से चिढ़ने लगा था. 
वह चौदह साल का था, माँ बाप उसे अपने साथ योरोसलम तीर्थ पर ले गए, 
जहाँ वह गुम हो गया, बहुत ढूँढने के बाद वह योरोसलम के एक मंदिर में मरियम को वह मिला. मरियम ने झुंझला कर ईसा घसीटते हुए कहा,
''तुम यहाँ हो और तुम्हारा बाप तुम्हारे लिए परेशान है.'' 
ईसा का जवाब था मेरा कोई बाप और माँ नहीं, 
मैं ख़ुदा का बेटा हूँ और यहीं रहूँगा. 
ईसा अड़ गया, यूसुफ़ और मरियम को ख़ाली हाथ वापस लौटना पड़ा. 
ईसा के इसी एलान ने उसे ख़ुदा का बेटा बना दिया. 
वह कबीर क़ी तरह यहूदी धर्म क़ी उलटवासी कहने लगा, 
थे न दोनों समाज के नाजायज़ संतान.
वह धर्म द्रोही हुवा और सबील पर यहूदी शाशकों ने उसे लटका दिया. 
इस तरह वह  ''येसु ख़ुदा बाप का बेटा'' बन गया. 
और उसके नाम से ही एक धर्म बन गया. 
ईसाई उसे कुंवारी मारिया का बेटा कहते हैं, 
जिसमें झूट और अंध विश्वास न हो तो वह धर्म कैसा? ''

"और आप जो उन पर इतना ग़म खाते (हैं) सो शायद आप उनके पीछे अगर यह लोग इस मज़मून (क़ुरआनी) पर ईमान न लाए तो ग़म से अपनी जान दे देंगे (यानी इतना गम न करें कि क़रीब-ब-हलाकत कर दे).''
सूरह कहफ़ १८ -१५ वां पारा आयत(६)

देखिए कि मुहम्मद ख़ुद को अल्लाह से कैसा दुलरा रहे हैं. 
लगता है अल्लाह और उनका चचा भतीजे का रिश्ता हो, 
क्यूँ कि बेटे तो हो नहीं सकते. 
मुल्ला कहता है क़ुरआन को ज़ारो क़तार हो कर पढ़ा जाए, 
हैं न मुहम्मद का भारी नाटक कि अगर उनकी उम्मत उनके लिए राज़ी न होती तो वह जान दे देते.

''हमने ज़मीन पर की चीज़ों को इस (ज़मीन) के लिए बाइसे-रौनक़ बनाया ताकि हम इन लोगों की आज़माइश करें कि इन में ज़्यादः अच्छा अमल कौन करता है और हम इस (ज़मीन) पर की तमाम चीज़ों को एक साफ़ मैदान (यानी फ़ना) कर देंगे।''
सूरह कहफ़ १८ -१५ वां पारा आयत(७-८)

मुहम्मद क़ी नियत में हर जगह नफ़ी का पहलू नज़र आता है, 
एक मुसलमान बग़ैर खौ़फ़ के कोई ख़ुशी मना ही नहीं सकता. 
क़ुदरत की रौनक़ भी देखने से पहले अपनी बर्बादी का ख़याल रक्खो. 
इस कशमकश के अक़ीदे से लोग बेज़ार भी नहीं होते.

''क्या आप ये ख़याल करते हैं कि ग़ार वाले और पहाड़ वाले हमारी अजाएबात (क़ुदरत) में से कुछ तअज्जुब की चीज़ थे (वह वक़्त काबिले-ज़िक्र है) जब कि इन नव जवानो ने इस ग़ार में जाकर पनाह ली और कहा के ऐ हमारे परवर दिगार हमको अपने पास से रहमत (का सामान) अता फ़रमाइए और हमारे लिए (इस) काम में दुरुस्ती का सामान मुहय्या कर दीजिए.''
सूरह कहफ़ १८ -१५ वां पारा आयत(९-१०)

ग़ार वालों क़ी कहानी में ग़ार वालों और पहाड़ियों को अल्लाह ख़ुद अजाएबात और तअज्जुब की चीज़ बतला कर शुरू करता है, 
अल्लाह ख़ुद अपनी रचना पर तअज्जुब करता है.
 मुहम्मद तबलीग़ में लगे यहाँ तक कि पौराणिक कथा में भी ख़ुद  को क़ायम करने लगे. 
सिकंदर युगीन जवानों से अल्लाह की रहमत क़ी दरख़्वास्त करवाते हैं, 
गोया वह भी मुसलमान थे. 
(इस क़िस्त में ब्रेकट में रखे अल्फ़ाज़ तर्जुमा निगार के हैं, अल्लाह के नहीं.ऐसे ही पूरे क़ुरआन में तर्जुमान अल्लाह का उस्ताद बना हुवा है.)




जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 19 June 2018

Hindu dharm darshan 196



शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा.

क़ुरआन मैं ५० सालों से पढ़ रहा हूँ, गीता बहुत पहले एक बार पढ़ी थी, 
मैंने हिन्दू धर्म शाश्त्रों के विरोध में ज़बान कभी नहीं खोली कि 
यह हिन्दू मुस्लिम मुआमला हो जाएगा.
मैं डरता था और सोचता था कि सिर्फ़ मुसलामानों को जगाया जाए, 
हिन्दुओं के तो बहुतेरे समाज सुधारक हैं. 
मगर एक दिन अन्दर से आवाज़ आई कि मैं तो डरपोक और पक्ष पाती हूँ.
आज का पाठक भी बहुत समझदार हो गया है , 
वह विषय में तथ्य को तलाशता है हिन्दू मुस्लिम संकीर्णता को नहीं. 
जो लोग बुनयादी तौर पर कपटी हैं उनकी बात अलग है.
बहुत पहले मनुवाद और गीता पढ़ी थी, दोबारा फिर पढ़ रहा हूँ. 
अब इनको समय के हिसाब से उदर पोषक लेखकों ने छलावरण के आभूषण से  और सजा दिया है. गीता प्रेस की ओरिजनल मनु स्मृति तो अब ढूंढें नहीं मिलती.
क़ुरआन में ओलिमाओं ने अपनी बात डालने के लिए - - - 
"अल्लाह के कहने का मतलब यह है - - - " 
का सहारा लिया है . 
मिसाल के तौर पर अल्लाह कहता है - - -
"क़ुरआन सुन कर जिन्नों ने कहा इसमें तो निरा जादू है," 
मुतरज्जिम {भावार्थी) आलिम कहता है - - -
लाहौलविलाकूवत (धिककार) जादू तो झूट होता है , 
इससे तो क़ुरआन झूट साबित होता है, 
" अल्लाह के कहने का मतलब यह है  - - - " 
फिर वह क़ुरआनी आयतों में मनमानी भरता है.
गीता में  इसी " अल्लाह के कहने का मतलब यह है  - - - " 
को "तात्पर्य" का सहारा लिया गया है. 
श्लोक के बाद "तात्पर्य" लगा कर उस में अपनी गन्दी मानसिकता उंडेलते हैं.
गोया यह किराए के टट्टू भगवान् के गुरु बन जाते हैं. 
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 18 June 2018

Soorah Kahaf 18 Q-1

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह कुहफ़ 18 
(क़िस्त-1) 

कहफ़ के मानी गुफा के होते हैं. 
इस सूरह में मुहम्मद ने सिकंदर कालीन यूनानी घटना की योरपियन पौराणिक कथा को अपने ही अंदाज़ में इस्लामी साज़ ओ सामान के साथ गाया है. 
चार व्यक्ति किसी मुल्क की सरहद पार कर रहे थे कि इनको ख़बर हुई कि इन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. ये लोग डर के मारे एक ग़ार में छुप गए, साथ में इनके एक कुत्ता भी था. वह बग़रज़ हिफ़ाज़त ग़ार के मुँह पर बैठ गया. 
रात हो गई, वह लोग ग़ार में ही सो गए, सुब्ह हुई तो उन्हें भूख लगी, 
वह बचते बचाते बाज़ार गए कि कुछ खाना पीना ले आएं. 
बाज़ार में सामाने-ख़ुर्दनी ख़रीद कर जब उन्होंने उसका भुगतान किया तो दूकान दार उनका मुँह तकने लगा कि ज़माना ए क़दीम का सिक्का यह कैसे दे रहे है? 
इस ख़बर से बाज़ार में हल चल मच गई. 
पता चला कि यह तो तीन सौ साल पुराना सिक्का है, यह लोग इसे अब चला रहे हैं? गरज़ राज़ खुला कि यह तीन सौ साल तक ग़ार में सोते रहे. 

कहानी तो कहानी ही होती है, यानी 'फिक्शन' कहानी में अस्ल किरदार कुत्ते का है जो इतने बरसों तक वफ़ा दारी के साथ अपने मालिकों की हिफ़ाज़त करता रहा. 

इस पौराणिक कथा का मोरल कुत्ते की वफ़ादारी है.
 इस्लाम ने अरबी तहज़ीब ओ तमद्दुन, उसका इतिहास और उसकी विरासत का ख़ून करके दफ़्न कर दिया है, जो अपनी नई तहज़ीब बदले में मुसलमानों को दी वह उनकी हालत पर अयाँ है मगर क़ुदरत की बख़्शी हुई सदाक़तें कैसे रूपोश हो सकती हैं?
 इस्लाम ने कुत्तों की क़द्र ओ क़ीमत ख़त्म करके उसे नजिस और नापाक क़रार दे दिया. 
मुहम्मद कुत्तों से शदीद नफ़रत करते थे, कई हदीसें इसकी गवाह हैं - - -

''मुहम्मद की ग्यारवीं बेगम मैमूना कहती है कि एक रोज़ मुहम्मद पूरे दिन उदास रहे, कहा 'जिब्रील अलैहिस्सलाम ने वादा किया था कि आज वह हम से मिलने आ रहे हैं, मगर आए नहीं, ख़याल आया कि आज एक कुत्ते का बच्चा डेरे से निकला था, यह वजेह हो सकती है, वह उठे, फ़ौरन उस जगह को पानी छिड़क कर साफ़ और पाक किया, 
फ़रमाया कुत्ते की मौजूदगी और नजासत फरिश्तों को पसंद नहीं. 
सुबह उठे और हुक्म दे दिया कि तमाम कुत्तों को क़त्ल कर दिया जाए, 
जब कुत्ते मारे जाने लगे तो इस हुक्म का विरोध हुआ, 
कहा अच्छा छोटे बाग़ों के कुत्तों को मार दो, बड़ों को बागों की रखवाली के लिए रहने दो, फिर एहतेजाज हुवा कि कुत्ते तो हमारी इस तरह से हिफ़ाज़त करते हैं कि हम अपनी औरतों को उनके हमराह एक गाँव से दूसरे गाँव तक तनहा भेज देते हैं - - - 
तब कुछ सोचने के बाद कहा अच्छा उन कुत्तों को मार दो जिनकी आँखों पर दो काले धब्बे होते हैं, ऐसे कुत्तों में शैतानी अलामत होती है. 
(मुस्लिम- - - किताबुल लिबास ओ जीनत+ दीगर)

इस तरह पूरी क़ौम क़ुदरत की इस बेश बहा और प्यारी मख़लूक़ से महरूम हुई. 
वह मानते हैं कि जहाँ कुत्ते के रोएँ गिरते हैं वहां फ़रिश्ते नहीं आते. 

बाहरी दुन्या से कुत्ते की खुशबू पाकर मुहम्मदी अल्लाह इतना मुतासिर हुवा कि कुत्ते को क़ुरआनी सूरह बना दिया, जिसको आज मुसलमान वज़ू करके अपनी नमाज़ों में वास्ते सवाब पढ़ते हैं, यहाँ तक कि वह कहते हैं, 
जानवरों में सिर्फ़ यही कुत्ता जन्नत नशीन हुवा है. 
अजीब ट्रेजडी है इस क़ौम के साथ पत्थर की मूर्तियाँ इसके लिए कुफ़्र हैं. 
तो वहीँ पत्थर असवद को चूमती है. 
अंध विश्वास को कोसती है 
मगर मुहम्मदी अल्लाह अंध विश्वास से शराबोर है.
***

सूरह में बयान को बेहूदः कहा जा सकता है, ख़ुद देखिए - - -

''खूबियाँ उस अल्लाह के लिए हैं (साबित) जिसने अपने(ख़ास)बन्दे पर (ये)किताब नाज़िल फ़रमाई और इसमें ज़रा भी कजी नहीं रखी.''
सूरह कुहफ़ १८ -१५ वाँ पारा आयत(१)

ख़ूबियाँ ज़रूर सब अल्लाह की हो सकती हैं, 
ख़राबियां मुसलमानों की, ये क़ुरआन किए हुए है. 
 यह अलफ़ाज़ किसी झूठे बन्दे के हैं, जो सफ़ाई दे रहा है 
कि किताब में कोई कजी नहीं, 
अल्लाह की बात तो हाँ की हाँ और न की न होती है. 
वह हरकत अपने फ़ेल से करता है, 
इन्सान की तरह मुँह नहीं बजाता. 
भूचाल जैसी उसकी हरकतें किसी मुसलमान और काफ़िर को नहीं पहचानतीं, 
न प्यारा मौसम किसी ख़ास के लिए होता है.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 15 June 2018

सूरह बनी इस्राईल -१७ (क़िस्त 6)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है.
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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क़ुरआन सूरह बनी इस्राईल -१७
(क़िस्त 6)


 अल्लाह की मुहम्मद से वार्तालाप - - -

''आप कह दीजिए कि अल्लाह तअला मेरे और तुम्हारे दरमियान काफ़ी गवाह है वह अपने बन्दों को खूब जनता है, खूब देखता है और जिसको वह बेराह करदे तो उसको ख़ुदा के सिवा आप किसी को भी उन का मददगार न पाओगे. और हम क़यामत के रोज़ ऐसों को अँधा, गूंगा, बहरा बना कर मुँह के बल चला देंगे. ऐसों का ठिकाना दोजख़ है, वह जब ज़रा धीमी होने लगेगी, तब ही इन के लिए और ज़्यादः भड़का देंगे. यह है उनकी सज़ा इस लिए कि इन्हों ने हमारी आयतों का इंकार किया.''
सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५ आयत (९७-९८)



मुहम्मद ने अपने झूट को सच साबित करने के लिए अपने मुअय्यन और मुक़र्रर किए हुए अल्लाह को गवाह बनाया है, 
पूछा जा सकता है उस अल्लाह का गवाह कौन है? 
वह है भी या नहीं? 

देखिए कि वह अपने अल्लाह को कौन सा रूप देकर बन्दों लिए स्थापित करते हैं कि वह ख़ुद मासूम बन्दों को गुमराह करता है, 
उनको अँधा,गूंगा और बहरा बना देता है फिर मुँह के बल चलाता है .
एक सहाबा हसन बिन मालिक से हदीस है कि कोई अरबी इस आयत पर चुटकी लेते हुए मोहम्मद से पूछता है, 
''या रसूल्लिल्लाह क़यामत के दिन काफिरों को यह मुँह के बल चलाना क्या होता है? मुहम्मद फ़रमाते हैं जो अल्लाह पैरों के बल से इंसान को चला सकता है वह क्या मुँह के बल चलाने की कुदरत नहीं रखता?
(सही मुस्लिम शरअ नवी)
पूछने वाले का सवाल, जवाब तलब इसके बाद भी है कि कैसे? 
मगर किसी को मजाल न थी कि इस जवाब पर दोबारा सवाल करता, 
क्यूंकि उस वक़्त हज़रत बज़रिए मार काट और लूट पाट के, उरूज पर आ चुके थे.
शायद इसी बात पर किसी ने झुंझलाहट में कहा कि 
"फ़रिश्ते अपने पिछवाड़े से घोडा खोल सकते हैं."
ग़ौर तलब है कि मोहम्मदी अल्लाह कितना कुरूर और कितना ज़ालिम है, 
कि दुन्या का संचारण छोड़ कर दोज़ख की भाड़ झोंकता रहता है 
सिर्फ़ इस बात पर कि नोहम्मद की गढ़ी हुई आयतों को बन्दों ने मानने से इंकार किया. 
किन बुनयादों पर मुसलमानों का अक़ीदा खड़ा है? 
वह सोचते नहीं बल्कि जो सोचे उसकी माँ बहेन तौलने लगते है.



(पाँच आयातों में फिर मूसा और बनी इस्राईल का बेतुका हवाला है)


''और क़ुरआन में हमने जा बजा फ़ासला (वक़्फ़ा) रखा है ताकि आप लोगों के सामने ठहर ठहर कर पढ़ें और हम ने इसको उतारने में भी, तजरीदन (दर्जा बदर्जा) उतारा है. आप कह दीजिए कि तुम इस क़ुरआन पर ईमान लाओ या ईमान न लाओ जिन लोगों को इससे पहले दीन का इल्म दिया गया था ये जब उनके सामने पढ़ा जाता है तो वह ठुडडियों के बल सजदे में गिर पड़ते हैं और कहते हैं कि हमारा रब पाक है, बेशक हमारे रब का वादा ज़रूर पूरा ही होगा. और ठुडडियों के बल गिरते हैं, रोते हैं और ये उनका खुशु बढ़ा देता है. आप कह दीजिए ख़्वाह आप अल्लाह कह कर पुकारो या रहमान कह कर पुकारो सो इसके बहुत अच्छे नाम हैं और अपनी नमाज़ में न बहुत पुकार कर पढ़िए और न बिलकुल चुपके चुपके ही पढ़िए, और दोनों के दरमियान एक तरीक़ा अख़्तियार कर लीजिए.''
सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५ आयत (१०६-१०९)



क़ुरआन को पढ़ने का तरीक़ा सलीक़ा भी बतला दिया गया है जोकि ट्रेनिग द्वारा आज भी पाठक को बतलाई जाती है, 

इसी क़ुरआन के गुणगान और कर्म कांड में ही मुसलमानों का वक़्त कटता है. मुहम्मद इसकी पब्लिसिटी करते हैं कि लोग इसे पढ़ कर मदहोश हो जाते हैं और इसका ख़ुमार ऐसा उन पर होता है कि ठुडडियों के बल गिर गिर पड़ते हैं.
आप समझ सकते हैं कि मोहम्मद किस कद्र झूठे और मक्र आलूद थे.
***
मेरे भाइयो, 
बहनों ! 
मेरे बुजुगो!! 
नौ जवानों!!!
मेरे मिशन को समझने की कोशिश करो. मैं आप में से ही एक बेदार फ़र्द हूँ जो आने वाले वक़्त की भनक पा चुका है कि अगर तुम न जगे तो पामाल हो जाओगे. 
मैं कहाँ तुमको गुमराह कर रहा हूँ ?
तुम तो पहले से ही गुमराह हो, 
मैं तो तुम से ज़रा सी तब्दीली की बात कह रह हूँ कि 
मुस्लिम से मोमिन बन जाओ, 
सब कुछ तुम्हारा जहाँ का तहाँ रहेगा, 
बस बदल जाएगा सोचने का ढंग. 
जब तुम मोमिन हो जाओगे तो तुम्हारे पीछे तुम्हारी तक़लीद में होंगे ग़ैर मुस्लिम भी. 
और इस तरह एक पाकीज़ा क़ौम वजूद में आएगी, 
जिसको ज़माना सर उठा कर देखेगा कि यह मोमिन है, 
पार दर्शी है, 
अनोखा है.
सिकंदर दुन्या को फ़तह करते करते फ़ना हो गया, 
हिटलर ग़ालिब होते होते मग़लूब हो गया, 
इस्लाम अब इसी मुक़ाम पर आ पहुंचा है, 
अल्लाह के नाम पर मुहम्मद ने इंसानियत को बहुत नुक़सान पहुँचाया है, 
उसका ख़ामयाज़ा आज एक बड़ा मानव समाज और पूरी दुन्या में भुगत रहा है, 
जो तुम्हारी आँखों के सामने है. 
यह गुनह गार ओलिमा और उनके एजेंट ग़लत प्रोपेगंडा करते हैं 
कि इस्लाम योरोप और अमरीका में मक़बूल हो रहा है, 
यह इनकी रोटी रोज़ी का मामला है जिसके वह वफ़ा दार हैं 
मगर तुम्हारे लिए वह ग़द्दार हैं.
भूल कर मज़हब बदल कर हिन्दू, ईसाई या बहाई मत बन जाना, 
यह चूहेदानों की अदला बदली है. 
मज़हबी कट्टरता ही चूहे दान होती है. 
मेरे जज़बा ए मोमिन को समझो. 
मोमिन का दीन ही तुम्हारा दीन होगा. 
आने वाले कल में मोमिन ही सुर्ख़रू होंगे.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 14 June 2018

Hindu dharm darshan 194




श्रद्धा 
क्या बला ये श्रद्धा 

इसके पीछे हमेशा ही भोले भाले और नादान लोगों की जानें ही जाती  हैं.
उफ़ !२०१३ का केदारनाथ, १०००० का क़ीमती मानव जीवन. 
श्रद्धा सैकड़ों रचनात्मक कामों को छोड़ कर अरचनात्मकता के नज़र होती है. 
श्रद्धा भी एक तरह से विलासता का प्रतीक है. 
इस पर खर्च होने वाले पैसे को अगर स्वच्छ भारत अभियान को दे दिया जाए 
तो एक साल में भारत आईना जैसा साफ़ बन सकता है. 
हज और तीर्थ के श्रद्धालु खुद तो अराचनात्मक होते ही है, 
इनकी सेवा में लगे सेवक भी अरचनात्मकता के शिकार होते हैं. 
इनके लिए सरकारी फौज फाटे भी ज़ाया होते है. 
मज़े की बात तो यह है कि इनको शहीद करने वाले भी 
अपनी कृति को आस्था पर श्रद्धा मानते हैं . 
सरकारें श्रद्धा का विशुद्ध व्यापार करती हैं.  

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान