Friday, 28 May 2010

कुरआन सूरह हुज्र - १५



सूरह हुज्र १५ , पारा-१३

The Rock

मुहम्मद फेस बुक पर


इंटर नेट की एक और वेब साईट 'फेस बुक' पर पाकिस्तानी कठमुल्लाओं ने पाबन्दी लगाने में कामयाबी हासिल करली है. क्या इस से पाकिस्तानी अवाम का कुछ भला होगा बजाय नुकसान के, या आलमी बिरादरी को कोई फ़र्क पड़ने वाला है? दर अस्ल मुआमला ये था कि किसी इदारे ने शरारतन मुहम्मद डे पर मुहम्मद की तस्वीर लोगों से माँगी थी, मुस्लमान जो कुछ करते इदारे पर करते, बंद कर दिया अपने मुल्क में पूरी साईट को. इंटर नेट पर साईट को मैंने देखा, इसमें तुगरे भेज कर सबसे ज़्यादः मुसलमानों ने ही शिरकत की. हालांकी इस्लामी हिमाक़तों की एक यह भी एक तरह की तस्वीर ही है. तस्वीरों में एक तस्वीर दिल को दहला देने वाली छ सात साला बच्ची आयशा की है जिसको औधा कर मुहम्मद उसके साथ मसरूफे-बलात्कार हैं, जो अपनी गुडिया को दर्द के मारे दबोचे हुए है और उसकी आँखें बाहर निकली जा रही हैं. मुहम्मद वहशी जानवर की तरह उस मासूम से मह्जूज़ हो रहे हैं.
उफ़! क्या मुसलमानों से ये मुहम्मद की मुस्तनद और तारीखी हक़ीक़त देखी नहीं जाती? इसके चलते वह सच्चाई के दर्पन पर पथराव कर देंगे ? दुन्या के साथ चलना छोड़ देंगे. मुहह्म्मद के जरायम की परतें तो अब खुलना शुरू हुई हैं, अंत होने तक मुस्लमान बेयार ओ मदद गार तनहा रह जाएगा, अगर तौबा करके ईमान दार नहीं बन जाता.आइए चलिए हम ले चलते हैं आपको माज़ी में - - -
''आयशा कहती हैं जिस वक़्त मेरा मुहम्मद से निकाह हुवा मैं छ साल की थी. फिर मक्का से मदीना हिजरत करके पहुँचे तो मुझे बुखार आने लगा, मेरे सर के बाल गिर गए लेकिन अच्छी होने के बाद बाल फिर से निकल कर शानों के नीचे तक लटकने लगे. एक दिन मैं झूले में अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी कि यकायक मेरी वाल्दा ने आकर मुझको डांटा. मैं इनके इस डांटने का मतलब नहीं समझ सकी. वह मुझको वहां से पकड़ कर घर लाईं, मैं हांपने लगी, जब मेरी सांसें थमीं तो उन्हों ने मेरा हाथ, मुंह और सर धुलाया. घर के अन्दर कुछ नसारा औरतें बैठी थीं, उन्होंने वाल्दा के हाथों से मुझे ले लिया और वाल्दा मुझे इन के सुपुर्द करके चली गईं. इन औरतों ने मेरी जिस्मानी हालत को दुरुस्त किया. उसके बाद कोई नई बात पेश नहीं आई. मुहम्मद चाश्त के वक़्त मेरे घर आए, उन औरतों ने मुझे उनके हवाले कर दया.
(बुख़ारी-१५३५)
नन्हीं आयशा की यह आप बीती है. छ साल की उम्र में निकाह, आठ साल की उम्र में रुखसती, और इसी उम्र में वह हक़ीक़त जो फेस बुक में मुसव्विर ने तस्वीर खींची है. मुसलमानों! किस बात की मुखालिफ़त ? क्या सच्चाई का सामना नहीं कर सकते? क्या यह सब झूट है? क्या ५२ साला बूढ़े ने बच्ची आयशा को बेटी बना लिया था ? अगर तस्वीर देख्नना गवारा न करो तो तसव्वुर में चले जाओ, अपनी बहेन या बेटी को जो भी इन उमरों की हों, क्या किसी रूहानी अय्यार के हवाले करना पसंद करोगे? अगर नहीं तो अपने ज़मीर का साथ दो कि सदाक़त ही ईमान है न कि इस्लाम. और अगर हाँ मुहम्मद को हक बजानिब समझते हों तो तुम्हारे मुंह पर आक़! थू !!


OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO

चलो मक्खियों की तरह भिनभिना कर मुहम्मद की तुकबंदी की तिलावत की जाय और आने वाली नस्लों का आकबत राब किया जाय . । .


''अलरा -ये आयतें हैं एक किताब और कुरआन वाज़ेह की.''सूरह हुज्र,१५ पारा१४आयत (१)अलरा यह बेमानी लफ्ज़ मुहम्मद का छू मंतर है इसके कोई माने नहीं. मुहम्मद बार बार अपनी किताब को वाज़ेह कहते हैं जिसका मतलब होता है स्पष्ट अथवा असंदिग्ध, जब कि कुरआन पूरी तरह से संदिग्ध और मुज़ब्ज़ब किताब है.खुद आले इमरान में आयत ६ में अपनी आयातों को अल्लाह मुशतबह-उल-मुराद(संदिग्ध) बतलाता है. इसी को हम क़ुरआनी तज़ाद (विरोधाभास) कहते है. इसी के चलते सदियों से विरोधाभाषी फतवे ओलिमा नाज़िल किया करते हैं.


''काफ़िर लोग बार बार तमन्ना करेंगे क्या खूब होता अगर वह लोग मुसलमान होते. आप उनको रहने दीजिए कि वह खा लें और चैन उड़ा लें और ख़याली मंसूबा उन्हें ग़फलत में डाले रखें, उन्हें अभी हक़ीक़त मालूम हुई जाती है ''सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (२-३)
काफ़िर लोग हमेशा खुश हल रहे हैं और मुसलमान बद हल. इस्लामी तालीम मुसलमानों को कभी खुश हाल होने ही न देगी, इनकी खुश हाली तो इनका फरेबी आक़बत है जो उस दुन्या में धरा है. सच पूछिए तो अज़ाब ए मुहम्मदी मुसलमानों का नसीब बन चुका है. चौदह सौ साल पहले अहमक़ अल्लाह ने कहा'' उन्हें अभी हक़ीक़त मालूम हुई जाती है '' उसका अभी, अभी तक नहीं आया ?


''और हमने जितनी बस्तियां हलाक की हैं, इन सब के लिए एक मुअययन नविश्ता है. कोई उम्मत न अपनी मीयाद मुक़रररा से न पहले हुई न और न पीछे रही.''सूरह हुज्र,१५ पारा१४आयत (४-५)
अल्लाह खुद एतरफ कर रहा है कि वह हलाकू है. फिर ऐसे अल्लाह पर सुब्ह ओ शाम लअनत भेजिए किसी ऐसे अल्लाह को तलाशिए जो बाप की तरह मुरब्बी और दयालु हो, नाकि बस्त्तियाँ तबाह करने वाला. उसके सही बन्दे ओसामा बिन लादेन की तरह ही होते हैं जो ? को तबाह करके ? बना सकते हैं.


''और कहा वह शख्स जिस पर कुरआन नाज़िल किया गया तहक़ीक़ तुम मजनूँ हो और अगर तुम सच्चे हो तो हमारे पास फ़रिश्तों को क्यूँ नहीं लाते? हम फ़रिश्तों को सिर्फ़ फ़ैसले के लिए ही नाज़िल किया करते हैं और इस वक़्त उनको मोहलत भी न दी जाती.''सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (६-८)हदीसों में कई जगह है कि फ़रिश्ते ज़मीन पर आते हैं. पहली बार मुहम्मद को पटख कर फ़रिश्ते ने ही पढाया था''इकरा बिस्म रब्बे कल्लज़ी'' फिर ''शक्कुल सदर'' भी फ़रिश्ते ने किया, मुहम्मद ने आयशा से कह की जिब्रील अलैहिस्सलाम आए हैं तुम को सलाम कर रहे हैं. जंगे बदर में तो हजारों फ़रिश्ते मैदान में शाने बशाने लड़ रहे थे, कई (झूठे) सहबियों ने इसकी गवाही भी दी. अब लोगों के तकाजे पर मंतिक गढ़ रहे हो कि रोज़े हश्र वह नाज़िल होंगे तो कभी कहते हो कि उनके आने पर भूचाल ही आ जाएगा।


''हम ने कुरआन नाज़िल किया, हम इसकी मुहाफ़िज़ हैं. और हम ने आप के क़ब्ल भी अगले लोगों के गिरोहों में भेजा था और कोई उनके पास ऐसा नहीं आया जिसके साथ उन्हों ने मज़ाक न किया हो. इसी तरह ये हम उन मुज्रिमीन के दिलों में डाल देते हैं. ये लोग इस पर ईमान नहीं लाते और ये दस्तूर से होता आया है. अगर उनके लिए आसमान में कोई दरवाज़ा खोल दें फिर ये दिन के वक़्त इस में चढ़ जाएँ, कह देंगे कि हमारी नज़र बंदी कर दी गई है, बल्कि हम लोगों पर तो एकदम जादू कर रखा है.सूरह हुज्र,१५ पारा१४ आयत (९-१५)
अल्लाह कहता है कि वह खुद लोगों के दिलों में (शर) डाल देता है कि (स्वयंभू ) पैगम्बरों का मज़ाक़ उड़ाया करें. मुहम्मद इस बात को इस लिए अल्लाह से कहला रहे हैं कि बगेर उसके हुक्म के कुछ नहीं होता. यह उनका पहला कथन है. अब लोगों को मुजरिम भी अल्लाह को बना रहा है, जुर्म खुद कर रहा है ? भला क्यों? अल्लाह के पास कोई ईमान और इन्साफ़ का तराज़ू है? कहता है कि ऐसा उसका दस्तूर है? जबरा मारे रोवै न देय. ऐसे अल्लाह पर सौ बार लअनत. मुहम्मद आसमान में दरवाज़ा खोल रहे हैं गोया पानी में छेद कर रहे हैं.मुसलमानों! दर असल तुम्हारी नज़र बंदी कर दी गई है आँखें खोलो, वर्ना - - तुम्हारी दास्ताँ रह जाएगी बस दस्तानों में.
''बेशक हमने आसमान में बड़े बड़े सितारे पैदा किए और देखने वालों के लिए इसको आरास्ता किया और इसको शैतान मरदूद से महफूज़ फ़रमाया, हाँ! कोई बात चोरी छुपे अगर सुन भागे तो इसके पीछे एक रौशन शोला हो लेता है.''सूरह हुज्र, पारा१४ आयत (१६-१८)
रात को तारे टूटते हैं, ये उसका साजिशी मुशाहिदा है, उम्मी मुहम्मद ने शगूफ़ा तराशा है कि अल्लाह जो आसमान पर रहता है, वहां से ख़ारिज और मातूब किया गया शैतान उसके राजों के ताक में लगा रहता है कि कोई राज़ ए खुदा वंदी हाथ लगे तो मैं उस से बन्दों को भड़का सकूँ, जिसकी निगरानी पर फ़रिश्ते तैनात रहते हैं, शैतान को देखते ही रौशन शोले की मिसाईल दाग देते हैं. जो उसे दूर ताक खदेड़ आतीहै.मुसलमानों कब तक तुम्हारे अन्दर बलूगत आएगी? कब मोमिन के ईमान पर ईमान लओगे?


जीम। मोमिन ''निसारुल ईमान''

*****************************


11 comments:

  1. मान गए उस्ताद! हमें अपना शागिर्द बना ही लो. सब्र नहीं होता

    ReplyDelete
  2. बनाम इस्लाम की दुनिया
    महोदय,
    बहुत कठिन है डगर पनघट की. सब से पहले आप को तौबा करके मोमिन बाईमान बनना होगा, ईमान शब्द हिंदी शब्द कोष में नहीं है मगर बयान किया जा सकता है कि अंतर आत्मा की पुकार को ईमान कहा जाता है, फिर भी अपने भीतर धर्म काँटे की तौल का सत्य लाना होगा. आपके निमंत्ररण पर मैं आप के ब्लाग पर गया. तथा कथित धार्मिक दुन्य की गाली गलौज की सडान्ध से मेरा दम घुटने लगा. मानवता के लिए कुछ कर सकते हैं तो आप के अन्दर बैठा जीव ही आपका उस्ताद है.

    ReplyDelete
  3. कृपया अपना ई मेल पता प्रकाशित करिए

    ReplyDelete
  4. तुम्हारे ही जैसे मोमिन के रूप में शैतान उस दौर में भी थे, जिन्होंने नबी की मौत के बाद इस तरह की झूठी हदीसें बेतहाशा गढ़ीं. कुरआन में ऐसे लोगों को मुनाफ़िक़ कहा गया है. नबी की बीवी की उम्र छह साल किसी भी तरीके से साबित नहीं होती. लो पढो यहाँ!

    ReplyDelete
  5. सादर वन्दे !
    इतना बीभत्स आईना दिखाया आपने कि किसी को भी इनसे नफ़रत हो जाये ! उससे बड़ी बात मै आपके हिम्मत कि दाद देता हूँ |

    ReplyDelete
  6. प्रिय जीम,
    प्रिय संबोधन इसलिए की शुद्ध मानसिकता से स्पष्ठवादी हो।(इसलान कि दुनिया को आपका प्रत्युत्तर)
    लेकिन कुछ लोग उन हदिसो को प्रामाणिक नहीं मानते(ज़ैदी का मन्तव्य) जिसमे इतना वीभत्स आलेखित है। यदि वे हदीसे अप्रमाणिक है तो आपका लेखन भी अश्लीलता की श्रेणी मे आएगा।
    आपके कथन को प्रामाणिक सिद्ध करने की अपेक्षा है।
    में आपसे सहमत हूँ कि कुरआन की आयते प्रथम दृष्टि में ही 'उम्मी की तुक' है। अस्पष्ट,अस्त-व्यस्त जोड़। इसीकारण लोग उसके कई मायने निकाल सकते है। और मूर्ख बनाने में सफल होते है।
    "मोमिन बाईमान बनना, ईमान शब्द हिंदी शब्द कोष में नहीं है मगर बयान किया जा सकता है कि अंतर आत्मा की पुकार"

    -हम तो 'ईमान' का सीधा शब्दार्थ 'आस्था' से लेते थे।
    क्या उसका भावार्थ आत्मा की आवाज़ है?

    ReplyDelete
  7. मामा का अनुवाद पेश करने वाले बेमानी अल्‍फाज पर तो यह पढ ले एक मिसाल

    Miraculous quality of Qur’an mentioned immediately after these broken letters

    Therefore immediately after these broken letters are mentioned in the Qur’an, the following verses speak about the miracle of the Qur’an, and its authority e.g. in Surah Baqarah Chapter 2 verse 1-2:

    "Alif Laam Meem.
    This is the Book; in it is guidance sure, without doubt, to those who fear Allah."
    [Al-Qur’an 2:1-2]

    more:
    Direct Link
    http://www.ilovezakirnaik.com/misconceptions/b05.htm

    ReplyDelete
  8. जिन बातों को अभी समझना है उन पर समय खराब न करो, समय का कोई भरोसा नहीं, इसलिये रहते समय आओ

    signature:
    विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
    (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
    antimawtar.blogspot.com (Rank-2 Blog) डायरेक्‍ट लिंक

    अल्‍लाह का चैलेंज पूरी मानव-जाति को

    अल्‍लाह का चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता

    अल्‍लाह का चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं

    अल्‍लाह का चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार

    अल्‍लाह का चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में

    अल्‍लाह का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी

    छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
    islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)
    डायरेक्‍ट लिंक

    ReplyDelete
  9. हमें आपके कलाम से मुहब्बत हो गयी है

    ReplyDelete
  10. हमें आपके कलाम से मुहब्बत हो गयी है

    ReplyDelete
  11. ये क्या पागलपन है एक तो जाकिर नाइक जिसके दिमाग में भूसा भरा है और ये दूसरा असरफअली है जिनका भी कोई स्क्रू ढीला लगता है एक को संस्कृत ठीक से नहीं आती और एक को अरबी का मतलब करना नहीं आता दोनों ही अपने अपने नाम का प्रचार करने में लगे है में कोई इस्लाम या मुसलमानों का विरोधी नहीं हूँ लेकिन ऐसे लोगो का विरोधी हूँ जो की किसी भी धर्म ग्रन्थ का अपमान करके अपने आप को बड़ा चतुर और समजदार बताते है इन लोगो की आदत होती है ये किसी भी धर्म ग्रन्थ का अध्ययन नहीं किया करते लेकिन ये धर्म ग्रन्थ इस लिए पढ़ते है की उसमे से कुछ ऐसा मसाले दार मतलब निकला जाये कि दुनिया अचंभित हो जाये ये सब दया के पात्र है और इनका साथ देनेवाले विकृत मनो विचार वाले कहलायेंगे (अगर जाकिर नाइक को संस्कृत और असरफ को अरबी उर्दू सीखनी है तो में सिखाने के लिया तैयार हु बिलकुल निःशुल्क ) चाणक्य के अनुसार मूर्खो से कोई भी सम्बन्ध रखने वाला अंत में संकट ही पाता है तो असरफ अली और जाकिर नाइक ये दोनों को एक दुसरे पर कीचड़ उछालना है तो उछाले लेकिन इनके पास खड़े रह कर अपने ऊपर भी किचल उचालेंगा ये तय है तो इनसे दूर ही रहा जाये यही बुध्धिमानी है असरफ अली मुस्लिम हो कर मुस्लिम के उपास्यो को निचा दिखा रहा है तो क्या ये दुसरे धमो की इज्जत करेगा ? इनसे पूछो की फिर किसकी उपासना की जाये? क्या तुम लोगो की ? इससे पूछना भी बेकार होगा की, तुम्हारे स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बारेमे क्या विचार है? या तो गरीब नवाज़ के बारे में क्या विचार है? विवेकानंद के बारेमे या तो सूफी संत निजामुदीन के बारेमे? कबीर, तुलसीदास, मीराबाई के बारे में ?क्यों की ये दोनों बकवास ही करने वाले है. मैं तो हिन्दू, जैन, बुद्ध, सिख, इसाई और सबको इनसे दूर ही रहने की सलाह देता हूँ . - श्री दासअवतार

    ReplyDelete