Thursday, 18 January 2018

Hindu Dharm Darshan-129



गीता और क़ुरआन
भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
यदि कोई कृष्णाभावनामृत अंगीकार कर लेता है तो भले ही वह शाश्त्रानुमोदित कर्मों को न करे अथवा ठीक से भक्ति न करे और चाहे वह पतित भी हो जाए तो इसमें उसकी हानि या बुराई नहीं होगी. किन्तु यदि वह शाश्त्रानुमोदित सारे कार्य करे तो उसके किस काम का है ?
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1.5.17

और क़ुरआन कहता है - - - 
"कुल्ले नफ़्सिन ज़ाइक़तुलमौत''-हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है, और तुम को तुम्हारी पूरी पूरी पादाश क़यामत के रोज़ ही मिलेगी, सो जो शख्स दोज़ख से बचा लिया गया और जन्नत में दाखिल किया गया, सो पूरा पूरा कामयाब वह हुवा। और दुनयावी ज़िन्दगी तो कुछ भी नहीं, सिर्फ धोके का सौदा है।" 
सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयात (185) 

क्या गीता और कुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?
क्या इन्हीं किताबों पर हाथ रख कर हम अदालत में सच बोलने की क़सम खाते हैं ? ?
धरती पर शर और फ़साद के हवाले करने वाले यह ग्रन्थ 
क्या इस काबिल हैं कि इनको हाज़िर व् नाज़िल किया जाए, गवाह बनाया जाए ???


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 17 January 2018

Soorah Nisa 4 Q-5

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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निसाँअ 4 पाँचवाँ पारा 
क़िस्त 5  

हलाक़ू के समय में अरब दुन्या का दमिश्क़ शहर इस्लामिक माल ए ग़नीमत से ख़ूब फल फूल रहा था. ओलिमा ए दीन (धर्म गुरू) झूट का अंबार किताबों की शक्ल में खड़ा कर रहे थे. 
हलाक़ू बिजली की तरह दमिश्क़ पर टूटा, 
लूट पाट के बाद  उसने ओलिमा की ख़बर ली, जो इस्लामी झूट के किताबों की मीनार खडी किए हुए थे. 
सब को इकठ्ठा किया और पूछा यह किताबें किस काम आती हैं? 
जवाब था पढने के. 
फिर पूछा - सब कितनी लिखी गईं? 
जवाब- साठ हज़ार. 
फिर उसने पूछा तुम लोग और क्या करते हो? ज़रीया मुआश ??
ओलिमा बोले हम लोग आलिम हैं हमारा यही काम है. 
हलाक़ू पर  हलाक़त का जलाल चढ़ गया. 
हुक्म दिया- - -
 इन किताबों को तुम लोग खाओ. 
ओलिमा बोले हुज़ूर यह खाने की चीज़ थोढ़े ही है. 

हलाक़ू बोला यह किसी काम की चीज़ नहीं है, 
और न ही तुम किसी कम की चीज़ हो. 
हलाक़ू के सिपाहिओं ने उसके इशारे पर दमिश्क की लाइब्रेरी में आग लगा दी. वह उस वक़्त दुन्या की सबसे बड़ी इस्लामी लाइब्रेरी थी. 
और सभी ओलिमा को मौत के घाट उतार दिया. 
आज भी इस्लामिक और तमाम धार्मिक लाइब्रेरी को आग के हवाले कर देने की ज़रुरत है.
क़ज़ज़ाक़ लुटेरे और वहशी अपनी वहशत में कुछ अच्छा भी कर गए. 
हलाक़ू का ही पोता चंगेज़ ख़ान जिसने इस्लाम को स्वीकारा मगर  क़ज़ज़ाक़ परम्परा के साथ. 
मुसलमान होने के बाद उसने दो मुल्लाओं को नौकरी पर रख लिया ताकि वह समय समय पर उसकी रहनुमाई किया करें. कि मौक़ा ब मौक़ा इस्लाम क्या कहता है. 
उनमें एक थे बड़े मुल्ला और दूसरे छोटे मुल्ला, 
दोनों एक दूसरे के छुपे दुश्मन. जैसा कि हमेशा से होता चला आ रहा है.
एक दिन अचनाक चंगेज़ कि बूढी माँ मर गई. 
बड़े मुल्ला इस्लामिक तौर तरीक़े बतलाने के लिए तलब किए गए, 
बाक़ी मंगोली क़बीलाई एतबार से जो होता है वह होगा, उस से इस्लाम का कोई लेना देना नहीं. 
माँ के साथ साथ उसके तमाम नौकर चाकर, साज व् सामान, कुछ दिनों का खाना पीना दफ़न करना क़ज़ज़ाक़ी हुक्म हुवा, 
मौक़ा मुनासिब था कि बड़े मुल्ला छोटे को इसी बहाने निपटा दें.
उनहोंने चंगेज़ को राय दिया कि हुज़ूर क़ब्र में मुनकिर नकीर मुर्दे को ज़िदा करके सवाल जवाब के लिए आते है, 
एक मुल्ला की वहां ज़रुरत पड़ेगी, अम्माँ बेचारी कहाँ जवाब दे पाएगी ? बेहतर है कि छोटे मुल्ला को इन के हमराह कर दें. 
वह बहुत क़ाबिल भी है. 
चंगेज़ को बात मुनासिब लगी और हुक्म हुवा कि छोटे मुल्ला को अम्माँ के साथ दफ़न कर दिया जाए. 
हुक्म सुन कर छोटे मुल्ला की जान निकल गई कि यह कारस्तानी बड़े मुल्ला की है. 
वह भाग कर चंगेज़ के पास गया और बोला यह क्या नादानी कर रहे हैं आप?. हुज़ूर समझदारी से काम लें , बूढी माँ के लिए बूढ़े मुल्ला को रखिए.
आप ने सुना नहीं कि बड़ा होकर भी उसने मेरी तारीफ़ की. 
मैं यक़ीनन उस से ज़्यादा क़ाबिल हूँ.
आप मुझको अपने लिए बचा के क्यूं नहीं रखते, 
आप के सर लाखों के ख़ूनों का गुनाह है, मैं बखूबी मुनकिर नकीर से निमट सकता हूँ, आपका हम उम्र भी हूँ.
अम्माँ के लिए इस बूढ़े मुल्ला को भेज दें,ये मुनासिब होगा. 
चंगेज़ को बात समझ में आ गई और बड़े मुल्ला जी बुढिया के साथ दफ़न कर दिए गए.

क़ज़ज़ाक़ों का क़ज़ज़ाकिस्तान इस्लाम के असर में आकर एक इस्लामी मुल्क बन गया था.
७९ साल तक रूस की ला मज़हबीयत ने उसे मुसलमान से इंसान बनाया फिर वह आज़ाद हुए. 
आज़ाद क़ज़ज़ाकिस्तान के सामने मुस्लिम मुमालिक ने फिर इस्लामी लानत के टुकड़े फेंके जिसे उस जगी हुई कौम ने ठुकरा दिया.
चंगेज़ का पोता तैमूर लंग हुवा जिसकी ज़ुल्म की कहानी दिल्ली कभी नहीं भूलेगी. तैमूर का पोता बाबर, बाबर के पोते दर पोते बहादुर शाह ज़फर और उनकी पोती आज कोलकोता की गली में चाय कि फुट पाथी दूकान पर झूटी प्यालियाँ धोती है.

अब अल्लाह की २+२=५ की बातों पर आओ और 
मुसलमान बने रहो या फिर आँखें खोलो, 
बहादुर और ईमान दार मोमिन बन कर जीने का अहद करो. 
मोमिन जिसका कि इस्लाम ने इस्लामी करण करके मुस्लिम कर दिया है और अपने झूट को सच का जामा पहना दिया.

अल्लाह कहता है.- - - 
"यह तो कभी न हो सकेगा कि सब बीवियों में बराबरी रखो, तुम्हारा कितना भी दिल चाहे." 
सूरह निसाँअ 4 पाँचवाँ पारा- आयात (129) 

यह क़ुरआनी आयत है अपनी ही पहली आयात के मुक़ाबले में जिसमें अल्लाह कहता है दो दो तीन तीन चार चार बीवियां कर सकते हो मगर मसावी सुलूक और हुक़ूक़ की शर्त है, और अब अपनी बात काट रहा है, 
कुरानी कठमुल्ले मुहम्मदी अल्लाह की इस कमजोरी का फ़ायदा यूँ उठाते है की अल्लाह ये भी तो कहता है. 

"ऐ ईमान वालो! इंसाफ पर खूब क़ायम रहने वाले और अल्लाह के लिए गवाही देने वाले रहो."
सूरह निसाँअ 4 पाँचवाँ पारा- आयात (135) 

मुसलमानों !
सोचो तुम्हारा अल्लाह इतना कमज़ोर है कि बन्दों की गवाही चाहता है? 
अगर तुम पीछे हटे तो वोह मुक़दमा हार जाएगा. 
उस झूठे और कमज़ोर अल्लाह को हार जाने दो. 
ताक़त वर जीती जागती क़ुदरत तुम्हारा इन्तेज़ार अपनी सदाक़त की बाहें फैलाए हुए कर रही है.

"जब एहकाम ए इलाही के साथ इस्तेह्ज़ा (मज़ाक) होता हुवा सुनो तो उन लोगों के पास मत बैठो - - - इस हालत में तुम भी उन जैसे हो जाओगे।'' 
सूरह निसाँअ 4 पाँचवाँ पारा- आयात (140) 

मुहम्मद की उम्मियत में पुख्तगी थी, अपनी जेहालत पर ही उनका ईमान था जिसमें वह आज तक कामयाब हैं. जब तक जेहालत क़ायम रहेगी मुहम्मदी इसलाम क़ायम रहेगा. 
इस आयात में यही हिदायत है कि तालीमी रौशनी में इस्लामी जेहालत का मज़ाक बनेगा. "ज़मीन नारंगी की तरह गोल और घूमती हुई दिखती है, रोटी की तरह चिपटी और क़ायम नहीं है." 

एहकाम ए इलाही में ज़्यादा तर इस्तेहज़ा के सिवा है क्या ? 
इस में एक से एक हिमाक़तें दरपेश आती हैं. 👀

Tuesday, 16 January 2018

Hindu Dharm Darshan-128



गीता और क़ुरआन
भगवान् कृष्ण कहते हैं - - -
तुम सुख या दुःख ,हानि या लाभ, विजय या पराजय का विचार किए बिना युद्ध करो ऐसा करने पर तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा.
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 38 

और क़ुरआन कहता है - - - 
"और उन से कहा गया आओ अल्लाह की रह में लड़ना या दुश्मन का दफ़ीअ बन जाना। वह बोले कि अगर हम कोई लडाई देखते तो ज़रूर तुम्हारे साथ हो लेते, यह उस वक़्त कुफ़्र से नजदीक तर हो गए, बनिस्बत इस हालत के की वह इमान के नज़दीक तर थे।" 
सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयात (168) 

क्या गीता और कुरआन के मानने वाले इस धरती को पुर अमन रहने देंगे ?
क्या इन्हीं किताबों पर हाथ रख कर हम अदालत में सच बोलने की क़सम खाते हैं ? ?
धरती पर शर और फ़साद के हवाले करने वाले यह ग्रन्थ 
क्या इस काबिल हैं कि इनको हाज़िर व् नाज़िल किया जाए, गवाह बनाया जाए ???


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 15 January 2018

Soorah Nisa 4 Q-4

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह निसाँअ ४ 
क़िस्त- 4   

मैं पहले उम्मी मुहम्मद की एक भविष्य वाणी यानी हदीस से आप को आगाह कराना चाहूंगा, 
उसके बाद उनकी शाइरी कुरआन पर आता हूँ - - -

''दूसरे ख़लीफ़ा उमर के बेटे अब्दुल्ला के हवाले से ... 
रसूल मक़बूल सललललाहो अलैहे वसललम (मुहम्मद की उपाधियाँ) ने फ़रमाया एक ऐसा वक़्त आएगा कि उस वक़्त तुम लोगों की यहूदियों से जंग होगी, अगर कोई यहूदी पत्थर के पीछे छुपा होगा तो पत्थर भी पुकार कर कहेगा कि ऐ मोमिन मेरी आड़ में यहूदी छुपा बैठा है, आ इसको क़त्ल कर दे. 
(बुख़ारी १२१२)
आज मुसलमान पहाड़ी पत्थरों में छुपे यहूदियों के ही बोसीदा ईजाद हथियारों से लड़ कर अपनी जान गँवा रहे हैं. इंसानी हुक़ूक़ उनको बचाए हुए है मगर कब तक? 
मुहम्मद की जेहालत रंग दिखला रही है. 
  
क़ुरआन कहता है - - - 
"बअज़े ऐसे भी तुम को ज़रूर मिलेंगे जो चाहते हैं तुम भी बे ख़तर होकर रहो और अपने क़ौम से भी बे ख़तर होकर रहें. जब इन को कभी शरारत की तरफ़ मुतवज्जो किया जाता है तो इस में गिर जाते हैं. यह लोग अगर तुम से कनारा कश न हों और न तुम से सलामत रवी रखें और न अपने हाथ को रोकें तो ऐसे लोगों को पकडो और क़त्ल कर दो जहाँ पाओ " 
सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (91) 

मुहम्मद ये उन लोगों को क़त्ल कर देने का हुक्म दे रहे हैं जो आज सैकुलर जाने जाते हैं और मुसलमानों के लिए पनाह ए अमां बने हुए हैं. 
भारत में आज़ादी के पहले यह भी मुसलमानों के लिए काफ़िर ओ मुशरिक जैसे ही थे, मगर इब्नुल वक़्त ओलिमा आज इनकी तारीफ़ में लगे हुए हैं. वैसे भी नज़रियात बदल जाते हैं, मज़हब बदल जाते हैं मगर खून के रिश्ते कभी नहीं बदलते. मुहम्मदी इसलाम इन्सान से ग़ैर फ़ितरी काम कराता है, इसी लिए बिल आख़ीर रुसवा ए ज़माना है. 
मैं एक बार फिर आप की तवज्जो को होश में लाना चाहता हूँ कि इस कायनात का निगराँ, वह अज़ीम हस्ती अगर कोई है भी तो क्या उसकी बातें ऐसी टुच्ची किस्म की हो सकती हैं जो क़ुरआन कहता है? 
किसी बस्ती के ना इंसाफ मुख्या की तरह, या कभी किसी कस्बे के बे ईमान बनिए जैसा ?. 
कभी गाँव के लाल बुझक्कड़ की तरह ?. 
अल्लाह भी कहीं ज़नानो की तरह बैठ कर पुत्राओ-भत्राओ करता है? 
कुन फ़यकून की ताक़त रखता है तो पंचायती बातें क्यूँ? 
आख़िर मुसलमानों को समझ क्यों नहीं आती, उस से पहले उसे हिम्मत क्यों नहीं आती? 

"और किसी मोमिन को शान नहीं की किसी मोमिन को क़त्ल करे और किसी मोमिन को ग़लती से क़त्ल कर दे तो उसके ऊपर एक मुसलमान ग़ुलाम या लौंडी को आज़ाद करना है और ख़ून बहा है, जो उसके ख़ानदान के हवाले से दीजिए, मगर ये की वह लोग मुआफ़  कर दें." 
सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (92)

"और जो किसी मुसलमान का क़सदन क़त्ल कर डाले तो इस की सज़ा जहन्नम है जो हमेशा हमेशा को इस में रहना." 
सूरह निसाँअ ४ चौथा पारा आयात (93) 

बड़ी ताक़ीद है कि मोमिन मोमिन को क़त्ल न करे, 
इस्लामी तारीख़ जंगों से भरी पड़ी हैं और ज़्यादा तर जंगें आपस में मुसलमनो की इस्लामी मुल्को और हुक्मरानों के दरमियान होती हैं. 
आज ईरान, ईराक, अफ़ग़ानिस्तान, और पाकिस्तान में खाना जंगी मुसमानों की मुसलमानों के साथ हो रही है. भुट्टू और मुजीबुर रहमान जैसा सिलसिला रुकने का नहीं लेता, मज़े की बात ये है कि इनको मारने वाले शहीद और जन्नत रसीदा होते हैं, मरने वाले चाहे भले न होते हों. मुसलमान आपस में एक दूसरे से हमदर्दी रखते हों या नहीं मगर इस जज़्बे का नाजायज़ फ़ायदा उठा कर एक दूसरे को चूना ज़रूर लगाते हैं.  

"अल्लाह तअला ने इन लोगों का दर्जा बहुत ज़्यादा बनाया है जो अपने मालों और जानों से जेहाद करते हैं, बनिसबत घर में बैठने वालों के, बड़ा उज़्र ए अज़ीम दिया है, यानी बहुत से दर्जे जो अल्लाह तअला की तरफ़ से मिलेंगे।" 
सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (95) 

मुहम्मद ने जेहाद का आग़ाज़ भर सोचा था, अंजाम नहीं, अंजाम तक पहुँचने के लिए उनके पास ईसा और गौतम जैसा ज़ेहन ही नहीं था, न ही होने वाले रिश्ते दार नौ शेरवान ए आदिल का दिल था. उन्होंने अपनी विरासत में क़ुरआन की ज़हरीली आयतें छोडीं, तेज़ तर तलवार और माल ए ग़नीमत के धनी ख़ुलफ़ा, उमरा, सुलतान, और खुदा वंद बादशाह, 
साथ साथ ज़ेहनी ग़ुलाम जाहिल उम्मत की भीड़. 

"मुहम्मदी अल्लाह कहता है जब ऐसे लोगों की जान फ़रिश्ते क़ब्ज़ करते हैं जिन्हों ने ख़ुद को गुनाह गारी में डाल रक्खा था तो वह कहते हैं कि तुम किस काम में थे? वह जवाब देते हैं कि हम ज़मीन पर महज़ मग़लूब थे. वह कहते हैं कि क्या अल्लाह की ज़मीन बसी न थी? कि तुम को तर्क ए वतन करके वहाँ चले जाना चाहिए था? सो इन का ठिकाना जहन्नम है,"

अल्लाह अपनी नमाज़ें किसी हालात में मुआफ़ नहीं करता, चाहे आज़ारी व् लाचारी हो या फिर मैदान ए जंग. 
मैदान ए जंग में आधे लोग सफ़ बंद हो जाएँ और बाक़ी नमाज़ की सफ़ में खड़े हो जाएँ. नमाज़ और रोज़ा  अल्लाह की बे रहम ज़मींदार की तरह माल गुज़ारी है.
बहुत देर तक और बहुत दूर तक अल्लाह अपने घिसे पिटे कबाडी जुमलों की खो़न्चा फ़रोशी करता है, फिर आ जाता है अपने मुर्ग की एक टांग पर. 

"जो शख़्स अल्लाह और उसके रसूल की पूरी इताअत करेगा, अल्लाह तअला उसको ऐसी बहिश्तों में दाख़िल करेगा जिसके नीचे नहरें जारी होंगी, हमेशा हमेशा इन में रहेगे. यह बड़ी कामयाबी है." 
सूरह निसाँअ पाँचवाँ पारा- आयात (96-122) 

फिर एक बार कूढ़ मग़ज़ों के लिए मुहम्मदी अल्लाह कहता है - - - 

"और जो शख़्स कोई नेक काम करेगा ख़्वाह वह मर्द हो कि औरत बशरते कि वह मोमिन हो, सो ऐसे लोग जन्नत में दाखिल होंगे और इन पर ज़रा भी ज़ुल्म न होगा." 
सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (124) 

अल्लाह न ज़ालिम है न रहीम. 
करोरों साल से दुन्या क़ायम है, 
ईमान दारी के साथ उसकी कोई खबर नहीं है, 
अफवाह, कल्पना, और जज़्बात की बातें बे बुन्याद होती हैं. 
ख़ुद मुहम्मद ज़ालिम तबअ थे और अपने हिसाब से उसका तसव्वुर करते हैं. आम मुसलमानों में ज़ेहनी शऊर बेदार करने के लिए ख़ास अहले होश और बुद्धि जीवियों को आगे आने की ज़रुरत है.
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 13 January 2018

Hindu Dharm Darshan-127



वेद दर्शन - - -            
खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 

हे शूर इंद्र ! तुमने अधिक मात्रा में जल बरसाया, उसी को घृत असुर ने रोक लिया था. तुमने उस जल को छुड़ा लिया था. तुमने स्तुत्यों द्वारा उन्नति पाकर स्वयं को मरण रहित मानने वाले दास घृत को नीचे पटक दिया था. 
द्वतीय मंडल सूक्त 11-2 

कुरआन की तरह वेद को भी  हिन्दू समझ नहीं पाते, वह अरबी में है, यह संस्कृत में. ज़रुरत है इन किताबों को लोगों को उनकी भाषा में पढाई जाए और इसे विषयों में अनिवार्य कर दिया जाए जब तक कि विद्यार्थी इसे पढने से तौबा न करले.
*
हे शूर इंद्र ! तुम बार बार सोमरस पियो. मद (होश) करने वाला सोमरस तुमको प्रसन्न करे. सोम तुम्हारे पेट को भर कर तुम्हारी वृध करे. पेट भरने वाला सोम तुम्हें तिरप्त करे.  
 द्वतीय मंडल सूक्त 11-11

सोमरस अर्थात दारू हवन की ज़रूरी सामग्री हुवा करती थी, 
अब पता नहीं है या नहीं हवन के बाद शराब इन पुरोहितों को ऐश का सामान होती.
*
हे इंद्र ! तुम्हारी जो धनयुक्त स्तोता की इच्छा पूरी करती है, वह हमें प्रदान करो. तुम सेवा करने योग्य हो, इस लिए हमारे अतरिक्त वह daxina किसी को न देना. हम पुत्र पौत्रआदि को साथ लेकर यज्ञ में तुम्हारी अधिक स्तुति करेंगे.   
द्वतीय मंडल सूक्त 11-21 
वेद ब्रह्मणों कि दुआ है और बाक़ियों के लिए बद दुआ. इसे आज भी मानने वाले कितने स्वार्थी हैं.
(ऋग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान



Friday, 12 January 2018

Soorah nisa 4 Q-3

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह निसाँअ ४ चौथा पारा

क़िस्त- 3  

लोहे को जितना गरमा गरमा कर पीटा जाय वह उतना ही ठोस हो जाता है. इसी तरह चीन की दीवार की बुन्यादों की ठोस होने के लिए उसकी खूब पिटाई की गई है, लाखों इंसानी शरीर और रूहें उसके शाशक के धुर्मुट तले दफ़न हैं. ठीक इसी तरह मुसलमानों के पूर्वजों की पिटाई इस्लाम ने इस अंदाज़ से की है कि उनके नस्लें अंधी, बहरी और गूंगी पैदा हो रही हैं.

(सुम्मुम बुक्मुम उम्युन, फहुम ला युर्जून) 

इन्हें लाख समझाओ यह समझेगे नहीं.

मैं कुरआन में अल्लाह की कही हुई बात ही लिख रह हूँ जो कि न उनके हक़ में है न इंसानियत के हक़ में, 

मगर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं, 

वजेह वह सदियों से पीट पीट कर मुसलमान बनाए जा रहे है, आज भी खौ़फ़ ज़दा हैं कि दिल दिमाग और ज़बान खोलेंगे तो पिट जाएँगे, कोई यार मददगार न होगा.

यारो! तुम मेरा ब्लॉग तो पढो, कोई नहीं जान पाएगा कि तुमने ब्लॉग पढ़ा, फिर अगर मैं हक़ बजानिब हूँ तो पसंद का बटन दबा दो, इसे भी कोई न जान पाएगा और अगर अच्छा न लगे तो तौबा कर लो,

तुम्हारा अल्लाह तुमको मुआफ करने वाला है। 


अली के नाम से एक कौल शिया आलिमो ने ईजाद किया है 

''यह मत देखो कि किसने कहा है, यह देखो की क्या कहा है.'' 

मैं तुम्हारा असली शुभ चितक हूँ, मुझे समझने की कोशिश करो.

क़ुर आन कहता है - - - 

"फिर जब उन पर जेहाद करना फ़र्ज़ कर दिया गया तो क़िस्सा क्या हुआ कि उन में से बअज़् आदमी लोगों से ऐसा डरने लगे जैसे कोई अल्लाह से डरता हो, बल्कि इस भी ज़्यादह डरना और कहने लगे ए हमारे परवर दीगर ! आप ने मुझ पर जेहाद क्यूँ फ़र्ज़ फरमा दिया? हम को और थोड़ी मुद्दत देदी होती ----" 

सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (77) 

आयात गवाह है कि मुहम्मद को लोग डर के मारे 

"ऐ मेरे परवर दिगर" 

कहते और वह उनको इस बात से मना भी न करते बल्कि खुश होते जैसा की कुरानी तहरीर से ज़ाहिर है. हकीक़त भी है क़ुरआन में कई ऐसे इशारे मिलते हैं कि अल्लाह के रसूल से वह अल्लाह नज़र आते हैं. खैर - - -

खुदा का बेटा हो चुका है, ईश्वर के अवतार हो चुके है तो अल्लाह का डाकिया होना कोई बड़ा झूट नहीं है. 

मुहम्मद जंगें, बशक्ले हमला लोगों पर मुसल्लत करते थे जिस से लोगों का अमन ओ चैन ग़ारत था. उनको अपनी जान ही नहीं माल भी लगाना पड़ता था. हमलों की कामयाबी पर लूटा गया माले ग़नीमत का पांचवां हिस्सा उनका होता. जंग के लिए साज़ ओ सामान ज़कात के तौर पर उगाही मुसलमानों से होती. 

उस दौर में इसलाम मज़हब के बजाए गंदी सियासत बन चुका था. अज़ीज़ ओ अकारिब में नज़रया के बिना पर आपस में मिलने जुलने पर पाबंदी लगा दी गई थी। तफ़रक़ा नफ़रत में बदलता गया. 

बड़ा हादसती दौर था. भाई भाई का दुश्मन बन गया था. 

रिश्ते दारों में नफ़रत के बीज ऐसे पनप गए थे कि एक दूसरे को बिना मुतव्वत क़त्ल करने पर आमादा रहते, इंसानी समाज पर अल्लाह के हुक्म ने अज़ाब नाज़िल कर रखा था. नतीजतन मुहम्मद के मरते ही दो जंगें मुसलमानों ने आपस में ऐसी लड़ीं कि दो लाख मुसलमानो ने एक दूसरे को काट डाला, गलिबन ये कहते हुए कि इस इस्लामी अल्लाह को तूने पहले तसलीम किया - - -

नहीं पहले तेरे बाप ने - - 

"ऐ इंसान! तुझ को कोई ख़ुश हाली पेश आती है, वोह महेज़ अल्लाह तअला की जानिब से है और कोई बद हाली पेश आवे, वह तेरी तरफ़ से है और हम ने आप को पैग़म्बर तमाम लोगों की तरफ़ से बना कर भेजा है और अल्लाह गवाह काफ़ी है." 

सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (79)


यह मोहम्मदी अल्लाह की ब्लेक मेलिंग है. अवाम को बेवकूफ बना रहा है. आज की जन्नत नुमा दुनिया, जदीद तरीन शहरों में बसने वाली आबादियाँ, इंसानी काविशों का नतीजा हैं, 

अल्लाह मियां की रचना नहीं. 

अफ्रीका में बसने वाले भूके नंगे लोग क़बीलाई ख़ुदाओं और इस्लामी अल्लाह की रहमतों के शिकार हैं. 

आप जनाब पैगम्बर हैं, इसका गवाह अल्लाह है, और अल्लाह का गवाह कौन है? 

और आप ? 

बे वकूफ मुसलमानों आखें खोलो, 


"पस की आप अल्लाह की राह में क़त्ताल कीजिए. आप को बजुज़ आप के ज़ाती फ़ेल के कोई हुक्म नहीं और मुसलमानों को प्रेरणा दीजिए . अल्लाह से उम्मीद है कि काफ़िरों के ज़ोर जंग को रोक देंगे और अल्लाह तअला ज़ोर जंग में ज़्यादा शदीद हैं और सख़्त सज़ा देते हैं." 

सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (84) 

कैसी ख़तरनाक आयात हुवा करती थी कभी ये गैर मुस्स्लिमो के लिए और आज ख़ुद मुसलामानों के लिए ये ख़तरनाक ही नहीं, शर्मनाक भी बन चुकी है जिसको वह ढकता फिर रहा है.

मुहम्मद ने इंसानी फ़ितरत की बद तरीन शक्ल नफ़रत को बढ़ावा देकर एक राह ए हयात बनाई थी जिसका नाम रखा इसलाम. उसका अंजाम कभी सोचा भी नहीं, क्यूंकि वोह सच्चाई से कोसों दूर थे. यह सच है कि उनके क़बीले कुरैश की सरदारी की आरज़ू थी जैसे मूसा को बनी इस्राईल की बरतरी की, और ब्रह्मा को, ब्रह्मणों की श्रेष्टता की.

इसके बाद उम्मत यानी जनता जनार्दन कोई भी हो, जहन्नम में जाए. आँख खोल कर देखा जा सकता है, सऊदी अरब मुहम्मद की अरब क़ौम कि आराम से ऐशो आराइश में गुज़र कर रही है और प्राचीन बुद्धिष्ट अफ़गानी दुन्या तालिबानी बनी हुई है, सिंध और पंजाब के हिन्दू अलक़ाइदी बन चुके हैं, हिदुस्तान के बीस करोड़ इन्सान मुफ़्त में साहिब ए ईमान (खोखले आस्था वान) बने फिर रहे है, 

दे दो पचास पचास हज़ार रुपया तो ईमान घोल कर पी जाएँ. 

सब के सब गुमराह, होशियार मुहम्मद की कामयाबी है यह, अगर कामयाबी इसी को कहते हैं।

 

''क्या तुम लोग इस का इरादा रखते हो कि ऐसे लोगों को हिदायत करो जिस को अल्लाह ने गुमराही में डाल रक्खा है और जिस को अल्लाह तअला गुमराही में डाल दे उसके लिए कोई सबील नहीं"

सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (84)

गोया मुहम्मदी अल्लाह शैतानी काम भी करता है, अपने बन्दों को गुमराह करता है. मुहम्माद परले दर्जे के उम्मी ही नहीं अपने अल्लाह के नादान दोस्त भी हैं, जो तारीफ़ में उसको शैतान तक दर्जा देते हैं. उनसे ज्यादा उनकी उम्मत, जो उनकी बातों को मुहाविरा बना कर दोहराती हो कि 

"अल्लाह जिसको गुमराह करे, उसको कौन राह पर ला सकता है" 


"वह इस तमन्ना में हैं कि जैसे वह काफ़िर हैं, वैसे तुम भी काफ़िर बन जाओ, जिस से तुम और वह सब एक तरह के हो जाओ. सो इन में से किसी को दोस्त मत बनाना, जब तक कि अल्लाह की राह में हिजरत न करें, और अगर वह रू गरदनी करें तो उन को पकडो और क़त्ल कर दो और न किसी को अपना दोस्त बनाओ न मददगार"

सूरह निसाँअ4 पाँचवाँ पारा- आयात (89)

कितना ज़ालिम तबअ था अल्लाह का वह खुद साख़्त रसूल? 

बड़े शर्म की बात है कि आज हम उसकी उम्मत बने बैठे हैं. 

सोचें कि एक शख़्स रोज़ी की तलाश में घर से निकला है, उसके छोटे छोटे बाल बच्चे और बूढे माँ बाप उसके हाथ में लटकती रिज्क़ की पोटली का इन्तेज़ार कर रहे हैं और इसको मुहम्मद के दीवाने जहाँ पाते हैं क़त्ल कर देते हैं? 

एक आम और ग़ैर जानिबदार की ज़िन्दगी किस क़दर मुहाल कर दिया था मुहम्मद की दीवानगी ने. बेशर्म और ज़मीर फ़रोश ओलिमा उल्टी कलमें घिस घिस कर उस मुजरिम ए इंसानियत को मुह्सिने इंसानियत बनाए हुए हैं. 

यह क़ुरआन उसके बेरहमाना कारगुज़ारियों का गवाह है और शैतान ओलिमा इसे मुसलमानों को उल्टा पढा रहे हैं. हो सकता है कुछ धर्म इंसानों को आपस में प्यार मुहब्बत से रहना सिखलाते हों मगर उसमें इसलाम हरगिज़ नहीं हो सकता. 

मुहम्मद तो उन लोगों को भी क़त्ल कर देने का हुक्म देते हैं जो अपने मुस्लमान और काफ़िर दोनों रिश्तेदारों को निभाना चाहे. 

आज तमाम दुन्या के हर मुल्क और हर क़ौम, यहाँ तक कि कुरानी मुस्लमान भी इस्लामी दहशत गर्दी से परेशान हैं. इंसानियत की तालीम से नाबलद, कुरानी तालीम से लबरेज़ अलक़ाएदा और तालिबानी तंजीमों के नव जवान अल्लाह की राह में तमाम इंसानी क़द्रों पैरों तले रौंद सकते हैं, इर्तेकई जीनों को तह ओ बाला कर सकते हैं. सदियों से फली फूली तहज़ीब को कुचल सकते हैं. हजारों सालों की काविशों से इन्सान ने जो तरक्क़ी की मीनार चुनी है, उसे वह पल झपकते मिस्मार कर सकते हैं. इनके लिए इस ज़मीन पर खोने के लिए कुछ भी नहीं है एक नाक़िस सर के सिवा, जिसके बदले में ऊपर उजर ए अज़ीम है. इनके लिए यहाँ पाने के लिए भी कुछ नहीं है सिवाए इस के कि हर सर इनके नाक़िस इसलाम को कुबूल करके और इनके अल्लाह और उसके रसूल मुहम्मद के आगे सजदे में नमाज़ के वास्ते झुक जाए. इसके एवज़ में भी इनको ऊपर जन्नतुल फ़िरदौस धरी हुई है, पुर अमन चमन में तिनके तिनके से सिरजे हुए आशियाने को इन का तूफ़ान पल भर में पामाल कर देता है.



जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 11 January 2018

Hindu Dharm Darshan-126



वेद दर्शन - - -     
      
 खेद  है  कि  यह  वेद  है  . . . 

सुन्दर नयनों वाले, जरा रहित एवं शोभन गति वाले अग्नि, हव्य दाता !  यजमान के शत्रुओं को नष्ट करने के लिए बुलाए गए हैं .
द्वतीय मंडल सूक्त  8-2 

हजारों वर्षों से यजमान का सम्मान देकर हिदू समाज को इन निर्मूल मन्त्रों से लूटा जा रहा है. बाम्हन हिदू समाज के जोक हैं.
*
शत्रु नाशक एवं स्वयं शोभित अग्नि की स्तुति में ऋग वेद के सभी मन्त्रों का प्रयोग किया जाता है. अग्नि समस्त शोभओं को धारण करते हैं. 
द्वतीय मंडल सूक्त  8-5 

मुसलमानों को क़यामत की आग से डराया जाता है और हिदुओ को इसी अग्नि से लुभाया जाता है.

ग्वेद / डा. गंगा सहाय शर्मा / संस्तृत साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली )


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान