Monday, 19 February 2018

Hindu Dharm Darshan-143



वेद दर्शन - - -  
                         खेद  है  कि  यह  वेद  है  

इंद्र ने अपनी शक्ति द्वारा इधर उधर जाने वाले पर्वतों को अचल बनाया, 
मेघों के जल को नीचे की ओर गिराया, 
सब को धारण करने वाली धरती को सहारा दिया 
और अपनी बुद्धिमानी से आकाश को नीचे गिरने से रोका है.  
द्वतीय मंडल सूक्त 17(5)
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )

कुरआन कहता है कि 
आसमान बिना खंबे की छत है 
और वेद भी  कुछ ऐसा ही कहता है. 
कुरआन की बातें सुनकर हिन्दू मज़ाक़ उडाता है, 
और कहता है वेद को अपमानित मत करो 
क्योकि यह सब  से पुराना ग्रन्थ है. 
दोनों को ग़लत फहमी है कि योरोपियन इन्ही ग्रंथो से बहु मूल्य नुस्खे उड़ा कर ले गए हैं और आज आकाश को नाप रहे हैं. 
कितनी बड़ी विडंबना है - - - 


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Soorah anaam 6 Qist 6

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
************

सूरह अनआम ६
(क़िस्त -6)

अल्लाह के मुँह से कहलाई गई मुहम्मद की बातें क़ुरआन जानी जाती हैं और मुहम्मद के क़ौल और कथन हदीसें कहलाती हैं. मुहम्मद की ज़िन्दगी में ही मिलावटी हदीसें इतनी हो गई थीं कि उनको मुसलसल बोलते रहने के लिए हुज़ूर को सैकड़ों सालों की ज़िन्दगी चाहिए थी, ग़रज़ उनकी मौत के बाद हदीसों पर पाबन्दी लगा दी गई थी, उनके हवाले से बात करने वालों ख़तिर कोड़ों से होती थी. 
दो सौ साल बाद बुख़ारा में एक नव मुस्लिम मूर्ति पूजक बुड्ढा, मगर वाक़िए की  सच्चाई को ईमान दारी से उजागर करता - - -  
''शरीफ़  मुहम्मद इब्न ए इब्राहीम मुग़ीरा जअफ़ी बुख़ारी'' 
जो कि उर्फ़ ए आम में इमाम बुख़ारी के नाम से इस्लामी दुन्या में जाना जाता है, जिसने दर पर्दा इस्लाम की चूलें हिला कर रख दिया. इसने मुहम्मद की तमाम ख़सलतें, झूट, मक्र, ज़ुल्म, ना इंसाफी, बे ईमानी और अय्याशियाँ खोल खोल कर बयान कीं हैं. 
इमाम बुख़ारी ने किया है बहुत अज़ीम कारनामा जिसे इस्लाम के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ ''इंतक़ाम-ऐ-जारिया'' कहा जा सकता है. अंधे, बहरे और गूंगे मुसलमान उसकी हिकमत-ए-अमली को नहीं समझ पाएँगे, वह तो ख़त्म कुरआन की तर्ज़ पर ख़त्म बुख़ारी शरीफ़  के कोर्स बच्चों को करा के इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ कर रहेहैं, 
इस्लामी कुत्ते, ओलिमा. लिखते हैं कि इमाम बुख़ारी ने छः लाख हदीसों पर शोध किया और तीन लाख हदीसें कंठस्त कीं, इतना ही नहीं तीन तहज्जुद (रात की नमाज़) की रातों में एक क़ुरआन ख़त्म कर लिया करते थे और इफ्तार से पहले एक कुरआन. 
हर हदीस लिखने से पहले दो रकअत नमाज़ पढ़ते.. 
मगर उनके मरने के बाद पाई गईं सिर्फ़ २१५५ हदीसें. 

बुख़ारी लिखता है मुहम्मद के पास कुछ देहाती आए और उनसे पेट की बीमारी की शिकायत की. हुक्म हुआ कि इनको हमारे ऊंटों के बाड़े में छोड़ दो, वहां यह ऊंटों का दूध और मूत पीकर ठीक हो जाएँगे.
(ग़ौर करें कि बुख़ारी ने मुहम्मदी हुक्म से पेशाब पीना जायज़ क़रार देने का इशारा किया है, जबकि किसी भी पेशाब की एक बूंद से तन पर पड़ा हुवा कपड़ा नजिस हो जाता है.) 
कुछ दिनों बाद देहाती बाड़े के रखवाले को क़त्ल करके ऊंटों को लेकर फ़रार हो गए जिनको कि इस्लामी सिपाहियों ने जा धरा. 
उनको सज़ा मुहम्मद ने इस तरह दी कि 
सब से पहले उनके बाजू कटवाए, 
फिर टागें कटवाई, 
उसके बाद आँखों में गर्म शीशा पिलवाया 
बाद में उन्हें ग़ार ए हरा में फिकवा दिया 
जहाँ प्यास की शिद्दत लिए वह तड़प तड़प कर मर गए.
(बुख़ारी१७०) (सही मुस्लिम - - - किताबुल क़सामत)

तो इस क़दर ज़ालिम थे मुहम्मद जिनको ओलिमा मोहसिन ए इंसानियत लिखते हैं.
.
*अब देखिए मुहम्मद का मक्र क़ुरआन के सफ़हात में - - -

कहते हैं की गेहूं के साथ घुन भी पिस्ता है, मुसीबते और बीमारियाँ नेक और बद को देख कर नहीं आतीं. मगर अक्ल का दुश्मन मुहम्मदी अल्लाह ज़रा देखिए तो मुहम्मद से क्या कहता है- - -

''आप कहिए कि यह बतलाओ अगर तुम पर अल्लाह का अज़ाब आन पड़े, ख़्वाह बे ख़बरी में ख़्वाह ख़बरदारी में, तो क्या बजुज़ ज़ालिम लोगों के और कोई हलाक किया जाएगा?''
सूरह अनआम ७वां पारा आयत (४७)
एक रत्ती भर अक्ल रखने वाले के लिए क़ुरआन की यह आयत ही काफ़ी है कि वह मुहम्मद को परले दर्जे का बेवक़ूफ़ आँख बंद कर के कह दे और इस्लाम से बाहर निकल आए मगर ये हराम ज़ादे आलिमान ए दीन अपने तालिबानी गुंडों के साथ उनकी गर्दनों पर सवार जो हैं. इस से ज़्यादः मज़हकः ख़ेज़ बात और क्या हो सकती है कि जब कोई क़ुदरती आफ़त ज़लज़ला या तूफ़ान आए तो इस में काफ़िर ही तबाह हों और मुसलमान बच जाएं.

''आप कहिए कि न मैं यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं और न मैं तमाम ग़ैबों को जनता हूँ और न तुम से यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ. मैं तो सिर्फ़ मेरे पास जो वही आती है उसकी पैरवी करता हूँ. आप कहिए कि कहीं अँधा और आखों वाला बराबर हो सकता है? सो क्या तुम ग़ौर नहीं करते?''
सूरह अनआम ७वां पारा आयत (५०)

यहाँ मुहम्मद ने ख़ुद को आँखों वाला और दीगरों को अँधा साबित किया है, साथ साथ यह भी बतलाया है कि वह भविष्य की बातों को नहीं जानते. उनकी सैकड़ों ऐसी हदीसें हैं जो इस के बर अक्स हैं और पेशीन गोइयाँ करती है. विरोधाभास क़ुरआन और मुहम्मद की तक़दीर बना हुवा है.

''और जब तू इन लोगों को देखे जो हमारी आयातों में ऐब जोई कर रहे हैं तो इन लोगों से कनारा कश हो जा, यहाँ तक कि वह किसी और बात में लग जाएं और अगर तुझे शैतान भुला दे तो याद आने के बाद ऐसे ज़ालिम लोगों में मत बैठ.''
सूरह अनआम ७वां पारा आयत (६८)


मुहम्मद ने मुसलामानों पर किस ज़ोर की लगाम लगाईं है कि उनकी इस्लाह माहौल के ज़रिए करना भी बहुत मुश्किल है. उनको माहौल बदल नहीं सकता. मुल्ला जैसे कट्टर मुसलमान जब आधुनिकता की बातों वाली महफ़िल में होते हैं तो वैज्ञानिक सच्चाइयों का ज़िक्र सुन कर बेज़ार होते हैं और दिल ही दिल में तौबा कर के महफ़िल से उठ जाते हैं.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 17 February 2018

Hindu Dharm Darshan-142-G-23




गीता और क़ुरआन

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
किन्तु जो अज्ञानी और श्रद्धा विहीन व्यक्ति शाश्त्रों में संदेह करते हैं , 
श्रद्धाभावनामृत नहीं प्राप्त कर सकते. 
अपितु नीचे गिर जाते हैं. 
संशयात्मा के लिए न तो इस लोक मे, न परलोक में कोई सुख है.
जो व्यक्ति अपने कर्म फलों का परित्याग करते भक्ति करता है 
और जिसके संशय दिव्य ज्ञान द्वारा विनष्ट हो चुके होते हैं , 
वही वास्तव में आत्म परायण है. 
हे धनञ्जय ! 
वह कर्मों के बंधन में नहीं बंधता.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  -4 - श्लोक -40 - 41 

**हर धर्म की धुरी है श्रद्धा अर्थात कल्पना करना कि कोई शक्ति है जिसे हमें पूजना चाहिए. इस कशमकश में पड़ते ही गीता और क़ुरआन के रचैता आपकी कल्पना को साकार कर देते हैं, 
इसके बाद आपकी आत्म चिंतन शक्ति ठिकाने लग जाती है. 
किन्तु स्वचिन्तक बअज़ नहीं आता तब धर्म गुरु इनको गरिया शुरू कर देते हैं. 
इस ज्ञानी को अज्ञानी और नास्तिक की उपाधि मिल जाति है. 
श्रद्धाभावनामृत की पंजीरी बुद्धुओं में बांटी जाती है. 
कर्म करते रहने की भी ख़ूब परिभाषा है, 
बैल की तरह खेत जोतते रहो, 
फसल का मूल्य इनके भव्य मंदिरों में लगेगा, 
तभी तो इनकी दुकाने चमकेंगी.

क़ुरआन कहता है ---
''और जब तू इन लोगों को देखे जो हमारी आयातों में ऐब जोई कर रहे हैं तो इन लोगों से कनारा कश हो जा, यहाँ तक कि वह किसी और बात में लग जाएं और अगर तुझे शैतान भुला दे तो याद आने के बाद ऐसे ज़ालिम लोगों में मत बैठ.''
सूरह अनआम ७वां पारा आयत (६८)


मुहम्मद ने मुसलामानों पर किस ज़ोर की लगाम लगाईं है कि उनकी इस्लाह माहौल के ज़रिए करना भी बहुत मुश्किल है. उनको माहौल बदल नहीं सकता. मुल्ला जैसे कट्टर मुसलमान जब आधुनिकता की बातों वाली महफ़िल में होते हैं तो वैज्ञानिक सच्चाइयों का ज़िक्र सुन कर बेज़ार होते हैं और दिल ही दिल में तौबा कर के महफ़िल से उठ जाते हैं.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 16 February 2018

Soorah anaam 6 Qist 5

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह अनआम ६
(क़िस्त - 5)

पुर अम्न बस्ती, सुब्ह तड़के का वक़्त, लोग अध् जगे, किसी नागहानी से बेख़बर, ख़ैबर वासियों के कानों में शोर व् ग़ुल की आवाज़ आई तो उन्हें कुछ देर के लिए ख़्वाब सा लगा, मगर नहीं यह तो हक़ीक़त थी. 
आवाज़ ए तक़ब्बुर एक बार नहीं, दो बार नहीं तीन बार आई,
नारा ए तकबीर अल्लाहुअकबर - - - 

