Tuesday, 2 May 2017

Hindu Dharm Darshan 61



इनका मानसिक पोषण 

ऐसा लगता है कि शायद एशिया के मद्य से लेकर दक्छिन और पूर्व की ज़मीन का तक़ाज़ा है कि इस पर जन्मा मानव बग़ैर भगवान् खुदा अल्लाह या किसी रूहानी ताक़त की कल्पना के रह ही नहीं सकता।  इनकी ज़ेहनी ग़िज़ा के लिए कम अज़ कम एक अदद महा शक्ति , एकेश्वर , वाहिद ए मुतलक़ , ख़ालिक़ ए कुल , सर्व सृष्टा या सुप्रीम पावर चाहिए ही, वह भी शर्त अव्वलीन में। 
पहले जाय नमाज़ चाहिए, फिर दस्तर ख्वान। पहले मंदिर मस्जिद फिर घर की छत। 
इनको पहले परम पूज्य चाहिए  वह इनके जैसा ही इंसानी सोच रखता हो या कोई जानवर पेड़ पहाड़ दरिया हत्ताकि पत्थर की मूर्ति हो या फिर हवा की मूर्ति निरंकार या अल्लाह और खुदा बाप।  कोई न कोई मिज़ाजी खुदा या फिर आफ़ाक़ी ख़ुदा तो चाहिए ही वर्ना सांस लेना दूभर हो जाएगा .
वह अनेश्वर वादी मानव को पशु मानते हैं और मुल्हिद , जो सुकर्मों और कुकर्मों में कोई अंतर नहीं समझता। 
मैं कभी दीर्घ अतीत में जाता हूँ और वक़्त की तलाश करता हूँ तो हिन्दू मिथक ब्रहमा विष्णु महेश का कल्पित महा काल ढाई अरब साल नज़रों में घूम जाता है कि इस काल में ब्रम्ह्मा अपने शरीर से कायनात को वजूद में लाते हैं , विष्णु सृष्टी को चलते हैं और फिर महेश इसका विनाश कर देते हैं। इस तरह ढाई अरब साल का एक महाकाल समाप्त होता है और यह महा काल समय चक्र में चलता ही रहता है। 
इसके बाद यहूदीयत तखय्युल की बुन्याद है जिस पर दुन्या की तीनों क़ौमें की यकसाँ राय थोड़े बहुत इख्तेलाफ़ के साथ क़ायम है। इनकी राय है कि दुन्या सिर्फ छः सात हज़ार साल पहले वजूद में आई। तमाम कायनात और मख़लूक़ छः दिन में खुदा ने पैदा किया। इनकी यह सोच बहुत ठिंगनी और हास्य स्पद है क्योकि दस्यों हज़ार साल की पुराणी इंसानी तहज़ीब आज साइन्स दान तलाश कर चुके हैं और लाखों साल पहले के इंसानी और हैवानी कंकाल तलाशे जा चुके हैं। पहला आदमी आदम को क़ायम करने के लिए दुन्या की संरचना यहूदियों की कोरी कल्पना हैं जिसे ईसाइयों और मुसलमानो ने मुफ्त पा लिया है। 
अब बचती है एक सूरत जिसे डरबन थ्योरी कहा जाता है जिसमे पहली बार अक़ल की दख्ल  है। उसका ख़याल है कि इंसान का वजूद भी तमाम मख्लूक़ की तरह  ही पानी से हुवा  है 
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान



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