Monday, 22 October 2018

सूरह फ़ातिर-35 -سورتہ فاطر (क़िस्त - 2)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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 सूरह फ़ातिर-35 -سورتہ فاطر
(क़िस्त - 2)  

अल्लाह के कारनामे मुलाहिज़ा हों - - - 

"तो क्या ऐसा शख़्स जिसको उसका आमले-बद से अच्छा करके दिखाया गया, फिर वह उसको अच्छा समझने लगा, और ऐसा शख़्स जिसको क़बीह को क़बीह (बुरा) समझता है, कहीं बराबर हो सकते हैं
सो अल्लाह जिसको चाहता गुमराह करता है.
जिसको चाहता है हिदायत करता है .
सो उन पर अफ़सोस करके कहीं आपकी जान न जाती रहे.
अल्लाह को इनके सब कामों की ख़बर है.
और अल्लाह हवाओं को भेजता है, फिर वह बादलों को उठाती हैं फिर हम इनको खुश्क कर के ज़मीन की तरफ़ हाँक ले जाते हैं, फिर हम इनको इसके ज़रिए से ज़मीन को ज़िंदा करते हैं. इसी तरह (रोज़े -हश्र  इंसानों का) जी उठाना है. जो लोग इज्ज़त हासिल करना चाहें तो, तमाम इज्ज़त अल्लाह के लिए ही हैं.
अच्छा कलाम इन्हीं तक पहुँचता है और अच्छा काम इन्हें पहुँचाता है."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (8-10)

इन आयतों के एक एक जुमले पर ग़ौर करिए कि उम्मी अल्लाह क्या कहता है?
*मतलब ये कि अच्छे और बुरे दोनों कामों के फ़ायदे हैं मगर दोनों बराबर नहीं हो सकते.
*मुसलमानों के लिए सबसे भला काम है= जिहाद, फिर नमाज़, ज़कात और हज वग़ैरह और बुरा काम इन की मुख्लिफत. 
*जब अल्लाह ही बन्दे को गुमराह करता है तो ख़ता वार अल्लाह हुवा या बंदा?
*जिसको हिदायत नहीं देता तो उसे दोज़ख़ में क्यूँ डालता है ? 
क्या इस लिए कि दोज़ख़ से, उसका पेट भरने का वादा किए हुए है ?
*जब सब कामों की ख़बर है तो बेख़बरी किस बात की? 
फ़ौरन सज़ा या मज़ा चखा दे, क़यामत आने का इंतज़ार कैसा? 
बुरे काम करने ही क्यूँ देता है इंसान को?
*अल्लाह हवाओं को हाँकता है, जैसे चरवाहे मुहम्मद बकरियों को हाँका करते थे.
*गोया कि इंसान दफ़्न होगा और रोज़ हश्र बीज की तरह उग आएगा. 
फिर सारे आमाल की ख़बर रखने वाला अल्लाह ख़ुद भी नींद से उठेगा 
और लोगों के आमालों का हिसाब किताब करेगा.
*"तमाम इज्ज़त अल्लाह के लिए ही हैं.
"तब तो तुम इसके पीछे नाहक़ भागते हो, 
इस दुन्या में बेईज्ज़त बन कर ही जीना है. 
जो मुसलमान जी रहे हैं.
मुसलमानों! 
तुम जागो. अल्लाह को सोने दो. 
क़यामत हर खित्ता ए ज़मीन पर तुम्हारे लिए आई हुई है. 
पल पल तुम क़यामत की आग में झुलस रहे हो. 
कब तुम्हारे समझ में आएगा. 
क़यामत पसंद मुहम्मद हर तालिबान में ज़िंदा है 
जो मासूम बच्चियों को तालीम से ग़ाफ़िल किए हुए है. 
गैरत मंद औरतों पर कोड़े बरसा कर ज़िन्दा दफ़्न करता है. 
ठीक ऐसा ही ज़िन्दा मुहम्मद करता था.

"अल्लाह ने तुम्हें मिटटी से पैदा किया, फिर नुत्फ़े से पैदा किया, फिर तुमको जोड़े जोड़े बनाया और न किसी औरत को हमल रहता है, न वह  जनती है, मगर सब उसकी इत्तेला से होता है और न किसी की उम्र ज़्यादः की जाती है न उम्र कम की जाती है मगर सब लौहे-महफ़ूज़ (आसमान में पत्थर पर लिखी हुई किताब) में होता हो.ये सब अल्लाह को आसान है."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (11)

इंसान के तकमील का तरीक़ा कई बार बतला चुके हैं अल्लाह मियाँ ! 
कभी अपने बारे में भी बतलाएँ कि आप किस तरह से वजूद में आए.
उम्मी का ये अंदाज़ा यहीं तक महदूद है ?
वह अनासिरे ख़मसा (पञ्च तत्व) से बे ख़बर है ?
"मिटटी से भी और फिर नुतफ़े से भी"? 
मुहम्मद तमाम मेडिकल साइंस को कूड़े दान में डाले हुए हैं. 
मुसलमान आसमानी पहेली को सदियों से बूझे और बुझाए हुए है.

"और दोनों दरिया बराबर नहीं है, एक तो शीरीं प्यास बुझाने वाला है जिसका पीना आसान है. और एक खारा तल्ख़ है और तुम हर एक से ताजः गोश्त खाते हो, ज़ेवर निकलते हो जिसको तुम पहनते हो और तू कश्तियों को इसमें देखता है, पानी को फाड़ती हुई चलती हैं, ताकि तुम इससे रोज़ी ढूढो और शुक्र करो."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (12)

मुहम्मदी अल्लाह की मालूमात देखिए कि खारे समन्दर को दूसरा दरिया कहते हैं, 
ताजः मछली को ताजः गोश्त कहते हैं, 
मोतियों को जेवर कहते हैं. 
हर जगह ओलिमा अल्लाह की इस्लाह करते हैं. 
भोले भाले और जज़बाती मुसलमानों को गुमराह करते हैं. 

"वह रात को दिन में और दिन को रात दाख़िल कर देता है. उसने सूरज और चाँद को काम पर लगा रक्खा है. हर एक वक्ते-मुक़र्रर पर चलते रहेंगे. यही अल्लाह तुम्हारा परवर दिगार है और इसी की सल्तनत है और तुम जिसको पुकारते हो उसको खजूर की गुठली के छिलके के बराबर भी अख़्तियार नहीं" 
सूरह फ़ातिर -35 आयत (13)

रात और दिन आज भी दाख़िल हो रहे हैं एक दूसरे में 
मगर वहीँ जहाँ तालीम की रौशनी अभी तक दाख़िल नहीं हुई.
अल्लाह सूरज और चाँद को काम पर लगाए हुए है 
अभी भी जहां आलिमाने-दीन की बद आमालियाँ  है. 
मुहम्मदी अल्लाह की हुकूमत क़ायम रहेगी 
जब तक इस्लाम मुसलमानों को सफ़ा ए हस्ती से नेस्त नाबूद न कर देगा.

"अगर वह तुमको चाहे तो फ़ना कर दे और एक नई मख़लूक़ पैदा कर दे, अल्लाह के लिए ये मुश्किल नहीं."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (14)

अल्लाह क्या, कोई भी गुंडा बदमाश किसी को फ़ना कर सकता है.
मगर मख़लूक़ में इंसान भी एक क़िस्म की मख़लूक़ , 
अगर वह इसे ख़त्म कर दे तो पैग़मबरी किस पर झाडेंगे?
मैं बार बार मुहम्मद की अय्यारी और झूट को उजागर कर रहा हूँ 
ताकि आप जाने कि उनकी हक़ीक़त क्या है. 
यहाँ पर मख़लूक की जगह वह काफ़िर जैसे इंसानों को मुख़ातिब करना चाहते हैं मगर इस्तेमाल कर रहे हैं शायरी लफ़्फ़ाज़ी.

"आप तो सिर्फ़ ऐसे लोगों को डरा सकते हैं जो बिन देखे अल्लाह से डर सकते हों और नमाज़ की पाबंदी करते हों."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (18)

बेशक ऐसे गधे ही आप की सवारी बने हुए हैं.

"और अँधा और आँखों वाला बराबर नहीं हो सकते और न तारीकी और रौशनी, न छाँव और धूप और ज़िंदे मुर्दे बराबर नहीं हो सकते. अल्लाह जिस को चाहता है सुनवा देता है. और आप उन लोगों को नहीं सुना सकते जो क़ब्रों में हैं." 
सूरह फ़ातिर -35 आयत (19-22)

मगर या अल्लाह तू कहना क्या चाहता है, 
तू ये तो नहीं रहा कि मुल्ला जी और डाक्टर बराबर नहीं हो सकते.
जो इस पैग़ाम को सुनने से पहले क़ब्रों में चले गए, 
क्या ?
उन पर क्यों नाफ़िज़ होगा यह है कलाम पाक ? 
तू रोज़े-हश्र मुक़दमा चला कर दोज़खी जेलों में ठूँस देगा ? 
तेरा उम्मी रसूल तो यही कहता है कि उसका बाप अब्दुल्लह भी जहन्नम रसीदा होगा.
या अल्लाह क्या तू इतना नाइंसाफ़ हो सकता है?
दुन्या को शर सिख़ाने  वाले फ़ित्तीन के मरहूम वालिद का उसके जुर्मों में क्या कुसूर हो सकता है? 

कलामे दीगराँ - - - 
"आदमी में बुराई ये है कि वह दूसरे का मुअल्लिम (शिक्षक) बनना चाहता है और बीमारी ये है कि वह अपने खेतों की परवाह नहीं करता और दूसरे के खेतों की निराई करने का ठेका ले लेता है."
 कानफ़्यूश
यह है कलाम पाक 


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 21 October 2018

सूरह सबा-34 -سورتہ سبا Q-2

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह सबा-34 -سورتہ سبا
(क़िस्त -2)  

 चलते है क़ुरआन की हक़ीक़त पर 
"सो अपनों ने सरताबी की तो हमने उन पर बंद का सैलाब छोड़ दिया, हमने उनको फलदार बाग़ों के बदले, बाँझ बागें दे दीं जिसमें ये चीज़ें रह गईं, बद मज़ा फल और झाड़, क़द्रे क़लील बेरियाँ उनको ये सज़ा हमने उनकी नाफ़रमानी की वजेह से दीं, और हम ऐसी सज़ा बड़े ना फ़रमानों को ही दिया करते हैं."
सूरह सबा 34 आयत (17)
अल्लाह बन बैठा रसूल अपनी तबीअत, फ़ितरत और ख़सलत के मुताबिक़ अवाम को सज़ा देने के लिए बेताब रहता है. वह किस क़दर ज़ालिम था कि उसकी अमली तौर में दास्तानें हदीसों में भरी पडी हैं. तालिबान ऐसे दरिन्दे उसकी ही पैरवी कर रहे हैं. 
देखिए कि अपने लोगों के लिए कैसी सोच रखता है, 
"सो अपनों ने सरताबी की तो हमने उन पर बंद का सैलाब छोड़ दिया"
अल्लाह की बेशरमी मुलाहिज़ा हो ,
"हम ने उनको अफ़साना बना दिया और उनको बिलकुल तितर बितर कर दिया. बेशक इसमें हर साबिर और शाकिर के लिए बड़ी बड़ी इबरतें हैं"
सूरह सबा 34 आयत (19)
मुसलमानों! 
अगर ऐसा अल्लाह कोई है जो अपने बन्दों को तितर बितर करता हो और उनको तबाह करके अफ़साना बना देता हो तो वह अल्लाह नहीं बंदा ए  शैतान है, जैसे कि मुहम्मद थे.
वह चाहते हैं कि उनकी ज़्यादितियों के बावजूद लोग कुछ न बोलें और सब्र करें.
"उन्होंने ये भी कहा हम अमवाल और औलाद में तुम से ज्यादः हैं और हम को कभी अज़ाब न होगा. कह दीजिए मेरा परवर दिगार जिसको चाहे ज्यादः रोज़ी देता है और जिसको चाहता है कम देता है, लेकिन अकसर लोग वाक़िफ़ नहीं और तुम्हारे अमवाल और औलाद ऐसी चीज़ नहीं जो दर्जा में हमारा मुक़र्रिब बना दे, मगर हाँ ! जो ईमान लाए और अच्छा काम करे, सो ऐसे लोगों के लिए उनके अमल का दूना सिलह है. और वह बाला ख़ाने  में चैन से होंगे."
सूरह सबा 34 आयत (35-37)

कनीज़ मार्या के हमल को आठवाँ महीना लगने के बाद जब समाज में चे-मे गोइयाँ शुरू हुईं तो मार्या के दबाव मे आकर मुहम्मद ने उसे अपनी कारस्तानी क़ुबूला और बच्चा पैदा होने पर उसको अपने बुज़ुर्ग इब्राहीम का नाम  दिया, उसका अक़ीक़ा भी किया. ढाई साल में वह मर गया तब भी समाज में चे-मे गोइयाँ हुईं कि बनते हैं अल्लाह के नबी और बुढ़ापे में एह लड़का हुवा, उसे भी बचा न सके. तब मुहम्मद ने अल्लाह से एक आयत उतरवाई " इन्ना आतोय्ना कल कौसर - - - "यानी उस से बढ़ कर अल्लाह ने मुझको जन्नत के हौज़ का निगराँ बनाया - - -
तो इतने बेगैरत थे हज़रात.
इस सूरह के पासे मंज़र मे इन आयतों भी मतलब निकाला जा सकता है.
एक उम्मी की रची हुई भूल भुलैय्या में भटकते राहिए कोई रास्ता ही न मिलेगा, 

"आप कहिए कि मैं तो सिर्फ़ एक बात समझता हूँ, वह ये कि अल्लाह वास्ते खड़े हो जाओ, दो दो, फिर एक एक, फिर सोचो कि तुम्हारे इस साथी को जूनून नहीं है. वह तुम्हें एक अज़ाब आने से पहले डराने वाला है."
सूरह सबा 34 आयत (46)

बेशक, ये आयत ही काफ़ी है कि आप पर कितना जूनून था. दो दो, फिर एक एक - - - फिर उसके बाद सिफ़र सिफ़र फिर नफ़ी एक एक यानी बने हुए रसूल की इतनी धुनाई होती और इस तरह होती कि इस्लामी फ़ितने का वजूद ही न पनप पाता. 

यहूदी धर्म कहता है - - -
ऐ ख़ुदा!
फ़िरके फ़िरके का इन्साफ़ करेगा. मुल्क मुल्क के लोगों के झगड़े मिटाएगा, 
वह अपने तलवारों को पीट पीट कर हल के फल और भालों को हँस्या बनाएँगे, 
तब एक फ़िरका दूसरे फ़िरके पर तलवारें नहीं चलाएगा न आगे लोग जंग के करतब सीखेंगे.
"तौरेत"

ये हो सकती है अल्लाह की वह्यी या कलाम ए पाक.     


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 16 October 2018

Hindu Dharm Darshan 240



शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (43)

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
>अपने मन को मेरे नित्य चिंतन में लगाओ, 
मेरे भक्त बनो, मुझे नमस्कार करो और मेरी ही पूजा करो. 
इस प्रकार मुझ में पूर्णतया तल्लीन होने पर 
तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त करोगे. 
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  -9  श्लोक -34 

>भगवान् को प्राप्त करने के बाद साधक को क्या मिलता है ?
गूंगे को गुड का स्वाद ? जिसे वह बयान नहीं कर पाता. 
या अंधे की कल्पना जिसमे डूब कर वह हमेशा मुस्कुराया करता है ? 
क्या गीता लोगों को अँधा और गूंगा बनती है ? 
परम सुख है औरों को सुख देना और भगवान् स्वयं सुख पाने का पाठ पढ़ा रहे हैं.

और क़ुरआन कहता है - - - 
>''ऐ ईमान वालो! 
अगर तुम अल्लाह से डरते रहोगे तो, वह तुम को एक फैसले की चीज़ देगा और तुम से तुम्हारे गुनाह दूर क़र देगा और तुम को बख्श देगा और अल्लाह बड़ा फ़ज़ल वाला है.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत ( २९ )

अल्लाह के एजेंट बने मुहम्मद उसकी बख्शी हुई रियायतें बतला रहे हैं. 
पहले उसके बन्दों को समझा दिया कि उनका जीना ही गुनाह है, 
वह पैदा ही जहन्नम में झोंके जाने के लिए हुए हैं, 
इलाज सिर्फ़ यह है कि मुसलमान होकर मुहम्मद और उनके कुरैशियों को टेक्स दें और उनके लिए जेहाद करके दूसरों को लूटें मारें जब तक कि वह भी उनके साथ जेहादी न बन जाएँ.
ना करदा गुनाहों के लिए बख्शाइश का अनूठा फार्मूला जो मुसलमानों को धरातल की तरफ खींचता रहेगा.
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 15 October 2018

सूरह फ़ातिर-35 -سورتہ فاطر (क़िस्त -1)

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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 सूरह फ़ातिर-35 -سورتہ فاطر
(क़िस्त -1) 

तारीख़ अरब के मुताबिक़ बाबा ए क़ौम  इब्राहीम के दो बेटे हुए  
इस्माईल और इसहाक़. 
छोटे इसहाक़ की औलादें बनी इस्राईल कहलाईं जिन्हें यहूदी भी कहा जाता है. इन में नामी गिरामी लोग पैदा हुए, मसलन यूफुफ़, मूसा, दाऊद, सुलेमान और ईसा वग़ैरह और पहली तारीख़ी किताब मूसा ने शुरू की तो उनके पैरो कारों ने साढ़े चार सौ सालों तक इसको मुरत्तब करने का सिलसिला क़ायम रखा. 
लौंडी जादे हाजरा (हैगर) पुत्र इस्माइल की औलादें इस नाम व से महरूम रहीं जिनमें मुहम्मद भी आते हैं. 
इस्माइलियों में हमेशा ये क़लक़ रहता कि काश हमारे यहाँ भी कोई पैग़मबर होता कि हम उसकी पैरवी करते. 
इन रवायती चर्चा मुहम्मद के दिल में गाँठ की तरह बन्ध गई कि क़ौम में पैग़ामरी की जगह ख़ाली है.
मदीने की एक उम्र दराज़ बेवा मालदार ख़ातून ख़दीजा ने मुहम्मद को अपने साथ निकाह की पेश काश की. वह फ़ौरन राज़ी हो गए कि बकरियों की चरवाही से उन्हें छुट्टी मिली और आराम के साथ रोटी का ज़रीया मिला. 
इस राहत के बाद वह रोटियाँ बांध कर ग़ार ए हिरा में जाते और अल्लाह का रसूल बन्ने का ख़ाका तैयार करते.
इस दौरान उनको जिंसी तकाजों का सामान भी मिल गया था और छह अदद बच्चे भी हो गए, साथ में ग़ार ए हिरा में आराम और प्लानिंग का मौक़ा भी मिलता कि रिसालत की शुरूवात कब की जाए, कैसे की जाए, 
आगाज़, हंगाम और अंजाम की कशमकश में आख़िर कार एक रोज़ फैसला ले ही लिया कि गोली मारो सदाक़त, सराफ़त और दीगर इंसानी क़दरों को. ख़ारजी तौर पर समाज में वह अपना मुक़ाम जितना बना चुके हैं, वही काफ़ी है.
एक दिन उन्हों ने अपने इरादे को अमली जामा पहनाने का फैसला कर ही डाला. अपने क़बीले क़ुरैश को एक मैदान में इकठ्ठा किया, 
भूमिका बनाते हुए उन्हों ने अपने बारे में लोगों की राय तलब की, 
लोगों ने कहा तुम औसत दर्जे के इंसान हो कोई बुराई नज़र नहीं आती, सच्चे, ईमान दार, अमानत और साबिर तबा शख़्स हो. 
मुहम्मद  ने पूछा अगर मैं कहूँ कि इस पहाड़ी के पीछे एक फ़ौज आ चुकी है, तो यक़ीन कर लोगे? 
लोगों ने कहा कर सकते हैं इसके बाद मुहम्मद ने कहा - - -
मुझे अल्लाह ने अपना रसूल चुना है.
ये सुन कर क़बीला भड़क उट्ठा. 
कहा तुम में कोई ऐसे आसार, ऐसी ख़ूबी और अज़मत नहीं कि तुम जैसे जाहिल गँवार को अल्लाह पयंबरी के लिए चुनता फिरे.
मुहम्मद के चाचा अबू लहेब बोले,
 "माटी मिले, तूने इस लिए हम लोगों को यहाँ बुलाया था? 
सब के सब मुँह फेर कर चले गए. 
मुहम्मद की इस हरकत और जिसारत से क़ुरैशियों  को बहुत तकलीफ़ पहुंची मगर मुहम्मद मैदान में कूद पड़े तो पीछे मुड कर न देखा.
बाद में वह क़ुरैशियों के बा असर लोगों से मिलते रहे और समझाते रहे 
कि अगर तुमने मुझे पैग़मबर मान लिया और मैं कामयाब हो गया तो तुम बाक़ी क़बीलों में बरतर होगे, 
मक्का ज़माने में बरतर होगा 
और अगर नाकाम हुवा तो ख़तरा सिर्फ़ मेरी जान को होगा. 
इस कामयाबी के बाद, बदहाल मक्कियों को हमेशा हमेश के लिए रोटी सोज़ी का सहारा मिल जाएगा.
मगर क़ुरैश अपने माबूदों (पूज्य) को तर्क करके मुहम्मद को अपना माबूद बनाए जाने को तैयार न हुए.

इस हक़ीक़त के बाद क़ुरआन की आयातों को परखें.

"तमाम तर हम्द अल्लाह तअला को लायक़ है जो आसमानों और ज़मीनों को पैदा करने वाला है. जो फ़रिश्तों को पैग़ाम रसा बनाने वाला है, जिनके दो दो तीन तीन और चार चार पर दार बाजू हैं, जो पैदाइश में जो चाहे ज़्यादः कर देता है. बे शक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (1)

तमाम हम्द उन हस्तियों की होनी चाहिए जिनहों ने इंसान और इंसानियत के किए कुछ किया हो. 
जो मुसबत ईजादों के मूजिद हों. 
उन पर लअनतें हों जिन्हों ने इंसानी ख़ून से नहाया हो .
ईसाइयों के फ़रिश्ते न नर होते हैं न नारी और उनका कोई जिन्स भी नहीं होता, अलबत्ता छातियाँ होती हैं जिस को मुहम्मदी अल्लाह कहता है ये लोग तब मौजूद थे जब वह पैदा हुए कि उनको औरत बतलाते हैं. 
तअने देता है कि अपने लिए तो बेटा और अल्लाह के लिए बेटी?
मुहम्मद हर मान्यता का धर्म का विरोध करते हुए अपनी बात ऊपर रखते हैं, चाहे वह कितनी भी धांधली ही क्यूं न हो. 
ख़ुद फ़रिश्तों के बाज़ू गिना रहे हैं, जैसे अपनी आँखों से देखा हो. 

"अल्लाह जो रहमत लोगों के लिए खोल दे, सिवाए इसके कोई बंद करने वाला नहीं और जिसको बंद कर दे, सो इसके बाद इसको कोई जारी करने वाला नहीं - - - ए लोगो ! तुम पे जो अल्लाह के एहसान हैं, इसको याद करो, क्या अल्लाह के सिवा कोई ख़ालिक़ है जो तुमको ज़मीन और आसमान से रिज़्क पहुँचाता हो. इसके सिवा कोई लायक़-इबादत नहीं. अगर ये लोग आप को झुट्लाएंगे तो आप ग़म न करें क्यूंकि आप से पहले भी बहुत से पैग़ामबर झुट्लाए जा चुके हैं."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (2-4)

अभी तक कोई अल्लाह खोजा नहीं जा सका, 
दुन्या को वजूद में आए लाखों बरस हो गए. 
अगर वह मुहम्मदी अल्लाह है तो निहायत टुच्चा है, 
जिसे नमाज़ रोज़ों की शदीद ज़रुरत है. 
किसी भी इंसान पर वह एहसान नहीं करता बल्कि ज़ुल्म ज़रूर करता है 
कि आज़ाद रूह किसी पैकर के ज़द में आकर ज़िन्दगी पर थोपी गई मुसीबतें झेलता है. 

"ए लोगो! अल्लाह का वादा ज़रूर सच्चा है, सो ऐसा न हो कि ये दुन्यावी ज़िन्दगी तुम्हें धोके में डाल रखे और ऐसा न हो कि तुम्हें धोकेबाज़ शैतान अल्लाह से धोके में डाल दे. ये शैतान बेशक तुम्हारा दुश्मन है, सो तुम इसको दुश्मन समझते रहो. वह तो गिरोह को महेज़ इस लिए बुलाता है कि वह दोंनों दोज़खियों में शामिल हो जाएँ."
सूरह फ़ातिर -35 आयत (5-6)

अल्लाह और शैतान दोनों ही इन्सान को दोज़ख़ में डालने का बेड़ा उठाए हुए हैं. शैतान लड़ता है कि अल्लाह इंसानों का दुश्मन नंबर वन है, 
तभी तो किसी वरदान की तरह दोज़ख़ रसीदा करने का वादा करता है,
ऐसे अल्लाह को जूते मार कर घर (दिल) से बाहर करिए, 
और शैतान नंबर दो को समझने की कोशिश करिए 
जिसकी बकवास ये क़ुरआन है.
उम्मी फ़रमाते हैं "धोकेबाज़ शैतान अल्लाह से धोके में डाल दे."
मुतराज्जिम अल्लाह की इस्लाह करते हैं.

कलामे दीगराँ - - -
"जन्नत और दोज़ख़ दोनों इंसान के दिल में होते हैं."
"शिन्तो"
  जापानी पयम्बर   
इसे कहते हैं कलाम पाक 

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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 13 October 2018

Hindu Dharm Darshan 239



शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (42)

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
>यदि कोई जघन्य से जघन्य कर्म करता है, 
किन्तु यदि वह भक्ति में रत रहता है तो 
उसे साधु मानना चाहिए.
क्योंकि वह अपने संकल्प में अडिग रहता है. 
>>वह तुरंत धर्मात्मा बन जाता है और स्थाई शान्ति को प्राप्त होता है. 
हे कुंती पुत्र ! 
निडर होकर घोषणा करदो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  -9  श्लोक -30 +31 

>कितनी खोखली बात कही है गीता ने. क्या यह गीता अपराधियों की शरण स्थली नहीं ?
 बड़े बड़े डाकू भगवान् की इन बातों का सहारा लेकर गुनाहों से तौबा करते हैं, उसके बाद धर्मात्मा बन कर पूजे जाते हैं. उन की लूट आसान हो जाति है, बिना खून खराबे के माल काटते हैं.

और क़ुरआन कहता है - - - 
मुगीरा नाम का एक कातिल एक कबीले का विशवास पात्र बन कर सोते में पूरे कबीले का खून करके मुहम्मद के पास आता है और इस्लाम कुबूल कर लेता है, इस शर्त के साथ कि उसका लूटा हवा माल उसका होगा . मुहम्मद फ़ौरन राज़ी हो जाते हैं.
*मुगीरा*= इन मुहम्मद का साथी सहाबी की हदीस है कि इन्होंने (मुगीरा इब्ने शोअबा) एक काफिले का भरोसा हासिल कर लिया था फिर गद्दारी और दगा बाज़ी की मिसाल क़ायम करते हुए उस काफिले के तमाम लोगो को सोते में क़त्ल करके मुहम्मद के पनाह में आए थे और वाकेआ को बयान कर दिया था, फिर अपनी शर्त पर मुस्लमान हो गए थे. (बुखारी-११४४)
गीता और क़ुरआन खोटे सिक्के के दो पहलू हैं, इनका चलन जब तलक देश में प्रचलित रहेगा, भारत के बाशिंदों का दुर्भाग्य कायम रहेगा.
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 12 October 2018

सूरह सबा-34 -سورتہ سبا Q-1

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह सबा-34 -سورتہ سبا
क़िस्त -1 

इस सूरह में ऐसा कुछ भी नहीं है जो नया हो. 
मुहम्मद कुफ़्फ़ार ए मक्का के दरमियान सवाल-व-जवाब का सिलसिला दिल चस्प है. 
कुफ़्फ़ार कहते हैं - -
"ए मुहम्मद ये क़ुरआन तुम्हारा तराशा हुआ झूट है"
क़ुरआन मुहम्मद का तराशा हुवा झूट है, ये सौ फ़ीसदी सच है. 
कमाल का ख़मीर था उस शख़्स का, जाने किस मिटटी का बना हुवा था वह, शायद ही दुन्या में पैदा हुवा हो कोई इंसान, 
तनहा अपनी मिसाल आप है वह. 
अड़ गया था अपनी तहरीक पर जिसकी बुनियाद झूट और मक्र पर रखी हुई थी. हैरत का मुक़ाम ये है कि हर सच को ठोकर पर मारता हुवा, 
हर गिरफ़्त पर अपने पर झाड़ता हुवा, 
झूट के बीज बोकर फ़रेब की फ़सल काटने में कामयाब रहा. 
दाद देनी पड़ती है कि इस क़द्र बे बुन्याद दलीलों को लेकर उसने इस्लाम की वबा फैलाई कि इंसानियत उस का मुंह तकती रह गई. 
साहबे-ईमान लोग मुजरिम की तरह मुँह छिपाते फिरते. 
ख़ुद साख़्ता पैग़मबर की फैलाई हुई बीमारी बज़ोर तलवार दूर दराज़ तक फैलती चली गई.
वक़्त ने इस्लामी तलवार को तोड़ दिया मगर बीमारी नहीं टूटी. 
इसके मरीज़ इलाज ए जदीद की जगह इस्लामी ज़हर पीते चले गए, 
ख़ास कर उन जगहों पर जहाँ मुक़ामी बद नज़मी के शिकार और दलित लोग. 
इनको मज़लूम से ज़ालिम बनने का मौक़ा जो मिला. 
इस्लाम की इब्तेदा ये बतलाती है कि मुहम्मद का ख़ाब क़बीला ए क़ुरैश की अज़मत क़ायम करना और अरब की दुन्या तक ही था, 
इस कामयाबी के बाद अजमी (ग़ैर अरब) दुन्या इसके लूट का मैदान बनी, साथ साथ ज़ेहनी  गुलामी के लिए तैयार इंसानी फ़सल भी. मुहम्मद अपनी जाबिराना आरज़ू के तहत बयक वक़्त दर पर्दा अल्लाह बन गए, मगर बज़ाहिर उसके रसूल ख़ुद को क़ायम किया. 
वह एक ही वक़्त में रूहानी पेशवा, मुमालिक का रहनुमा और बेताज बादशाह हुआ , 
इतना ही नहीं, एक डिक्टेटर भी थे, बात अगर जिन्स की चले तो राजा इन्दर साबित होता है.
कमाल ये कि मुतलक़ जाहिल, एक क़बीलाई फ़र्द. हट धर्मी को ओढ़े-बिछाए, जालिमाना रूप धारे, जो चाहा अवाम से मनवाया, इसकी गवाही ये क़ुरआन और उसकी हदीसें हैं. 
मुहम्मद की नक़्ल करते हुए हज़ारों बाबुक खुर्मी और अहमदी हुए मगर कोई मुहम्मद की गर्द भी न छू सका.
देखिए और समझिए की अल्लाह क्या कहता है - - - 

"तमाम तर हम्द उसी अल्लाह को सज़ावार है जिसकी मिलकियत में है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है और उसी को हुक्म आख़िरत में है और वह हिकमत वाला ख़बरदार है."
सूरह सबा 34 आयत (1)

मुसलमानों!
अल्लाह को किसी हम्द की ज़रुरत है न वह कोई मिलकियत रखता है. 
उसने एक निज़ाम बना कर मख़लूक़ को दे दिया है, उसी के तहत इस दुन्या का कारोबार चलता है. आख़िरत बेहतर वो होती है कि आप मौत से पहले मुतमईन हों कि आपने किसी का बुरा नहीं किया है. 
नादान लोग अनजाने में बद आमाल हो जाते हैं, वह अपना अंजाम भी इसी दुन्या में झेलते हैं. 
हिसाब किताब और मैदान हश्र मुहम्मद की यहूदियत से उधार ली हुई मंतिक़ और घातें हैं.

"और ये काफ़िर कहते हैं कि हम पर क़यामत न आएगी, आप फ़रमा दीजिए कि क्यूं नहीं? क़सम है अपने परवर दिगार आलिमुल ग़ैब की, वह तुम पर आएगी, इससे कोई ज़र्रा बराबर भी ग़ायब नहीं, न आसमान में और न ज़मीन में और न कोई चीज़ इससे छोटी है न बड़ी है मगर सब किताब ए मुबीन में है."
सूरह सबा 34 आयत (3)

अल्लाह ख़ुद अपनी क़सम खाता है और अपनी तारीफ़ अपने मुँह से करता हुआ ख़ुद को "परवर दिगार आलिमुल ग़ैब" बतलाता है. ऐसे अल्लाह से नजात पाने में ही समझदारी है. 
बेशक क़यामत काफ़िरों पर नहीं आएगी क्यूंकि वह रौशन दिमाग हैं 
और मुसलमानों पर तो पूरी दुन्या में हर रोज़  क़यामत आती है 
क्यूंकि वह अपने मज़हब की तारीकियों में भटक रहे हैं.

"काफ़िर कहते हैं कि हम तुमको ऐसा आदमी बतलाएँ कि जो तुमको ये अजीब ख़बर देता है, जब तुम मरने के बाद (सड़ गल कर) रेज़ा रेज़ा हो जाओगे तो (क़यामत के दिन) ज़रूर तुम एक नए जन्म में आओगे. मालूम नहीं अल्लाह पर इसने ये झूट बोहतान बाँधा है या इसको किसी तरह का जुनून है."
सूरह सबा 34 आयत  (7-8)

जैसा कि हम बतला चुके हैं कि इस्लाम की बुनयादी रूह यहूदियत है. 
ये अक़ीदा भी यहूदियों का है कि क़यामत के रोज़ सबको उठाया जाएगा, पुल ए सरात से सबको गुज़ारा जायगा जिसे गुनाहगार पार न कर पाएँगे और कट कर जहन्नम रसीदा होंगे, मगर बेगुनाह लोग पुल को पार कर लेंगे और जन्नत में दाख़िल होंगे. इस बात को अरब दुन्या अच्छी तरह जानती थी, मुहम्मद ऐसा बतला रहे हैं जैसे इस बात को वह पहली बार लोगों को बतला रहे हों. इस बात से अल्लाह पर कोई बोहतान या इलज़ाम आता है?

"और हमने दाऊद को अपनी तरफ़ से बड़ी निआमत दी थी,  ए पहाड़ो! दाऊद के साथ तस्बीह किया करो और परिंदों को हुक्म दिया और सुलेमान अलैहिस सलाम के लिए हवा को मुसख़्ख़िर (मुग्ध करने वाला) कर दिया था  कि इसकी सुबः की मंज़िल एक एक महीने भर की हुई और इसकी शाम की मंज़िल एक महीने भर की हुई और हमने इनके लिए ताँबे का चश्मा बहा दिया और जिन्नातों में बअज़े  ऐसे थे जो इनके आगे काम करते थे, उनके रब के हुक्म से और उनमें से जो हमारे हुक्म की सरताबी करेगा हम उसको दोज़ख़ का अज़ाब चखा देंगे. वह जिन्नात उनके लिए ऐसी चीजें बनाते जो इन्हें मंज़ूर होता. बड़ी बड़ी इमारतें, मूरतें और लगन जिससे हौज़ और देगें एक जगह जमी रहें. ए दाऊद के ख़ानदान वालो! तुम सब शुक्रिया में नेक काम किया करो और मेरे बन्दों में शुक्र गुज़ार कम ही हैं."
सूरह सबा 34 आयत (10-13)

ए मेरे अज़ीज़ दोस्तों! 
कुछ ग़ौर करो कि क्या पढ़ते हो. 
क्या तुम्हारा अक़ीदा उस अल्लाह पर है जो पहाड़ों से तस्बीह पढ़वाता हो? 
देखिए कि आपका उम्मी रसूल अपनी बात भी पूरी तरह नहीं कर पा रहा. 
पागलों की तरह जो ज़बान में आता है, बकता रहता है. 
उसके सआदत मंद इन लग्वयात को नियत बाँध कर नमाज़ें पढ़ते हैं. 
भला कब तक जिहालत की कतारों में खड़े रहोगे ? 
इस तरह तुम अपनी नस्लों के साथ ज़ुल्म और जुर्म किए जा रहे हो. 
ऐसी क़ुरआनी आयतों को उठा कर कूड़ेदान के हवाले करो जो कहती हों कि- - -
"ए पहाड़ो! दाऊद के साथ तस्बीह किया करो और इत्तेला देती हों कि सुलेमान अलैहिस सलाम के लिए हवा को मुसख़्ख़िर (मुग्ध करने वाला) कर दिया था "
ये सुब्ह व शाम की मंज़िलों का पता मिलता है अरब के गँवारों के इतिहास में, आज हिंद में ये बातें दोहराई जा रही हैं .
"सुबः की मंज़िल एक एक महीने भर की हुई और इसकी शाम की मंज़िल एक महीने भर की हुई." 
"हमने इनके लिए ताँबे का चश्मा बहा दिया "
तांबा तो खालिस होता ही नहीं, ये लोहे और पीतल का मुरक्कब हुआ करता है, रसूल को इसक भी इल्म नहींकि धातुओं का चश्मा नहीं होता. जिहालत कुछ भी गा सकती है. मगर तुम तो तालीम याफ़्ता हो चुके हो, फिर तुम जिहालत को क्यूं गा रहे हो?
"जिन्नातों में बअज़े  ऐसे थे जो इनके आगे काम करते थे,"
अगर ये मुमकिन होता तो सुलेमान जंगें करके हज़ारों यहूदी जानें न कुर्बान करता और जिन्नातों को इस काम पर लगा देता.
जिन्नात कोई मख़लूक़ नहीं होती है, अपनी औलादों को समझाओ..
"जो हमारे हुक्म की सरताबी करेगा हम उसको दोज़ख़ का अज़ाब चखा देंगे"
अल्लाह कैसे गुंडों जैसी बातें करता है, ये अल्लाह की नहीं गुन्डे मुहम्मद की ख़सलत बोल रही है.
"बड़ी बड़ी इमारतें, मूरतें और लगन जिससे हौज़ और देगें एक जगह जमी रहें."
ये मुहम्मद कालीन वक़्त की ज़रुरत थी, अल्लाह को मुस्तकबिल की कोई ख़बर नहीं कि आने वाले ज़माने में पानी गीज़र से गर्म होगा और वह भी चलता फिरता हुवा करेगा.
 "मेरे बन्दों में शुक्र गुज़ार कम ही हैं."
कैसे अल्लाह हैं आप कि बन्दों को कंट्रोल नहीं कर पा रहे? 
और पहाड़ों से तस्बीह कराने का दावा करते हैं.  

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 11 October 2018

Hindu Dharm Darshan 238



शपथ गीता की, जो कहूँगा सच कहूँगा. (41)

भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
>जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं के बीच जन्म लेते है,
जो पितरों को पूजते हैं वे पितरों के पास जाते हैं, 
जो भूत प्रेतों की उपासना करते हैं वे उन्हीं के बीच जन्म लेते हैं, 
और जो मेरी पूजा करते है वे मेरे साथ ही निवास करते हैं.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  - 9  - श्लोक -25 
>हे कृष्ण भगवान ! 
तुमको पूजने से तो बेहतर है हम औरों को पूजें, या अपने पितरों को. 
कम से कम दूसरे आपकी तरह ब्लेक मेलिंग तो नहीं करेगे.
स्वयंभू भगवान् बन कर, महिमा मंडित होकर, हमारा दिमाग़ तो नहीं खाते रहेंगे. 

और क़ुरआन कहता है - - - 
>''आप फरमा दीजिए तुम तो हमारे हक में दो बेहतरीयों में से एक बेहतरी के हक में ही मुताज़िर रहते हो और हम तुम्हारे हक में इसके मुन्तजिर रहा करते हैं कि अल्लाह तअला तुम पर कोई अज़ाब नाज़िल करेगा, अपनी तरफ से या हमारे हाथों से.सो तुम इंतज़ार करो, हम तुम्हारे साथ इंतज़ार में हैं.''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (५२)

यह आयत मुहम्मद की फितरते बद का खुला आइना है, 
कोई आलिम आए और इसकी रफूगरी करके दिखलाए. 
ऐसी आयतों को ओलिमा अवाम से ऐसा छिपाते हैं जैसे कोई बद ज़ात औरत अपने नाजायज़ हमल को ढकती फिर रही हो. 
आयत गवाह है कि मुहम्मद इंसानों पर अपने मिशन के लिए अज़ाब बन जाने पर आमादा थे. 
इस में साफ़ साफ मुहम्मद खुद को अल्लाह से अलग करके निजी चैलेन्ज कर रहे हैं, 
क़ुरआन अल्लाह का कलाम को दर गुज़र करते हुए अपने हाथों का मुजाहिरा कर रहे हैं. 
अवाम की शराफत को ५०% तस्लीम करते हुए अपनी हठ धर्मी पर १००% भरोसा करते हैं. 
तो ऐसे शर्री कूढ़ मग्ज़ और जेहनी अपाहिज हैं 
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान