Sunday 17 March 2013

सूरह फ़ातिर -३५

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.


सूरह फ़ातिर -३५ पारा -२२  (1)
(पहली क़िस्त) 


मुहम्मद के ज़ेहन में पैग़म्बर बनने का ख़याल कैसे आया और फिर ये ख़याल जूनून में कैसे बदला??
मुहम्मद एक औसत दर्जे के समाजी फ़र्द थे. तालीम याफ्ता न सही, मगर साहिबे फ़िक्र थे. अब ये बात अलग है कि इंसान की फ़िक्र समाज के लिए तामीरी हो या तख़रीबी. मुहम्मद की कोई ख़ूबी अगर कही जाए तो उनके अन्दर दौलत से मिलने वाली ऐश व आराम की कोई अहेमयत नहीं थी. क़ेनाअत पसँद थे, लेन देन के मुआमले में वह ईमान दार भी थे.
मुहम्मद ने ज़रीआ मुआश के लिए मक्के वालों की बकरियाँ चराईं. सब से ज़्यादः आसान काम है, बकरियाँ चराना वह  इसी दौरान ज़ेहनी उथल पुथल में पैगम्बरी का खाका बनाते रहे.
 एक वाक़िया हुवा कि ख़ाना ए काबा की दीवार ढह गई जिसमें संग ए असवद नस्ब था जोकि आकाश से गिरी हुई उल्का थी. दीवार की तामीर अज़ सरे नव हुई, मक्का के क़बीलों में इस बात का झगड़ा शुरू हुआ कि किस कबीले का सरदार असवद को दीवार में नस्ब करेगा? पंचायत हुई, तय ये हुवा कि जो शख्स दूसरे दिन सुब्ह सब से पहले काबे में दाखिल होगा उसकी बात मानी जायगी. अगले दिन सुबह सब से पल्हले मुहम्मद हरम में दाखिल हुए.(ये बात अलग है कि वह सहवन वहाँ पहुँचे या क़सदन, मगर क़यास कहता है कि वह रात को सोए ही नहीं कि जल्दी उठाना है) बहर हाल दिन चढ़ा तमाम क़बीले के लोग इकठ्ठा हुए, मुहम्मद की बात और तजवीज़ सुनने के लिए.
 मुहम्मद ने एक चादर मंगाई और असवद को उस पर रख दिया, फिर हर क़बीले के सरदारों को बुलाया, सबसे कहा कि चादर का किनारा पकड़ कर  दीवार तक ले चलो. जब चादर दीवार के पास पहुच गई तो खुद असवद को उठा कर दीवार में नस्ब कर दिया. सादा लोह अवाम ने वाहवाही की, हालाँकि उनका मुतालबा बना रहा कि पत्थर कौन नस्ब करे. मुहम्मद को चाहिए था कि सरदारों में जो सबसे ज़्यादः बुज़ुर्ग होता उससे पत्थर नस्ब करने को कहते.
 मुहम्मद अन्दर से फूले न समाए कि वह अपनी होशियारी से क़बीलो में बरतर हो गए. उसी दिन उनमें ये बात पक्की हो गई कि पैगम्बरी का दावा किया जा सकता है.
तारीख अरब के मुताबिक बाबा ए कौम इब्राहीम के दो बेटे हुए इस्माईल और इसहाक़. छोटे इसहाक़ की औलादें बनी इस्राईल कहलाईं जिन्हें यहूदी भी कहा जाता है. इन में नामी गिरामी लोग पैदा हुए, मसलन यूफुफ़, मूसा, दाऊद, सुलेमान और ईसा वगैरा और पहली तारीखी किताब मूसा ने शुरू की तो उनके पेरू कारों ने साढ़े चार सौ सालों तक इसको मुरत्तब करने का सिलसिला क़ायम रखा. 
लौंडी जादे हाजरा (हैगर) पुत्र इस्माइल की औलादें इस से महरूम रहीं जिनमें मुहम्मद भी आते हैं. उनमें हमेशा ये क़लक़ रहता कि काश हमारे यहाँ भी कोई पैगम्बर होता कि हम उसकी पैरवी करते. इन रवायती चर्चा मुहम्मद के दिल में गाँठ की तरह बन्ध गई कि कौम में पैगामरी की जगह ख़ाली है.
मदीने की एक उम्र दराज़ बेवा, मालदार खातून, ख़दीजा ने मुहम्मद को अपने साथ निकाह की पेश कश की. वह फ़ौरन राज़ी हो गए कि बकरियों की चरवाही से छुट्टी मिली और आराम के साथ रोटी का ज़रीया मिला. इस राहत के बाद वह रोटियाँ बांध कर ग़ार ए हिरा में जाते और अल्लाह का रसूल बन्ने का ख़ाक़ा तैयार करते.
इस दौरान उनको जिंसी तकाजों का सामान भी मिल गया था और छह अदद बच्चे भी हो गए, साथ में ग़ार ए हिरा में आराम और प्लानिग का मौक़ा भी मिलता कि रिसालत की शुरूवात कब की जाए, कैसे की जाए, आगाज़, हंगाम और अंजाम की कशमकश में आखिर कार एक रोज़ फैसला ले ही लिया कि गोली मारो सदाक़त, सराफ़त और दीगर इंसानी क़दरों को. ख़ारजी तौर पर समाज में वह अपना मुक़ाम जितना बना चुके हैं, वही काफ़ी है.
एक दिन उन्हों ने अपने इरादे को अमली जामा पहनाने का फैसला कर ही डाला. अपने कबीले कुरैश को एक मैदान में इकठ्ठा किया, भूमिका बनाते हुए उन्हों ने अपने बारे में लोगों की राय तलब की, लोगों ने कहा तुम औसत दर्जे के इंसान हो कोई बुराई नज़र नहीं आती, सच्चे, ईमान दार, अमानत  और साबिर तबअ शख्स हो. मुहम्मद  ने पूछा अगर मैं कहूँ कि इस पहाड़ी के पीछे एक फ़ौज आ चुकी है तो यकीन कर लोगे? लोगों ने कहा कर सकते हैं इसके बाद मुहम्मद ने कहा - - -
मुझे अल्लाह ने अपना रसूल चुना है.
ये सुन कर क़बीला भड़क उट्ठा. कहा तुम में कोई ऐसे आसार, ऐसी खूबी और अज़मत नहीं कि तुम जैसे जाहिल गँवार को अल्लाह चुनता फिरे.
मुहम्मद के चाचा अबू लहेब बोले
 "माटी मिले, तूने इस लिए हम लोगों को यहाँ बुलाया था?''
सब मुँह फेर कर चले गए. मुहम्मद की इस हरकत और जिसारत से कुरैशियों को बहुत तकलीफ़ पहुंची मगर मुहम्मद मैदान में कूद पड़े तो पीछे मुड कर न देखा.
बाद में वह कुरैशियों के बा असर लोगों से मिलते रहे और समझाते रहे कि अगर तुम मुझे पैगम्बर मान लिया और मैं कामयाब हो गया तो तुम बाकी क़बीलों बरतर होगे, मक्का ज़माने में बरतर होगा और अगर नाकाम हुवा तो खतरा सिर्फ मेरी जान को होगा. इस कामयाबी के बाद बदहाल मक्कियों को हमेशा हमेश के लिए रोटी सोज़ी का सहारा मिल जाएगा.
मगर कुरैश अपने माबूदों (पूज्य) को तर्क करके मुहम्मद के अल्लाह को  अपना माबूद बनाए को तैयार न हुए.
इस हकीकत के बाद क़ुरआन की बनी आयातों को परखें.

"तमाम तर हम्द अल्लाह तअला को लायक़ है जो आसमानों और ज़मीनों को पैदा करने वाला है. जो फरिश्तों को पैगाम रसा बनाने वाला है, जिनके दो दो तीन तीन और चार चार पर दार बाजू हैं, जो पैदाइश में जो चाहे ज़्यादः कर देता है. बे शक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है."
सूरह फ़ातिर -३५ पारा -२२ आयत (१)

तमाम हम्द उन हस्तियों की होनी चाहिए जिनहों ने इंसान और इंसानियत के किए कुछ किया हो. जो मुसबत ईजादों के मूजिद हों. उन पर लअंतें हों जिन्हों ने इंसानी खून से नहाया हो .
ईसाइयों के फ़रिश्ते न नर होते हैं न नारी और उनका कोई जींस भी नहीं होता, अलबत्ता छातियाँ होती हैं जिस को मुहम्मदी अल्लाह कहता है ये लोग तब मौजूद थे जब वह पैदा हुए कि उनको औरत बतलाते हैं. तअने देता है कि अपने लिए तो बेटा और अल्लाह के लिए बेटी? मुहम्मद हर मान्यता का धर्म का विरोध करते हुए अपनी बात ऊपर रखते हैं चाहे वह कितनी भी धान्ली की क्यूं न हो. खुद फरिश्तों के बाजू गिना रहे हैं, जैसे अपनी आँखों से देखा हो. 

"अल्लाह जो रहमत लोगों के लिए खोल दे, सिवाए इसके कोई बंद करने वाला नहीं और जिसको बंद कर दे, सो इसके बाद इसको कोई जारी करने वाला नहीं - - - ए लोगो ! तुम पे जो अल्लाह के एहसान हैं, इसको याद करो, क्या अल्लाह के सिवा कोई खालिक़ है जो तुमको ज़मीन और आसमान से रिज़्क पहुँचाता हो. इसके सिवा कोई लायक़-इबादत नहीं. अगर ये लोग आप को झुट्लाएंगे तो आप ग़म न करें क्यूंकि आप से पहले भी बहुत से पैगम्बर झुट्लाए जा चुके हैं. "
सूरह फ़ातिर -३५ पारा -२२ आयत (२-४)

अभी तक कोई अल्लाह खोजा नहीं जा सका, दुन्या को वजूद में आए लाखों बरस हो गए. अगर वह मुहम्मदी अल्लाह है तो निहायत टुच्चा है जिसे नमाज़ रोज़ों की शदीद ज़रुरत है. किसी भी इंसान पर वह एहसान नहीं करता बल्कि ज़ुल्म ज़रूर करता है कि आज़ाद रूह किसी पैकर के ज़द में आकर ज़िन्दगी पर थोपी गई मुसीबतें झेलता है. 

"ए लोगो! अल्लाह का वादा ज़रूर सच्चा है, सो ऐसा न हो कि ये दुन्यावी ज़िन्दगी तुम्हें धोके में डाल रखे और ऐसा न हो कि तुम्हें धोकेबाज़ शैतान अल्लाह से धोके में डाल दे . ये शैतान बेशक तुम्हारा दुश्मन है, सो तुम इसको दुश्मन समझते रहो. वह तो गिरोह को महेज़ इस लिए बुलाता है कि वह दोंनों दोज़खियों में शामिल हो जाएँ."
सूरह फ़ातिर -३५ पारा -२२ आयत (५-६)

अल्लाह और शैतान दोनों ही इन्सान को दोज़ख में डालने का बेडा उठाए  हुए हैं. लगता है कि अल्लाह इंसानों का दुश्मन नंबर वन है, तभी तो किसी वरदान की तरह दोज़ख भेट करने का वादा करता है,ऐसे अल्लाह को जूते मार कर घर (दिल) से बाहर करिए, और शैतान नंबर दो को समझने की कोशिश करिए जिसकी बकवास ये क़ुरआन है.
उम्मी फरमाते हैं "धोकेबाज़ शैतान अल्लाह से धोके में डाल दे."
मुतराज्जिम  अल्लाह की इस्लाह करते हैं.
कलामे दीगराँ - - -
"जन्नत और दोज़ख दोनों इंसान के दिल में होते हैं."
"शिन्तो"
  जापानी पयम्बर   
इसे कहते हैं कलाम पाक 


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

1 comment:

  1. "जन्नत और दोज़ख दोनों इंसान के दिल में होते हैं."-सटीक बात.

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