Friday, 5 May 2017

Soorah burooj 86

मेरी तहरीर में - - -
क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी
''हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी''का है,
हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,
और तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।
नोट: क़ुरआन में (ब्रेकेट) में बयान किए गए अलफ़ाज़ बेईमान आलिमों के होते हैं,जो मफ़रूज़ा अल्लाह के उस्ताद और मददगार होते हैं और तफ़सीरें उनकी तिकड़म हैं और चूलें हैं.
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सूरह तारिक़ ८६ पारा ३०  
(वस्समाए वत्तारके) 

ऊपर उन (७८ -११४) सूरतों के नाम उनके शुरूआती अल्फाज़ के साथ दिया जा रहा हैं जिन्हें नमाज़ों में सूरह फातेहा या अल्हम्द - - के साथ जोड़ कर तुम पढ़ते हो.. ये छोटी छोटी सूरह तीसवें पारे की हैं. देखो   और समझो कि इनमें झूट, मकर, सियासत, नफरत, जेहालत, कुदूरत, गलाज़त यहाँ तक कि मुग़ललज़ात भी तुम्हारी इबादत में शामिल हो जाती हैं. तुम अपनी ज़बान में इनको पढने का तसव्वुर भी  नहीं कर सकते. ये ज़बान ए गैर में है, वह भी अरबी में, जिसको तुम मुक़द्दस समझते हो, चाहे उसमे फह्हाशी ही क्यूँ न हो..
इबादत के लिए रुक़ूअ या सुजूद, अल्फाज़, तौर तरीके और तरकीब की कोई जगह नहीं होती, गर्क ए कायनात होकर कर उट्ठो तो देखो तुम्हारा अल्लाह तुम्हारे सामने सदाक़त बन कर खड़ा होगा. तुमको इशारा करेगा कि तुमको इस धरती पर इस लिए भेजा है कि तुम इसे सजाओ और सँवारो, आने वाले बन्दों के लिए, यहाँ तक कि धरती के हर बाशिदों के लिए. इनसे नफरत करना गुनाह है, इन बन्दों और बाशिदों की खैर ही तुम्हारी इबादत होगी. इनकी बक़ा ही तुम्हारी नस्लों के हक में होगा.


"क़सम है आसमान की और उस चीज़ की जो रात को नमूदार होने वाली है,
और आपको कुछ मालूम है कि रात को वह नमूदार होने वाली चीज़ क्या है?
वह रौशन सितारा है,
कोई शख्स ऐसा नहीं कि जिसको कोई याद रखने वाला न हो,
तो इंसान को देखना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा हुवा है,
वह एक उछलते पानी से पैदा हुवा है,
जो पुश्त और सीने के दरमियान से निकलता है,
वह इसको दोबारा पैदा करने में ज़रूर क़ादिर है,
जिस रोज़ कि कलई खुल जाएगी फिर इस इंसान को न तो खुद कूवत होगी,
और न इक कोई हिमायती होगा,
क़सम है आसमान की जिससे बारिश होती है,
और ज़मीन की जो फट जाती है कि कुरआन एक फैसला कर देने वाला कलाम है,
कोई लग्व चीज़ नहीं. ये लोग तरह तरह की तदबीर कर रहे है,
और मैं भी तरह तरह की तदबीर कर रहा हूँ,
तो आप इन काफिरों को यूं ही रहने दीजिए.
सूरह तारिक़ ८६ पारा ३०  आयत (१-१७)

मैं पूने के सफ़र में दो आस्ट्रेलियंस के साथ सफ़र में था. बातों बातों में उन्होंने मेरा नाम पूछ लिया, मैंने अपना नाम मुस्लिम नुमा बतलाया. उन्हों ने तसदीक़ किया you are allah peaple ? मैं कहा हाँ.वह आपस में दबी ज़बान  कुछ बातें करने लगे और कन अंखियों से मुझे देखते जाते. मैं उनकी गुफ्तुगू तो नहीं समझ सका मगर इतना ज़रूर समझ सका कि वह मुझमे कोई अजूबा तलाश रहे हैं
क्या उन्होंने मुसलमानों के मुक़द्दस कुरआन की सूरह तारिक को पढ़ा हुवा है और कह रहे हों कि ये उछलते हुए  पानी से पैदा हुवा है? 

नमाज़ियो !
तुम अपना एक कुरआन खरीद कर लाओ और काले स्केच पेन से उन इबारतो को मिटा दो जो ब्रेकेट में मुतरज्जिम  ने कही है, क्यूँ कि ये कलाम बन्दे का है, अल्लाह नहीं. आलिमो ने अल्लाह के कलाम में दर असल मिलावट कर राखी है. अल्लाह की प्योर कही बातों को बार बार पढो अगर पढ़ पाओ तो, क्यूंकि ये बड़ा सब्र आजमा है. शर्त ये है कि इसे खुले दिमाग से पढो, अकीदत की टोपी लगा कर नहीं. जो कुछ तुम्हारे समझ में आए बस वही क़ुएआन है, इसके आलावा कुछ भी नहीं. जो कुछ तुम्हारी समझ से बईद है वह आलिमो की समझ से भी बाहर है. इसी का फायदा उठा कर उन्हों ने हजारो क़ुरआनी नुस्खे लिखे हैं अधूरा पन कुरआन का मिज़ाज है, बे बुन्याद दलीलें इसकी दानाई है. बे वज़न मिसालें इसकी कुन्द ज़ेहनी है, जेहालत की बातें करना इसकी लियाक़त है. किसी भी दाँव पेंच से इस कायनात का खुदा बन जाना मुहम्मद का ख्वाब है.इसके झूट का दुन्या पर ग़ालिब हो जाना मुसलामानों की बद नसीबी है.
आइन्दा सिर्फ पचास साल इस झूट की ज़िन्दगी है. इसके बाद इस्लाम एक आलमी जुर्म होगा. मुसलमान या तो सदाक़त की रह अपना कर तर्क इस्लाम करके अपनी और अपने नस्लों की ज़िन्दगी बचा सकते है या बेयार ओ मददगार तालिबानी मौत मारे जाएँगे. ऐसा भी हो सकता है ये तालिबानी मौत पागल कुत्तों की मौत जैसी हो, जो सड़क, गली और कूँचों में घेर कर दी जाती है.

मुसलामानों को अगर दूसरा जन्म गवारा है तो आसान है, मोमिन बन जाएँ. मोमिन का खुलासा मेरे मज़ामीन में है.


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

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