Monday, 28 December 2020

सहाबी ए किराम


सहाबी ए किराम  

आम मुसलमान मुहम्मद कालीन युग में इस्लाम पर ईमान लाने वाले मुसलमानो को जिन्हें सहाबी ए कराम कहा जाता है, पवित्र कल्पनाओं के धागों में पिरो कर उनके नामों की तस्बीह पढ़ा करते हैं, 
जब कि वह लोग ज़्यादः तर ग़लत थे, 
वह मजबूर, लाख़ैरे, बेकार और ख़ासकर जाहिल लोग हुवा करते थे. 
क़ुरआन और हदीसें ख़ुद इन बातों के गवाह हैं. 
अगर अक़ीदत का चश्मा उतार के, तलाशे हक़ की ऐनक लगा कर 
इसका मुतालिआ किया जाए तो सब कुछ क़ुरआन और हदीसों में 
ही अयाँ और निहाँ है .   
आम मुसलमान मज़हबी नशा फ़रोशों की दूकानों से और इस्लामी मदारियों से जो पाते है वही जानते हैं, इसी को सच मानते हैं. 
क़ुरआन में मुहम्मद का ईजाद करदा भारी आसमान वाला अल्लाह 
अपनी जेहालत, अपनी हठ धर्मी, अपनी अय्यारियाँ, अपनी चालबाजियाँ, 
अपनी दगाबज़ियाँ, अपने शर साथ साथ अपनी बेवकूफ़ियाँ 
खोल खोल कर बयान करता है. 
मैं तो क़ुरआनी फिल्म का ट्रेलर भर आप के सामने अपनी तहरीरों में पेश कर रहा हूँ. 
मेरा दावा है कि मुसलमानो को अँधेरे से बाहर निकालने के लिए एक ही इलाज है कि इनको नमाज़ें इनकी मादरी ज़ुबान में तर्जुमें की शक्ल में पढ़ाई जाएँ.  
इन्हें बिल जब्र क़ुरआनी तरजुमा सुनाया जाए. 
जदीद क़दरों के मुक़ाबिले में क़ुरआनी दलीलें रुसवा की जाएँ 
जोकि इनका अंजाम बनता है, 
तब जाकर मुसलमान इंसान बन सकता है.
***
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 27 December 2020

मुहम्मद, अल्लाह के रसूल


मुहम्मद, अल्लाह के  रसूल 

 होशियार मुहम्मद जैसे लोग अल्लाह का मुखौटा पहन कर भेड़ों की भीड़ में खड़े होकर कम अक़लों के ख़ुदा बन सकते हैं.
दो चार नस्लों के बाद वह मुस्तनद भी हो जाते हैं. 
ये हमारी पूरब की दुन्या की ख़ासियत है. 
मुहम्मद ने अल्लाह का रसूल बन कर कुछ ऐसा ही खेल खेला 
जिस से सारी दुन्या मुतास्सिर है. 
मुहम्मद इन्तेहाई दर्जा ख़ुद परस्त और ख़ुद ग़रज़ इंसान थे. 
वह हिकमते अमली में चाक चौबंद थे, 
पहले मूर्ति पूजकों को निशाना बनाया, 
अहले किताब (ईसाई और यहूदी) को भाई बंद बना रखा, 
कुछ ताक़त मिलने के बाद मुल्हिदों और दहरियों ( कुछ न मानने वाले, नास्तिक ) को निशाना बनाया, और मज़बूत हुए, तो अहले किताब को भी छेड़ दिया कि 
इनकी किताबें असली नहीं हैं, इन्हों ने फ़र्ज़ी गढ़ ली हैं, असली तो अल्लाह ने वापस ले लीं हैं. हाँला कि अहले किताब को छेड़ने का मज़ा इस्लाम ने भरपूर चखा, और चखते जा रहे हैं मगर ख़ुद परस्त और ख़ुद ग़रज़ मुहम्मद को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. 
वह हर किसी के सर को अपने सजदे में झुका हुवा देखना चाहते थे, 
इसके अलावा कुछ भी नहीं.
ईमान लाने वालों में एक तबका मुन्किरों का पैदा हुआ, 
जिसने इस्लाम को अपना कर फिर तर्क कर दिया, 
जिसने मुहम्मदी अल्लाह को क़रीब से देखा तो इसे झूट क़रार दिया, 
उनको ग़ालिब मुहम्मद ने क़त्ल कर देने का हुक्म दिया, 
इससे बा होश लोगों का सफ़ाया हो गया, 
जो डर कर इस्लाम में वापस हुए वह मुरतिद कहलाए.
मुहम्मद ख़ुद सरी, ख़ुद सताई, ख़ुद नुमाई और ख़ुद आराई के पैकर थे. 
अपनी ज़िन्दगी में जो कुछ चाहा, पा लिया, 
मरने के बाद भी कुछ छोड़ना नहीं चाहते थे कि ख़ुद को पैग़म्बरे आख़रुज़ ज़मा बना कर क़ायम हो गए, यही नहीं मुहम्मद अपनी जिहालत भरी क़ुरआन को अल्लाह का आख़री निज़ाम बना गए. 
मुहम्मद ने मानव जाति के साथ बहुत बड़ा जुर्म किया है जिसका ख़म्याज़ा सदियों से मुसलमान कहे जाने वाले बन्दे भर रहे है. 
अध् कचरी, अधूरी, पुर जेह्ल और नाक़िस बातों को आख़री निज़ाम क़रार दे दिया है. 
क्या उस शख़्स के सर में ज़रा भी भेजा नहीं था? 
कि वह इर्तेक़ाई तब्दीलियों को समझा ही नहीं सका. 
क्या उसके दिल में कोई इंसानी दर्द था ही नहीं कि इसके झूट एक दिन नंगे हो जाएँगे,
तब इसकी उम्मत का क्या हश्र होगा?
आज इतनी बड़ी आबादी हज़ारों झूट में क़ैद में, मुहम्मद की बख़्शी हुई सज़ा काट रही है. वह सज़ा जो इसे विरासत में मिली हुई है, 
वह सज़ा जो ज़हनों में पिलाई हुई घुट्टी की तरह है, 
वह क़ैद जिस से रिहाई ख़ुद क़ैदी नहीं गवारा करता, 
रिहाई दिलाने वाले से जान पर खेल जाता है. 
इन पर अल्लाह तो रहेम करने वाला नहीं, आने वाले वक़्तों में देखिए, क्या हो? 
कहीं ये अपने बनाए हुए क़ैद ख़ाने में ही दम न तोड़ दें. 
या फिर इनका कोई सच्चा पैग़म्बर पैदा हो.
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 26 December 2020

फ़ितरते इंसानी


फ़ितरते इंसानी 

हर शै की तरह इंसानी ज़ेहन भी इर्तेकई मरहलों के हवाले रहता है जिसके तहत अभी इंसानी मुआशरे को ख़ुदा की ज़रुरत है. कुछ लोग बहुत ही सादा लौह होते हैं, उन्हें अपने वजूद के सुपुर्दगी में मज़ा आता है. जैसे की एक हिन्दू धर्म पत्नि अपने पति को ही देवता मान कर उसके चरणों में पड़ी रहने में राहत महसूस करती है. 
हमारे एक डाक्टर दोस्त हैं, जो बहुत ही सीधे सादे नेक दिल इंसान हैं, 
वह अपने हर काम का अंजाम ईश्वर की मर्ज़ी पर डाल के बहुत सुकून महसूस करते हैं, 
उनको देख कर बड़ा रश्क आता है कि वह मुझ से बेहतर ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, 
कभी कभी अन्दर का कमज़ोर इंसान भटक कर कहता है कि किसी न किसी ख़ुदा को मान कर ही जीना चाहिए. किसी का क्या नुक़सान है कि कोई अपना ख़ुदा रख्खे. 
ये फ़ितरते इंसानी ही नहीं, बल्कि फ़ितरते हैवानी भी है. 
एक कुत्ता अपने मालिक के क़दमों पर लोट कर कितना ख़ुश होता है. 
बहुत से हैवान इंसान की पनाह में रहकर ही अमाँ पाते हैं. 
अपने पूज्य, अपने माबूद, अपने देव और अपने मालिक के तरफ़ ये क़दम इंसान या हैवान के दिल के अन्दर से फूटा हुवा जज़बा है, न कि इनके ऊपर लादा गया तसल्लुत. 
ये किसी ख़ारजी तहरीक या तबलीग़ का नतीजा नहीं, इसके पीछे कोई डर, खो़फ़ नहीं, कोई लालच या सियासत नहीं है. इसको मनवाने के लिए कोई क़ुरआनी अल्लाह की आयतें नहीं जिसके एक हाथ में दोज़ख की आग और दूसरे हाथ में जन्नत का गुलदस्ता रहता है. 
अन्दर से फूटी हुई ये चाहत क़ुरआनी अल्लाह की तरह हमारे वजूद की घेरा बंदी नहीं करतीं. आपका ख़ुदा किसी को मुतास्सिर न करे, शौक से पूजिए जब तक कि आप अपने सिने बलूग़त में न आ जाएं, आप की समझ में ज़िन्दगी के राज़ ओ नयाज़ न झलकें.
बेटे ने कहा , "अब्बा अब्बा फफीम खाएँगे."
 बाप बोला बेटा पहले अफ़ीम कहना तो सीखो. 
वैसे ही होती है अल्लाह की फफीम - - -
*****

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 25 December 2020

सेक्स-sex


 सेक्स-sex

मुहम्मद अपनी टोली में बैठे थे कि एक औरत आई और मुहम्मद से कहा,
आप मुझे अपने निकाह में ले लीजिए, पेट भरने का तो ठिकाना मिले.
मुहम्मद उसे देख कर मुस्कुराए. 
सोचा होगा कि 9 अदद वैसे भी हैं, 
अब इस झमेले में पडना मुनासिब नहीं. 
उन्हों ने मुस्कुराते हुए इंकार में सर हिला दिया.
उनके टोली में एक फटीचर भी बैठा हुवा था,  
 मुहम्मद के इनकार करने के फ़ौरन बाद बोला,
या रसूल अल्लाह ! 
इस औरत को मेरे निकाह में दे दीजिए ,
मुहम्मद ने कहा, तू अपने घर जा और देख कर आ कि
 तेरे पास क्या क्या असासे हैं.
वह हुक्म को मानते हुए घर गया और वापस आकर बतलाया कि, 
उसके पास कोई भी असासा नहीं है, बस तन से लिपटी हुई इस लुंगी के सिवा.
मुहम्मद ने पूछा क़ुरान की कोई आयत याद है ? 
उसने क़ुरान की एक आयत सुना दिया.
मुहम्मद ने दोनों का निकाह पढ़ा कर रुख़सत कर दिया.
(हदीस तजदीद बुख़ारी शरीफ उर्दू )

मुहम्मद का फ़ैसला दोनों के हक़ में ग़नीमत था. 
उन दोनों के पास कुछ भी न था 
क़ुदरत की बख़्शी  हुई दौलत सिर्फ़ SEX था, 
जिसके तुफ़ैल में दोनों एक दूसरे के मुस्तहक़ भी थे और तलबगार भी. 
अगले दिन उनके अन्दर समाया हुवा हिस बेदार हुवा होगा 
और उन्हें आपस में एक दूसरे के पेट के लिए ग़ैरत जगी होगी. 
वह ज़रूर हरकत में आ गए होंगे. 
उनके यहाँ बाल बच्चे भी हुए होंगे, 
ख़ुश हाली भी आ गई होगी.
SEX की बड़ी बरकत होती है, 
आप देखते हैं कि परिंदे SEX के बाद कितने ज़िम्मेदार हो जाते हैं, 
घोसला बनाने लगते हैं, 
अपने बच्चों के लिए चारा ढो ढो कर लाना शुरू कर देते हैं.
मुझे हैरत होती है कि हिन्दू समाज SEX को इतना बुरा क्यों मानता है. 
SEX को दबाने की कोशिश क्यों करता है ? 
SEX की लज्ज़त से इतना ना आशना क्यों होता है ? 
पेट भरने के बाद SEX इंसान की दूसरी ज़रुरत है.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 24 December 2020

अनर्गल श्रद्धा


अनर्गल  श्रद्धा 

आस्थावान और श्रद्धालु पक्के चूतिए होते हैं. 
मुस्लिम आस्थावान हिन्दू आस्थावान की आस्था कुफ़्र, शिर्क और ढोंग समझता है, औए हिन्दू आस्थावान मुसलमानों की आस्था और अक़ीदा को कूड़ा. 
दोनों की आस्थाएँ मनमानी हैं जो निराधार होती हैं.
मैंने आस्थावानों और श्रद्धालु के लिए कठोर, अभद्र और असभ्य  भाषा का इस्तेमाल जान बूझ कर किया है ताकि झटका लगे और यह अपनी धुन पर पुनर विचार करें.
इनको वस्त्रहीन करके दिखलाया जाए कि अभी तक ये बालिग़ नहीं हुए हैं, 
जैसे कि कभी कभी एक डाक्टर मरीज़ को नंगा कर देता है.
आस्थावान जेहनी मरीज़ ही तो होते हैं जो अपनी अपनी आस्था क़ायम करके या विरासत में मिली आस्था को लेकर समाज को अव्योस्थित किए रहते हैं. 
या कार्ल मार्क्स का कथन कि यह अफ़ीमची होते हैं.
इन मानसिक रोगियों से समाज डरता है जब यह समूह बन जाते हैं 
और इनकी खिल्ली उड़ाई जाती है जब अल्प संख्यक होते हैं. 
यानी चूतिए बनाम चूतिए. 
आस्थावान होना चाहिए उन मूल्यों का जो मानव जाति के भलाई में होती हैं, 
जो आस्था धरती के हर प्राणी के लिए शुभ हों, 
आस्थावान होना चाहिए धरती सजाने संवारने वाले उन सभी कार्यों के 
जो इसके लिए हमारे वैज्ञानिक अपनी अपनी ज़िंदगियाँ समर्पित किए हुए हैं. 
यही श्रद्धालु हमारी आगामी नस्लों के शुभ चिन्तक हैं.
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 23 December 2020

नास्तिकता


नास्तिकता

खौ़फ़, लालच और अय्यारी ने God, अल्लाह या भगवान को जन्मा.
इनकी बुन्याद पर बड़े बड़े धर्म और मज़हब फले फूले, 
अय्यारों ने अवाम को ठगा. 
इन ठगों को धर्म ग़ुरु कहा जाता है. 
कभी कभी यह निःस्वार्थ होते हैं मगर इनके वारिस चेले यक़ीनन फ़ित्तीन होते है.
कुछ हस्तियाँ इन से बग़ावत करके धर्मों की सीमा से बाहर निकल आती हैं , 
मगर वह काल्पनिक ख़ुदा के दायरे में ही रहती हैं, इन्हें संत और सूफ़ी कहा जाता है. 
संत और सूफ़ी कभी कभी मन को शांति देते है.
कभी कभार मै भी इन की महफ़िल में बैठ कर झूमने लगता हूँ. 
देखा गया है कि इनकी मआ
मज़ारें और मूर्तियाँ स्थापित हो जाती है 
और आस्था रूपी धंधा शुरू हो जाता है.
कुछ मानव मात्र इन से बेगाना होकर, मानव की ज़रूरतों को समझते हैं , 
उनके लिए ज़िंदगी को आसान बनाने का जतन किया, 
ऐसे महा पुरुष मूजिद (ईजाद करने वाला) और साइंस दां होते हैं . 
उन्हें नाम नमूद या दौलत की कोई चिंता नहीं, 
अपने धुन के पक्के, वर्षों सूरज की किरण भी नहीं देखते, 
अपना नाम भी भूल जाते हैं.
यह महान मानव संसाधनों के आविष्कारक होते हैं.
इनकी ही बख़्शी  हुई राहों पर चल कर दुन्या बरक़रार रहती है.
आधी दुन्या हवा के बुत God या अल्लाह को पूजती है, 
एक चौथाई दुन्या मिटटी पत्थर और धात की बनी मूर्तियाँ पूजती है, 
और एक चौथाई दुन्या ला मज़हब अथवा नास्तिक है. 
नास्तिकता भी एक धर्म है, 
निज़ाम ए हयात है 
या जीवन पद्धति कहा जाए. 
यह नवीन लाइफ़ स्टाइल है.
उपरोक्त धर्म और अर्ध धर्म हमें थपकियाँ देकर अतीत में सुलाए रहते हैं 
और साइंस दान भविष्य की चिंता में हमे जगाए रहते हैं. 
वास्तविकता को समझिए 
नास्तिकता को पहचानिए 
कि इसकी कोई पहचान नहीं.
यह मानव मात्र है.
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 22 December 2020

मुहम्मद की दीवानगी


मुहम्मद की दीवानगी 

कितना जालिम तबा था अल्लाह का वह ख़ुद साख़्ता रसूल? 
बड़े शर्म की बात है कि आज हम उसकी उम्मत बने बैठे हैं. 
सोचें कि एक शख़्स रोज़ी की तलाश में घर से निकला है, 
उसके छोटे छोटे बाल बच्चे और बूढे माँ बाप उसके हाथ में लटकती रिज़्क़ की पोटली का इन्तेज़ार कर रहे हैं और इसको मुहम्मद के दीवाने जहाँ पाते हैं क़त्ल कर देते हैं? 
एक आम और ग़ैर जानिबदार की ज़िन्दगी किस क़दर मुहाल कर दिया था मुहम्मद की दीवानगी ने. बेशर्म और ज़मीर फ़रोश ओलिमा उल्टी कलमें घिस घिस कर उस मुज्रिमे इंसानियत को मुह्सिने इंसानियत बनाए हुए हैं. 
यह क़ुरआन उसके बेरहमाना कारगुज़ारियों का गवाह है और शैतान ओलिमा इसे मुसलमानों को उल्टा पढा रहे हैं. 
हो सकता है कुछ धर्म इंसानों को आपस में प्यार मुहब्बत से रहना सिखलाते हों मगर उसमें इसलाम हरगिज़ नहीं हो सकता. मुहम्मद तो उन लोगों को भी क़त्ल कर देने का हुक्म देते हैं जो अपने मुस्लमान और काफ़िर दोनों रिश्तेदारों को निभाना चाहे. 
आज तमाम दुन्या के हर मुल्क और हर क़ौम, यहाँ तक कि क़ुरानी मुस्लमान भी इस्लामी दहशत गर्दी से परेशान हैं. इंसानियत की तालीम से नाबलद, क़ुरानी तालीम से लबरेज़ अलक़ाएदा और तालिबानी तंजीमों के नव जवान अल्लाह की राह में तमाम इंसानी क़द्रों पैरों तले रौंद सकते हैं, इर्तेकई जीनों को तह ओ बाला कर सकते हैं. 
सदियों से फली फूली तहजीब को कुचल सकते हैं. हजारों सालों की काविशों से इन्सान ने जो तरक़्क़ी की मीनार चुनी है, उसे वोह पल झपकते मिस्मार कर सकते हैं. इनके लिए इस ज़मीन पर खोने के लिए कुछ भी नहीं है एक नाकिस सर के सिवा, जिसके बदले में ऊपर उजरे अज़ीम है. इनके लिए यहाँ पाने के लिए भी कुछ नहीं है सिवाए इस के कि हर सर इनके नाक़िस इसलाम को क़ुबूल करके और इनके अल्लाह और उसके रसूल मुहम्मद के आगे सजदे में नमाज़ के वास्ते झुक जाए. 
इसके एवज़ में भी इनको ऊपर जन्नतुल फ़िरदौस धरी हुई है, 
पुर अमन चमन में तिनके तिनके से सिरजे हुए आशियाने को इन का तूफ़ान पल भर में पामाल कर देता है.
*****
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 21 December 2020

मुग़ीरा इब्ने शोअबा


मुग़ीरा इब्ने शोअबा

 मुहम्मद के साथी सहाबी की हदीस है कि इन्होंने (मुग़ीरा इब्ने शोअबा) एक क़ाफ़िले का भरोसा हासिल कर लिया था फिर गद्दारी और दग़ा बाज़ी की मिसाल क़ायम करते हुए उस क़ाफ़िले के तमाम लोगो को सोते में क़त्ल करके मुहम्मद के पनाह में आए थे और वाक़ेआ को बयान कर दिया था, फिर अपने लूटे हुए माल को बचाते हुए अपनी शर्त पर मुस्लमान हो गए थे. (बुख़ारी-११४४)

मुसलमानों ने उमर द ग्रेट कहे जाने वाले ख़लीफ़ा के हुक्म से जब ईरान पर लुक़मान इब्न मुक़रन की क़यादत में हमला किया तो ईरानी कमान्डर ने बे वज्ह हमले का सबब पूछा था तो इसी मुग़ीरा ने क्या कहा ग़ौर फ़रमाइए - - -

''हम लोग अरब के रहने वाले हैं. हम लोग निहायत तंग दस्ती और मुसीबत में थे. 
भूक की वजेह से चमड़े और खजूर की गुठलियाँ चूस चूस कर बसर औक़ात करते थे. दरख़्तों और पत्थरों की पूजा किया करते थे. ऐसे में अल्लाह ने अपनी जानिब से हम लोगों के लिए एक रसूल भेजा. इसी ने हम लोगों को तुमसे लड़ने का हुक्म दिया है, उस वक़्त तक कि तुम एक अल्लाह की इबादत न करने लगो या हमें जज़या देना न क़ुबूल करो. इसी ने हमें परवर दिगार के तरफ़ से हुक्म दिया है कि जो जेहाद में क़त्ल हो जाएगा वह जन्नत में जाएगा और जो हम में ज़िन्दा रह जाएगा वह तुम्हारी गर्दनों का मालिक होगा.
यह पहला जिहादी हमला हुवा. 
(बुख़ारी जदीद - १२८९)
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 20 December 2020

बेचारे मुसलमान


बेचारे मुसलमान

मुसलमान बड़े सब्र आज़मा दौर से गुज़र रहे हैं. उन के सच्चे रहनुमाओं को उपाधियाँ दे दी जाती हैं और उनको ऐसा बदनाम किया जाता है कि जैसे ज़हरीला सांप हो. 
उसकी अकेली आवाज़ दस आवाजों के बीच दब कर रह जाती है. 
मुस्लिम समाज की अच्छाईयाँ भी अकसरियत की ढिंढोरा बुरा बना देती है. अकसरियत की बुरायाँ तरक्क़ी पा रही हैं, उनको टोकने वाला कोई नहीं. 
आज कल मुस्लिम औरतों के लिए अकसरियत सूखी जा रही है. 
औरतों के मुआमले में अगर देखा जाए तो मुस्लिम समाज सुर्ख़रू हैं 
और हिन्दू समाज ज़र्दरू. 
मुस्लिम समाज में बेवाओं और तलाक़ शुदा को फ़ौरन अपना लिया जाता है. 
शादी के लिए उसे तरजीह दी जाती है. 
हिन्दू अपनी बेवा माँ बहन और बेटियों को पंडों के हरम (आश्रम) में जमा करा देता है. इस समाज में तलाक़ की नौबत ही नहीं आती, 
बहू को स्वाहः कर दिया जाता है. 
कंजूस समाज अबला को पालने को राज़ी नहीं होता. 
मुस्लिम समाज में माँ के पैर के नीचे जन्नत होती है. 
बेटियाँ अल्लाह की रहमत हैं.
शराब हिन्दू समाज का बड़ा मसअला है, लाखों औरतें और बच्चे इसका शिकार हैं. मुस्लिम समाज के लिए शराब कोई मसअला ही नहीं, शराब हराम जो ठहरी.
हज़ारो नंग धुडंग नागा मख़लूक़ हिन्दू ही होती है, 
मुसलमानों में नंग्नता का तसव्वुर भी नहीं है.
यह चंद मिसालें हैं,
लिखने को बहुत कुछ है 
मगर बात दूर तक चली जाएगी. 
मुसलमान बुनयादी तौर पर उन कट्टर मनुवादियों का शिकार हैं जिनके चंगुल से यह निकल गए. उप महाद्वीप की लग भग 50% आबादी इनकी ग़ुलामी से मुक्त हो गई है और मुसलसल इनके हाथों से निकलती चली जा रही है. 
भारत के मुसलमानों का जुर्म क्या है ? 
वह अरब के लड़ाके क़बीलों का अंश नहीं, मूलतः भारतीय हैं.
मुस्लिम कलचर और मुस्लिम पद्धति के अंतर्गत हैं जो कि कोई जुर्म नहीं. 
मगर इनको ख़ुद जागना होगा, यह इल्म जदीद को समझें, 
मदरसे से निकलकर बाहर खड़े हो जाएं जिसे ख़ुद मनुवाद चला रहा है 
कि मुसलमान इसमें मुब्तिला रहें. आगे न बढ़ जाएं.
मुसलमान "तअलीम ए नव" से जुड़ने के लिए आमादा हो जाएं. 
मुल्ला और मोलवी से फ़ासला अख़्तियार करे. 
तीन तलाक़ जैसी बुराई को खद हराम क़रार दें, 
न कि फ़लाने ढिमाके आकर इनकी ख़बर लें. 
बाक़ी मुआमले में मनुवादियों से कोसों आगे हैं.
मगर तअलीम में किसी से भी कोसों पीछे.
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 19 December 2020

बारीक बीन अँधा

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बारीक बीन अँधा     

मुसलमानों! 
अल्लाह तअला न बारीक बीन है न बाख़बर, 
न वह बनिए की तरह है कि सब का हिसाब किताब रखता है, 
वह अगर है तो एक निज़ाम बना कर क़ुदरत के हवाले कर दिया है, 
अगर नहीं है तो भी क़ुदरत का निज़ाम ही कायनात में लागू है. 
हर अच्छे बुरे का अंजाम मुअय्यन है, 
इस ज़मीन की रफ़्तार अरबों बरस से मुक़र्रर है कि है कि 
वह एक मिनट के देर के बिना साल में एक बार अपनी धुरी पर 
अपना चक्कर पूरा करती है. 
क़ुदरत गूँगी, बहरी है और अंधी है 
उससे निपटने के लिए इंसान हर वक़्त उसके मद्दे मुक़ाबिल रहता है. 
अगर वह मुक़ाबिला न करता होता तो अपना वजूद गवां बैठता, 
आज जानवरों की तरह सर्दी, गर्मी और बरसात की मार झेलता होता, 
बड़ी बड़ी इमारतों में ए सी में न बैठा होता.
मुसलमान उसका मुक़ाबिला नहीं करता बल्कि उसको पूजता है, 
यही वजेह है कि वह ज़वाल पज़ीर है.
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 18 December 2020

तुम्हारे लिए अच्छा मौक़ा है


तुम्हारे लिए अच्छा मौक़ा है 

मुसलमानों !
मौजूगा शहरी क़ानून से में परेशान न हो ? घबराना नहीं, तुम्हारे पास तिरयाक़ है. 
तुम फ़िलहाल नमाज़ रोज़े और इबादत को ताक़ पर रख कर भूल जाओ, 
'लाइलाहा इल्लिलाह मोहम्मादुर रसूल्लिल्लाह' ईमान नहीं बे ईमानी है.  
इसे  ताक़ ए निस्याँ करो. फ़ितरी ईमान सब कुछ है. इसे समझो.
अरब क़बीलों में उस वक़्त लड़कियां ज़िन्दा दफ़्न कर दी जाती थीं 
और बहुत सी बुराइयाँ थीं, सैकड़ों बुत थे, हर बुत  का एक तबक़ा था, 
लोग आपस में लड़ भिडकर एक दूसरे से बैर सखते. 
ऐसे मुआशरे को संवारने के लिए मुहम्मद का यह झूट 
लाइलाहा इल्लिलाह मोहम्मादुर रसूलिल्लाह,
सच से मुक़द्दस था. 
दुन्या बदल चुकी है, 
आज एक कुत्ते के बच्चे को भी ज़िन्दा दफ़्न करना दुन्या को गवारा नहीं. 
अल्लाह को हज़ारों सालकी इस मुहज़्ज़ब दुन्या ने अभी तक नहीं देखा, 
तो इसका वजूद भी मशकूक है. 
जब अल्लाह ही नहीं तो उसका एजेंट क्या मअने ? 
तुम मुस्लिम से मोमिन बन जाओ. 
ईमान दार मोमिन.
हक़ हलाल और मेहनत की रोटी खाओ. 
हुक़ूक़ुल इबाद पर इस्लामी रुक्न पर ईमान लाओ, 
यह ईमान ए हक़ीक़ी है.
माली हैसियत कोई ख़ास चीज़ नहीं, ईमान दारीअहम् चीज़ है. 
"वह" इस राज़ को नहीं जानते, वह लक्षमी पूजक हैं. 
मोमिन ही इस राज़ को जानता है की पैसा हाथ की मैला है.
मोलवियों और मुल्लाओं के फंदे से निकल कर
अपने बच्चो को जदीद तालीम दो.
इल्म ही दुन्या की महफ़ूज़ रहगुज़र है.
हक़ हलाल की रोज़ी ही सच्चा ईमान है.
***


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 17 December 2020

बुरे इस्लाम की कुछ खूबी


बुरे इस्लाम की कुछ खूबी

ग़ालिब कहता है - - -
बाज़ीचा ए इतफ़ाल है दुन्या मेरे आगे,
होता है शब व रोज़ तमाशा मेरे आगे.

बाज़ीचा ए इतफ़ाल = बच्चों के खेलने मैदान , 
अर्थात यह दुन्या मेरे नजदीक वह मैदान है जहाँ बच्चे खेलते हैं.
दिन व रात बच्चों के खेल के तमाशे मेरे आगे हुवा करते हैं 
और मैं फ़क़त इसका दर्शक बना रहता हूँ.
जी हाँ मैदान में यह बच्चे कभी पूजा पाठ का खेल खेलते हैं 
तो कभी नमाज़ रोज़ा का.
कभी घंटा घड्याल बजाते हैं तो कभी अज़ान चीखते है. 
कभी यह रक़्स ए इरफ़ानी करते हैं तो कभी गणपति बाप्पा मौर्या गाते हैं.
जुनैद मुंकिर भी चचा ग़ालिब का भतीजा है 
और उनके ही नक़्श ए क़दम पर चलता है.
जब से मैंने इस्लाम के साथ साथ हिन्दू धर्म के राग माले पेश करना शुरू किया है, धर्म दूषित लोगों ने इसे पसंद नहीं किया. 
मुझे un friend करना भी शुरू कर दिया है, 
कुछ ने तो गाली देना भी उचित समझा. 
ऐसे लोगों को मैं ख़ुदद अपनी रौशनी से बंचित कर देता हूँ.
उनकी दृष्टि में इस बात की कोई अहमयत नहीं कि 
मैंने इस्लाम को कुछ बुरा जान कर तर्क ए इस्लाम किया, 
उनकी चाहत है कि मैं हिन्दू क्यूँ नहीं बन गया? 
एक अल्लाह पर विश्वाश को छोडने वाला, 
गोबर अथवा देह मैल से निर्मित भगवान गणेश को स्थान देते हुए, 
हिंदुत्व का श्री गणेश क्यूँ नहीं करता .
हिंदुत्व और इस्लाम दो मुख़्तलिफ़ जीवन पद्धतियाँ हैं. 
इस्लाम दुश्मन को क़त्ल कर देता है. 
हिंदुत्व (मनुवाद) शत्रु को कभी भी क़त्ल नहीं करता, 
बल्कि दास बना लेता है. 
दुश्मन की पुश्त दर पुश्त मनुवाद के दास हुवा करते है, 
दास ऐसे कि जिनसे नफ़रत की सारी हदें पार हो जाती हैं.
उनके साया से भी परहेज़ होता है, 
उनकी मर्यादाएं मनुवाद की उगली हुई उल्टियाँ होती है. 
पांच हज़ार साल से भारत के मूल निवासी मनुवाद के ज़ुल्म को जी रही हैं, 
दास (ग़ुलाम) इस्लाम में भी हुवा करते थे 
मगर शर्त होती कि जो ख़ुद खाओ, 
वही ग़ुलाम को खिलाओ. जो ख़ुद पहनो वही ग़ुलाम को भी पहनाओ.
एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद व् अयाज़, 
कोई बंदा रहा और न कोई बंदा नवाज़.
हिन्सुस्तान का पहला मुस्लिम शाशक क़ुतुबुद्दीन ऐबक 
अपने बादशाह का ग़ुलाम ही था.
यह है बुरे इस्लाम की कुछ खूबी.
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 16 December 2020

अल्लाह की अह्द शिकनी


अल्लाह की अह्द शिकनी

अल्लाह अह्द शिकनी करते हुए कहता है - - -
''अल्लाह की तरफ़ से और उसके रसूल की तरफ़ से उन मुशरिकीन के अह्द से दस्त बरदारी है, जिन से तुमने अह्द कर रखा था.''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ पारा आयत (१)(२)
मुसलामानों ! 
आखें फाड़ कर देखो यह कोई बन्दा नहीं, तुम्हारा अल्लाह है जो अहद शिकनी कर रहा है, वादा ख़िलाफ़ी कर रहा है, मुआहिदे की धज्जियाँ उड़ा रहा है, मौक़ा परस्ती पर आमदः है, वह भी इन्सान के हक़ में अम्न के ख़िलाफ़ ? 
कैसा है तुम्हारा अल्लाह, कैसा है तुम्हारा रसूल ? एक मर्द बच्चे से भी कमज़ोर जो ज़बान देकर फिरता नहीं. मौक़ा देख कर मुकर रहा है? 
लअनत भेजो ऐसे अल्लाह पर.
''सो तुम लोग इस ज़मीन पर चार माह तक चल फिर लो और जान लो कि तुम अल्लाह तअला को आजिज़ नहीं कर सकते और यह कि अल्लाह तअला काफ़िरों को रुसवा करेंगे.''
कहते है क़ुरआन अल्लाह का कलाम है, 
क्या इस क़िस्म की बातें कोई ख़ालिक़ ए कार-ए-कायनात कर सकता है? 
मुसलमान क्या वाक़ई अंधे,बहरे और गूँगे हो चुके हैं, वह भी इक्कीसवीं सदी में. 
क्या ख़ुदाए बरतर एक साज़िशी, पैग़म्बरी का ढोंग रचाने वाले अनपढ़, नाक़बत अंदेश का मुशीर-ए-कार बन गया है. ?
वह अपने बन्दों अपनी ज़मीन पर चलने फिरने की चार महीने की मोहलत दे रहा है ? 
क्या अज़मतों और जलाल वाला अल्लाह आजिज़ होने की बात भी कर सकता है? 
क्या वह बेबस, अबला महिला है जो अपने नालायक़ बच्चों से आजिज़-ओ-बेज़ार भी हो जाती है. वह कोई और नहीं बे ईमान मुहम्मद स्वयंभू रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं जो अल्लाह बने हुए अह्द शिकनी कर रहे है.
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 15 December 2020

सगे भाई बहन बन सकते है पति पत्नी ,

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सगे भाई बहन बन सकते है पति पत्नी , 

देख लो वेदों में लिखी गंदगी
Arvind Rawat shared a link.| 
09 Jun 2016
वेदों को भुदेवताओ द्वारा ज्ञान और विज्ञान का भंडार कह कर सारी दुनियाँ में प्रचारित किया जा रहा है| इसकी सच्चाई को जानने विदेशी भी संस्कृत का अध्ययन कर रहे है. नतीजा उन्हें भी पता चल जाएगा कि वेदों कितने पानी में है. कुछ उदहारण नीचे देखिये .......??? 
**वेदों में याम और यमी आपस में भाई बहन है इन दोनों की अश्लीलता देखिये ........... " क्या एक भाई बहन का पति नही बन सकता ..... 
मै वासना से अधीन होकर यह प्रार्थना करती हू कि 
तुम मेरे साथ एक हो जाओ और रमण करो ..... 
वाह रे ज्ञान के भंडार .......!!!!! 
वेदों के हिमायतियों को भाई बहन का त्यौहार 'रक्षा बंधन से दूर ही रहना ठीक होगा. 
*इसके साथ ही वेदों की कुछ ऋचाओं, में देवता उपस्थित है, कुछ में नही. 
कुछ में पुजारी उपस्थित है कुछ में नही. किसी ऋचा में देवता की स्तुति की गई है, 
तों किसी ऋचाओं में केवल याचना. कुछ में प्रतिज्ञाए की गई है, तों कुछ ऋचाओं में श्राप दिए गए है.  कुछ ऋचाओं में दोषारोपण किया गया है और कुछ में विलाप किया गया है| कुछ ऋचाओं में इन्द्र से शराब और मांसाहार के लिए प्रार्थना की गई है | 
वेदों में यह विभिन्नताए यह प्रमाणित कराती है की ये ऋचाए भिन्न -भिन्न ऋषियों ( 99% ब्राहमणों ) की रचना है | और हर ऋषि का अपना एक देवता है जिससे वह ऋषि अपनी इच्छा पूर्ति की प्रर्थना करता है | वेदों में न कोई आध्यात्म है, न कोई ज्ञान विज्ञान ,और न कोई नैतिकता |बल्कि अश्लीलता और पाखण्ड ,शराब पीने और मांसाहार करने का भरपूर बोलबाला | कोई महामूर्ख ही वेदों को ज्ञान -विज्ञान का भंडार कह सकते है | 
अपनी बेटी से बलात्कार करने वाला, जगत रचयिता : ब्रह्मा 
'ब्रह्मा'शब्द के विविध अर्थ देते हुए श्री आप्र्टे के संस्कृत-अंग्रेजी कोष में यह लिखा है- पुराणानुसार ब्रह्मा की उत्पति विष्णु की नाभि से निकले कमल से हुई बताई गई है उन्होंने अपनी ही पुत्री सरस्वती के साथ अनुचित सम्भोग कर इस जगत की रचना की पहले ब्रह्मा के पांच सर थे,किन्तु शिव ने उनमें से एक को अपनी अनामिका से काट डाला व अपनी तीसरी आँख से निकली हुई ज्वाला से जला दिया. श्रीमद भगवत, तृतीय स्कंध, अध्याय १२ में लिखा है--- 
वाचं.................प्रत्याबोध्नायं ||२९|| अर्थात : मैत्रेय कहते है की हे क्षता(विदुर)!हम लोगों ने सुना है की ब्रह्मा ने अपनी कामरहित मनोहर कन्या सरस्वती की कामना कामोन्मत होकर की ||२८|| पिता की अधर्म बुद्धि को देखकर मरिच्यादी मुनियों ने उन्हें नियमपूर्वक समझाया ||२९||क्या यह पतन की सीमा नहीं है.? इससे भी ज्यादा लज्जाजनक क्या कुछ और हो सकता है.?
***
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 14 December 2020

सूरह-ए-तौबः


सूरह-ए-तौबः
 
सूरह-ए-तौबः एक तरह से अल्लाह की तौबः है . 
अरबी रवायत में किसी नामाक़ूल, नामुनासिब, नाजायज़ या नाज़ेबा काम की शुरूआत अल्लाह या किसी मअबूद के नाम से नहीं की जाती थी, 
आमदे इस्लाम से पहले यह क़ाबिले क़द्र अरबी क़ौम के मेयार का एक नमूना था. 
मुहम्मद ने अपने पुरखों की अज़मत को बरक़रार रखते हुए इस सूरह की शुरूआत बग़ैर बिस्मिल्लाह हिररहमा निररहीम से ख़ुद शुरू किया. 
आम मुसलमान इस बात को नहीं जानता कि कुरान की ११४ सूरह में से सिर्फ़ एक सूरह, सूरह-ए-तौबः बग़ैर बिस्मिल्लाह हिररहमा निररहीम पढ़े शुरू करनी चाहिए, इस लिए कि इस में रसूल के दिल में पहले से ही खोट थी. 
मुआमला यूँ था कि मुसलामानों का मुशरिकों के साथ एक समझौता हुआ था कि आइन्दा हम लोग जंगो जद्दाल छोड़ कर पुर अम्न तौर पर रहेंगे. ये मुआहदा क़ुरआन का है, गोया अल्लाह कि तरफ़ से हुवा. इसको कुछ रोज़ बाद ही अल्लाह निहायत बेशर्मी के साथ तोड़ देता है 
और बाईस-ए-एहसास जुर्म अपने नाम से सूरह की शुरूआत नहीं होने देता.
मुसलामानों! 
इस मुहम्मदी सियासत को समझो. 
अक़ीदत के कैपशूल में भरी हुई मज़हबी गोलियाँ कब तक खाते रहोगे? 
मुझे गुमराह, गद्दार, और ना समझ समझने वाले क़ुदरत कि बख़्शी हुई अक़्ल का इस्तेमाल करें, तर्क और दलील को गवाह बनाएं तो ख़ुद जगह जगह पर क़ुरआनी लग्ज़िशें पेश पेश हैं कि इस्लाम कोई मज़हब नहीं सिर्फ़ सियासत है और निहायत बद नुमा सियासत जिसने रूहानियत के मुक़द्दस एहसास को पामाल किया है।
***
 
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 13 December 2020

रामायण कथा


रामायण कथा 

बिना आज्ञा कक्ष में प्रवेश पर राम ने भाई लक्षमन को मृत्यु दंड दिया, 
चौदह साल राज भोग करने वाले कैकेई पुत्र, भाई भरत के बेटों को मर्यादा पुरुष राम देश निकाला का आदेश दिया, 
अर्धांगिनी सती सीता की एक साधारण धोबी की फ़ब्ती कसने पर अग्नि परीक्षा लिया, (सीता धरती में समां गई ? या अपने दोनों पुत्रों के लेकर आश्रम चली गई ?)
यह धर्म का चिर परिचित विवाद है.
मर्यादा पुरुष की ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अमर्यादित हैं. 
अंत में पश्याताप की आग ने राम को आत्म ह्त्या के लिए बाध्य कर दिया 
और वह सरयू धारा में समां गए. 
ऐसी है वाल्मीकि रामायण की राम कथा. 
इसे पढ़ कर तुलसी दास खिन्न हुए और अतीत में डूबकी लगा कर राम युग में जाकर जन्म लिया. राम के जन्म से लेकर मृयु तक वहीँ वास किया 
और शोध लेकर अपनी वर्तमान अवस्था में लौटे.
(तुलसी रामायण के संदर्भ लेख में पोंगा पंडित का विवरण देखें)
जिसे पढ़ कर पंडित विद्वानों ने कहा 
"साला वाल्मीकि ब्रह्मण नही भंगी था." 
इसे देख कर वाल्मीकि की आत्मा भले ही आहत हुई हो मगर समाज के अति घिरणित भंगियों को मुफ़्त ही एक सम्मानित पैग़मबर मिल गया.  
नोट ; - ग्यारवीं शताब्दी में एक परित्यगीय सीता नाम की महिला संस्कृति विद्वान वाल्मीकि के आश्रम में शरण में थी, उसी सीता पर वाल्मीकि ने रामायण नाम की गाथा लिखी थी जिसे तत्कालीन राजा ने बहुत सराहा था. बाद में यह कथा ने जनता की पसंद बन कर खूब प्रसिद्धि पाई.
 यह वाल्मीकि रामायण सीता प्रधान है 
और तुलसी रामायण राम प्रधान है. 
उसके बाद रामायण एक लेखन विधा बन गई 
और अनेक भषाओं में दर्जनों रामायण लिखी गईं.  
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 11 December 2020

एजेंट्स


एजेंट्स 

मेरे एक नए नए रिश्तेदार हुए, जो कट्टर मुस्लिम हैं. 
उन्हों ने जब मेरे बारे में जाना तो एक दिन मोलवियों का जत्था लिए हुए 
मेरे घर में घुस आ आए.
मैंने लिहाज़न उस वक़्त उन्हीं के अंदाज़ में उनके साथ सलाम दुआ 
और उनका स्वागत किया. 
उन्हों ने अपने साथियों का परिचय कराया. 
उनमे एक ख़ास थे D U के प्रोफ़ेसर ज़जाक़ अल्ला (बदला हुआ नाम) यह पहले पंडित रामाकांत मिश्र (बदला हुआ नाम) हुवा करते थे, इस्लाम के प्रभाव में आकर कलमा पढ़ लिया और मुसलमान हो गए . 
ज़जाक़ अल्ला ने मुझे इस्लाम की कई ख़ूबियाँ गिनाईं, 
हिन्दुओं में बहुतेरी ख़ामियां भी साथ साथ . 
पंडित जी ने कठ मुल्लों जैसी दाढ़ी रख ली थी 
और उन से ही कुछ सीखा था, 
कठमुल्लों जैसा अंदाज़ था उनका . 
मैं उनकी बातें को नाटकीय अंदाज़ में बड़ी तवज्जो के साथ सुनता रहा. 
दो मुसलमान उनके साथ थे . 
उन में से एक ने हदीस बयान की कि 
हज़रत मुहम्मद रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम 
(मुसलमान मुहम्मद का नाम इतनी उपाधियों के साथ ही लेता है 
या फिर उनको हुज़ूर कहता है .) 
के पास एक सहाबी आया और हुज़ूर (मुहम्मद) से एक काफ़िर के क़त्ल का वाक़िया बयां किया कि 
काफ़िर भागता रहा, मैं दौड़ाता रहा, वह थक कर गिर पड़ा तो हाथ जोड़ कर कलिमा पढ़ने लगा, मगर उसको मैंने छोड़ा नहीं . 
हुज़ूर ने पूछा मार दिया ? 
हाँ . 
हुज़ूर ने कहा कलिमा पढ़ लेने के बाद भी ? 
उसने कहा हाँ भाई हाँ, 
वह तो मजबूरी में कलिमा पढ़ने लगा, जान बचाने के लिए. 
हुज़ूर ने कहा कलिमा पढ़ लेने के बाद तुम्हें उसे मारना नहीं चाहिए था. 
हुज़ूर ने तीन बार इस बात को दोहराया.
मौलाना साबित करना चाहते थे कि इस्लाम में ज़्यादती नहीं है.
मौलाना की हदीस सुनने के बाद मैंने कहा आपने पूरी हदीस नहीं बयान की. 
जी ? वह चौंके .
जी मारने वाला हुज़ूर की हब्शी लौंडी ऐमन का लौंडा ओसामा था 
जो कि हुज़ूर को बेटे की तरह अज़ीज़ था. 
उसने हुज़ूर को बड़ी मायूसी के साथ जवाब दिया था कि 
इस्लाम क़ुबूल करने में मैंने जल्दबाज़ी की.
सुन कर मौलाना का ख़ून जम गया.
पंडित जी ने बहुत सी बकवासें कीं जिसे मैं लिहाज़ में सुनता रहा मगर जब उन्हों ने कहा कि वेद में भी हज़रत मुहम्मद रसूल्लिल्लाह सल्लल्लाह ए अलैहि वसल्लम के बारे में भविष्य वाणी की गई है. 
उन्हों ने महमद के नाम से कोई कबित सुनाई. 
तब तो मुझे ग़ुस्सा आ ही गया. 
मैंने पूछा किस वेद में ? 
बोले भाई ऋग वेद में. 
मैंने पूछा किस मंडल में कौन सी सूक्ति है ? 
तब तो पंडित जी के कान खड़े हुए . 
कहा यह तो देख कर ही बतला पाएँगे. 
हाँ बतलइए गा, वैसे वेद तो मेरे पास भी है, ख़ैर मगर छोडो.
अस्ल में यह नक़ली मुसलमान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए आहूतियां हैं जो मुसलमानों में घुसकर कई महत्त्व पूर्ण काम करते हैं. उसी में एक यह भी है कि इनको मज़बी खंदकों में गिराने का काम करते रहें.
मुस्लिम आलिम भी इनकी साज़िश और सहायता में मग्न रहते हैं. 
धर्म और मज़हब का यही किरदार है.
***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 10 December 2020

अंडे में इनक़्लाब






























अंडे में इनक़्लाब

इंसानी ज़ेहन जग चुका है और बालिग़ हो चुका है. 
इस सिने बलूग़त की हवा शायद ही आज किसी टापू तक भले न पहुँची हो,  
रौशनी तो पहुँच ही चुकी है, 
यह बात दीगर है कि नस्ल-इंसानी चूज़े की शक्ल बनी हुई 
अन्डे के भीतर बेचैन कुलबुलाते हुए, अंडे के दरकने का इन्तेज़ार कर रही है. 
मुल्कों के हुक्मरानों ने हुक्मरानी के लिए सत्ता के नए नए चोले गढ़ लिए हैं. 
कहीं पर दुन्या पर एकाधिकार के लिए सिकंदारी चोला है 
तो कहीं पर मसावात का छलावा. 
धरती के पसमांदा टुकड़े बड़ों के पिछ लग्गू बने हुए है. 
हमारे मुल्क भारत में तो कहना ही क्या है! 
क़ानूनी किताबें, जम्हूरी हुक़ूक़, मज़हबी जूनून, धार्मिक आस्थाएँ, 
आर्थिक लूट की छूट एक दूसरे को मुँह बिरा रही हैं. 
90% अन्याय का शिकार जनता अन्डे में क़ैद बाहर निकलने को बेक़रार है, 
10% मुर्गियां इसको सेते रहने का आडम्बर करने से अघा ही नहीं रही हैं. 
गरीबों की मशक़्क़त ज़हीन बनियों के ऐश आराम के काम आ रही है, 
भूखे नंगे आदि वासियों के पुरखों के लाशों के साथ दफ़न दौलत 
बड़ी बड़ी कंपनियों के जेब में भरी जा रही है और अंततः 
ब्लेक मनी होकर स्विज़र लैंड के हवाले हो रही है. 
हज़ारों डमी कंपनियाँ जनता का पैसा बटोर कर चम्पत हो जाती हैं. 
किसी का कुछ नहीं बिगड़ता. 
लुटी हुई जनता की आवाज़ हमें ग़ैर कानूनी लग रही हैं 
और मुट्ठी भर सियासत दानों, पूँजी पतियों, धार्मिक धंधे बाजों 
और समाज दुश्मनों की बातें विधिवत बन चुकी हैं. 
कुछ लोगों का मानना है कि आज़ादी हमें नपुंसक संसाधनों से मिली, 
जिसका नाम अहिंसा है. 
सच पूछिए तो आज़ादी भारत भूमि को मिली, भारत वासियों को नहीं. 
कुछ सांडों को आज़ादी मिली है और गऊ माता को नहीं. 
जनता जनार्दन को इससे बहलाया गया है. 
इंक़्लाब तो बंदूक की नोक से ही आता है, अब मानना ही पड़ेगा, 
वर्ना यह सांड फूलते फलते रहेंगे. 
स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वह चीन गए थे वहां उन्हों ने देखा कि हर बच्चा ग़ुलाब के फूल जैसा सुर्ख़ और चुस्त है. जहाँ बच्चे ऐसे हो रहे हों वहां जवान ठीक ही होंगे. कहते है चीन में रिश्वत लेने वाले को, रिश्वत देने वाले को 
और बिचौलिए को उनके संबंधियों के सामने एक साथ गोली मारदी जाती है. 
भारत में गोली किसी को नहीं मारी जाती, चाहे वह रिश्वत में भारत को ही लगादे. दलितों, आदि वासियों, पिछड़ों, ग़रीबों और सर्व हारा से अब सेना निपटेगी. 
नक्सलाईट का नाम देकर 90% भारत वासियों का सामना भारतीय फ़ौज करेगी, कहीं ऐसा न हो कि इन 10% लोगों को फ़ौज के सामने जवाब देह होना पड़े 
कि इन सर्व हारा की हत्याएं हमारे जवानों से क्यूं कराई गईं? 
और हमारे जवानों का ख़ून इन मज़लूमों से क्यूं कराया गया? 
मज़लूम  जिन अण्डों में हैं उनके दरकने के आसार भी ख़त्म हो चुके हैं. 
कोई चमत्कार ही उनको बचा सकता है.  
***
जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 8 December 2020

सूरतें क्या ख़ाक में होंगी ?

सूरतें क्या ख़ाक में होंगी ?

मुहम्मद ने क़ुरआन में क़ुदरत की बख़्शी हुई नेमतों का जिस बेढंगे पन से बयान किया है, उसका मज़ाक़ ही बनता है न कि कोई असर ज़हनों पर ग़ालिब होता हो. 
बे शुमार बार कहा होगा ''मफ़िस समावते वमा फ़िल अरज़े'' 
यानी आसमानों को (अनेक कहा है और ज़मीन को केवल एक कहा है). 
जिसका परियाय ये कि आसमान अनेक और ज़मीन एक, 
जब कि आसमान, कायनात न ख़त्म होने वाला एक है और उसमें ज़मीने, बे शुमार हैं अरबो खरबों. 
वह बतलाते हैं.
पहाड़ों को ज़मीन पर इस लिए ठोंक दिया कि तुम को लेकर ज़मीन डगमगा न सके. परिंदों के पेट से निकले हुए अंडे को बेजान बतलाते है और अल्लाह की शान कि उस बेजान से जान दार परिन्द निकल देता है. 
ज़मीन पर रस्ते और नहरें भी अल्लाह की तामीर बतलाते हैं. 
कश्ती और लिबासों को भी अल्लाह की दस्त कारी गर्दानते है. 
मुल्लाजी कहते हैं अल्लाह अगर अक्ल ही देता तो दस्तकारी कहाँ से आती? 
मुहम्मद के अन्दर पयंबरी फ़िक्र तो छू तक नहीं गई थी कि 
जिसे हिकमत, मन्तिक़ या साइंस कहा जाए. 
ज़मीन कब वजूद में आई? कैसे इरतेक़ाई सूरतें इसको आज की शक्ल में लाईं, 
इन को इससे कोई लेना देना नहीं, 
बस अल्लाह ने इतना कहा'' कुन'', यानी होजा और ''फयाकून'' हो गई.
जब तक मुसलमान इस क़बीलाई आसन पसंदी को ढोता रहेगा, 
वक़्त इसको पीछे करता जाएगा. 
जब तक मुसलमान मुसलमान रहेगा उसे यह क़बीलाई आसन पसंदी ढोना ही पड़ेगा, जो कुरआन उसको बतलाता है. 
मुसलमानों के लिए ज़रूरी हो गया है कि वह इसे अपने सर से उठा कर दूर फेंके और खुल कर मैदान में आए.
ब्रिज नारायण चकबस्त ने दो लाइनों में पूरी मेडिकल साइंस समो दिया है.

ज़िन्दगी क्या है? अनासिर में ज़हूरे तरतीब,
मौत क्या है? इन्ही अजज़ा का परीशां होना.

क़ुरआन की सारी हिकमत, हिमाक़त के कूड़े दान में डाल देने की ज़रुरत है.
अगर ग़ालिब का यह शेर मुहम्मद की फ़िक्र को मयस्सर होता तो शायद क़ुरानी हिमाक़त का वजूद ही न होता - - -

सब कहाँ कुछ लाला ओ गुल में नुमायाँ हो गईं,
सूरतें क्या ख़ाक में होंगी जो पिन्हाँ हो गईं''
*****


जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Monday, 7 December 2020

Ved Is At Your Door


Ved Is At Your Door 

मैं वन्धना (कानपुर) स्थित चिन्मय ओल्ड एज होम में कुछ दिनों के लिए था. 
यह आश्रम वन्धना और बिठूर के बीच स्थित है जो कभी डाकू बाल्मीकि की शरण स्थली हुवा करती थी.
आश्रम में एक मुस्लिम की आमद पर सुगबुगाहट उठने लगी. 
बात पहुंची संचालक स्वामी शंकरा नन्द तक . 
बूढों ने अपनी शंका ज़ाहिर की कि एक मुस्लिम आश्रम में आ गया है , 
हम लोगों को ख़तरे का आभास होने लगा है. 
आश्रम संचालक स्वर्गीय शंकर नन्द उनकी बातें सुनकर मुस्कुताए 
और कहा कि ख़तरा तो उस मुस्लिम को महसूस होना चाहिए कि हिंदुओं के बीच अकेला रह रहा है, न कि आप लोगों को.
मुझे इस बात की जानकारी हुई तो बात गाँधी जी की याद आई कि 
हिन्दू मानस बहुधा कायर होता है. 
स्वामी जी जो Ved Is At Your Door का मिशन अंतर राष्टीय स्तर पर चलाते थे, 
ने उन लोगों से पूछा जब मैं मिडिल ईस्ट जाता हूँ तो किसका अतिथेय बनता हूँ ? ज़ाहिर है मुसलमाओं का. अगर उनको मालूम हो कि हम मुसलमानों को आश्रम में नहीं रखते तो मैं क्या जवाब दूँ? 
दूसरे दिन से आश्रम में मेरी इज्ज़त होने लगी और गऊ शाला की ज़िम्मे दारी मैंने ले ली साथ साथ सबज़ी ख़रीदारी का ज़िम्मा भी.
आश्रम की दो बातें मुझे अकसर याद आती है , 
पहली यह कि एक गाय की डिलीवरी पेचीदा हो गई थी, मैं स्कूटर से भाग कर डाक्टर को वन्धना से लेकर आया तो बछड़ा पैदा हो सका. उस बछड़े के साथ मैं रोज़ खेलता. दूसरी हक़ीक़त यह कि - - - 
बियाई हुई गाय में दूध न था. 
ऐसे में एक सज्जन आए और दूसरी ब्याई हुई गाय लाकर आश्रम को पुजा गए, 
दूसरे दिन पता चला कि उसमें भी दूध देने की क्षमता न थी. 
चार प्राणियों के पालन पोषण की चर्चा हो ही रही थी कि एक सुबह मैं उठ्ठा , 
देखा तो दोनों गाय नदारद ? 
मैंने पाल से पूछा तो उसने इशारों से बतलाया कि ठिकाने लग गई.
यानी क़साई के हवाले कर दी गईं.
यह हिन्दू और मुस्लिम का समाज कितना खोखला है. 
झूटी मर्यादाएं जी रहे हैं दोनों.

***

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Sunday, 6 December 2020

धर्म मुक्त धरती

धर्म मुक्त धरती 

अन्न और घी को आग में झोंक कर क्षितिज को शुद्ध करने वाले मूरख ! 
अपनी नीदें खोलें, 
उनको ग़लत फ़हमी हुई है कि सदियों बाद उनका साम्राज्य स्थापित होने जा रहा है. 

बार बार उनके कान में फूंका जा रहा है कि शब्द हिन्दू, 
आक्रमण कारी विजेताओं, अरबियों और फ़ारसियों की बख़्शी हुई उपाधि है, जो उनकी भाषा में कुरूप काले चोर उचक्कों को कहा जाता है. और तथा कथित हिन्दू परिषद फिर भी अपने इस अपमान पर गर्व करता है ?? 
कैसा आशचर्य है कि शायद यही हिन्दू परिषद की नियति है. 
दक्षिण भारत में "द्रविण मुन्नैत्र" शुद्घ शब्द है जोकि हिन्दू का बदल हो सकता है, 
मगर यहाँ पर स्वर्ण फिर भी फंस जाते हैं कि वह आर्यन है और 
उनका मूल रूप ईरान है, इस ऐतिहासिक सत्य को कभी भी ढका नहीं जा सकता. 
दर अस्ल हिंदुत्व और इस्लाम एक ही सिक्के दो पहलू हैं. 
हिंदू अपने आधीनों को कभी भी मार नहीं डालता , 
उसके यहाँ तो जीव हत्या पाप है 
चाहे वह बीमारी फ़ैलाने वाले जीव जंतु ही क्यों न हों, 
आधीन उसके लिए "सवाब जरिया" (सदयों जारी रहने वाला पुण्य) होते हैं जिन्हें वह कभी मारता है, और न मोटा होने देता है. 
मनुवाद को ईमान दारी से पढ़िए अगर असली कहीं मिल सके. 
इस्लाम क़त्ल और ग़ारतगरी पर ईमान रखता है , 
यहूदियत की तरह. 
हिन्दू परिषद वालो सावधान ! 
देश की अवाम जाग चुकी है , 
तुमको हमेशा की तरह एक बार भी बड़ी ज़िल्लत उठानी पड़ेगी.  
मानवता अपने शिखर विंदू को छूने वाली है. जिसके तुम दुश्मन हो. 
इस्लाम ख़ुद अपने ताबूत में आख़िरी कील ठोंक रहा है. 
सऊदी की जाम गटरों से क़ुरआन की जिल्दें निकाली जा रही हैं.  
बहुत हो चुकी धर्म व् मज़हब की धांधली,
अब मानव समाज को धर्म मुक्त धरती चाहिए. 
जो फ़ितरी सदाक़तो और लौकिक सत्य पर आधारित हो.
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 जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Saturday, 5 December 2020

माता


माता 

मैं मुस्लिम बाहुल्य और मुस्लिम शाशक कस्बे में पैदा हुवा, 
चार पाँच की उम्र से सामाजिक चेतना मुझ में जागने लगी थी. 
माहौल के हिसाब से ख़ुद को हिन्दुओं से बरतर समझने लगा था. 
सेवक लोग उस समय के प्रचलित अछूत हुवा करते थे 
जो शक्लन काले कलूटे मज़लूम लगते . 
हिन्दू अकसर मुझे चेचक ज़दा चेहरे दिखते . 
बड़ों से मालूम हुवा कि चेचक एक बीमारी होती है 
जिसमें पूरे शरीर पर फोड़े निकल आते हैं , 
हिदू इसे माता कहते हैं और इलाज नहीं कराते . 
मेरे मन में शब्द माता घृणित बीमारी जैसा लगने लगा .
बाज़ार में एक बनिए की दूकान में आग लग गई तो 
बूढ़ी बानिन लोगों को आग बुझाने से रोक रही थीं कि 
अग्नि माता को मत बुझाव . 
इससे मेरी समझ में आया कि वाक़ई माता ख़तरनाक हुवा करती हैं .
मैं अपनी माँ के साथ बस द्वारा कानपुर आ रहा था कि शोर सुना 
जय गंगा मय्या की, बस से झांक कर देखा तो पहली बार देखा, 
एक विशाल नदी ठाठें मार रही थी, डर लगा. 
माँ से मालूम हुवा हिन्दू गंगा नदी को माता कहते हैं.
अभी तक माता बमानी माँ होती है, मैं नहीं जनता था, 
इस लिए हर ख़तरनाक बात को माता समझता था.
क़स्बे में काली माई का मेला हुवा करता था जिसमे माताओं की ख़तरनाक तस्वीरें हुवा करती थीं, कोई ख़ूनी ज़बान बीता भर की लपलपाती हुई होती, 
तो कोई नर मुंड का हार पहने दुर्गा माता हुवा करती थी. 
माँ का तसव्वुर मेरे ज़ेहन में घिनावना ही होता गया.
क़स्बे में गाय का गोश्त एलानया कटता और बिकता. 
सुनने में आया कि हिन्दू गाय को भी माता कहते हैं. 
माता ! माता !! अंततः मेरी झुंझलाहट को पता चला  कि माता के मानी माँ के हैं.
शऊर बेदार हुवा तो इस माता पर ग़ौर किया, बहुत सी माताएं सुनने में आईं, 
धरती माता, सीता माता, लक्ष्मी माता, सरस्वती माता, सति माता, 
संतोषी माता से होते हुए बात राधे माता (डांसर ) तक आ गई .
पिछले दिनों गऊ माता के सपूतों ने काफ़ी ऊधम काटा 
और कई मानव जीव भी काटा.
अब नए सिरे से सियासी भूत अवाम पर चढ़ाया जा रहा है 
"भारत माता" .
ख़ैर ! मैं सियासी फ़र्द नहीं समाजी चिन्तक हूँ . 
इन माताओं की भरमार में इंसान की असली माता पीछे कर दी गई है . 
सदियों से वह इतनी पीछे है कि उसका ठिकाना गंगा पुत्रो के शरण में है . 
उसकी किसी हिन्दू को परवाह नहीं कि 
अन्य कल्पित माताएं उन्हें दूध भी दे रही हैं और कुर्सियां भी .
हिन्दू भाई अन्य समाज से ख़ुद को नापें तौलें 
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Friday, 4 December 2020

ख़ुद में तलाश


 ख़ुद में तलाश 

आज हर तरफ़ आध्यात्म की सौदागरी हो रही है. 
हर पांचवां आदमी चार को बाबाओं की तरफ़ घसीटता नज़र आ रहा है. 
ऊपर से आधुनिक ढ़ंग के संचार का चारों ओर जाल बिछा हुवा है. 
हर कैडर के इंसानी दिमाग की घेरा बंदी हो रही है. 
हर तबक़े के लिए रूहानी मरज़ की दवा ईजाद हो चुकी है. 
ओशो अपने आश्रम में कहीं सेक्स की आज़ादी दे रहे है 
तो दूसरी तरफ़ योगी उस के बर अक्स लोगों को सेक्स से 
दूर रहने के तरीक़े बतला रहे हैं. 
बीच का तबक़ा जो इन दो पाटों में फंसा हुवा है 
वह भगवानो की लीला ही देख कर 
या लिंग की पूजा करके ही सेक्स की प्यास बुझा लेता है.

और भी गम है ज़माने में लताफत से सिवा. 

बीमारियाँ इंसान का एक बड़ा मसअला बनी हुई हैं. 
जिसके लिए औसत आदमी डाक्टर के बजाए पीर फ़क़ीर 
और बाबाओं के फंदे में खिंचे चले आते है. 
समस्या समाधान के लिए लोग एक दूसरों पर आधारित रहते है.
अस्ल में यह मसअले समाज के मंद बुद्धि लोगों के हैं.
समझदार लोग तो ख़ुद अपने आप में बैठ कर समस्या का समाधान तलाश करते है, किसी से दिमाग़ी क़र्ज़ नहीं लेते और न किसी का शिकार होते हैं. 
हमारे मसाइल का हम से अच्छा कौन साधक हो सकता है. 
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Thursday, 3 December 2020

तलवार और क़लम


तलवार और क़लम 

फ़तह मक्का के बाद मुसलामानों में दो बाअमल गिरोह ख़ास कर वजूद में आए जिन का दबदबा पूरे खित्ता ए अरब में क़ायम हो गया. 
पहला था तलवार का क़ला बाज़ और दूसरा था क़लम बाज़ी गर. 
अहले तलवार जैसे भी रहे हों बहर हाल अपनी जान की बाज़ी लगा कर अपनी रोटी हलाल करते, मगर इन क़लम के बाज़ी गरों ने आलमे इंसानियत को जो नुकसान पहुँचाया है,  उसकी भरपाई कभी भी नहीं हो सकती. 
अपनी तन आसानी के लिए इन ज़मीर फ़रोशों ने मुहम्मद की असली तसवीर का नक़शा ही उल्टा कर दिया. इन्हों ने क़ुरआन की लग्वियात को अज़मत का गहवारा बना दिया. 
यह आपस में झगड़ते हुए मुबालग़ा आमेज़ी (अतिशोक्तियाँ ) में एक दूसरे को पछाड़ते हुए, झूट के पुल बांधते रहे. 
क़ुरआन और कुछ असली हदीसों में आज भी मुहम्मद की असली तस्वीर सफ़ेद और सियाह रंगों में देखी जा सकती है. इन्हों ने हक़ीक़त की बुनियाद को खिसका कर झूट की बुन्यादें रखीं और उस पर इमारत खड़ी कर दी.
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जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Wednesday, 2 December 2020

आयशा की किरदार कुशी


आयशा की किरदार कुशी 

तजदीद हदीस बुख़ारी उर्दू ११३१ 

मुहम्मद की पोती नुमा बीवी कहती हैं कि मुहम्मद जब भी जंग के लिए जाते तो साथ में अपनी किसी न किसी बीवी को ज़रूर ले जाते. इसके लिए वह बीवियों की क़ुरअ अंदाजी करते. वह किसी जंग में जा रहे थे कि क़ुरअ अंदाजी में मेरा नाम निकल आया. चूंकि परदे का हुक्म जारी हो चुका था इसलिए मेरी ख़ातिर परदे दार कुजावे (ऊंटों पर रखा जाने वाला हौद) का इन्तेज़ाम किया गया. कुजावा मय सवारी के ऊंटों पर चढ़ा दिया जाता और इसी तरह मय सवारी उतारा जाता. 
मुहम्मद जंग से फ़ारिग़ होकर मदीना वापस हो रहे थे कि मदीने के पहले पहुँच कर आख़री मंज़िल में शब गुज़ारी के लिए ऐलान हुवा. 
मैं सुबह को क़ज़ाए हाजत के लिए कुजावे से बाहर निकली और दूर चली गई, 
वापसी में मेरा हाथ अपने गले पर गया तो एहसास हुवा कि मेरा शुग़रे-ज़ुफ़ार का हार गले से ग़ायब था, मैं वापस उस मुक़ाम तक गई और हार ढूंढती रही. हार ख़ुदा ख़ुदा करके मिल गया तो मैं वापस क़ाफिले के पास गई, तो वहां देखा कुछ न था, मालूम हुवा क़ाफ़िला कूच कर गया, मेरा सर चकराया और मैं वहीँ बैठ गई. 
आयशा कहती हैं मैं उस ज़माने मैं एक हलकी फुल्की लड़की थी जैसे कि कुँवारी लड़कियां होती हैं, मजदूरों को ख़याल हुवा कि मैं कुजावे बैठी हूँ, ग़रज़ ख़ाली कुजावा ऊँट पर कस दिया गया. मै सोचने लगी कि जब लोग कुजावे में मुझे न पाएँगे तो ज़रूर वापस होंगे. 
इसी मुक़ाम पर बैठे बैठे मुझे नींद आ गई. 
हज़रात सिफ़वान इब्ने मुअत्तल जो की क़ाफ़िले के पीछे सफ़र किया करते थे 
(इस लिए कि क़ाफ़िले की कोई चीज़ छूट गई हो तो उसे उठा लें)
जब सुबह को मेरे क़रीब पहुंचे तो मुझे पहचान लिया. उन्हों ने ऊँट पर मुझे बिठाया और ख़ुद मोहार पकड़ कर चलने लगे यहाँ तक कि मेरा क़ाफ़िला मैदान में धूप सेंकता हुवा मुझे मिल गया. 
इस अरसे में जिसको फ़ितना आराई करनी थी, कर चुके थे.
(यह अब्दुल्ला इब्न अबी, इब्ने सलूल था जिसने आयशा पर बोहतान तराशी की थी.) 
हम लोग मदीना पहुंचे, मैं वहां बीमार पड़ गई, बोहतान की ख़बर मदीने में रोज़ बरोज़ तरक़्क़ी करती गई और मेरे शौहर मुहम्मद भी उनमें शामिल हो गए जो इलज़ाम तराशी में थे. 
इस बीमारी में मैं बहुत ज़ईफ़ हो गई. 
एक दिन मेरी एक दोस्त ने बोहतान की पूरी दास्तान मुझको सुनाई. 
मैं इसे सुन कर और भी नहीफ़ हो गई. 
मै अपने मायके चली गई जहाँ मेरी माँ ने मुझे तसल्ली दी. 
इस दौरान मुहम्मद ने अली औ ओसामा इब्ने ज़ैद को बुलाया और मश्विरह तलब किया (इस दौरान शायद अल्लाह भी शक ओ शुब्हः में पड़ा था कि वहिय न भेजता था) दोनों ने अपने अपने तबीयत के मुताबिक़ राय दिया, ओसामा ने आयशा के हक़ में मश्विरह दिया मगर अली ने कज अदाई की. बात को बरीरा तक बढ़ा दिया. 
बरीरा ने भी मुहम्मद को आयशा की खूबियाँ ही बतलाईं.
मुहम्मद वहां से उट्ठे और सीधे सलूल की तरफ़ गए और इलज़ाम तराशों को कुछ मशविरा देने के बाद उनसे मुआज्रत ख़्वाह होने पर ज़ोर दिया. बात बढ़ कर क़बीलाई अज़मतों तक पहुँच गई. दो मक्की और मदनी क़बीलाई सरदारों में पहले लफ़ज़ी जंग हुई, बात बढ़ गई तो हाथ तलवारों तक पहुँच गए. इस नाज़ुकी को देख कर मुहम्मद उठे और सबको ख़मोश किया और ख़ामोशी छा गई. 
आयशा कहती है कि रो रो कर उसका हाल बुरा था कि एक महीने बाद मुहम्मद ने ज़बान खोली, आकर बैठे और कहने लगे 
"आयशा मुझे यक़ीन है कि अल्लाह जल्द ही तुम्हारे बारे में वह्यी भेजेगा फिर भी अगर तुमने ऐसे फ़ेल का इर्तेक़ाब किया है तो ख़ुदा तअला से तौबा करो, क्योंकि जब कोई बन्दा गुनाह करके तौबा करता है तो ख़ुदा उसके गुनाहों को मुआफ़ कर देता है." 
मुहम्मद का कलाम ख़त्म हुवा तो आयशा के आंसू ख़ुश्क हो चुके थे और वह हर एहसास से ख़ुद को बरी कर लिया था, 
बाप से बोली इनसे बातें आप ही कर लें या वाल्दा, 
दोनों ने कहा बेटी मैं ख़ुद हैरान हूँ कि नबी को क्या जवाब दें. 
आयशा कहती है "ख़ुदा की क़सम मैं ने महसूस किया है कि मुआमले को लोगों ने इतना मशहूर किया है कि सबके दिलों में यह यक़ीन बन गया है कि मैं मुजरिम हूँ, आप लोग मेरी हाँ करने के मुन्तजिर हैं. आप लोग जो बयान करते हो, इसके लिए मेरा ख़ुदा ही मेरा मदद गार है." 
ये कहती हुई अपने बिस्तर पर चली गई कि "मैं अपने आप को इस क़ाबिल नहीं समझती कि मेरी ज़ात पर वह्यी उतरे और क़ुरआन में मेरा वाक़िया नमाज़ों में पढ़ा जाए. मैं ख़ुद को इकदम कमतर समझती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि अल्लाह ताला नबी को सच ख़्वाब में दिखला दे."
इसके बाद मुहम्मद पर वह्यी आई, वह पसीना पसीना हुए और बोले 
"आयशा तुन इलज़ाम से बरी हुईं, अल्लाह ने तुम्हारे बारे में वह्यी भेज दी है."
 आयशा की मां ने उस से कहा "बेटी तू मुहम्मद का शुक्रिया अदा कर कि उनका दिल साफ़ हो गया है". 
आयशा बोली "मैं अल्लाह के आलावा किसी का शुक्रिया नहीं अदा करूंगी." 
इस वह्यी के नाटक के बाद कि मुहम्मद के अल्लाह ने मुहम्मद को अपनी शहादत दे दी, ये शख़्स फिर अपने अल्लाह पर शक करता हुआ अपनी बे निकाही बीवी ज़ैनब से दर्याफ़्त करता है कि 
"ज़ैनब तुम बतलाओ कि आयशा का किरदार कैसा है?" 
ज़ैनब भी आयशा की कट्टर सौतन होते हुए भी कहा 
"मैंने आयशा के किरदार में कोई लग़ज़िश नहीं पाई". 

* इस वाक़िए की हक़ीक़त तो साफ़ नहीं है कि मुहम्मद की बीवी आयशा पर इलज़ाम सही हैं कि ग़लत? मगर मुहम्मद की पैग़म्बरी ज़रूर झूटी साबित होती है. 
एक कमज़ोर इंसान की तरह वह पूरी ज़िन्दगी शक ओ शुबह में पड़े रहे. उनका पाखंड वह्यी (आकाश वाणी) भी उनको इत्मीनान न दे सकी, जो मुसलमानों का अक़ीदा तकमील-क़ुरान है.

जीम 'मोमिन' निसारुल-ईमान

Tuesday, 1 December 2020

क़यामती साया


क़यामती साया          
 
आज इक्कीसवीं सदी में दुन्या के तमाम मुसलामानों पर मुहम्मदी अल्लाह का क़यामती साया ही मंडला रहा है. 
जो क़बीलाई समाज का मफ़रूज़ा ख़दशा हुवा करता था. 
अफ़ग़ानिस्तान दाने दाने को मोहताज है, ईराक अपने दस लाख बाशिदों को जन्नत नशीन कर चुका है, मिस्र, लीबिया और दीगर अरब रियासतों पर इस्लामी तानाशाहों की चूलें ढीली होती जा रही हैं. 
तमाम अरब मुमालिक अमरीका और योरोप के ग़ुलामी में जा चुके है, 
लोग तेज़ी से सर ज़मीन ए ईसाइयत की गोद में जा रहे हैं, 
कम्युनिष्ट रूस से आज़ाद होने वाली रियासतें जो इस्लामी थीं, 
दोबारा इस्लामी सफ़ में वापस होने से साफ़ इंकार कर चुकी हैं, 
11-9  के बाद अमरीका और योरोप में बसे मुसलमान मुजरिमाना वजूद ढो रहे हैं, 
अरब से चली हुई बुत शिकनी की आंधी हिदुस्तान में आते आते कमज़ोर पड़ चुकी है, सानेहा ये है कि ये न आगे बढ़ पा रही है और न पीछे लौट पा रही है, 
अब यहाँ बुत इस्लाम पर ग़ालिब हो रहे हैं, 
18  करोड़ बे क़ुसूर हिदुस्तानी बुत शिकनों के आमाल की सज़ा भुगत रहे हैं, 
हर माह के छोटे मोटे दंगे और सालाना बड़े फ़साद इनकी मुआशी हालत को बदतर कर देते हैं, और हर रोज़ ये समाजी तअस्सुब के शिकार हो जाते हैं, इन्हें सरकारी नौकरियाँ बमुश्किल मिलती है, 
बहुत सी प्राइवेट कारख़ाने और फ़र्में इनको नौकरियाँ देना गवारा नहीं करती हैं, 
दीनी तअलीम से लैस मुसलमान वैसे भी हाथी का छोत होते है, 
जो न जलाने के काम आते हैं न लीपने पोतने के, 
कोई इन्हें नौकरी देना भी चाहे तो ये उसके लायक़ ही नहीं होते. 
लेदे के आवां का आवां ही खंजर है.
दुन्या के तमाम मुसलमान जहाँ एक तरफ़ अपने आप में पस मानदा है, 
वहीं, दूसरी क़ौमों की नज़र में जेहादी नासूर की वजेह से ज़लील और ख़्वार है. 
क्या इससे बढ़ कर क़ौम पर कोई क़यामत आना बाक़ी रह जाती है? 
ये सब उसके झूठे मुहम्मदी अल्लाह और उसके नाक़िस क़ुरआन की बरकत है. 
आज हस्सास तबा मुसलमान को सर जोड़कर बैठना होगा कि 
बुज़ुर्गों की नाक़बत अनदेशी ने अपने जुग़राफ़ियाई वजूद को क़ुरबान करके 
अपनी नस्लों को कहीं का नहीं रक्खा.
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जीम 'मोमिन' निसा0रुल-ईमान