''ख़ैबर बर्बाद हुवा ! क्यूं कि हम जब किसी क़ौम पर नाज़िल होते हैं तो इन की बर्बादी का सामान होता है'' 

यह आवाज़ किसी और की नहीं, सललल्लाहो अलैहे वसल्लम कहे जाने वाले मुहम्मद की थी. 
नवजवान मुक़ाबिला को तैयार होते, इस से पहले मौत के घाट उतार दिए गए. बेबस औरतें लौडियाँ बना ली गईं और बच्चे गुलाम कर लिए गए. 
बस्ती का सारा तन और धन इस्लाम का माले ग़नीमत बन चुका था.
एक जेहादी लुटेरा वहीय क़ल्बी जो एक परी ज़ाद को देख कर उस पर फ़िदा हो जाता है, मुहम्मद के पास आता है और एक अदद बंदिनी की ख़्वाहिश का इज़हार करता है, जो मुहम्मद उसको अता कर देते हैं. 
वहीय के बाद एक दूसरा जेहादी मुहम्मद के पास दौड़ा दौड़ा आता है और इत्तेला देता है या रसूल अल्लाह सफ़िया बिन्त हई तो आप की मलिका बन्ने के लायक़ हसीन जमील है, वह बनी क़रीज़ा और बनी नसीर दोनों की सरदार थी. 
यह ख़बर सुन कर मुहम्मद के मुंह में पानी आ जाता है, 
उनहोंने क़ल्बी को बुलाया और कहा तू कोई और लौंडी चुन ले. 
मुहम्मद की एक पुरानी मंजूरे नज़र उम्मे सलीम ने उस क़त्ल और ग़ारत गरी के आलम में मज़लूम सफ़िया को दुल्हन बनाया, मुहम्मद दूलह बने और दोनों का निकाह हुवा.
लुटे घर, फुंकी बस्ती में, बाप भाई और शौहर की लाशों पर सललल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सुहाग रात मनाई. 
मुसलमान अपनी बेटियों के नाम मुहम्मद की बीवियों, लौंडियों और रखैलों के नाम पर रखते हैं, 
यह सुवरज़ाद ओलिमा के उलटे पाठ की पढाई की करामत है, 
क़ुरआन में ''या बनी इसराइल'' के नाम से यहूदियों को मुहम्मदी अल्लाह मुख़ातिब करता है. 
अरब में बज़ोर तलवार बहुत सारे यहूदी मुसलमान हो गए हैं, उनकी ही कुछ शाखें हिंदुस्तान में है जो खुद को बनी इसराइल कहते हैं मगर मुहम्मद के फ़रेब में इतने मुब्तिला हैं कि उनकी तलवार लेकर मरने मारने पर आमादः रहते हैं.

अब आइए कुरआन की ख़ुराफ़ात पर- - -

''तो आप को अगर ये क़ुदरत है कि ज़मीन में कोई सुरंग या आसमान में कोई सीढ़ी दूंढ़ लो फिर कोई मुअज्ज़ा लेकर आओ. अगर अल्लाह को मंज़ूर होता तो इन सब को राह ए रास्त पर जमा कर देता, सो आप नादानों में मत हो जाएं."
सूरह अनआम-६_७वाँ पारा (आयत३५)

अल्लाह ख़ुद मुहम्मद को फटकार रहा है, 
मुहम्मद की इस ज़ेहनी कारीगरी को क्या आम आदमी समझ नहीं सकता, मगर मुसलमान आँख बंद किए, सर झुकाए इन सौदागरी बातों को समझ नहीं पा रहा है. इन बे सिर पैर की बातों का मज़ाक़ डेढ़ हज़ार साल पहले बन चुका था, अफ़सोस कि आज इबादत बना हुवा है. ज़हीन काफ़िर दीगर नबियों जैसा मुअज्ज़ा दिखा ने की फ़रमाइश जब मुहम्मद से करते हैं तो मुहम्मदी अल्लाह कहता है- - -

''अगर आप को इन काफ़िरों की रू गर्दानी गराँ गुज़रती है तो, फिर अगर आप को क़ुदरत है तो ज़मीन में कोई सुरंग या आसमान में कोई सीढ़ी दूंढ़ लो'' 
सूरह अनआम-६_७ वाँ पारा (आयत३७)

लीजिए अल्लाह अपने दुलारे रसूल से भी रूठ रहा है क्यूं कि वह ग़म ज़दः हो रहे हैं और धीरज नहीं रख पा रहे हैं, अल्लाह पहले बन्दों को तअने देकर बातें सुनाता है फिर मुहम्मद को. 
ये आलम ए ख़्वाहिश ए पैगम्बरी में मुहम्मद की ज़ेहनी कैफ़ियत है जिसमे मक्र की बू आती है.

''और जितने क़िस्म के जानदार ज़मीन पर चलने वाले हैं और जितने क़िस् के परिंदे हैं कि अपने दोनों बाजुओं से उड़ते हैं, इसमें कोई क़िस्म ऐसी नहीं जो तुम्हारी तरह के गिरोह न हों. हमने दफ़्तर में कोई चीज़ नहीं छोड़ी फिर सब अपने परवर दिगार के पास जमा किए जाएंगे''
सूरह अनआम-६_७वाँ पारा (आयत३८)

इन अर्थ और तर्क हीन बातों में मुल्लाओं ने खूब खूब अर्थ और तर्क पिरोया है. ज़रुरत है कि इसे नई तालीम की रौशनी में लाकर इनका पर्दा फाश किया जाए.

''अल्लाह जिसको चाहे बेराह कर दे - - -'' 
सूरह अनआम-६_७वाँ पारा (आयत३९ )

अल्लाह शैतान का बड़ा भाई जो ठहरा. दोनों इंसान को गुमराह करते हैं. 
मुहम्मदी शैतान जो मुसलामानों को सदियों से गुमराह किए हुए 'है.

''मुहम्मद लोगों से पूछते हैं कि अगर कोई मुसीबत आन पड़े या क़यामत ही आ जाए तो अल्लाह के सिवा किसको पुकारोगे?"
सूरह अनआम-६_७वाँ पारा (आयत४१)

 इससे लगता है कि उस वक़्त के लोग ईश शक्ति की बुनयादी ताक़त को  मानते हुए, उसकी अलामतों को भी शक्ति मानते रहे होंगे. 
आज का आम मुसलमान भी यही समझता है, 
ख़्वाजा अजमेरी को ख़ुद अल्लाह का मार्फ़त मानता है मगर अल्लाह नहीं. 
मुहम्मदी अल्लाह कुफ़्र की दुश्मनी का ऐनक लगा कर ही हर मुआमले को देखता है.

''हमने और उम्मतों की तरफ़ भी जोकि आपसे पहले हो चुकी हैं, पैगम्बर भेजे थे, सो हमने उनको तंग दस्ती और बीमारी में पकड़ा था ताकि वह ढीले पड़ जाएं''
''सो जब उन को हमारी सजाएं पहुची थीं तो वह ढीले क्यूं न पड़े? लेकिन उनके क्लूब (ह्रदय) तो शख़्त ही रहे. और शैतान उनके आमाल को उनके ख़याल में आरास्ता करके दिखलाता है''
सूरह अनआम-६_७वाँ पारा (आयत४२-४३)

मुहम्मदी अल्लाह बड़ी बेशर्मी के साथ अपनी बद आमालियों के कारनामें बयान करते हुए मुहम्मद की पैग़म्बरी में मदद गार हो रहा है. अपने मुक़ाबले में शैतान को खड़ा करके नूरा कुश्ती का खेल खेल रहा है, बालावस्था में पड़ा मुस्लिम समाज मुंह में उंगली दबाए अपने अल्लाह की करामातें देख रहा है.

''फिर जब वह लोग इन चीज़ों को भूले रहे जिनकी इनको नसीहत की जाती थी तो हमने इन पर हर चीज़ के दरवाज़े कुशादा कर दिए, यहाँ तक कि जब उन चीज़ों पर जो उनको मिली थीं, वह खूब इतरा गए तो हमने उनको अचानक पकड़ लिया, फिर तो वह हैरत ज़दः रह गए, फिर ज़ालिम लोगों की जड़ कट गई''
सूरह अनआम-६_७वाँ पारा (आयत 44-45)


मुहम्मद एलान नबूवत के बाद अपनी फटीचर टुकड़ी को समझा रहे हैं कि उनके अल्लाह की ही देन है, यह काफ़िरों की ख़ुश हाली जो आरज़ी है. काश कि वह मेहनत और मशक्क़त का पैग़ाम देते जिस में क़ौमों की तरक्क़ी रूपोश है. 
इस्लाम का पैग़ाम तो क़त्ल ओ ग़ारत गरी और लूट पाट है.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 15 February 2018

Hindu Dharm Darshan-141V



वेद दर्शन - - -            
खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 

हे इंद्र ! घास खाकर तृप्त होने हुई गाय जिस प्रकार अपने बछड़े की भूख को समाप्त करती है, उसी प्रकार तुम शत्रु वाधा सम्मुख आने से पूर्व ही हमारी रक्षा कर लो. 
जिस प्रकार पत्नियां युवक को घेरती हैं, 
उसी प्रकार हे शत्तरुत्र इंद्र ! हम सुन्दर स्तुत्यों द्वारा तुमको घेरेंगे.
सूक्त 16-8 

पंडित अपनी सुरक्षा अग्रिम ज़मानत की तरह इंद्र देव से तलब करता है. 
उपमा देखिए कि जिस तरह धास खाकर गाय अपने बछड़े को तृप्त रखती है.
अनोखी मिसाल 
" पत्नियाँ सामूहिक रूप में युवक को घेरती हैं"
हो सकता है वैदिक युग में यह कलचर रहा हो 
कि इस पर उनके पतियों को कोई एतराज़ न होता रहा हो, 
वैसे कामुक इंद्र देव की रिआयत से पत्नियों की जगह कुमारियाँ होना चाहिए था. 
पंडित जी कहते हैं उसी तरह वह इन्दर देव को घेरेगे.
हिंदुओ ! कब तक इन पाखंडियों के मनुवाद के घेरे में घिरे रहोगे?
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )


विवाह की इच्छा से आई हुई कन्याओं को भागता देख कर परावृज ऋषि सब के सामने खड़े हुए. 
इंद्र की कृपा से वह पंगु दौड़ा और अँधा होकर भी देखने लगा. 
इंद्र ने यह सब सोमरस के मद में किया है.
सूक्त 15-7 

आप भांग पीकर इस वेद श्लोक को जितना चाहें और जैसे चाहें कल्पनाओं की दुन्या में कूद सकते हैं मगर मैं समझता हूँ कि वेद ज्ञान को शून्य कर देता है,अज्ञानता में ढकेल देता है.
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 14 February 2018

Soorah anaam 6 Qist 4

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह अनआम ६
(क़िस्त -4)

कोई देखे या न देखे अल्लाह देख रहा है .

काश कि हम अल्लाह को इस क़दर करीब समझ कर ज़िन्दगी को जिएँ. 
मगर अल्लाह की गवाही का डर किसे है?
उसकी जगह अगर बन्दे में दरोगा जी के बराबर भी अल्लाह का डर हो तो इन्सान गुनाहों से बाज़ आ सकता है. 
कोई देखे या न देखे अल्लाह देख रहा है, 
की जगह यह बात एकदम सही होगी कि 
" कोई देखे या न देखे मैं तो देख रहा हूँ." 
दर अस्ल अल्लाह का कोई गवाह नहीं है, आलावा कुंद ज़ेहन मुसलमानों के जो लाउड स्पीकर से अजानें दिया करते कि 
" मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अलावा कोई अल्लाह नहीं"
और 
"मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके दूत हैं."
अल्लाह ग़ैर मुस्तनद है, 
और मैं अपनी ज़ात को लेकर सनद रखता हूँ कि मैं हूँ.
इस लिए मेरा देखना अपने हर आमल को यक़ीनी है. 
इसी को लेकर तबा ताबईन (मुहम्मद के बाद के) कहे जाने वाले मंसूर को सजाए मौत हुई, 
उसने एलान किया था कि मैं खुदा हूँ (अनल हक़)
इंसान अगर अपने अन्दर छिपे खुदा का तस्लीम करके जीवन जिए तो दुन्या बहुत बदल सकती है.

क़ुरआन कहता है - - -

''यहाँ तक कि जब यह लोग आप के पास आते हैं तो आप से ख़्वाह मख़्वाह झगड़ते हैं. यह लोग जो काफ़िर हैं वोह यूं कहते हैं यह तो कुछ भी नहीं सिर्फ़ बे सनद बातें हैं जो कि पहले से चली आ रही हैं और यह लोग इस से औरों को भी रोकते हैं और ख़ुद भी इस से दूर रहते हैं और यह लोग अपने को ही तबाह करते है और कुछ ख़बर नहीं रखते.''
सूरह अनआम -६-७वाँ पारा आयत (२६)

सोचने की बात यह है कि डेढ़ हज़ार साल पहले, उस वक़्त के लोग आज के कुंद ज़हनों से ज़्यादः समझदार थे. मूसा और ईसा के प्रचलित, क़िस्से दौर ए जहालत में अंध विशवास के रूप में रायज थे, जिसको चंट मुहम्मद ने रसूले-खुदा बन के सच साबित किया, मगर, बहर हाल झूट का अंजाम बुरा होता है जो आज दुन्या की एक बड़ी आबादी भुगत रही है.

''और अगर आप देखें जब ये दोज़ख के पास खड़े किए जाएँगे तो कहेंगे -- कितनी अच्छी बात होती कि हम वापस भेज दिए जाएं और हम अपने रब की बातों को झूटा न बतलाएं और हम ईमान वालों में हो जाएं''
सूरह अनआम -६-७वाँ पारा आयत (२7)

आगे ऐसी ही बचकानी बातें मुहम्मद करते हैं कि लोग इस पर यक़ीन कर के इस्लाम कुबूल करें. ऐसी बचकाना बातों पर जब तलवार की धारों से सैक़ल किया गया तो यह ईमान बनती चली गईं. 
तलवारें थकीं तो मरदूद आलिमों की ज़बान इसे धार देने लगीं.

''और मेरे पास ये क़ुरआन बतौर वही (ईश वाणी) भेजा गया है ताकि मैं इस क़ुरआन के ज़रीए तुम को और जिस जिस को ये क़ुरआन पहुंचे, इन सब को डराऊं''
सूरह अनआम-६-७वाँ पारा आयत(२८)

क़ुरआन बतौर वही नहीं बज़रीए वही कहें, या रसूलल्लाह!
क़ुरआनी अल्लाह अपनी किताब क़ुरआन में न आगाह करता है, न वाक़िफ़ कराता है और न ख़बरदार करता है, बस डराता रहता है. 
ज़ाहिर है कि वह उम्मी है, उनके पास न तो अल्फ़ाज़ के भंडार हैं, न ज़बान दानी के तौर तरीके. बच्चों को डराया जाता है, बड़ों को धमकाया जाता है, मुहम्मद को इस की तमाज़त नहीं. वह बड़े बूढों, औरत मर्द, गाऊदी और मुफ़क्किर, सब को अपने बनाए अल्लाह के बागड़ बिल्ले से डराते हैं. 
मुसलमानों का तकिया कलाम बन गया है,
''अल्लाह से डरो'' 
भला बतलाइए कि क्यूँ ख़्वाह मख़्वाह अल्लाह से डरें ? 
वह कोई साँप बिच्छू या भेडिया तो नहीं? 
डरना है तो अपनी बद आमालियों से डरो जिसका कि अंजाम बुरा होता है. आप की बद आमालियाँ वह हैं जो दूसरों को नुक़सान पहुंचाएं.
इन कुंद ज़ेहन साहिब ए ईमान मुसलामानों को कोई समझाए कि अरबों ख़रबों बरस से क़ायम इस कायनात का अगर कोई रचना कार है भी तो वह एक जाहिल जपट मुहम्मद से अपनी सहेलियों की तरह, अपने गम गुसारों की तरह, अपने महबूब की तरह बात करेगा? 
अगर तुम्हारा यक़ीन इतना ही कच्चा है तो कोई गम नहीं कि तुम इस नई दुन्या में सफा-ए-हस्ती से मिटा दिए जाओ और जगे हुए इंसानों के लिए जगह ख़ाली करदो कि जो दो वक़्त की रोटी नहीं पा रहे हैं. हालांकि वह बेदार हैं और तुम अक़ीदत की नींद में डूबे हुए गुनाहगार ओलिमा को हलुवा पूरी खिला रहे हो. 
मगर नहीं रुको मैं इतना और कह दूं कि मुहम्मद ने तो सिर्फ़ क़ुरैशियों की हलुवा पूरी को क़ायम करना चाहा था मगर यह बीमारी तो सारी दुन्या को लग गई? दुन्या को दुन्या जाने, मैं तो सिर्फ़ पंद्रह करोर हिदुस्तानी मुसलमानों को जगाना चाहता हूँ. 

देखो कि ब्रह्माण्ड का रचैता एक धूर्त से कैसे बातें करता है - - -
''हम ख़ूब जानते हैं कि आप को इनके अक़वाल मग़मूम करते हैं, सो यह लोग आप को झूटा नहीं कहते, लेकिन यह ज़ालिम अल्लाह तअला की आयातों का इनकार करते हैं.
अनआम-६-७वाँ पारा आयत(३३)

मेरे भोले भाले मुसलमानों क्या यह अय्यारी की बातें तुम्हारे समझ में नहीं आतीं?


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 13 February 2018

Hindu Dharm Darshan-140-G-22



गीता और क़ुरआन

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
जैसे प्रज्वलित अग्नि ईधन को भस्म कर देती है,
उसी तरह से
अर्जुन !
ज्ञान रुपी अग्नि भौतिक कर्मों के सभी फलों को जला डालती है.
इस संसार में दिव्य ज्ञान के सामान कुछ भी उदात्त तथा शुद्ध नहीं .
ऐसा ज्ञान समस्त योग का परिपक्व फल है.
जो व्यक्ति भक्ति में सिद्ध हो जाता है,
वह यथा समय अपने अंतर में इस ज्ञान का आस्वादन करता है.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  - 4 - श्लोक -37- 38

बहुत ज्ञान मनुष्य को भ्रमित और गुमराह किए रहता है,
इन ज्ञानियों को बहुधा भौतिक सुख और सुविधा का आदी ही देखा जाता है,
वह मान और सम्मान के भूके होते हैं.
और अगर ज्ञान पाकर मनुष्य गुमनाम हो जाए,
तब तो ज्ञान का लाभ ही ग़ायब हो जाता है.
वैसे भी इस युग में ईश्वरीय ज्ञान का कोई महत्व नहीं.
यह युग विज्ञान का है.
विज्ञान के लिए गहन अध्यन की ज़रुरत है,
तप और तपश्या की नहीं.
ठीक कहा है
"ज्ञान रुपी अग्नि भौतिक कर्मों के सभी फलों को जला डालती है. "
अर्थात ज्ञान का फल राख का ढेर.
भभूति लगा कर ज्ञान का चिंमटा बजाइए.

और क़ुरआन कहता है - - -
''फिर जब वह लोग इन चीज़ों को भूले रहे जिनकी इनको नसीहत की जाती थी तो हमने इन पर हर चीज़ के दरवाज़े कुशादा कर दिए, यहाँ तक कि जब उन चीज़ों पर जो उनको मिली थीं, वह खूब इतरा गए तो हमने उनको अचानक पकड़ लिया, फिर तो वह हैरत ज़दः रह गए, फिर ज़ालिम लोगों की जड़ कट गई''
सूरह अनआम-६_७वाँ पारा (आयत  44-45)

धर्म और मज़हब का ज्ञान मानव जाति को अज्ञान परोसता है.
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान